महिला पहलवानों के यौन उत्पीड़न मामले में दिल्ली की राउज एवेन्यू कोर्ट से पूर्व भारतीय कुश्ती महासंघ प्रमुख और छह बार के पूर्व सांसद बृजभूषण शरण सिंह को बरी किए जाने के बाद राजनीतिक और खेल जगत में नई चर्चाएं शुरू हो गई हैं। अदालत के फैसले ने कानूनी लड़ाई में उन्हें राहत जरूर दी है लेकिन अब सबसे बड़ा सवाल उनकी राजनीतिक और खेल प्रशासन में संभावित वापसी को लेकर उठ रहा है। फैसले से पहले अदालत पहुंचे बृजभूषण शरण सिंह ने कहा था कि वह केवल अदालत के निर्णय पर भरोसा करते हैं। फैसला आने के बाद उन्होंने कहा कि जिस दिन उन पर आरोप लगे थे, उसी दिन उन्होंने कहा था कि यदि आरोप सही साबित हुए तो वह स्वयं को सबसे बड़ा दोषी मानेंगे। अब अदालत द्वारा बरी किए जाने के बाद उन्होंने इसे अपने और समर्थकों के लिए खुशी का दिन बताया। यौन उत्पीड़न के आरोप सामने आने के बाद 2024 के लोकसभा चुनाव में भारतीय जनता पार्टी ने कैसरगंज सीट से उनका टिकट काट दिया था। हालांकि पार्टी ने उनके पुत्र करण भूषण सिंह को उम्मीदवार बनाया और उन्होंने जीत दर्ज कर सीट भाजपा के पास बरकरार रखी। इससे यह भी संकेत मिला कि क्षेत्र में बृजभूषण का राजनीतिक प्रभाव पूरी तरह समाप्त नहीं हुआ था। अदालत के फैसले के बाद राजनीतिक गलियारों में यह चर्चा तेज हो गई है कि क्या भाजपा भविष्य में उन्हें फिर से सक्रिय भूमिका दे सकती है। उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव 2027 और उसके बाद के राजनीतिक समीकरणों को देखते हुए उनके समर्थक उनकी वापसी की उम्मीद जता रहे हैं। हालांकि यह पूरी तरह पार्टी नेतृत्व की राजनीतिक रणनीति और उस समय के हालात पर निर्भर करेगा। दूसरी ओर भारतीय कुश्ती महासंघ में उनकी सम्भावित वापसी को लेकर भी अटकलें लग रही हैं। हालांकि केवल अदालत से राहत मिल जाना अपने आप में किसी पद पर वापसी की गारंटी नहीं माना जा सकता। खेल प्रशासन से जुड़े निर्णय महासंघ के नियमों, खेल मंत्रालय की नीतियों और अन्य संस्थागत प्रक्रियाओं के तहत लिए जाएंगे। फिलहाल इतना तय है कि अदालत के फैसले ने बृजभूषण शरण सिंह के लिए एक नई राजनीतिक संभावना का दरवाजा जरूर खोला है लेकिन क्या यह राहत उन्हें फिर से चुनावी राजनीति या कुश्ती प्रशासन के केंद्र में ले आएगी, इसका जवाब आने वाले महीनों में भाजपा की रणनीति, खेल संस्थाओं के रुख और बदलते राजनीतिक घटनाक्रम से ही मिलेगा।

शरद ने बढ़ाई सहयोगियों की बेचैनी

राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (एनसीपी) प्रमुख शरद पवार एक बार फिर महाराष्ट्र की राजनीति के केंद्र में हैं। एक ओर वे अपनी पार्टी और सुनेत्रा पवार के नेतृत्व वाले दूसरे एनसीपी गुट के सम्भावित विलय की अटकलों को लगातार खारिज कर रहे हैं तो वहीं दूसरी तरफ पीएम मोदी और भाजपा नेतृत्व से उनकी बढ़ती निकटता ने महाविकास अघाड़ी और ‘इंडिया’ गठबंधन की चिंता बढ़ा दी है। अब सवाल यह नहीं है कि पवार किससे मिल रहे हैं बल्कि यह है कि उनका अगला राजनीतिक कदम क्या होगा। गौरतलब है कि 22 जुलाई को शरद पवार अपनी बेटी सुप्रिया सुले के साथ प्रधानमंत्री मोदी से मिले थे। अब बारामती स्थित ‘विद्या प्रतिष्ठान’ के ट्रस्टियों ने उनसे संस्थान के नए ‘प्रेरणा स्थल’ डोम के उद्घाटन के लिए प्रधानमंत्री मोदी को आमंत्रित करने का आग्रह किया है। पवार ने प्रधानमंत्री से समय लेकर औपचारिक निमंत्रण देने का भरोसा भी दिया है। ऐसे में दोनों नेताओं की सम्भावित दूसरी मुलाकात को लेकर राजनीतिक अटकलें तेज हो गई हैं। चर्चा यह भी है कि भाजपा महाराष्ट्र में अपने सामाजिक और राजनीतिक समीकरण मजबूत करने के साथ-साथ संसद में परिसीमन जैसे अहम विधेयकों पर क्षेत्रीय दलों का समर्थन जुटाने की कोशिश कर सकती है। ऐसे किसी भी प्रयास में शरद पवार की भूमिका महत्वपूर्ण मानी जा रही है जिससे शरद ने सहयोगियों की बेचैनी जरूर बढ़ा दी है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि शरद पवार हमेशा सत्ता और विपक्ष, दोनों के साथ संवाद बनाए रखने की राजनीति करते रहे हैं। यही रणनीति उन्हें राष्ट्रीय राजनीति में प्रासंगिक बनाए रखती है और उनकी राजनीतिक सौदेबाजी की क्षमता भी बढ़ाती है। परिसीमन जैसे संवेदनशील मुद्दों पर भी उनका अंतिम रुख क्या होगा, इसे लेकर सहयोगी दल पूरी तरह आश्वस्त नहीं हैं। यही अनिश्चितता कांग्रेस और उद्धव ठाकरे के नेतृत्व वाली शिवसेना के लिए सबसे बड़ी चिंता मानी जा रही है। फिलहाल तस्वीर पूरी तरह साफ नहीं है लेकिन इतना तय है कि शरद पवार की हर मुलाकात, हर बयान और यहां तक कि उनकी चुप्पी भी राजनीतिक संदेश बन रही है। यही वजह है कि सहयोगी दल उनके अगले कदम पर लगातार नजर बनाए हुए हैं।

जयंत की डिमांड कैसे पूरी करेगी भाजपा?
उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव 2027 से पहले एनडीए में सीट बंटवारे को लेकर शुरुआती राजनीतिक हलचल तेज होने लगी है। भाजपा और उसके सहयोगी दल गठबंधन को मजबूत बता रहे हैं लेकिन राजनीतिक गलियारों में चर्चा है कि राष्ट्रीय लोकदल ने 33 से अधिक सीटों पर चुनाव लड़ने की इच्छा जताई है जबकि भाजपा फिलहाल 20 से 25 सीटों के फार्मूले पर विचार कर रही है। जयंत चैधरी पश्चिमी उत्तर प्रदेश तक सीमित रहने के बजाए प्रदेश के अन्य हिस्सों में भी पार्टी का विस्तार करना चाहते हैं। इसी रणनीति के तहत संगठन को सम्भावित सीटों पर मजबूत करने के निर्देश दिए गए हैं। आरएलडी का आकलन है कि जाट, किसान और ग्रामीण इलाकों में उसका प्रभाव बढ़ा है, इसलिए उसकी हिस्सेदारी भी उसी अनुपात में बढ़नी चाहिए। राजनीतिक जानकारों का कहना है कि भाजपा के सामने सबसे बड़ी चुनौती सहयोगियों की अपेक्षाओं और अपने संगठन के हितों के बीच संतुलन बनाने की होगी। यदि पार्टी आरएलडी को अधिक सीटें देती है तो कई मौजूदा भाजपा विधायकों और टिकट के दावेदारों में नाराजगी बढ़ सकती है, वहीं सहयोगियों की मांगों को नजरअंदाज करने पर चुनाव से पहले गठबंधन में खींचतान की चर्चाएं तेज हो सकती हैं। यही वजह है कि सीट बंटवारा भाजपा के लिए महज गणित नहीं बल्कि राजनीतिक संतुलन का भी सवाल बन गया है। भाजपा केवल सीटों की संख्या बढ़ाकर ही सहयोगियों को संतुष्ट करने की कोशिश नहीं करेगी। विधान परिषद में प्रतिनिधित्व, संगठन में अहम जिम्मेदारियां, चुनाव बाद सरकार में बेहतर भागीदारी या कुछ नई सीटों पर जातीय और स्थानीय समीकरणों के आधार पर समझौते जैसे विकल्प भी सामने आ सकते हैं। सहयोगियों की मांगों को ध्यान में रखकर ही अंतिम फार्मूला तैयार किया जा सकता है।

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