अंगदान किसी अंग विफल मरीज के लिए किसी वरदान से कम नहीं होता है। अंग मिलना उसके लिए ज़िंदगी दुबारा मिलने जैसा है। यानी जीवन जीने का दूसरा मौका। अंगदान को लेकर दुनिया के बड़े देशों के अपेक्षा भारत में कम जागरूकता का हवाला दिया जाता रहा है। अमेरिका के बाद दुनिया में जीवित दाता ट्रांसप्लांट्स की दूसरी सबसे बड़ी संख्या भारत की मानी जाती है और तो और भारत में अंगदान करने में सबसे अधिक महिलाओं का योगदान है।
आंकड़ों के अनुसार, हर पांच में से चार अंगदान महिलाओं द्वारा किए गए हैं। वहीं, दान किए गए ऐसे पांच में से चार अंगों ने पुरुषों की जान बचाई है। आंकड़े तो यही कहते हैं। उनके अनुसार, 1995 से 2021 के बीच देश में 36 हजार 640 प्रत्यारोपण हुए। इनमें से 29 हजार अंग प्राप्तकर्ता पुरुष थे, जबकि केवल 6 हजार 945 महिलाओं को अंग प्रत्यारोपण से लाभ हुआ। वहीं इस अच्छी खबर का एक स्याह पक्ष भी है।
अखबार टाइम्स ऑफ इंडिया की रिपोर्ट के अनुसार अंगदान में इतना बड़ा अंतर आर्थिक और वित्तीय जिम्मेदारियों के साथ-साथ सामाजिक दबाव और अंतर्निहित प्राथमिकताओं के कारण है।
लिविंग ऑर्गन डोनेशन में भी महिलाएं आगे
लिविंग ऑर्गन डोनेशन यानी जीवित रहते हुए अंग दान करने वालों में भी महिलाएं अग्रणी हैं। नेशनल ऑर्गन ट्रांसप्लांट एंड टिश्यू ऑर्गनाइजेशन (NOTTO) के निदेशक डॉ. अनिल कुमार का कहना है कि अधिकतर महिलाएं जीवित दाता हैं। जबकि अधिकांश पुरुष अंगों को मृत दाताओं द्वारा दान किया गया था यानी उन पुरुषों के अंगों को मृत्यु के बाद दान किया गया था।
एक्सपेरिमेंटल एंड क्लिनिकल जर्नल में प्रकाशित शोध के अनुसार, 2019 में किए गए कुल अंग प्रत्यारोपणों में से 93% जीवित दाता थे। इन जीवित दाताओं में से 80% महिलाएं थीं। जबकि अंग प्राप्त करने वालों में 80% पुरुष थे। इसका मतलब यह है कि अंगदान के मामले में पुरुष महिलाओं को अंग दान देने में पीछे हटते हैं। एक जीवित दाता जीवित रहते हुए अपनी किडनी और लीवर दान कर सकता है। ज्यादातर मामलों में महिलाएं ही पुरुषों को किडनी दान करती हैं।
एक अध्ययन में पाया गया कि अधिकतर महिलाएं सामाजिक-आर्थिक दबाव के कारण अंग दान करने के लिए आगे आती हैं। उन्हें लगता है कि पुरुष ही घर में कमाने वाले होते हैं, अगर वे अंगदान करेंगे तो उन्हें घर पर बैठना पड़ सकता है। महिलाओं के अंगदान का कारण आर्थिक नुकसान से बचना है। महिलाएं न केवल अपने पति बल्कि अपने बच्चों और भाई-बहनों को भी अंगदान करती हैं।
अंगदान कानून और समस्याएं
चिकित्सा प्रयोजनों के लिए मानव अंगों को हटाने, भंडारण और प्रत्यारोपण की एक प्रणाली बनाने और मानव अंगों में व्यावसायिक लेनदेन को रोकने के लिए मानव अंग प्रत्यारोपण अधिनियम (टीएचओए) 1994 में अधिनियमित किया गया था। THOA को आज आंध्र प्रदेश और जम्मू-कश्मीर को छोड़कर सभी राज्यों द्वारा अपनाया गया है। 2011 में इसके संशोधित नियमों के अनुसार, यदि कोई जीवित व्यक्ति अंग दान करना चाहता है, तो इसे दो श्रेणियों के तहत अनुमति दी जाती है। यदि कोई करीबी रिश्तेदार है तो अस्पताल के सक्षम प्राधिकारी के माध्यम से प्रत्यारोपण की अनुमति दी जाती है। यदि दाता कोई करीबी रिश्तेदार नहीं है, तो सरकार द्वारा नियुक्त प्राधिकरण समिति के माध्यम से प्रत्यारोपण की अनुमति दी जाती है।

