वष 2012 में जो आंदोलन से उपजी थी, वही आम आदमी पार्टी अब धीरे-धीरे चुनावी परिपक्वता की राह पर है – लेकिन शायद थकी हुई भी। दिल्ली नगर निगम चुनाव में हार के बाद पार्टी न केवल राजनीतिक मोर्चे पर, बल्कि नेतृत्व संरचना को लेकर भी पसोपेश में है। अतीत में मनीष सिसोदिया और अरविंद केजरीवाल की जोड़ी ने पार्टी को उभार दिया था, लेकिन अब दोनों ही कानूनी मामलों और जन असंतोष से घिरे हैं।

2015 और 2020 की जीतों के बाद आत्ममुग्धता ने पार्टी को विचारधारा से दूर कर दिया और अब वही शून्यता उसे अंदर से खा रही है। गोपाल राय, आतिशी और सौरभ भारद्वाज जैसे नेता भले जुझारू हों, लेकिन उनका जनाधार सीमित है। पार्टी अब इस बात को लेकर असमंजस में है कि ‘संस्थापक नेतृत्व’ पर भरोसा बनाए रखे या बदलाव को स्वीकार करे।

