- दि संडे पोस्ट डेस्क
एक समय था जब काबुल की सड़कों पर आधुनिक परिधान पहने युवा महिलाएं विश्वविद्यालयों की ओर जाती दिखाई देती थीं। वे डाॅक्टर थीं, प्रोफेसर थीं, पत्रकार थीं, सरकारी अधिकारी थीं और अपने भविष्य के सपने स्वयं गढ़ रही थीं। आज वही अफगानिस्तान दुनिया के उस देश के रूप में जाना जाता है जहां लड़कियों की शिक्षा पर सबसे कठोर प्रतिबंध हैं जहां महिलाओं की सार्वजनिक उपस्थिति लगातार सीमित की जा रही है और उनके अधिकारों को व्यवस्थित ढंग से संकुचित किया गया है लेकिन इस निराशाजनक तस्वीर के बीच एक दूसरी कहानी भी जन्म ले रही है। यह कहानी उन हजारों अफगान महिलाओं की है जिन्होंने परिस्थितियों के आगे घुटने टेकने के बजाय छोटे उद्योगों, हस्तशिल्प, कालीन निर्माण, खाद्य प्रसंस्करण और घरेलू व्यवसायों के माध्यम से अपने लिए रास्ता बनाया है
वर्ष 1960 और 1970 के दशक का काबुल। चैड़ी सड़कों पर आत्मविश्वास से चलती महिलाएं, विश्वविद्यालयों में पढ़ती छात्राएं, पुस्तकालयों और दफ्तरों में काम करती पेशेवर महिलाएं। उस दौर का अफगानिस्तान आज की पीढ़ी को लगभग अविश्वसनीय लगता है। तब अफगानिस्तान की महिलाएं पश्चिम एशिया के अनेक देशों की तुलना में अधिक स्वतंत्र जीवन जी रही थीं। शिक्षा, रोजगार और सार्वजनिक जीवन में उनकी भागीदारी लगातार बढ़ रही थी। काबुल विश्वविद्यालय में बड़ी संख्या में छात्राएं पढ़ती थीं। महिलाओं की उपस्थिति राजनीति, प्रशासन, चिकित्सा, शिक्षा और मीडिया जैसे क्षेत्रों में सामान्य बात थी।
इतिहास हमेशा सीधी रेखा में आगे नहीं बढ़ता। अफगानिस्तान ने पिछले पांच दशकों में जितनी उथल- पुथल देखी है, उतनी शायद ही किसी अन्य देश ने देखी हो। सोवियत संघ का हस्तक्षेप, मुजाहिदीन संघर्ष, गृहयुद्ध, तालिबान का पहला शासन, अमेरिकी नेतृत्व वाला सैन्य अभियान और फिर अगस्त 2021 में तालिबान की सत्ता में वापसी, इन घटनाओं ने देश के सामाजिक ढांचे को पूरी तरह बदल दिया। सबसे अधिक प्रभाव महिलाओं पर पड़ा।
तालिबान का पहला शासन 1996 से 2001 तक चला था। उस दौरान महिलाओं के अधिकारों पर कठोर प्रतिबंध लगाए गए थे। उन्हें घर से बाहर निकलने, काम करने और शिक्षा प्राप्त करने के अवसरों से वंचित कर दिया गया था। 2001 में तालिबान शासन के पतन के बाद स्थिति में धीरे-धीरे सुधार आया। अगले दो दशकों में लाखों लड़कियां स्कूलों और विश्वविद्यालयों तक पहुंचीं। महिलाओं ने संसद, मीडिया, न्यायपालिका, शिक्षा और व्यवसाय में उल्लेखनीय उपलब्धियां हासिल कीं। अनेक अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं ने महिलाओं के सशक्तिकरण के लिए कार्यक्रम चलाए। ऐसा लगने लगा था कि अफगानिस्तान धीरे-धीरे एक अधिक समावेशी समाज की ओर बढ़ रहा है।
तालिबान ने छिनी स्वतंत्रता
अगस्त 2021 में जब अमेरिकी सेना की वापसी के बाद तालिबान ने फिर सत्ता सम्भाली तो इतिहास ने मानो करवट बदल ली। शुरुआत में तालिबान नेताओं ने अपेक्षाकृत उदार रुख अपनाने के संकेत दिए। उन्होंने कहा कि महिलाओं के अधिकारों का सम्मान किया जाएगा लेकिन अगले कुछ महीनों में वास्तविकता बिल्कुल अलग दिखाई दी। लड़कियों के माध्यमिक विद्यालय बंद कर दिए गए। विश्वविद्यालयों में महिलाओं के प्रवेश पर रोक लगा दी गई। अनेक सरकारी कार्यालयों से महिलाओं को हटा दिया गया। गैर-सरकारी संगठनों में महिलाओं के काम करने पर भी विभिन्न प्रकार की पाबंदियां लगाई गईं। महिलाओं के पहनावे, यात्रा और सार्वजनिक जीवन से जुड़ी नई शर्तें लागू की गईं।
आज स्थिति यह है कि लाखों अफगान लड़कियां अपने जीवन के सबसे महत्वपूर्ण वर्षों में शिक्षा से वंचित हैं। एक पूरी पीढ़ी ऐसी है जो स्कूलों और विश्वविद्यालयों के बंद दरवाजों के सामने खड़ी है। संयुक्त राष्ट्र और मानवाधिकार संगठनों ने बार-बार चेतावनी दी है कि यह स्थिति केवल महिलाओं के अधिकारों का प्रश्न नहीं है बल्कि पूरे अफगान समाज के भविष्य का प्रश्न है। किसी भी देश की आधी आबादी को शिक्षा और अवसरों से वंचित करके विकास की कल्पना नहीं की जा सकती।
हार के बाद जीत है
यहीं से अफगान महिलाओं के संघर्ष की दूसरी कहानी शुरू होती है। जब नौकरी के अवसर कम हो गए, विश्वविद्यालय बंद हो गए और सार्वजनिक जीवन में भागीदारी सीमित होने लगी, तब हजारों महिलाओं ने अपने जीवन को नए ढंग से संगठित करना शुरू किया। उन्होंने छोटे व्यवसायों की ओर रुख किया। किसी ने सिलाई-कढ़ाई का काम शुरू किया, किसी ने कालीन बुनाई का। किसी ने खाद्य उत्पाद तैयार करने शुरू किए तो किसी ने हस्तशिल्प और घरेलू उत्पादों का व्यवसाय खड़ा किया। धीरे-धीरे यह एक व्यापक आर्थिक गतिविधि का रूप लेने लगा।
हेरात, काबुल, कंधार और मजार-ए-शरीफ जैसे शहरों में आज अनेक महिला संचालित व्यवसाय सक्रिय हैं। विशेष रूप से कालीन उद्योग में महिलाओं की भागीदारी उल्लेखनीय है। अफगान कालीनों की अंतरराष्ट्रीय पहचान पुरानी है और इस क्षेत्र में महिलाओं ने बड़ी भूमिका निभाई है। अनेक महिला उद्यमियों ने छोटे समूह बनाकर उत्पादन शुरू किया और बाद में उन्हें संगठित व्यवसाय में बदल दिया।
हाल में प्रकाशित अंतरराष्ट्रीय अध्ययनों और व्यावसायिक संगठनों के आंकड़ों के अनुसार तालिबान शासन के दौरान लगभग 10 हजार महिला उद्यमियों को व्यापारिक लाइसेंस जारी किए गए हैं। यह संख्या अपने आप में महत्वपूर्ण है क्योंकि यह उस देश की कहानी है जहां महिलाओं की स्वतंत्रता पर गम्भीर प्रतिबंध मौजूद हैं। यह तथ्य दर्शाता है कि आर्थिक जीवन में महिलाओं की भूमिका को पूरी तरह समाप्त करना सम्भव नहीं हुआ है। हालांकि इन आंकड़ों को देखकर यह निष्कर्ष निकालना भी गलत होगा कि अफगान महिलाओं की स्थिति बेहतर हो गई है। वास्तविकता कहीं अधिक जटिल है। अधिकांश महिला उद्यमियों के सामने वित्तीय संसाधनों की भारी कमी है। बैंकिंग व्यवस्था तक उनकी पहुंच सीमित है। ऋण प्राप्त करना कठिन है। अनेक महिलाओं को अपना व्यवसाय शुरू करने के लिए रिश्तेदारों और मित्रों से उधार लेना पड़ा। बाजार तक पहुंच भी एक बड़ी समस्या है। कई बार उत्पाद तैयार हो जाते हैं लेकिन उन्हें बेचने के लिए पर्याप्त नेटवर्क उपलब्ध नहीं होता।
एक और समस्या सामाजिक अलगाव की है। जिन महिलाओं ने पहले विश्वविद्यालयों में पढ़ने, सरकारी सेवा में जाने या पेशेवर जीवन में आगे बढ़ने का सपना देखा था, वे आज घरों के भीतर सीमित आर्थिक गतिविधियों तक सिमट गई हैं। उनका संघर्ष केवल आय अर्जित करने का नहीं बल्कि अपनी पहचान बनाए रखने का भी है। व्यवसाय उनके लिए आत्मनिर्भरता का माध्यम है लेकिन वह उस व्यापक सामाजिक स्वतंत्रता का विकल्प नहीं बन सकता जो उनसे छीन ली गई है।
आगे बढ़ने की जिद्
‘इंडियन एक्सप्रेस’ में प्रकाशित एक रिपोर्ट में ऐसी अनेक महिलाओं की कहानियां सामने आई हैं जिन्होंने विपरीत परिस्थितियों के बावजूद अपने व्यवसाय खड़े किए। किसी ने कालीन बुनाई केंद्र शुरू किया जहां दर्जनों महिलाएं काम कर रही हैं वहीं किसी ने स्थानीय हस्तशिल्प को बाजार तक पहुंचाने का प्रयास किया। इन महिलाओं की सफलता केवल आर्थिक उपलब्धि नहीं बल्कि सामाजिक प्रतिरोध का प्रतीक भी है। वे यह संदेश देती हैं कि अवसर सीमित किए जा सकते हैं लेकिन आकांक्षाओं को पूरी तरह समाप्त नहीं किया जा सकता। इन कहानियों का एक मानवीय पक्ष भी है। अनेक महिला उद्यमियों ने बताया कि उनका व्यवसाय उन्हें मानसिक रूप से मजबूत बनाए रखता है। घर में बैठकर भविष्य को लेकर निराश होने के बजाय वे उत्पादन, बिक्री और संगठन के कार्यों में लगी रहती हैं। इससे उन्हें आर्थिक लाभ के साथ-साथ आत्मसम्मान भी मिलता है। कई महिलाएं अपने व्यवसाय के माध्यम से अन्य महिलाओं को रोजगार दे रही हैं और एक तरह का सहयोगी नेटवर्क विकसित कर रही हैं।
यहां एक महत्वपूर्ण प्रश्न उभरता है। यदि महिलाएं सफल व्यवसाय चला सकती हैं, रोजगार पैदा कर सकती हैं और स्थानीय अर्थव्यवस्था में योगदान दे सकती हैं तो फिर उन्हें शिक्षा और सार्वजनिक जीवन में समान अवसर क्यों नहीं मिलने चाहिए? यही वह विरोधाभास है जो आज के अफगानिस्तान को परिभाषित करता है। एक ओर महिलाओं की क्षमता स्पष्ट रूप से दिखाई देती है, दूसरी तरफ उनके अधिकारों को सीमित किया जाता है।
विशेषज्ञों का मानना है कि महिला उद्यमिता में आई वृद्धि को किसी सकारात्मक सामाजिक परिवर्तन के रूप में देखने से पहले उसके कारणों को समझना जरूरी है। यह वृद्धि मुख्य रूप से मजबूरी की उपज है। जब रोजगार के पारम्परिक रास्ते बंद हो जाते हैं तो लोग वैकल्पिक रास्ते तलाशते हैं। अफगानी महिलाओं ने भी यही किया है। उन्होंने परिस्थितियों से समझौता नहीं किया बल्कि उपलब्ध सीमित अवसरों को अपने पक्ष में इस्तेमाल करने की कोशिश की।
विशेषज्ञों का मानना है कि महिला उद्यमिता में आई वृद्धि को किसी सकारात्मक सामाजिक परिवर्तन के रूप में देखने से पहले उसके कारणों को समझना जरूरी है। यह वृद्धि मुख्य रूप से मजबूरी की उपज है। जब रोजगार के पारम्परिक रास्ते बंद हो जाते हैं तो लोग वैकल्पिक रास्ते तलाशते हैं। अफगानी महिलाओं ने भी यही किया है। उन्होंने परिस्थितियों से समझौता नहीं किया बल्कि उपलब्ध सीमित अवसरों को अपने पक्ष में इस्तेमाल करने की कोशिश की।
नई पीढ़ी के लिए प्रेरणा
इतिहास बताता है कि समाजों का निर्माण केवल सरकारें नहीं करतीं बल्कि आम लोग भी करते हैं। अफगानिस्तान की महिलाएं आज जिस साहस का परिचय दे रही हैं, वह इसी तथ्य का प्रमाण है। वे अपने परिवारों को सम्भाल रही हैं, छोटे उद्योग चला रही हैं, नई पीढ़ी को प्रेरित कर रही हैं और यह साबित कर रही हैं कि किसी समाज की आधी आबादी को स्थायी रूप से हाशिए पर नहीं धकेला जा सकता।
कभी काबुल की सड़कों पर स्वतंत्रता का प्रतीक रही अफगानी महिलाएं आज संघर्ष का प्रतीक बन गई हैं। उनके सपनों पर पहरे बिठाए गए हैं, उनके अवसर सीमित किए गए हैं लेकिन उनकी जिजीविषा अब भी जीवित है। यही कारण है कि आज के अफगानिस्तान की सबसे महत्वपूर्ण कहानी केवल तालिबान की नहीं है। यह उन महिलाओं की कहानी है जो तमाम प्रतिबंधों, कठिनाइयों और अनिश्चितताओं के बावजूद अपने लिए जगह बना रही हैं। यह कहानी बताती है कि इतिहास के सबसे अंधेरे दौर में भी उम्मीद की छोटी-सी लौ बुझती नहीं बल्कि कई बार वही भविष्य के उजाले की शुरुआत बन जाती है।