कर्नाटक कांग्रेस में मुख्यमंत्री पद को लेकर लम्बे समय से चल रही खींचतान के बीच जिस अंदाज में सिद्धारमैया ने मुख्यमंत्री की कुर्सी छोड़ी है उसके बाद राजनीतिक गलियारों में एक बड़ा सवाल तेजी से उठ रहा है कि क्या सिद्धारमैया का यह ‘त्याग’ कांग्रेस को लम्बे समय तक बेचैन रखेगा? क्या कहानी अभी खत्म नहीं हुई है? मीडिया और सोशल मीडिया में ऐसे तमाम सवालों पर जोरदार चर्चा हो रही है। असल में सिद्धारमैया ने जाते-जाते जो संदेश दिए उन्होंने कांग्रेस हाईकमान के लिए असहज स्थिति पैदा कर दी है। उनका बयान कि ‘मैं दिल्ली नहीं जाऊंगा, राज्यसभा नहीं जाऊंगा, राजनीति नहीं छोड़ूंगा’ सिर्फ एक सामान्य राजनीतिक प्रतिक्रिया नहीं है बल्कि इसे हाईकमान की राजनीति को सीधी चुनौती के तौर पर देखा जा रहा है। संदेश साफ है कि मुख्यमंत्री की कुर्सी भले चली गई हो लेकिन उनकी राजनीतिक जमीन और जनाधार अब भी मजबूत है। कांग्रेस लम्बे समय से ऐसे नेताओं के साथ सहज नहीं रही है जिनका अपना स्वतंत्र राजनीतिक कद और जनाधार हो। सिद्धारमैया भी उन्हीं नेताओं में शामिल हैं। कर्नाटक में पिछड़े वर्गों और ग्रामीण समाज में उनकी गहरी पकड़ है। वे सिर्फ हाईकमान के भरोसे राजनीति करने वाले नेता नहीं रहे। यही वजह है कि विधानसभा चुनाव में कांग्रेस की जीत का सबसे बड़ा चेहरा भी उन्हें ही माना गया।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि राहुल गांधी की राजनीति पर अक्सर यह आरोप लगता रहा है कि पार्टी में ऐसे नेताओं को ज्यादा जगह मिलती है जो नेतृत्व को चुनौती न दें लेकिन सिद्धारमैया कभी ‘हां में हां’ मिलाने वाले नेता नहीं रहे। मुख्यमंत्री पद छोड़ने के बाद भी उन्होंने खुद को सक्रिय राजनीति से अलग करने से इनकार कर दिया। यही बात कांग्रेस नेतृत्व के लिए सबसे ज्यादा असहज करने वाली मानी जा रही है। आमतौर पर कांग्रेस में जब किसी बड़े क्षेत्रीय नेता को सत्ता से हटाया जाता है तो उसे राज्यसभा, संगठन या सलाहकार भूमिका देकर सम्मानजनक तरीके से सक्रिय राजनीति से दूर कर दिया जाता है। कई नेता इसे राजनीतिक रिटायरमेंट का सुरक्षित रास्ता मानकर स्वीकार भी कर लेते हैं लेकिन सिद्धारमैया ने यह रास्ता ठुकरा दिया। उन्होंने साफ संकेत दिया कि उन्हें दिल्ली भेजकर शांत करना आसान नहीं होगा।
सिद्धारमैया का रुख एक तरह से राजनीतिक विद्रोह जैसा दिखाई देता है। वे यह जताना चाहते हैं कि कर्नाटक की राजनीति में उनकी भूमिका अभी खत्म नहीं हुई है। राजनीति में कई बार सबसे ताकतवर वही नेता होता है जिसके पास पद भले न हो लेकिन मजबूत जनाधार और समर्थकों का नेटवर्क मौजूद हो। सिद्धारमैया फिलहाल उसी स्थिति में नजर आते हैं।
अब कांग्रेस के सामने सबसे बड़ी चुनौती सिर्फ डीके शिवकुमार को पूरी तरह स्थापित करने की नहीं होगी बल्कि सिद्धारमैया समर्थकों को संतुष्ट रखने की भी होगी। कर्नाटक कांग्रेस पहले से कई गुटों में बंटी हुई मानी जाती है। सिद्धारमैया और डीके शिवकुमार के समर्थकों के बीच अंदरखाने प्रतिस्पर्धा लम्बेे समय से चली आ रही है। ऐसे में अगर असंतोष बढ़ता है तो सरकार के लिए मुश्किलें खड़ी हो सकती हैं क्योंकि राजनीति में सबसे बड़ा खतरा हमेशा विपक्ष नहीं होता बल्कि पार्टी के भीतर का असंतोष होता है। कांग्रेस यह बात कई राज्यों में भुगत चुकी है। राजस्थान में अशोक गहलोत और सचिन पायलट का संघर्ष इसका उदाहरण रहा है। पंजाब में कैप्टन अमरिंदर सिंह और नवजोत सिंह सिद्धू के टकराव ने भी पार्टी को नुकसान पहुंचाया था। कर्नाटक में भी वैसी ही स्थिति बनने की आशंका जताई जा रही है।
राहुल गांधी के लिए भी यह पूरा घटनाक्रम एक राजनीतिक परीक्षा की तरह है। वे लगातार यह संदेश देने की कोशिश करते हैं कि कांग्रेस अब सामूहिक नेतृत्व वाली पार्टी बन रही है और क्षेत्रीय नेताओं को महत्व दिया जा रहा है लेकिन जमीन पर तस्वीर अक्सर अलग दिखाई देती है। बड़े फैसले अब भी हाईकमान के स्तर पर तय होते हैं। यही वजह है कि कांग्रेस में मजबूत क्षेत्रीय नेताओं की संख्या लगातार घटती गई। कई नेता या तो पार्टी छोड़कर चले गए या धीरे-धीरे हाशिए पर धकेल दिए गए।
सिद्धारमैया का मामला इसलिए भी अलग और महत्वपूर्ण माना जा रहा है क्योंकि वे अभी भी पूरी तरह सक्रिय दिखाई दे रहे हैं। उन्होंने न तो खुद को कमजोर दिखाया और न ही राजनीतिक संन्यास के संकेत दिए। इसके उलट उन्होंने यह जताने की कोशिश की कि उनका संघर्ष अभी खत्म नहीं हुआ है। यही वजह है कि उनका ‘त्याग’ कांग्रेस के लिए राहत से ज्यादा चिंता का विषय बन गया है। साफ है कि यह सिर्फ मुख्यमंत्री बदलने की कहानी नहीं है। यह कांग्रेस की उस पुरानी राजनीतिक संस्कृति की कहानी है जहां हाईकमान और क्षेत्रीय नेताओं के बीच संतुलन साधना हमेशा मुश्किल रहा है। सिद्धारमैया ने कुर्सी छोड़ी जरूर है लेकिन जाते-जाते वे कांग्रेस के सामने कई ऐसे सवाल छोड़ गए हैं जिनका जवाब पार्टी को आने वाले समय में देना होगा। यही वजह है कि उनका यह ‘त्याग’ कांग्रेस को लम्बे समय तक सोने नहीं देगा।
बहरहाल कर्नाटक की राजनीति में आने वाले दिनों में सबसे बड़ा सवाल यही रहेगा कि क्या सिद्धारमैया वास्तव में शांत बैठेंगे? अगर वे पर्दे के पीछे से भी सक्रिय रहते हैं तो कांग्रेस सरकार के भीतर शक्ति संतुलन लगातार चुनौती बना रहेगा। डीके शिवकुमार को अपनी पकड़ मजबूत करने के लिए सिर्फ विपक्ष से नहीं बल्कि पार्टी के भीतर की राजनीति से भी जूझना पड़ सकता है।