- दिव्या भारती
अल्मोड़ा में स्थित कर्बला कुष्ठ रोग अस्पताल, जिसकी नींव वर्ष 1836 में ब्रिटिश अधिकारी सर हेनरी रैम्जे द्वारा रखी गई थी, आज अपने अस्तित्व के सबसे कठिन दौर से गुजर रहा है। करीब 190 वर्षों से यह अस्पताल उन कुष्ठ रोगियों के लिए आश्रय उपचार और पुनर्वास का केंद्र रहा है जिन्हें समाज और परिवार से ठुकरा दिया गया। कभी यहां 100 से अधिक मरीजों की देखभाल, दर्जनों स्टाफ से संचालित होने वाले इस अस्पताल की स्थिति आज यह है कि सीमित संसाधनों, महज 11 मरीजों और गिने-चुने कर्मचारियों के सहारे दान पर निर्भर होकर चल रहा है। वर्ष 1989 में इस अस्पताल की जिम्मेदारी ‘लेप्रोसी मिशन’ नामक अंतरराष्ट्रीय संस्था को 30 वर्षों के लिए सौंपी गई थी। इस दौरान अस्पताल ने अपने सबसे बेहतर दौर को देखा। करीब 15 कर्मचारियों का स्टाफ, 100 से अधिक मरीज, सर्जरी, पुनर्वास, गांव-गांव सर्वे और यहां तक कि मरीजों के बच्चों की पढ़ाई तक की व्यवस्था की जाती थी। पूरा खर्च संस्था स्वयं उठाती थी। वर्ष 2021 में लेप्रोसी मिशन के जाने के बाद अस्पताल का संचालन मेथोडिस्ट चर्च को सौंप दिया गया जिसका मुख्यालय मुम्बई में है। वर्तमान में संस्था के पास फंड की भारी कमी है जिसके कारण अस्पताल पूरी तरह चैरिटी पर निर्भर हो चुका है
कुमाऊं की सांस्कृतिक राजधानी कहा जाने वाला अल्मोड़ा शहर अपने प्राचीन मंदिरों, औपनिवेशिक दौर की इमारतों और समृद्ध सामाजिक इतिहास के लिए जाना जाता है। अंग्रेजों के समय में अल्मोड़ा न केवल प्रशासनिक दृष्टि से महत्वपूर्ण था बल्कि स्वास्थ्य और सामाजिक सेवा के क्षेत्र में भी यहां कई संस्थानों की स्थापना की गई थी। इन्हीं में से एक ऐसा अस्पताल है जो समाज के सबसे उपेक्षित वर्ग, कुष्ठ रोगियों के लिए समर्पित था। आज, लगभग दो शताब्दियों की विरासत समेटे यह अस्पताल खुद अपने अस्तित्व के लिए संघर्ष कर रहा है।
अल्मोड़ा में स्थित कर्बला कुष्ठ रोगी अस्पताल, जिसकी नींव वर्ष 1836 में ब्रिटिश अधिकारी सर हेनरी रैम्जे द्वारा रखी गई थी, आज अपने अस्तित्व के सबसे कठिन दौर से गुजर रहा है। करीब 190 वर्षों से यह अस्पताल उन कुष्ठ रोगियों के लिए आश्रय उपचार और पुनर्वास का केंद्र रहा है जिन्हें समाज और परिवार से ठुकरा दिया गया। कभी यहां 100 से अधिक मरीजों की देखभाल होती थी लेकिन आज स्थिति यह है कि सैकड़ों मरीजों और दर्जनों स्टाफ से संचालित होने वाला यह अस्पताल सीमित संसाधनों, महज 11 मरीजों और गिने-चुने कर्मचारियों के सहारे दान पर निर्भर होकर चल रहा है।
इस कुष्ठ रोग अस्पताल की स्थापना ब्रिटिश शासनकाल में उस समय की गई थी, जब कुष्ठ रोग (लेप्रोसी) को न केवल एक गम्भीर बीमारी बल्कि सामाजिक बहिष्कार का कारण भी माना जाता था। बताया जाता है कि इस अस्पताल की नींव उस समय पड़ी जब सर हेनरी रैम्जे ने एक कुष्ठ रोगी को समाज से अपमानित और अलग-थलग होते देखा। वे उसके पीछे-पीछे जंगल तक पहुंचे जहां उन्होंने देखा कि कई रोगी दूर जंगलों में गुफाओं जैसी जगहों पर रह रहे हैं और समाज से पूरी तरह कट चुके हैं। इस स्थिति को देखते हुए उन्होंने अपने साथियों की मदद से यहां झोपड़ियां बनवाकर उन रोगियों के रहने और भोजन की व्यवस्था शुरू की। यही प्रयास आगे चलकर एक अस्पताल के रूप में विकसित हुआ। समय के साथ यहां भवन, वार्ड और उपचार की सुविधाएं विकसित की गईं। यह अस्पताल न केवल उत्तराखण्ड बल्कि देश के अन्य हिस्सों और यहां तक कि नेपाल से आने वाले रोगियों के लिए भी उपचार का प्रमुख केंद्र बन गया।
अस्पताल परिसर में पहुंचने पर साफ तौर पर महसूस होता है कि यहां केवल एक स्वास्थ्य केंद्र नहीं बल्कि इतिहास का हिस्सा है जो धीरे-धीरे उपेक्षा का शिकार हो चुका है। इमारतें, वार्ड और व्यवस्था उस दौर की गवाही देते हैं जब यहां इलाज के साथ-साथ पुनर्वास और सामाजिक कार्य भी बड़े स्तर पर होते थे।
गौरतलब है कि शुरुआती समय में कुष्ठ रोग का उपचार उपलब्ध नहीं था लेकिन बाद में ‘माइक्रो बैक्टीरियम लेप्रे’ जीवाणु की खोज से इस रोग को समझा गया। कुष्ठ रोग आज चिकित्सा विज्ञान के अनुसार पूरी तरह ठीक होने वाला रोग है। मल्टी-ड्रग थेरेपी (एमडीटी) के माध्यम से इसका प्रभावी इलाज सम्भव है। फिर भी सबसे बड़ी समस्या इलाज नहीं बल्कि सामाजिक दूरी और बहिष्कार है। कई मरीज उपचार के बाद रोगमुक्त हो चुके हैं लेकिन परिवार ने अपनाया नहीं और समाज ने स्वीकार नहीं किया, इसलिए वे आज भी इसी अस्पताल परिसर में रहने को मजबूर हैं। वर्तमान में 11 मरीज इस अस्पताल में अपना गुजर-बसर कर रहे हैं।
वर्ष 1989 में इस अस्पताल की जिम्मेदारी ‘लेप्रोसी मिशन’ नामक अंतरराष्ट्रीय संस्था को 30 वर्षों के लिए सौंपी गई थी। इस दौरान अस्पताल ने अपने सबसे बेहतर दौर को देखा। करीब 15 कर्मचारियों का स्टाफ, 100 से अधिक मरीज, सर्जरी, पुनर्वास, गांव-गांव सर्वे, और यहां तक कि मरीजों के बच्चों की पढ़ाई तक की व्यवस्था की जाती थी। पूरा खर्च संस्था स्वयं उठाती थी।
वर्ष 2021 में लेप्रोसी मिशन के जाने के बाद अस्पताल का संचालन मेथोडिस्ट चर्च को सौंप दिया गया जिसका मुख्यालय मुम्बई में है। वर्तमान में संस्था के पास फंड की भारी कमी है जिसके कारण अस्पताल पूरी तरह चैरिटी पर निर्भर हो चुका है। कोई राशन दे जाता है, कोई कपड़े तो कोई दवाइयों के लिए आर्थिक मदद कर देता है, इसी तरह अस्पताल चल रहा है, सरकारी स्तर पर केवल सीमित सहायता ही मिलती है, ड्रेसिंग मटेरियल, विशेष माइक्रो-रबर चप्पल (विकलांग रोगियों के लिए), अस्पताल की यह स्थिति देख यह सवाल खड़ा होता है कि क्या इतने महत्वपूर्ण और ऐतिहासिक संस्थान के लिए सरकारी जिम्मेदारी यहीं तक सीमित है?
यहां तीन स्थायी कर्मचारी, एक हेल्थ वर्कर, एक ड्राइवर और एक रात्रि चौकीदार (जो कुक का काम भी कर रहा है) के सहारे व्यवस्था चल रही है। इसके अलावा एक सफाई कर्मचारी और एक महिला, जो दान एकत्र करने का कार्य करती हैं, व्यवस्था को किसी तरह बनाए हुए हैं। अस्पताल में कुष्ठ रोग के इलाज के लिए जरूरी मल्टी ड्रग थेरेपी एमडीटी दवा भी उपलब्ध नहीं है जबकि यही कुष्ठ रोग का मुख्य इलाज है। पहले देश-विदेश और नेपाल से भी मरीज यहां इलाज के लिए आते थे, अब भी कई मरीज उम्मीद लेकर आते हैं लेकिन दवा और सुविधा के अभाव में उन्हें लौटना पड़ता है। डाॅ. ललित पंत समय-समय पर सेवा भाव से मरीजों को देख जाते हैं लेकिन नियमित चिकित्सा व्यवस्था मौजूद नहीं है, अस्पताल का संचालन मेथोडिस्ट चर्च के अधीन है और स्थानीय स्तर पर इसकी जिम्मेदारी डायरेक्टर राॅबिनसन दास के पास है, जो अल्मोड़ा में ही रहते हैं। अस्पताल से जुड़े लोगों के अनुसार, डायरेक्टर समय-समय पर अस्पताल आते तो हैं लेकिन निरीक्षण सीमित और औपचारिक रहता है। बताया जाता है कि वे मुख्य रूप से स्टाफ से मिलकर लौट जाते हैं और मरीजों से सीधा संवाद बहुत कम होता है। सम्पर्क के प्रयासों को लेकर भी असंतोष सामने आया है। अस्पताल से जुड़े लोगों और मरीजों का कहना है कि कई बार फोन करने पर सम्पर्क नहीं हो पाता और यदि बात होती भी है तो व्यस्तता का हवाला देकर बातचीत समाप्त कर दी जाती है।
अस्पताल का स्थान पहाड़ी इलाके में स्थित है जहां से नीचे बाजार या अन्य अस्पतालों तक पहुंचना आसान नहीं है। यहां रहने वाले कई मरीज, वृद्ध हैं या विकलांग हैं उनके लिए आवागमन लगभग असम्भव है। कुछ समय पहले समाज कल्याण और निर्वाचन विभाग द्वारा यहां के वृद्ध और विकलांग मरीजों के लिए पास में मतदान केंद्र बनाने का आश्वासन दिया गया था लेकिन यह योजना लागू नहीं हो सकी। स्थानीय लोगों और वहां रह रहे मरीजों का कहना है कि पिछले लगभग पांच वर्षों में न कोई जनप्रतिनिधि और न ही कोई अधिकारी अस्पताल की स्थिति का जायजा लेने पहुंचा है।
अस्पताल में कार्यरत कर्मचारियों को पिछले 26 महीनों से वेतन नहीं मिला है, साथ ही कर्मचारियों की ग्रेच्युटी राशि भी संस्था के पास लम्बित है। एक कर्मचारी की लगभग 5,55,900 रुपए की ग्रेच्युटी जून 2021 से अब तक नहीं मिली है। इस सम्बंध में जिलाधिकारी और श्रम विभाग को कई बार आवेदन दिए जा चुके हैं लेकिन अब तक कोई ठोस कार्रवाई सामने नहीं आई है, जब अस्पताल में रह रहे मरीजों से बात की गई तो उन्होंने बीते समय और वर्तमान के बीच का अंतर साफ तौर पर बताया।
मरीजों की आवाज : बीते समय और आज की हकीकत अस्पताल में पिछले लगभग 39 वर्षों से कार्यरत हेल्थ वर्कर अनूप सिंह बताते हैं ‘‘लेप्रोसी मिशन अंतरराष्ट्रीय संस्था के अंतर्गत जब ये अस्पताल था उस समय यहां सारी व्यवस्थाएं सुचारू रूप से होती थी कोई समस्याएं नहीं थी, अस्पताल का पूरा खर्च संस्था खुद उठाती थी, चाहे स्टाफ की सैलरी हो या मरीजों की दवाइयां लेकिन 2021 में जब लेप्रोसी मिशन का कार्यकाल समाप्त हुआ तो अस्पताल की जिम्मेदारी फिर मेथोडिस्ट चर्च को सौंप दी गई। 2021 में उनके जाने के बाद स्थिति लगातार खराब होती गई। हमें पिछले 26 महीनों से वेतन नहीं मिला है। हमने जिला अधिकारी, श्रम विभाग सहित कई जगह आवेदन दिए लेकिन अभी तक कोई ठोस कार्रवाई नहीं हुई है। एक महीने वेतन न मिले तो घर चलाना मुश्किल हो जाता है लेकिन हम 26 महीनों से बिना वेतन के काम कर रहे हैं।’’ अनूप सिंह अपनी व्यक्तिगत स्थिति साझा करते हुए कहते हैं, ‘‘मेरी करीब 5 लाख 55 हजार 900 रुपए की ग्रेच्युटी जून 2021 से संस्था के पास फंसी हुई है। पहले मेरी सैलरी 30-35 हजार रुपए तक हो जाती थी लेकिन बाद में यह घटकर 24,939 रुपए रह गई और वह भी अब 26 महीनों से नहीं मिली है।’’
अस्पताल में रह रहीं 85 वर्षीय हंसी, जो पिछले 46 वर्षों से यहां हैं, बताती हैं ‘‘जब मैं यहां आई थी, तब दो नर्स, दो वार्ड बाॅय, डाॅक्टर, लैब टेक्नीशियन, मैनेजर, कुक, सफाई कर्मचारी, सब थे। करीब 105 मरीजों की पूरी व्यवस्था होती थी लेकिन आज न स्टाफ है, न इलाज, न डाॅक्टर।’’ वह आगे कहती हैं ‘‘आज हम पूरी तरह से दान पर आश्रित हैं। अल्मोड़ा के लोग हमें राशन, कपड़े और दवाइयां देते हैं। अगर उन्होंने भी देना बंद कर दिया तो हमारा क्या होगा? हम न खुद काम कर सकते हैं, न अपनी देखभाल।’’
गढ़वाल से आए पदमाराम, जो 44 वर्षों से यहां रह रहे हैं। बताते हैं ‘‘जब मैं यहां आया था, तब मेरे हाथ-पैर संक्रमित थे। यहां इलाज मिला, जिससे हालत में सुधार हुआ लेकिन अब अस्पताल की व्यवस्था पहले जैसी नहीं रही।’’
बंद होने और संपत्ति बिकने की आशंका स्थानीय स्तर पर यह चर्चा भी सामने आ रही है कि अस्पताल को बंद करने और इसकी सम्पत्ति को बेचने की बात चल रही है। हालांकि इसकी आधिकारिक पुष्टि नहीं हो पाई है लेकिन वर्तमान स्थिति को देखते हुए ऐसी आशंकाएं सामने आना स्वाभाविक है।
बात अपनी-अपनी
यह एक निजी संस्थान है, अतः यह आवश्यक है कि यह परीक्षण किया जाए कि सरकार किस प्रकार से इसमें सहयोग प्रदान कर सकती है तथा किन-किन सुविधाओं का विस्तार सम्भव है। इस संदर्भ में सम्बंधित फर्म एवं मैथोडिस्ट चर्च संस्था से भी औपचारिक रूप से वार्ता की जाएगी। साथ ही शासन को पत्र लिखकर आवश्यक सहयोग अथवा संस्थान के सम्भावित अधिग्रहण (टेकओवर) के सम्बंध में अनुरोध किया जाएगा। संस्थान की वास्तविक स्थिति के आकलन हेतु प्रशासन द्वारा संयुक्त जांच एवं कैपेसिटी आॅडिट भी कराया जाएगा, जिसके लिए एक समिति गठित की जा रही है। यह समिति एक सप्ताह के भीतर अपना कार्य प्रारम्भ करेगी तथा 10-12 दिनों में अपनी रिपोर्ट प्रस्तुत करेगी। इस बीच आवश्यक एमडीटी दवाइयों की उपलब्धता सुनिश्चित करने के लिए हर सम्भव प्रयास किए जाएंगे। आकलन पूर्ण होने के उपरांत संस्थान की आवश्यकताओं का विस्तृत मूल्यांकन किया जाएगा तथा उसी के अनुरूप सहायता प्रदान करने की कार्यवाही सुनिश्चित की जाएगी।
अंशुल सिंह, जिलाधिकारी, अल्मोड़ा
अंशुल सिंह, जिलाधिकारी, अल्मोड़ा