लगातार दो विधानसभा चुनाव हार चुकी उत्तराखण्ड कांग्रेस में अब संगठन विस्तार के नाम पर नए चेहरों की एंट्री को लेकर बड़ा टकराव उभर आया है। पार्टी के भीतर नारायण पाल, भीमलाल आर्य, राजकुमार ठुकराल, लाखन सिंह नेगी और संजय नेगी को शामिल करने की कवायद चल रही है लेकिन इन्हीं नामों को लेकर अलग-अलग गुट आमने-सामने हैं। इस पूरे घटनाक्रम में जहां नेता प्रतिपक्ष यशपाल आर्य सक्रिय रणनीतिक भूमिका में नजर आ रहे हैं, वहीं पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत को दरकिनार करने की कोशिशों के संकेत भी साफ दिखाई दे रहे हैं
उत्तराखण्ड कांग्रेस इस समय एक ऐसे संक्रमण काल से गुजर रही है जहां संगठन विस्तार, नेतृत्व संतुलन और चुनावी रणनीति तीनों एक-दूसरे से टकराते नजर आ रहे हैं। ऊपर से पार्टी नए चेहरों को शामिल कर 2027 के विधानसभा चुनाव के लिए खुद को मजबूत करने की कोशिश कर रही है लेकिन अंदरूनी खेमेबाजी इस पूरी कवायद को कमजोर करती दिखाई दे रही है। दरअसल, कांग्रेस के सामने सबसे बड़ी चुनौती यह है कि वह विस्तार और संगठनात्मक अनुशासन के बीच संतुलन कैसे बनाए लेकिन मौजूदा हालात में यह संतुलन लगातार बिगड़ता दिख रहा है।
हाल ही में दिल्ली में उत्तराखण्ड के वरिष्ठ नेताओं की प्रदेश प्रभारी शैलजा के साथ हुई बैठक इस पूरे विवाद का केंद्र बन गई है। इस बैठक में प्रदेश अध्यक्ष गणेश गोदियाल, नेता प्रतिपक्ष यशपाल आर्य, पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत, प्रीतम सिंह, डाॅ. हरक सिंह रावत, करण माहरा, तिलक राज बेहड़, ब्रह्मास्वरूप ब्रह्माचारी और प्रकाश जोशी सहित कई बड़े नेता मौजूद थे। बैठक का एजेंडा सिर्फ 2027 की रणनीति नहीं था बल्कि यह भी था कि किन नए चेहरों को पार्टी में शामिल किया जाए। इसी बैठक में नारायण पाल, भीमलाल आर्य, राजकुमार ठुकराल, लाखन सिंह नेगी और संजय नेगी जैसे नामों पर चर्चा हुई और यहीं से कांग्रेस के भीतर खेमेबाजी खुलकर सामने आने लगी।
कांग्रेस में नए नेताओं का आना कोई नई बात नहीं है लेकिन इस बार विवाद एंट्री से ज्यादा एंट्री की राजनीति को लेकर है। असल सवाल यह बन गया है कि कौन किसे पार्टी में ला रहा है, किसे टिकट दिलाने की तैयारी है और किसे जान-बूझकर रोका जा रहा है। यही कारण है कि संगठन विस्तार की प्रक्रिया आपसी संघर्ष का कारण बनती जा रही है।
इस पूरे घटनाक्रम में नेता प्रतिपक्ष यशपाल आर्य की भूमिका बेहद अहम होकर उभरी है। खासतौर पर भीमताल सीट पर उनका रुख पार्टी के भीतर सबसे ज्यादा चर्चा और विवाद का विषय बना हुआ है। वे लाखन सिंह नेगी को कांग्रेस में शामिल कराने और उन्हें टिकट दिलाने के पक्ष में मजबूती से खड़े हैं। इसके पीछे उनका राजनीतिक गणित भी माना जा रहा है। पंचायत चुनाव के दौरान लाखन सिंह नेगी की पत्नी पुष्पा नेगी को कांग्रेस उम्मीदवार बनाया गया था जिसके बाद दोनों के बीच राजनीतिक नजदीकियां बढ़ीं। साथ ही यह भी माना जा रहा है कि लाखन नेगी के जरिए यशपाल आर्य बेतालघाट क्षेत्र को साधने की रणनीति पर काम कर रहे हैं, क्योंकि पिछली बार बेतालघाट सीट से संजीव आर्य की हार उनके लिए बड़ा झटका साबित हुई थी लेकिन यही फैसला अब विवाद का सबसे बड़ा कारण बन गया है। भीमताल में पार्टी के भीतर यह असंतोष तेजी से उभर रहा है। जहां एक ओर हरीश पनेरु पिछले करीब चार वर्षों से लगातार कांग्रेस के लिए जमीन तैयार कर रहे हैं और संगठन को मजबूत करने में जुटे हैं, वहीं दूसरी तरफ लाखन सिंह नेगी को प्राथमिकता दी जा रही है। इससे स्थानीय कार्यकर्ताओं में यह संदेश जा रहा है कि पार्टी अपने पुराने और संघर्षशील नेताओं की अनदेखी कर रही है।
विवाद को और गहरा करने वाली बात यह है कि लाखन सिंह नेगी की छवि को लेकर भी सवाल उठ रहे हैं। उपलब्ध दस्तावेजों के अनुसार उन पर कई आपराधिक मुकदमे दर्ज रहे हैं जिनमें गैंगस्टर एक्ट के तहत कार्रवाई का उल्लेख भी शामिल है। गैंगस्टर एक्ट एक सख्त कानून है जो संगठित अपराध में शामिल व्यक्तियों या गिरोहों पर लगाया जाता है और इसके तहत सम्पत्ति जब्ती से लेकर कड़ी निगरानी तथा कठोर कार्रवाई तक के प्रावधान होते हैं। ऐसे में पार्टी के भीतर यह सवाल उठ रहा है कि क्या कांग्रेस जीत की सम्भावना के नाम पर अपने मूल राजनीतिक और नैतिक मानकों से समझौता कर रही है।
रुद्रपुर सीट पर भी स्थिति कम विवादित नहीं है। यहां तिलक राज बेहड़ और यशपाल आर्य के बीच स्पष्ट मतभेद सामने आ चुके हैं। बेहड़ जहां राजकुमार ठुकराल के कांग्रेस में आने का विरोध कर रहे हैं, वहीं यशपाल आर्य उनके समर्थन में खड़े हैं। इस विवाद ने ऊधमसिंह नगर में कांग्रेस को दो खेमों में बांट दिया है जिससे संगठनात्मक एकता पर असर पड़ना तय माना जा रहा है।
नारायण पाल की वापसी को लेकर भी पार्टी के भीतर मतभेद उभर कर सामने आए हैं। 2022 के विधानसभा चुनाव में यशपाल आर्य नारायण पाल के पक्ष में थे लेकिन कांग्रेस ने नवतेज सिंह को टिकट दिया था और नवतेज सिंह ने ही चुनाव लड़ा था। अब स्थिति यह है कि नवतेज खेमा नारायण पाल की वापसी का विरोध कर रहा है जिससे यह साफ हो जाता है कि पार्टी के भीतर पुरानी राजनीतिक प्रतिस्पर्धाएं अब भी सक्रिय हैं।
भीमलाल आर्य का मामला कांग्रेस की अंदरूनी राजनीति का एक और महत्वपूर्ण उदाहरण है। वे टिहरी जिले की घनसाली सीट से विधायक रह चुके हैं और हरीश रावत के मुख्यमंत्रित्व काल में जब कांग्रेस के भीतर बगावत हुई थी, तब सरकार बचाने वालों में प्रमुख भूमिका निभाई थी। बाद में वे कांग्रेस में शामिल हुए लेकिन 2022 के विधानसभा चुनाव में पार्टी प्रत्याशी के खिलाफ मैदान में उतरने पर कांग्रेस ने उन्हें छह साल के लिए निष्कासित कर दिया। पार्टी ने पहले उन्हें मनाने और नामांकन वापस लेने के लिए प्रयास किए लेकिन असफल रहने पर उन्हें बाहर का रास्ता दिखाया गया। अब उनकी दोबारा एंट्री को लेकर सहमति बनती दिखाई दे रही है जो कांग्रेस की राजनीतिक लचीलापन और व्यावहारिक रणनीति दोनों को दर्शाती है।
रामनगर सीट इस पूरे घटनाक्रम का सबसे संवेदनशील केंद्र बनकर उभरी है। यहां पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत संजय नेगी की कांग्रेस में वापसी के पक्ष में मजबूती से खड़े हैं। उन्होंने प्रदेश प्रभारी शैलजा के साथ हुई बैठक में भी संजय नेगी के पक्ष में जोरदार पैरवी की लेकिन वहां मौजूद अन्य नेताओं ने उनका साथ नहीं दिया। इस स्थिति ने यह संकेत दिया है कि पार्टी के भीतर हरीश रावत को दरकिनार करने की कोशिशें अब खुलकर सामने आने लगी हैं। रामनगर में रणजीत रावत, करण माहरा और प्रकाश जोशी जैसे नेता संजय नेगी की एंट्री का विरोध कर रहे हैं। यह टकराव सिर्फ राजनीतिक नहीं रह गया है बल्कि व्यक्तिगत समीकरणों तक पहुंच गया है जहां पारिवारिक रिश्ते भी अलग-अलग राजनीतिक खेमों में बंटे दिखाई दे रहे हैं।
2022 के विधानसभा चुनाव का अनुभव भी इस विवाद की पृष्ठभूमि को मजबूत करता है। उस समय हरीश रावत और रणजीत रावत के बीच टकराव के चलते महेंद्र पाल सिंह को टिकट दिया गया था लेकिन निर्दलीय संजय नेगी के मैदान में उतरने से कांग्रेस को नुकसान हुआ और भाजपा के दीवान सिंह बिष्ट की जीत आसान हो गई। इसके बावजूद संजय नेगी की जमीनी पकड़ कमजोर नहीं हुई। उन्होंने निकाय चुनाव में हाजी अकरम का समर्थन कर उन्हें जिताया जबकि उस समय कांग्रेस अपना आधिकारिक प्रत्याशी तक घोषित नहीं कर पाई थी। उस चुनाव में भी पार्टी के अलग- अलग गुट अलग-अलग दिशा में काम करते नजर आए थे। पंचायत चुनाव में भी संजय नेगी ने अपने दम पर अपनी पत्नी मंजू नेगी को ब्लाॅक प्रमुख बनवाया जबकि भाजपा उन्हें अपना उम्मीदवार बनाना चाहती थी।
इन तमाम घटनाक्रमों के बीच सबसे बड़ा सवाल यही उभरता है कि क्या हरीश रावत की भूमिका को सीमित किया जा रहा है और क्या पार्टी के भीतर एक नई नेतृत्व संरचना तैयार हो रही है जो उनके प्रभाव को कम करना चाहती है।
कांग्रेस की आंतरिक स्थिति को देखें तो यह साफ नजर आता है कि पार्टी अब कई धड़ों में बंटी हुई है जहां एक ओर हरीश रावत का जनाधार आधारित नेतृत्व है वहीं दूसरी तरफ यशपाल आर्य रणनीतिक और क्षेत्रीय विस्तार की राजनीति कर रहे हैं। इसके साथ ही रणजीत रावत और करण माहरा जैसे नेता संगठनात्मक पकड़ के जरिए अपनी स्थिति मजबूत बनाए रखने की कोशिश में हैं जबकि स्थानीय स्तर पर कई पुराने कार्यकर्ता खुद को उपेक्षित महसूस कर रहे हैं।
यही बहुस्तरीय गुटबाजी कांग्रेस के सामने सबसे बड़ी चुनौती बनकर उभरी है। पार्टी यह तो समझ चुकी है कि 2027 का चुनाव सिर्फ पुराने चेहरों के भरोसे नहीं जीता जा सकता लेकिन यह भी उतना ही बड़ा सच है कि यदि संगठन के पुराने और जमीनी नेताओं की अनदेखी की गई तो इसका नुकसान चुनावी मैदान में उठाना पड़ सकता है।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि उत्तराखण्ड जैसे राज्य में हरीश रावत का कद अब भी सबसे बड़ा है और उन्हें नजरअंदाज करना कांग्रेस के लिए भारी पड़ सकता है लेकिन इसके समानांतर पार्टी के भीतर एक नई नेतृत्व संरचना भी आकार ले रही है जो भविष्य की राजनीति को अपने तरीके से परिभाषित करना चाहती है।
ऐसे में कांग्रेस के सामने असली चुनौती सिर्फ भाजपा से मुकाबले की नहीं है बल्कि अपने ही भीतर चल रही इस खामोश लड़ाई को संतुलित करने की है। यदि यह संतुलन नहीं बन पाया तो 2027 का चुनाव कांग्रेस के लिए सिर्फ विपक्ष से नहीं बल्कि अपने ही भीतर से हारने वाली लड़ाई बन सकता है।
ऐसे में कांग्रेस के सामने असली चुनौती सिर्फ भाजपा से मुकाबले की नहीं है बल्कि अपने ही भीतर चल रही इस खामोश लड़ाई को संतुलित करने की है। यदि यह संतुलन नहीं बन पाया तो 2027 का चुनाव कांग्रेस के लिए सिर्फ विपक्ष से नहीं बल्कि अपने ही भीतर से हारने वाली लड़ाई बन सकता है।