उत्तराखण्ड एक आध्यात्मिक खोज-7

 मेरी दो यात्राओं में मैंने बहुत अंतर देखा। 1995 की यात्रा में सुविधा का अभाव था लेकिन भाव पूर्ण यात्रा थी। 2010 की यात्रा में ऊपर तक फोन चल रहे थे, दुनियाभर की वस्तुएं वहां मिल रही थीं लेकिन मुझे लिखने में भी कष्ट होता है कि मैंने स्वयं कुछ तमोगुणी वस्तुएं ऊपर जाते देखी जो किसी भी तीर्थ की मर्यादा के लिए उचित नहीं। सच कहूं तो बहुत क्रोध आया था और शायद इसलिए 2013 की त्रासदी मुझे मानव जनित लगी। शिवपुराण में स्पष्ट लिखा है- देव स्थानों में किए पाप और पुण्य का फल हजार गुना ज्यादा मिलता है। पाप हजार गुना हमारी सभ्यता को वापस मिला। वो प्रकृति और हिमालय का क्रोध था और भीमशिला ने स्पष्ट संकेत दिया था कि ये क्रोध मानव सभ्यता को चेतावनी देने के लिए ही था। चारों ओर मौत ने तांडव किया था। शिव स्थल में लोगों की जीवित भक्ति ने ही उस वक्त दूसरों को सहारा दिया था इस बात की बानगी आप इस घटना में देखिएगा। मेरे भाई जैसे एक पारिवारिक मित्र हैं डॉक्टर मोहित तायल जो उस वक्त राज्य सरकार की तरफ से वहां लगे मेडिकल कैम्प में लोगों की जांच कर रहे थे। उनके अनुसार लोग जरूरत भर की दवाई लेकर बाकी पत्ता वापस कर दे रहे थे कि बाकी लोगों को भी जरूरत होगी। ऐसी अफरा-तफरी में भी इतना सब्र तो शिव भक्तों में ही हो सकता है

मौसम खराब होने के कारण वापसी में आपातकालीन निकासी शुरू हुई थी और पहले बुजुर्गों को एक अटेंडेंट के साथ नीचे भेजा गया। मेरे बड़े भैया ने नानी के साथ उड़ान भरी थी और हम नीचे वेटिंग एरिया से देख रहे थे। भैया ने नानी को इशारा कर मंदिर की तरफ देखने को कहा और नानी ने श्रद्धा से प्रणाम किया। मुझे ये स्पष्ट याद है। ये मेरी मेरे भाई के साथ आखिरी यात्रा थी, इसके कुछ ही महीनों बाद वो अपनी अनंत यात्रा पर निकल गया था। शायद इसी कारण ये आखिरी दृश्य मेरे अवचेतन में बैठ गया है। मुझे जब भी वो स्वप्न में दिखा है, शिव स्थान पर ही दिखा है और यह भी एक संकेत था। नहीं मालूम लोग इन बातों पर कितना यकीन करते हैं, पर मैं भी बाद में समझी। भैया की मृत्यु से एक-दो रात पहले मुझे कुछ सांकेतिक स्वप्न आए। उनमें से एक रात पहले वाला स्वप्न यही दृश्य था। स्वप्न में, मेरा पूरा परिवार केदारनाथ में दर्शन के लिए गया था और हम सबके दर्शन की व्यवस्था देखने के लिए भैया बांस की एक सीढ़ी पर चढ़ा और शिवाय नमः बोलने लगा। स्वप्न टूटा और मुझे कुछ समझ ना आया। उसकी मृत्यु के बहुत दिनों बाद जब मैं थोड़ी स्थिर हुई तो भान हुआ बांस की सीढ़ी पर चढ़कर शिव धाम जाने के और क्या ही अभिप्राय हो सकता था। शायद ऐसे ही तो नहीं कहा गया है श्मशान की भस्म में भी शिव हैं। वो प्रत्येक आत्मा का अंतिम विराम है और उन्हीं में एक दिन सबको समाना है।

खैर कुल मिलाकर मेरी दो यात्राओं में मैने बहुत अंतर देखा। 1995 की यात्रा में सुविधा का अभाव था लेकिन भाव पूर्ण यात्रा थी। 2010 की यात्रा में ऊपर तक फोन चल रहे थे, दुनियाभर की वस्तुएं वहां मिल रही थीं लेकिन मुझे लिखने में भी कष्ट होता है कि मैंने स्वयं कुछ तमोगुणी वस्तुएं ऊपर जाते देखी जो किसी भी तीर्थ की मर्यादा के लिए उचित नहीं। सच कहूं तो बहुत क्रोध आया था और शायद इसलिए 2013 की त्रासदी मुझे मानव जनित लगी।

शिवपुराण में स्पष्ट लिखा है- देव स्थानों में किए पाप और पुण्य का फल हजार गुना ज्यादा मिलता है। पाप हजार गुना हमारी सभ्यता को वापस मिला। वो प्रकृति और हिमालय का क्रोध था और भीमशिला ने स्पष्ट संकेत दिया था कि ये क्रोध मानव सभ्यता को चेतावनी देने के लिए ही था। चारों ओर मौत ने तांडव किया था। निश्चित ही उस दृश्य को देखकर बहुत-बहुत पीड़ा हुई। लेकिन ये भी लगा कि मानव का बोया मानव ही तो काटेगा। हिमालय के उस क्रोधित स्वरूप में कई गांव बह गए। पहाड़ी लोगों ने अपने घरों के महीनों के राशन को फंसे हुए भक्तों की सेवा में रातों-रात लुटाया था। शिव स्थल में लोगों की जीवित भक्ति ने ही उस वक्त दूसरों को सहारा दिया था इस बात की बानगी आप इस घटना में देखिएगा। मेरे भाई जैसे एक पारिवारिक मित्र हैं डॉक्टर मोहित तायल जो उस वक्त राज्य सरकार की तरफ से वहां लगे मेडिकल कैम्प में लोगों की जांच कर रहे थे। उनके अनुसार लोग जरूरत भर की दवाई लेकर बाकी पत्ता वापस कर दे रहे थे कि बाकी लोगों को भी जरूरत होगी। ऐसी अफरा-तफरी में भी इतना सब्र तो शिव भक्तों में ही हो सकता है।

मुझे स्वयं ये लगा था कि वाकई देवभूमि में आज भी देव स्वभाव लोग विचरते हैं। बहुत समय तक ‘वत्सल’ वहां सेवाएं देता था। ऐसी कई मार्मिक कहानियां हैं मेरे पास सुनाने को लेकिन आज उनका वर्णन न कर मैं मूल विषय पर वापस आती हूं।

त्रासदियों के बाद वाला केदारनाथ देखने को इच्छा तो बहुत है परंतु मन में 1995 वाले दर्शन जो बसे हुए हैं उन यादों की जगह नई यादों को लाने में जो साहस लगेगा शायद अभी वो मैं अपने भीतर नहीं ला पाई हूं इसलिए कई मौके मिलने के बावजूद 2010 से अब तक वहां बाबा ने बुलाया भी नहीं है। हालांकि अब सोशल मीडिया के जमाने में वहां घट रहे प्रत्येक बदलाव की तस्वीर देखने को मिल जाती है। कुछ बदलाव बहुत अच्छे हैं और कुछ हिमालय के नैतिक शास्त्र से परे। जिस देव स्थान पर स्वयं शिव ने मानव को छह महीने आने की अनुमति दी है वहां ऑल वेदर रोड का निर्माण मुझे देव वाणी की अवहेलना लगती है। परिणाम भी सुखद नहीं कहे जा सकते। अब छोटी-मोटी त्रासदी हर साल घट रही है।

दूसरा राज्य में राजस्व की दृष्टि से केदारनाथ को पर्यटन की दृष्टि से प्रचारित करना। हिमालय की यात्रा को सुगम कर हम पर्यावरण के विरुद्ध जाकर निराकार स्वरूप की मर्यादा का महत्व नहीं समझ रहे। शिव सिर्फ शिवालय में नहीं निराकार स्वरूप में प्रकृति में भी हैं। इसकी अनुभूति वहां विचरने वाले साधक आपको यूं ही करा देंगे।

तीसरा स्वयं सोचिए केदारनाथ में बाबा भैंस के स्वरूप में विराजित हैं और स्वयं ये संदेश देते हैं कि वो अबोले प्राणियों में भी समाते हैं दूसरी तरफ हर साल सीजन में इन बेजुबान जानवरों का जो शोषण होता है, उस कीमत पर कोई तीर्थ करने वाला क्या पुण्य कमाएगा?

नजर हो तो पाण्डवों जैसी जिन्होंने उस स्वरूप में भी शिव को पहचान लिया था। आधुनिक भक्तों ने तो उन्हें सिर्फ मंदिर की चारदीवारी की सीमा में बांध दिया है। मुझे ये बात लिखने में संकोच भी हो रहा है लेकिन सत्य ही तो शिव है।

शिव बाबा के दिव्य स्वरूप को समझने के लिए इन बिंदुओं पर विचार अवश्य करना होगा।
शर्वाय क्षितिरूपाय नंदीसुरभये नमः!
ईशाय वसवे सुभ्यं नमः स्पर्शमयात्मने!!
अर्थात्

नंदी और सुरभि कामधेनु भी आपके ही प्रतिरूप हैं। पृथ्वी को धारण करने वाले हे शर्वदेव! आपको नमस्कार है। हे वायुरुपधारी, वसुरुपधारी आपको नमस्कार है!!

अब जीव प्रकृति और स्वयं से परे शिव और कहां मिलेंगे लेकिन जागृत करने के लिए जब भी केदारनाथ आए ये सनद रहे कि शिव सर्वत्र व्याप्त है।

अब एक सवाल और – शिव को हम कलियुग के भक्त उन्हीं स्थानों तक सीमित क्यों रख देते हैं जहां शिवलिंग हो? जैसा कि विदित है शिव को साकार रूप में आना पड़ा एक विवाद सुलझाने और वैसे उनकी विराटता निराकार होने में भी है। ये ध्यान हमें निरंतर रहना चाहिए।
भारत भूमि के लिए तो कहा ही गया है इसका कंकड़-कंकड़ शंकर है। ये भी भाव एक गीत का था:

पहचान सके तो पहचान
कण-कण में छिपे भगवान

यहां भाव भूमि की पवित्रता से ही है। जहां धरती को और नादियों को मां की संज्ञा दी गई है। हिमालय को भी देव संज्ञा मिली है। फिर मेरा सवाल आप सभी पाठकों से ये है कि धरती मां नदी मां और हिमालय की निरंतर होती दुर्दशा पर हमारा मौन कैसे हमारा पाप नहीं है?

हिमालय उन संतों की भूमि है जहां महावतार बाबाजी ने क्रियायोग और हैडाख़ान बाबाजी ने कर्मयोग सिखाया फिर इसी पावन भूमि पर प्रकृति के साथ खिलवाड़ करते हुए हमारी साधना कैसे खंडित नहीं होगी? साथ ही गहन साधना में लीन सूक्ष्म विचर रही दिव्यात्माओं को भी हम अपने शोर से परेशान कर विघ्न ही उत्पन्न करते हैं।

हिमालय में हम भौतिक आराम के साधन जुटाते-जुटाते प्रकृति के साथ जो खिलवाड़ करते हैं उसमें पाप सिर्फ उस सुविधा के साधन जुटाने वाले पर नहीं उसका उपभोग करने वाले पर भी लगता है।

मुझे याद आता है कैलाश मानसरोवर यात्रा के दौरान मुझे ये अनुभव हुआ था कि शिव किसी मंदिर के मोहताज नहीं। शिव तो हिमालय में अनुभव करने का विषय है। विराट फैले मानस के नील जल से लेकर शुभ्रवस्त्रा हिमालय में शिव आपको अपने होने का अद्भुत प्रमाण देते हैं जिसका बखान शब्दों में सम्भव ही नहीं है। वहां जाकर आपको महसूस होता है कि अनंत ब्रह्माांड की तरफ बांह फैलाकर आप ब्रह्माांड की ऊर्जा का अंगीकार कर बेहतर साधना कर पायेंगे।

‘सत्यम शिवम् सुंदरम’ कठोपनिषद में ये वर्णन है कि सत्य ही शिव है और शिव ही सुंदर है। जहां सत्य होगा वहां ही ईश्वर विराजेंगे और बगैर सत्य का अनुपालन किए उनके स्वरूप को समझने का आप सिर्फ प्रयास मात्र कर पाएंगे। अब एक पल के लिए ध्यान लगाइए कब आखिरी बार किसी शिवालय में जल चढ़ाने के अलावा वहां साफ-सफाई की सेवा दी थी?

सनातन में पूजन से पहले आसन और स्वयं को जल के माध्यम से पवित्र करने का मंत्र कहा जाता है और ये भी कहा गया है स्थान की पवित्रता में ही देव निवास करते हैं। पवित्रता सिर्फ भौतिक ना होकर भाव रूप से भी पवित्र हो। डिजिटल युग में लोग अपने सब्सक्राइबर्स को ज्यादा लुभाते और सत्य खोजते कम दिखाई देते हैं।

सुंदर हिमालय में सत्य निष्ठ हिम देश के वासियों को जागकर हिमालय के स्वरूप को बिगाड़ने नहीं, संवारने के प्रयास करने होंगे। केदारनाथ में भी शिव पशु संरक्षण और प्रकृति संरक्षण का मौन संदेश से रहे हैं। इसी संदेश में शिव की साधना के संकेत हैं। सोचिए पशुओं पर अत्याचार कर शिव स्थान में कचरा फैलाकर या अमर्यादित लोक व्यवहार कर आप शिव को नहीं अपने अहम को पूज रहे हैं और जहां अहम होगा वहां शिव नहीं सिर्फ वहम मिलेगा।

ईश्वर से प्रार्थना है कि वो अपने स्वरूप को समझने की शक्ति हर साधक को प्रदान कर हिम क्षेत्र के स्वरूप को संरक्षित रखने में अपने योगदान देने की प्रेरणा सबको प्रदान करें।
साम्ब सदाशिव!

क्रमशः
(लेखिका रेडियों प्रजे़न्टर, एड फिल्म मेकर तथा
 वत्सल सुदीप फाउंडेशन की सचिव हैं)

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