‘‘घर में भी एक पुराना बुढ़ा होता है उसे खांसते रहना चहिए। मैं भी इसी तरह से खांसता रहता हूं कि हमारे घर के लोग चौकन्ने रहे। आप मेरे प्रयासों को उसी खांसते हुए बूढ़े व्यक्ति से तुलना कर सकते हैं जो अपने लोगों को हमेशा चैकन्ना बनाए रखने का काम कर रहा है। मैं अब चुनाव लड़ाऊंगा। 2022 में भी मैं कहता रहा लेकिन पार्टी ने मेरा आग्रह नहीं माना और मुझे चुनाव लड़ने का आदेश दिया। अगर मेरा आग्रह मान लिया होता और मैं चुनाव लड़ने की बजाय कांग्रेस को चुनाव लड़वाता तो शायद आज कांग्रेस सत्ता में होती। मैं समेटने का काम करना चाहता हूं। जब-जब मैंने कांग्रेस में समेटने का काम किया तब-तब कांग्रेस जीती है। 2007 में भी हम सत्ता के मुहाने पर आ गए थे लेकिन हमें कहा गया कि हम जोड़-तोड़ से सरकार नहीं बनाएंगे तो हम पीछे हो गए।’’ उत्तराखण्ड के पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत से कृष्ण कुमार की बातचीत
सत्तहत्तर वर्ष की उम्र मेें भी आपकी जमीनी सक्रियता और संघर्ष प्रेरणादायी है। बार-बार चुनौतियों से उभर कर खड़े हो जाना आपकी आदत बन चुकी है। क्या आप अपने आपको फिनिक्स पक्षी के रूप में देखते हैं?
नहीं, ऐसा नहीं है। मैं एक बहुत ही सामान्य प्रकार का व्यक्ति हूूं लेकिन समय की चुनौतियों के अनुरूप आपको खड़ा होना पड़ता है। आज हमारी पार्टी के सामने भी, लीगेसी के सामने भी लीडरशिप के सामने भी और लोकतांत्रिक तौर पर भी गम्भीर सवाल खड़े हैं। उसका कोई भी सिपाही जब तक वह अंतिम यात्रा पर न हो उसके पांव रूकने नहीं चाहिए। यह लोकतंत्र है इसमें हमें लोकतंत्र और संविधान को बचाने और अपनी पार्टी को मजबूत करने का संघर्ष निरंतर करना चाहिए। मैं भी इसे अपना नैतिक धर्म मानकर इस काम को कर रहा हूं।
जब पार्टी आपके नेतृत्व में रही तब कांग्रेस के कई नेताओं ने पार्टी छोड़ी। क्या आप मानते हैं कि उस समय आप पार्टी को एकजुट नहीं रख पाए?
हां, यह भी कहा जा सकता है। यह पूरे देश में होता है। धन बल, सत्ता बल की ताकत से ऐसा पूरे देश में हो रहा है। पहले अन्य प्रदेशों में हुआ फिर यह हमारे प्रदेश में भी आया। लेकिन उत्तराखण्ड में हमने केंद्रीय सत्ता से लड़ाई लड़ककर अपने आप को मजबूत किया, अपनी सरकार को भी वापस करवाई। जबकि अन्य जगहों पर ऐसा नहीं हुआ।
आपने कई बार व्यक्तिगत आलोचनाओं और अपमानजनक परिस्थितियों को भी सार्वजनिक रूप से स्वीकार किया, फिर भी पार्टी के लिए डटे रहे। आपको यह शक्ति कहां से मिलती है?
आपके पास एक निश्चित शक्ति और समय है। आप उसका उपयोग कैसे करते हैं यह आप पर निर्भर करता है। मैं आलोचनाओं पर ध्यान नहीं देता। मैं अपना काम करता हूं, आलोचना करने वाले आपना काम करते हैं। मेरा लक्ष्य है कि मुझे क्या करना है, मैं उसी पर फोकस करता हूं। लोकतंत्र में आलोचला होना और उसे सहन करना ही लोकतांत्रिक होने का गुण है। अगर यह नहीं है तो आप लोकतांत्रिक ही नहीं है। तो मैं अपना गुण क्यों छोड़ू। चंदन के पेड़ पर भुजंग लिपटे रहते हैं लेकिन चंदन अपना स्वभाव नहीं छोड़ता तो मैं कैसे अपना स्वभाव छोड़ सकता हूं।
उत्तराखण्ड की राजनीति में आपको कई बार अलग-थलग करने की कोशिशें हुई, लगातार हार के बाद भी आपके साथ जनता का एक वर्ग और कांग्रेस के कार्यकर्ताओं का एक ऐसा वर्ग आज भी है जो आप पर भरोसा ज्यादा करता है। आप इस भरोसे और समर्थन को किस रूप में देखते हैं?
यह तो बहुत लम्बे समय से होता रहा है। लेकिन कोशिश कहीं न कहीं आकर अटक गई। लेकिन मैं अपना काम करता रहा हूं। पार्टी ने मुझे पूरा सम्मान दिया मुझे यह कभी नहीं कहा कि अब हरीश रावत बस करो। जिस दिन पार्टी मुझे यह कह देगी कि अब बस करो मैं रूक जाऊंगा।
आप कांग्रेस को पुनर्जीवित करने के प्रयास में जुटे हैं क्या यह प्रयास आपके जीवन का आंतिम राजनीतिक मिशन है?
हां, यदि इसे बड़बोलापन न समझा जाए तो मैं कहूंगा हां। मेरे जीवन का अंतिम राजनीतिक लक्ष्य कांग्रेस पार्टी को मजबूत करना है। मैं यह भी जानता हूं कि मेरे अंदर बहुत क्षमता नहीं हैं लेकिन चींटी की तरह मैं अपना काम और अपना लक्ष्य पूरा करने का प्रयास कर रहा हूं। चींटी अपने से कहीं ज्यादा भार वाला बोझ लेकर चलती है, कई बार गिरती है कई बार उठती है लेकिन अंततोगत्वा वह उस बोझ को अपने लक्ष्य पर पहुंचा देती है। मैं चींटी से प्रेरणा लेता हूं। मैं हार से निराश नहीं होता हूं, मन के मारे हार है, मन के जीते जीत। मैं इसी पर चलता रहता हूं। हार-जीत अलग विषय है, लक्ष्य क्या है इस पर मेरा ध्यान रहता है।
आपके बाद उत्तराखण्ड कांग्रेस का भविष्य किसके कांधों पर है। क्या कोई ऐसा चेहरा है जिसे आप जनता का नेतृत्व सौंपने योग्य मानते हैं?
बहुत सारे चेहरे हैं इसे मैं उत्तराखण्ड का सौभाग्य मानूंगा और कांग्रेस का सौभाग्य मानूंगा कि हमारे पास एक बहुत अच्छी और सक्षम नेताओं की सूची है। लेकिन मैं इसे अपनी विफलता मानता हूं कि हमारे पास इतने सक्षम नेताओं के होने के बाद भी हम उनका उपयोग पार्टी की सफलता के लिए नहीं कर पाए। यह अवसर हमारे सामने 2022 में आया था जब जनता हमको चुनना चाहती थी लेकिन हमने यह अवसर गंवा दिया।
आप बार-बार कहते हैं कि आप किसी पद के इच्छुक नहीं हैं। फिर भी जब कोई संकट आता है कि जो पार्टी आपको आगे कर देती है क्या यह कांग्रेस की आंतरिक नेतृत्व की विफलता का संकेत नहीं है?
नहीं, ऐसा नहीं है लेकिन घर में भी एक पुराना बुढ़ा होता है उसे खांसते रहना चहिए। मैं भी इसी तरह से खांसता रहता हूं कि हमारे घर के लोग चैकन्ने रहे। आप मेरे प्रयासों को उसी खांसते हुए बूढ़े व्यक्ति से तुलना कर सकते हैं जो अपने लोगों को हमेशा चैकन्ना बनाए रखने का काम कर रहा है।
क्या आपको लगता है कि अब उत्तराखण्ड में पार्टी को युवा नेतृत्व को आगे लाने के लिए एक स्पष्ट योजना के साथ काम करना चाहिए?
हमारे ऑल रेडी है। हमारे पास तो दो-तीन स्टेप में युवा नेतृत्व है। उम्र के हिसाब से प्रीतम सिंह जी हैं, करीब-करीब उनके कंधों तक गणेश गोदियाल जी हैं और उनके कंधे तक करण महरा जी हैं। ऐसे ही हमारे पास और भी अच्छे और युवा नेतागण हैं जो प्रभावी तौर मजबूत नेता माने जाते हैं। हमारे पास अनुभवी और युवा नेताओं की कोई कमी नहीं है।
2027 के चुनाव के लिए ज्यादा समय नहीं है। भाजपा अभी से चुनावी मोड में आ चुकी है लेकिन कांग्रेस पार्टी इसमें नजर नहीं आ रही है। ऐसा क्यों है?
कांग्रेस पूरी तरह से चुनाव के लिए तैयार है। आप देखिएगा 30 अप्रैल से हम दनादन काम में जुट जाएंगे। बाकी संगठानात्मक काम चलता रहेगा लेकिन जो लोकतांत्रिक दायित्व हमारा है प्रतिपक्ष का उसकी भूमिका हम मजबूती से निभाते रहेंगे। 30 अपैल के बाद आप बहुत मजबूती के साथ कांग्रेस की भूमिका को देखेंगे।
आप कह रहे हैं कि कांग्रेस चुनावी मोड में है लेकिन कांग्रेस की प्रदेश प्रभारी कुमारी शैलजा तो उत्तराखण्ड में नजर हीं नहीं आती हैं। बगैर प्रभारी के कांग्रेस चुनावी रणनीति बना पाएगी?
नहीं, ऐसी बात नहीं है। प्रदेश प्रभारी निरंतर सम्पर्क में रहती है और उनका मार्गदर्शन कांग्रेस पार्टी को मिलता रहता है। जब आवश्यकता होती है तब उनका मार्गदर्शन मिलता है। कुमारी शैलजा बहुत अनुभवी हैं वे अच्छी तरह से जानती हैं कि किस समय आना है, किस समय मार्गदर्शन देना है।
यदि कांग्रेस पार्टी 2027 तक कोई नया मुख्यमंत्री का चेहरा नहीं उभारती है तो क्या आप एक बार फिर से चुनावी रणनीति में उतरने को तैयार होंगे?
नहीं, मैं अब चुनाव लड़ाऊंगा। 2022 में भी मैं कहता रहा लेकिन पार्टी ने मेरा आग्रह नहीं माना और मुझे चुनाव लड़ने का आदेश दिया। अगर मेरा आग्रह मान लिया होता और मैं चुनाव लड़ने की बजाय कांगे्रस को चुनाव लड़वाता तो शायद आज कांग्रेस सत्ता में होती। मैं समेटने का काम करना चाहता हूं। जब-जब मैंने कांग्रेस में समेटने का काम किया तब-तब कांग्रेस जीती है। 2007 में भी हम सत्ता के मुहाने पर आ गए थे लेकिन हमें कहा गया कि हम जोड़-तोड़ से सरकार नहीं बनाएंगे तो हम पीछे हो गए। जबकि हमारे साथ कई विधायक गठबंधन करने को तैयार थे। लेकिन हमें हमारे प्रभारी मोतीलाल बोरा जी ने फोन करके मना न किया होता तो हमने बहुमत का आंकड़ा जुटा लिया था। हम सरकार बनाने की स्थिति में आ गए थे। 2022 में भी हमने समेटा तो हम जीते। कांग्रेस की सीटें 2017 से ज्यादा आई। अब मैं 2027 में वह काम करने के लिए दृढ निश्चयी हूं।
भाजपा में कांग्रेस से गए कई पुराने नेता आज भी सक्रिय हैं। आपको लगता है कि वे किसी समय कांग्रेस में लौट सकते हैं, अगर हां तो क्या आप उनकी पुनर्वापसी के पक्षधर हैं?
जिस तरह से भाजपा ने इनको अनुपयोगी पाया है। आप एक बात देखिए, सतपाल महाराज कांग्रेस में मुख्यमंत्री के बड़े दावेदार थे। कांग्रेस में उनको गाॅड सीएम कहा जा रहा था। लेकिन भाजपा में जाने के बाद पहली बार पता चला कि गाॅड सीएम तो मंत्री पद का आकांक्षी निकला। ऐसे ही दूसरे लेाग भी हैं। आज भाजपा में जो कुर्सी की लड़ाई चल रही है उस लड़ाई में कांग्रेस से गए विशेषज्ञों का ही हाथ होने की बातें सुनाई दे रही है। जो काम इन लोगों ने कांग्र्रेस में किया उस अनुभव का यह लोग भाजपा में भी तो उपयोग करेंगे। हम चाहेंगे कि यह लाभ वे भाजपा को आगे भी देते रहें। बाकी लोग जिन्हें भाजपा ने सिर्फ चिपका कर रखा है तो ऐसे लोगों में अब लड़ने का हौसला नहीं रह गया है, वह विपक्ष धर्म निभाने के लिए हमारे पास क्यों आएंगे?
आज की राजनीति डिजिटल युग की राजनीति हो चली है। सोशल मीडिया और वर्चुअल नेतृत्व का समय है। भाजपा इसमें बहुत आगे दिखाई देती है। क्या आपकी जमीनी शैली की राजनीति के साथ तालमेल बैठा पाएगी?
दोनों में तालमेल करना पड़ेगा। यह दौर ‘आई काॅन्टेक्ट’ का है। हाथ से हाथ मिलाने का जो मजा है वह सोशल मीडिया में नहीं है। कांग्रेस आदमी की राजनीति करती है लेकिन भाजपा शोशे बाजी की राजनीति करती है। हम हाथ से हाथ की राजनीति करते हैं।
आपने लम्बे समय तक दिल्ली और उत्तराखण्ड दोनों की राजनीति देखी है। आज कांग्रेस का राष्ट्रीय स्तर किस तरह की वैचारिक और सांगठनिक सुधार की आवश्यकता है?
हमने बहुत सही लाइन अपने लिए चूज की है। पहले हमने उदयपुर अधिवेशन किया था। उसमें हमने संगठानात्मक तरीके में क्या सुधार करने हैं, संगठन में क्या करना है उसे किया है सुधारो की जरूरत हुई तो किया ह,ै उसे लागू किया है। अभी हमने साबरमती के किनारे अधिवेशन में एक एक्शन चार्टर तैयार किया है उस पर हम अमल कर रहे हैं। मैंने अभी आपको कहा कि हम 30 अप्रैल से दनादन गोले दागते दिखाई देंगे और विपक्ष की मजबूत भूमिका में निभाएंगे। लोकतंत्र में विपक्ष के पास कोई अलग से विषय नहीं होता। जनता ने आपको विपक्ष में बैठाया है तो आपका काम है कि आप सरकार की जनता के खिलाफ नीतियों का विरोध करते जो मुद्दे जनता के हैं उस पर सरकार काम करे इस पर विपक्ष का धर्म होता है। हम प्रतिपक्ष का धर्म निभाएंगे।
राहुल गांधी ने कहा है कि कांग्रेस में ऐसे स्लीपर सेल है जो भाजपा की मदद करते हैं। उत्तराखण्ड में भी इसी तरह की बातें हो रही है। अगर यह सही है तो कांग्रेस ऐसे लोगों पर लगाम क्यों नहीं लगा पा रही है?
जो संगठन का काम देख रहे हैं यह उन लोगों का विषय है वे ऐसे लोगों को देखें और उन पर कार्यवाही करे। प्रभारी हो या संगठन के लोग, उनको सूचना मिली होगी तभी ऐसी बातें कही जा रही हैं। हम भाजपा के बिल्कुल भिन्न हैं। वैचारिक रूप से हम एक नहीं हो सकते। इसलिए कोई कांग्रेस मैन है तो वह भाजपा से समझौता कर ही नहीं सकता और न ही कभी दिखाई देगा। अगर समझौता करता दिखाई दे रहा है तो वह सम्पूर्ण कांग्रेस मैन नहीं है।

