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संकट में मोहन यादव, शर्मसार हुआ भाजपा नेतृत्व

  • दि संडे पोस्ट डेस्क
भारतीय जनता पार्टी के राजनीतिक विस्तार की नींव केवल चुनावी सफलताओं पर नहीं बल्कि कुछ नैतिक और वैचारिक दावों पर भी रखी गई थी। 1980 के दशक और विशेष रूप से 1984 में लोकसभा में मात्र दो सीटों तक सिमट जाने के बाद भाजपा ने अटल बिहारी वाजपेयी और लालकृष्ण आडवाणी के नेतृत्व में स्वयं को कांग्रेस से अलग एक राजनीतिक विकल्प के रूप में स्थापित करना शुरू किया। इसी दौर में ‘चाल, चरित्र और चेहरा’ भाजपा की पहचान का सबसे चर्चित सूत्र बना। पार्टी का दावा था कि उसकी सबसे बड़ी ताकत सत्ता नहीं बल्कि उसके नेताओं का राजनीतिक आचरण, नैतिकता और सार्वजनिक जीवन की शुचिता है। बाद में 1990 के दशक और अटल बिहारी वाजपेयी के प्रधानमंत्रित्वकाल में भाजपा ने ‘भय, भूख और भ्रष्टाचार मुक्त भारत’ का नारा भी बुलंद किया। यह केवल चुनावी घोषणा नहीं थी बल्कि सुशासन, पारदर्शिता और ईमानदार प्रशासन का वादा था। चार दशक बाद जब भाजपा देश की सबसे बड़ी राजनीतिक शक्ति बन चुकी है, तब उसके किसी मुख्यमंत्री पर लगने वाले भ्रष्टाचार, पक्षपात या हितों के टकराव से जुड़े आरोप केवल उस व्यक्ति पर सवाल नहीं खड़े करते बल्कि भाजपा के उन्हीं मूल नारों और नैतिक दावों को भी कठघरे में खड़ा कर देते हैं जिनके सहारे उसने अपनी राजनीतिक पहचान बनाई थी

‘दि इंडियन एक्सप्रेस’ ने अपने 23 जून के अंक में एक सनसनीखेज समाचार प्रकाशित कर भाजपा नेतृत्व को शर्मसार करने और मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री को भारी संकट में डालने का काम कर दिया है। इसकी खोजी रिपोर्ट के अनुसार मुख्यमंत्री बनने के बाद मोहन यादव के परिवार और उनसे जुड़ी कम्पनियों ने उज्जैन और आस-पास के क्षेत्रों में 137 भूखंड खरीदे, जिनका कुल क्षेत्रफल लगभग 168 एकड़ बताया गया है। आरोप है कि इनमें से बड़ी मात्रा में जमीन उन इलाकों में खरीदी गई जहां बाद में सड़क, रिंग रोड और अन्य विकास परियोजनाओं की घोषणा हुई लेकिन इस विवाद के साथ-साथ भाजपा के भीतर सम्भावित सत्ता संघर्ष की चर्चाएं भी तेज हो गई हैं।

‘दि इंडियन एक्सप्रेस’ के अनुसार दिसम्बर 2023 में मुख्यमंत्री बनने के बाद से लेकर 2025 के अंत तक मुख्यमंत्री मोहन यादव के परिवार और परिवार से जुड़ी कम्पनियों ने उज्जैन तथा आस-पास के क्षेत्रों में बड़े पैमाने पर जमीन की खरीदारी की। रिपोर्ट के अनुसार कुल 137 भूखंड खरीदे गए हैं जिनका क्षेत्रफल लगभग 168 एकड़ है। इन जमीनों का घोषित मूल्य करीब 45 करोड़ रुपए बताया गया है।
रिपोर्ट में कहा गया है कि इन खरीदों में मुख्यमंत्री की पत्नी, भाई, भाभी, भतीजे, चचेरे भाई और परिवार से जुड़ी रियल एस्टेट कम्पनियां शामिल हैं। सबसे महत्वपूर्ण आरोप यह है कि लगभग 111 एकड़ जमीन ऐसे इलाकों में खरीदी गई जहां बाद में सड़क, रिंग रोड, औद्योगिक काॅरिडोर, शहरी विस्तार अथवा अन्य सरकारी विकास परियोजनाओं की घोषणा हुई। यही वह बिंदु है जिसने पूरे मामले को सामान्य रियल एस्टेट निवेश से निकालकर राजनीतिक विवाद में बदल दिया है।
‘दि इंडियन एक्सप्रेस’ के अनुसार उज्जैन के आस-पास महाकाल लोक विस्तार, सिंहस्थ 2028 की तैयारियों, रिंग रोड, नई कनेक्टिविटी परियोजनाओं और शहरी विस्तार योजनाओं के कारण जमीन की कीमतों में भारी वृद्धि की सम्भावना है। आरोप है कि मुख्यमंत्री के परिजनों ने ठीक उन्हीं इलाकों में बड़ी मात्रा में जमीन खरीदी जहां भविष्य में सरकारी निवेश और बुनियादी ढांचे का विस्तार होना था। विपक्ष का सवाल है कि क्या इन खरीदों को केवल संयोग माना जाए या फिर सत्ता के निकट होने के कारण भविष्य की परियोजनाओं की जानकारी का लाभ उठाया गया।
कांग्रेस ने इस मामले को हाथोंहाथ लिया है। उसका आरोप है कि यह हितों के टकराव का स्पष्ट मामला है। कांग्रेस नेताओं का कहना है कि भले ही जमीन मुख्यमंत्री के नाम पर न हो लेकिन जब खरीदारी उनके निकट रिश्तेदारों और परिवार से जुड़ी कम्पनियों द्वारा की गई हो तो सवाल उठना स्वाभाविक है। कांग्रेस स्वतंत्र जांच की मांग कर रही है और इसे सत्ता तथा व्यवसाय के गठजोड़ का उदाहरण बता रही है।
इस पूरे विवाद में मोहन यादव को एक अप्रत्याशित राहत समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव से मिली है। अखिलेश ने कहा है कि केवल जमीन खरीद लेने भर से किसी को दोषी नहीं ठहराया जा सकता और पहले तथ्यों की जांच होनी चाहिए। राजनीतिक विश्लेषक इसे उत्तर भारत की यादव राजनीति के व्यापक सामाजिक समीकरण से जोड़कर देख रहे हैं। भाजपा और समाजवादी पार्टी के बीच तीखा राजनीतिक संघर्ष होने के बावजूद अखिलेश का यह रुख चर्चा का विषय बन गया है। हालांकि इस पूरे विवाद का एक दूसरा राजनीतिक पहलू भी है जिसकी चर्चा भोपाल और दिल्ली के सत्ता गलियारों में लगातार हो रही है। सोशल मीडिया और राजनीतिक हलकों में यह सवाल उठाया जा रहा है कि क्या यह मामला केवल पत्रकारिता के माध्यम से सामने आया खुलासा है या इसके पीछे भाजपा के भीतर चल रहा कोई बड़ा शक्ति संघर्ष भी मौजूद है।
गौरतलब है कि दिसम्बर 2023 में जब भाजपा नेतृत्व ने शिवराज सिंह चौहान की जगह मोहन यादव को मुख्यमंत्री बनाया था तो इसे केवल नेतृत्व परिवर्तन नहीं बल्कि सत्ता के केंद्र में बदलाव माना गया था। लगभग दो दशकों तक मध्य प्रदेश की राजनीति पर प्रभाव रखने वाले पुराने नेतृत्व की जगह एक नया नेतृत्व सामने आया। इसके साथ ही नौकरशाही, राजनीतिक नेटवर्क और कारोबारी समूहों के बीच शक्ति संतुलन भी बदलने लगा। इसी पृष्ठभूमि में सोशल मीडिया पर प्रसारित कुछ राजनीतिक टिप्पणियों में दावा किया जा रहा है कि राज्य के कुछ प्रभावशाली कारोबारी समूहों और पुराने सत्ता नेटवर्कों के हित प्रभावित होने के बाद टकराव बढ़ा। कुछ पोस्टों में यहां तक संकेत दिए गए हैं कि मुख्यमंत्री के खिलाफ सामने आई विस्तृत जानकारी किसी अंदरूनी राजनीतिक संघर्ष का परिणाम हो सकती है। इन दावों के समर्थन में कोई सार्वजनिक प्रमाण उपलब्ध नहीं हैं लेकिन यह चर्चा अवश्य है कि मुख्यमंत्री के परिवार की जमीनों से जुड़े इतने विस्तृत खसरा रिकाॅर्ड, रजिस्ट्री दस्तावेज और भू-अभिलेख किस प्रकार व्यवस्थित रूप से सार्वजनिक विमर्श का हिस्सा बने?
राजनीतिक पर्यवेक्षकों का कहना है कि यदि आरोप सही हैं तो मामला अत्यंत गम्भीर है क्योंकि यह सत्ता और निजी आर्थिक हितों के बीच सम्बंधों पर प्रश्न खड़ा करता है लेकिन यदि इसके पीछे राजनीतिक प्रतिद्वंद्विता काम कर रही है तो यह भी उतना ही महत्वपूर्ण प्रश्न है कि क्या मध्य प्रदेश में सत्ता परिवर्तन के बाद पुराने और नए शक्ति केंद्रों के बीच संघर्ष अब खुलकर सामने आने लगा है।
मोहन यादव और उनके समर्थकों का कहना है कि परिवार लम्बे समय से रियल एस्टेट कारोबार में सक्रिय है और जमीन खरीदना कोई अपराध नहीं है। उनका तर्क है कि मुख्यमंत्री बनने के बाद परिवार के प्रत्येक कारोबारी निर्णय को संदेह की दृष्टि से नहीं देखा जा सकता। वहीं विपक्ष का कहना है कि जब खरीदारी उन्हीं क्षेत्रों में हो जहां बाद में सरकारी परियोजनाएं आती हैं तो नैतिक सवाल खड़े होना स्वाभाविक है। फिलहाल यह विवाद केवल भूमि खरीद तक सीमित नहीं रह गया है। यह मध्य प्रदेश की राजनीति में सत्ता, प्रभाव, कारोबारी हितों और भाजपा के भीतर सम्भावित शक्ति संघर्ष की बहस में बदल चुका है। आने वाले दिनों में जांच और राजनीतिक घटनाक्रम तय करेंगे कि यह मामला केवल एक भूमि विवाद साबित होता है या फिर मध्य प्रदेश की राजनीति में चल रही किसी बड़ी अदृश्य लड़ाई का सार्वजनिक चेहरा बन जाता है।

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