जनपद उत्तरकाशी के मोरी विकास खंड और तहसील क्षेत्र के बंघाड़ पट्टी का समुद्र तल से करीब 18 सौ मीटर ऊंचाई पर बसा सीमांत गांव कलीच आजादी के 78 वर्ष बाद भी अपने विकास की राह देख रहा है। सरकारी सिस्टम की अनदेखी का आलम इस बात से लगाया जा सकता है कि आज भी इस गांव के अलावा करीब दो दर्जन अन्य गांव अपने स्वास्थ्य और चिकित्सा की सुविधाओं के लिए हिमाचल प्रदेश के शिमला जिले के रोहडू पर ही निर्भर हैं। सीमांत और दुर्गमता से जूझ रहे कलीच गांव में सरकारी सिस्टम की अनदेखी को इस बात से भी समझा जा सकता है कि जिले के अनेक गांव अपनी स्थानीय बोली भाषा में संवाद करते हैं, साथ ही गढ़वाली भाषा बोली को अच्छी तरह से समझते हैं लेकिन कलीच गांव के साथ-साथ इस क्षेत्र के अन्य गांव के निवासी आज भी गढ़वाली बोली-भाषा से पूरी तरह से अनजान ही हैं। सीमांत जनजातीय प्राचीन बंघाणी बोली और हिंदी ही उनका आम लोगों से संवाद का मुख्य माध्यम बना हुआ है
करीब 600 की आबादी और 340 मतदताताओं वाला गांव कलीच एक भरी पूरी ग्रामसभा है जिसमें रत्यालु, डाड, खड़ा मातील रगड़ी, पाजूधार एक व पाजूधार दो के अलावा स्यू टमेडा तोक गांव में 92 परिवार आबाद हैं। आश्चर्य की बात है कि तमाम असुविधाओं के बावजूद कलीच गांव में पलायन का अनुपात महज 10 फीसदी ही है यह 10 प्रतिशत भी सरकारी या निजी क्षेत्र में नौकरी आदि करने के कारण हुआ है। आज भी गांव पूरी तरह से आबाद है।
स्थानीय निवासियों का मुख्य व्यवसाय कृषि और बागवानी ही रहा है। मंडुवा, मक्का, आलू, मटर, राजमा का उत्पादन होता है लेकिन यह स्वयं के लिए ही पर्याप्त होता है। जब फसल का उत्पादन अधिक हो जाता है तो उसको त्युणी, आराकोट आदि क्षेत्रों के बाजारों में विक्रय कर के कुछ आमदानी हासिल की जाती है। इसके अलावा फलों का उत्पादन भी इस क्षेत्र में होता है जिसमें पुलम, आडू, नाशपाती, चूलू, खुबानी सहित अन्य आदी फल भी इस क्षेत्र में होते तो हैं लेकिन उनका व्यवसायिक उत्पादन न के बराबर ही रहा है। साथ ही पशुपालन में गाय, भैंस, बकरी, भेड़ प्रत्येक परिवार का एक अभिन्न अंग हैं। जहां समूचे पर्वती क्षेत्रों में बैलांे को अनुपयोगी मानकर छोड़ा जा रहा है, वहीं कलीच गांव में आज भी बैलो से खेती की जा रही है। हालांकि ट्रैक्टरों का भी उपयोग बढ़ रहा है बावजूद इसके बैलांे का उपयोग खेती में होना अपने आप में ही एक सुखद अहसास पैदा करता है।
सेब एक मात्र ऐसा फल उत्पादन है जो इस क्षेत्र के सैकड़ों लोगों के लिए आज तक आर्थिकी का मुख्य आधार बना हुआ है। अविभाजित उत्तर प्रदेश के समय से ही इस क्षेत्र में सेब का उत्पादन होता आ रहा है। अलग उत्तराखण्ड राज्य बनने के बाद केंद्र और राज्य सरकार द्वारा राष्ट्रीय एप्पल मिशन के तहत पर्वतीय क्षेत्रों में सेब के बागान लगाने का बड़ा प्रयास किया गया लेकिन वह सिर्फ रूट स्टाॅक पर ही सीमित कर दिया गया जबकि कलीच और इस समूचे बंघाण क्षेत्र में 15 से लेकर 50 वर्ष के सिडलिंग ग्राफिटिंग तकनीक से परम्परागत सेब का उत्पादन होता आ रहा है। इस क्षेत्र में मशहूर राॅलय, स्पर्र रेड चीफ, स्कारलेट, किंगरोट, जैड वन, गाला, फैंन्सम और डार्क बैरून प्रजाति के सेब का भरपूर उत्पादन होता है।
कहने का तो कलीच गांव सेब उत्पादन में अग्रणी गांव है लेकिन प्रति वर्ष 2500 टन सेब का उत्पादन करने वाला इस गांव में सरकारी सिस्टम और बागवानी से जुड़ी योजनाएं आते-आते दम तोड़ देती है। आज भी इस गांव के लोगों को जंगली जानवरों से बचाव के लिए घेरबाड़ योजना का लाभ नहीं मिल पाया है। एक भी किसान को घेरबाड़ योजना से नहीं जोड़ा जा सका है। इसका एक बड़ा कारण यह बताया गया है कि कृषि और उद्यान विभाग अधिकारी लाभार्थी के प्रस्ताव में इतने अडंगे लगा देते हैं कि किसान हार कर योजना की मांग ही छोड़ देता है।
एप्पल मिशन को प्रदेश के बागवानों के लिए आर्थिकी की रीढ़ बताने वाला सरकारी सिस्टम कितना उदासीन है उसका प्रमाण इस बात से ही लगाया जा सकता है कि मोरी विकास खंड सेब उत्पादन में जिले भर में अग्रणी होने के बावजूद एक भी कोल्ड स्टोरेज इस क्षेत्र में नहीं लग पाया है। जिसके कारण सेब उत्पादक किसानों को अनेक समस्याओं से जूझना पड़ता है। अत्याधिक बरसात, आपदा से जूझने के बाद बाजार में कम भाव मिलना बागवानों के लिए किसी आपदा से कम नहीं है जिसके कारण कई सौ टन सेब या तो सड़ जाता है या कौड़ियों के भाव में ही बेचना पड़ता है। इस वर्ष आई आपदा में सड़क मार्ग बंद होने और भारी बरसात के चलते कलीच गांव के हर किसान को भारी नुकसान उठाना पड़ा। स्थानीय निवासी बताते हैं कि हर किसान का कम से कम दो से चार टन सेब सड़ गया।
फसलों की सिंचाई के लिए भी इस क्षेत्र में कोई सुविधा नहीं है। हैरत की बात यह है कि कलीच गांव में करीब एक दर्जन बारहमासी जल स्रोत हैं जिनमें हर मौसम में भरपूर पानी होता है लेकिन इन स्रोतांे को आज तक सिंचाई के लिए जोड़ा नहीं जा सका है, न ही इस क्षेत्र में सिंचाई की गूलें और नहर बनाई जा सकी है। स्थानीय किसान अपने सामथ्र्य से ही पाइप द्वारा सिंचाई कर पाते हैं लेकिन इसमें भी बहुत समस्या और खर्च होता है जिस कारण अधिकांश किसान बरसात के ही भरोसे रहने को मजबूर हैं।
कलीच गांव के लिए आराकोट कलीच मोटर मार्ग वर्ष 2019 में तत्कालीन मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत सरकार द्वारा स्वीकृत की गई थी जिसका बजट भी तुरंत स्वीकृत कर दिया गया था। 2021 में सड़क को काटकर कलीच गांव तक ले जाया गया। तब से लेकर आज तक इस सड़क का न तो डामरीकरण किया जा सका है और न ही इसका मानकों के अनुरूप निर्माण कार्य किया गया। लोक निर्माण विभाग के मानकों के अनुसार 5 मीटर सड़क का निर्माण किया जाता है लेकिन यह सड़क 4 मीटर ही बनाई गई है जबकि अनेक स्थानों पर तो 3 मीटर से भी कम है। इस सड़क पर अभी तक 6 वाहन दुर्घटनाएं हो चुकी है। हालांकि इन दुर्घनटनाओं में किसी प्रकार की जनहानि तो नहीं हुई है लेकिन सेब से लदे छोटे वाहन के दुर्घटना होने से किसानों को बड़ी आर्थिक हानि जरूर हुई है। आज भी यह सड़क कलीच और अनेक गांवों के लिए एक मात्र आवागमन और उत्पादन को बाजार में ले जाने का माध्यम बनी हुई है। इस सड़क को प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना में स्थानांतरण का प्रस्ताव की फाइल विभागों में ही चल रही है। हैरत की बात यह है कि जनप्रतिनिधियों द्वारा दबाव बनाया जाता है तो लोक निर्माण विभाग और प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना एक-दूसरे के सिर ठीकरा फोड़ने का काम करते हैं।
इस वर्ष आई आपदा में भी 17 दिनों तक सड़क मार्ग बाधित होने से जनजीवन ठप्प तो रहा ही साथ ही सेब की फसल को बाजार न ले जाए जाने से किसानों को बड़ी हानि हुई है। स्थानीय लोगों और जनप्रतिनिधियों ने सड़क खोलने के लिए विभागीय अधिकारियों से मांग की तो विभाग इस सड़क की जिम्मदारी पीएमजीएसवाई के सिर डालकर चुप्पी मार गया जिससे इस क्षेत्र के सैकड़ों सेब किसानों को भारी नुकसान उठाना पड़ा। जब सड़क मार्ग खुला तो सेब के भाव इतने गिर गए कि किसानों को भाड़ा काटकर कुछ ही हजार रुपए मिल पाए जिस कारण अनेक किसानों का सेब पेटियों में पैक ही सड़ गया। आज भी हर किसान के खेत और सड़क के आस-पास सड़ता हुआ सेब बर्बाद हुए किसानों की कहानी कहता नजर आ रहा है। स्थानीय सेब किसान और पूर्व ग्राम प्रधान कल्याण सिंह कानू बताते हैं कि इस बार सेब की फसल अच्छी हुई और जब हमने फलों को तोड़कर पेटियों में पैक किया तो सड़क कई जगह टूटने से बंद हो गई। 17 दिनों के बाद सड़क खोली गई तब तक सेब पेटियों में ही सड़ गया जो कुछ बचा वह किसी तरह से बाजार में ले गए तो वहां दाम बहुत नीचे गिर गए जिससे भाड़ा तक निकालना मुश्किल हो गया। उनका स्वयं 4 से 5 टन सेब सड़ गया जिसे खेत में फेंक दिया गया।
स्वास्थ्य और चिकित्सा के क्षेत्र में भी कलीच गांव के साथ-साथ दो दर्जन गांवों के लिए प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र तक की सुविधा नहीं है। 17-18 किमी दूर आराकोट में केवल प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र है जो कि चिकित्सक की बजाय फार्मासिस्ट के भरोसे चल रहा है। इस कारण क्षेत्र की 12 हजार की आबादी हिमाचल के शिमला जिले के रोहडू में इलाज करवाने के लिए जाने को मजबूर है। हैरत की बात यह है कि विभागीय मानकों के अनुसार 10 हजार की आबादी में एक प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र होना जरूरी है बावजूद इसके 12 हजार की आबादी को स्वास्थ्य सेवाएं मयस्सर नहीं हो पाई है।
इसी तरह से शिक्षा के क्षेत्र में भी कलीच गांव के हालात बदहाल ही नजर आते हैं। जूनियर हाईस्कूल के अलावा एक प्राथमिक स्कूल कलीच गांव में है जिसमें स्टाफ और अध्यापकों की कमी तो नहीं है लेकिन 2019 की आपदा में प्राथमिक स्कूल बुरी तरह से क्षतिग्रस्त हो गया जिस कारण इसमें छात्रों के लिए खतरा पैदा हो गया। इस स्कूल को जूनियर हाईस्कूल में स्थानांतरित कर दिया गया। एक कमरे में ही प्राथमिक स्कूल के छात्र पढ़ाई के लिए मजबूर हंै। हैरत की बात यह है कि 7 वर्ष बीत जाने के बावजूद प्राथमिक स्कूल के नए भवन का निर्माण तक नहीं हो पाया है यहां तक कि इसकी मरम्मत भी नहीं हो पाई है। इंटर की पढ़ाई के लिए 18 किमी दूर आराकोट और डिग्री काॅलेज के लिए 35 किमी दूर त्यूणी में छात्रों को जाना पड़ता है।
राजनीतिक तौर पर कलीच गांव भी राजनेताओं के लिए उदासीन ही रहा है। हालांकि स्थानीय निवासी बताते हैं कि कलीच गांव के अधिकांश मतदाता भाजपा समर्थित रहे हैं बावजूद इसके आज तक टिहरी सांसद महारानी माला राजलक्ष्मी इस गांव में कभी नहीं आई। यहां तक कि वोट मांगने के लिए भी कभी प्रचार में नहीं आई। इसी तरह से पुरोला के भाजपा विधायक दुर्गेश्वर लाल भी इस क्षेत्र के प्रति उदासीन ही रहे हैं। स्थानीय निवासियों का कहना है कि भाजपा समर्थित होने के चलते कलीच गांव को सुविधाओं की कमी से जूझना पड़ रहा है। विधायक द्वारा इसी वर्ष मंदिर के सौंदर्यीकरण के लिए विधायक निधी से 5 लाख और 5 लाख जिला निधी से देने की घोषणा की थी लेकिन आज तक इस घोषणा पर अमल नहीं हो पाया है। यही नहीं सड़क के डामरीकरण के अलावा सिंचाई की सुविधा हेतु कई बार मांग की गई लेकिन इन मांगों पर कोई काम तक नहीं किया गया।
आराकोट कलीच मोटरमार्ग पीडब्ल्यूडी द्वारा निर्माण किया गया है। अब इस सड़क को प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना में दिए जाने का प्रस्ताव बनाया जा चुका है। शायद जनवरी 2026 में सड़क ट्रांसफर हो जाएगी फिर तत्काल ही इस सड़क को पक्का कर दिया जाएगा। जहां तक सिंचाई की सुविधा न होने की बात है तो इसका अगर कोई प्रस्ताव आया होगा तो उस पर काम किया जाएगा नहीं तो मैं जल्द ही इरिगेशन डिपार्टमेंट की विजिट कलीच गांव में करवा देता हूं जो भी रिपोर्ट मुझे मिलेगी उसके अनुसार तुरंत काम किया जाएगा।
2019 में आराकोट कलीच मोटर मार्ग स्वीकृत हुई भी जो 2021 में बन गई थी। यह रोड अभी पूरी तरह से कच्ची रोड है। हमने आराकोट कलीच मार्ग पर पांच किलोमीटर रोड पक्की कर दी थी अब केवल 13 किलोमीटर ही कच्ची है। 2024 में इस सड़क को प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना में प्रस्तावित कर दिया गया था जिसे भारत सरकार ने अपनी सहमती दे दी है। अब इसका प्रस्ताव अंतिम चरण में है। इसलिए अब यह रोड पीएमजीएसवाई के ही आधीन है। लेकिन जब तक यह सड़क ट्रांसफर नहीं होती तब तक इसका स्वामित्व लोक निर्माण विभाग के ही पास है और हमने समय-समय पर इस रोड को खुलवाया है। यह रोड कभी भी 17 दिनों तक बंद नहीं रही। जब-जब बंद हुई हमने इसमें काम करवाया है। आपको डाटा की जानकारी होना चाहिए। लोग क्या कह रहे हैं? क्यों कह रहे हैं? यह हम नहीं जानते, हम तो अपने विभाग के डाटा की बात करेंगे।
बलराम मिश्रा, अधिशासी अभियंता, लोक निर्माण विभाग, पुरोला
आरोकाट कलीच मोटर मार्ग पीएमजीएवाई को ट्रांसफर होने के लिए प्रस्ताव अंतिम चरण में है। नवम्बर 2025 तक हमें भारत सरकार से आदेश मिल जाएगा तो हम इस सड़क को मानकों के अनुसार 5 मीटर चैड़ी बना देंगे। फिलहाल इसका संचालन लोक निर्माण के ही पास है और वही इसकी देखरेख आदि काम कर सकता है। हमारे पास जब यह आ जाएगी तब इसकी सारी जिम्मेदारी हमारी होगी।
योगेंद्र कुमार सिंह, अधिशासी अभियंता, प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना पुरोला
आजादी के 50 साल के बाद हमें सड़क नसीब हुई लेकिन आज तक यह सड़क पक्की नहीं हो पाई है। बरसात में हर बार यह सड़क टूट जाती है तो कई-कई दिनों तक बंद हो जाती है। इसलिए हमलोग अपनी उपज खास तौर पर सेब को बाजार में नहीं ले जा पाते। कई-कई टन सेब सड़ जाता है। भाजपा और टिहरी राजपरिवार को हम वोट देते-देते मर गए लेकिन आज तक सांसद महारानी माला राजलक्ष्मी को मैंने अपने गांव में नहीं देखा, वह वोट मांगने भी कभी नहीं आई। छह साल पहले बेसिक स्कूल टूट गया लेकिन आज तक उसकी मरम्मत नहीं हुई। प्राथमिक स्वास्थ केंद्र भी 18 किलोमीटर दूर आराकोट में है जिसका कोई फायदा नहीं है। हमंे आज भी हिमाचल के रोहडू में जाना पड़ता है।
महेंद्र चौहान, स्थानीय निवासी और किसान, ग्राम कलीच
हमारा कलीच गांव आत्मनिर्भर रहा है। सेब की फसल जितना हमारे गांव में बगैर सुविधा, बगैर सिंचाई के होती है उतना शायद ही कहीं और होती होगी। हमें सरकार की तरफ से न तो मदद मिलती है न ही योजनाएं। कई किसान घेरबाड़ योजना चाहते हैं लेकिन उनको कभी मिलती ही नहीं। आपको आश्चर्य होगा कि हमारे गांव में पलायन बहुत ही कम हुआ है। जबकि प्रदेश में गांव के गांव खाली हो गए हंै। कम से कम हमें इस बात के लिए सराहना और सरकारी मदद तो मिलनी ही चाहिए।
जयेंद्र चौहान, स्थानीय निवासी, कलीच
हमलोग तो पहले ही दुर्गम में बैठे हैं तो सरकार और प्रशासन भी हमारे लिए दुर्गम ही रहा हैै। कुछ भाई लोग और हमारे प्रतिनिधि दबाव बना देते हैं तो सरकार इस गांव के लिए कुछ काम कर देती है। हमें कोल्ड स्टोरेज की बहुत जरूरत है। हम सेब उगाते हैं लेकिन हमें चंढीगढ़ या दिल्ली बाजार खोजने जाना पड़ता है। सड़क बंद होने से कई-कई टन सेब खेतों में ही सड़ गया है उसके ढेर लगे पड़े हैं। इससे आप समझ सकते हैं कि हमारी क्या स्थिति है?
कल्याण सिंह कानू, पूर्व प्रधान एवं किसान, कलीच
सेब एक मात्र ऐसा फल उत्पादन है जो इस क्षेत्र के सैकड़ों लोगों के लिए आज तक आर्थिकी का मुख्य आधार बना हुआ है। अविभाजित उत्तर प्रदेश के समय से ही इस क्षेत्र में सेब का उत्पादन होता आ रहा है। अलग उत्तराखण्ड राज्य बनने के बाद केंद्र और राज्य सरकार द्वारा राष्ट्रीय एप्पल मिशन के तहत पर्वतीय क्षेत्रों में सेब के बागान लगाने का बड़ा प्रयास किया गया लेकिन वह सिर्फ रूट स्टाॅक पर ही सीमित कर दिया गया जबकि कलीच और इस समूचे बंघाण क्षेत्र में 15 से लेकर 50 वर्ष के सिडलिंग ग्राफिटिंग तकनीक से परम्परागत सेब का उत्पादन होता आ रहा है। इस क्षेत्र में मशहूर राॅलय, स्पर्र रेड चीफ, स्कारलेट, किंगरोट, जैड वन, गाला, फैंन्सम और डार्क बैरून प्रजाति के सेब का भरपूर उत्पादन होता है।
कहने का तो कलीच गांव सेब उत्पादन में अग्रणी गांव है लेकिन प्रति वर्ष 2500 टन सेब का उत्पादन करने वाला इस गांव में सरकारी सिस्टम और बागवानी से जुड़ी योजनाएं आते-आते दम तोड़ देती है। आज भी इस गांव के लोगों को जंगली जानवरों से बचाव के लिए घेरबाड़ योजना का लाभ नहीं मिल पाया है। एक भी किसान को घेरबाड़ योजना से नहीं जोड़ा जा सका है। इसका एक बड़ा कारण यह बताया गया है कि कृषि और उद्यान विभाग अधिकारी लाभार्थी के प्रस्ताव में इतने अडंगे लगा देते हैं कि किसान हार कर योजना की मांग ही छोड़ देता है।
एप्पल मिशन को प्रदेश के बागवानों के लिए आर्थिकी की रीढ़ बताने वाला सरकारी सिस्टम कितना उदासीन है उसका प्रमाण इस बात से ही लगाया जा सकता है कि मोरी विकास खंड सेब उत्पादन में जिले भर में अग्रणी होने के बावजूद एक भी कोल्ड स्टोरेज इस क्षेत्र में नहीं लग पाया है। जिसके कारण सेब उत्पादक किसानों को अनेक समस्याओं से जूझना पड़ता है। अत्याधिक बरसात, आपदा से जूझने के बाद बाजार में कम भाव मिलना बागवानों के लिए किसी आपदा से कम नहीं है जिसके कारण कई सौ टन सेब या तो सड़ जाता है या कौड़ियों के भाव में ही बेचना पड़ता है। इस वर्ष आई आपदा में सड़क मार्ग बंद होने और भारी बरसात के चलते कलीच गांव के हर किसान को भारी नुकसान उठाना पड़ा। स्थानीय निवासी बताते हैं कि हर किसान का कम से कम दो से चार टन सेब सड़ गया।
फसलों की सिंचाई के लिए भी इस क्षेत्र में कोई सुविधा नहीं है। हैरत की बात यह है कि कलीच गांव में करीब एक दर्जन बारहमासी जल स्रोत हैं जिनमें हर मौसम में भरपूर पानी होता है लेकिन इन स्रोतांे को आज तक सिंचाई के लिए जोड़ा नहीं जा सका है, न ही इस क्षेत्र में सिंचाई की गूलें और नहर बनाई जा सकी है। स्थानीय किसान अपने सामथ्र्य से ही पाइप द्वारा सिंचाई कर पाते हैं लेकिन इसमें भी बहुत समस्या और खर्च होता है जिस कारण अधिकांश किसान बरसात के ही भरोसे रहने को मजबूर हैं।
कलीच गांव के लिए आराकोट कलीच मोटर मार्ग वर्ष 2019 में तत्कालीन मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत सरकार द्वारा स्वीकृत की गई थी जिसका बजट भी तुरंत स्वीकृत कर दिया गया था। 2021 में सड़क को काटकर कलीच गांव तक ले जाया गया। तब से लेकर आज तक इस सड़क का न तो डामरीकरण किया जा सका है और न ही इसका मानकों के अनुरूप निर्माण कार्य किया गया। लोक निर्माण विभाग के मानकों के अनुसार 5 मीटर सड़क का निर्माण किया जाता है लेकिन यह सड़क 4 मीटर ही बनाई गई है जबकि अनेक स्थानों पर तो 3 मीटर से भी कम है। इस सड़क पर अभी तक 6 वाहन दुर्घटनाएं हो चुकी है। हालांकि इन दुर्घनटनाओं में किसी प्रकार की जनहानि तो नहीं हुई है लेकिन सेब से लदे छोटे वाहन के दुर्घटना होने से किसानों को बड़ी आर्थिक हानि जरूर हुई है। आज भी यह सड़क कलीच और अनेक गांवों के लिए एक मात्र आवागमन और उत्पादन को बाजार में ले जाने का माध्यम बनी हुई है। इस सड़क को प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना में स्थानांतरण का प्रस्ताव की फाइल विभागों में ही चल रही है। हैरत की बात यह है कि जनप्रतिनिधियों द्वारा दबाव बनाया जाता है तो लोक निर्माण विभाग और प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना एक-दूसरे के सिर ठीकरा फोड़ने का काम करते हैं।
इस वर्ष आई आपदा में भी 17 दिनों तक सड़क मार्ग बाधित होने से जनजीवन ठप्प तो रहा ही साथ ही सेब की फसल को बाजार न ले जाए जाने से किसानों को बड़ी हानि हुई है। स्थानीय लोगों और जनप्रतिनिधियों ने सड़क खोलने के लिए विभागीय अधिकारियों से मांग की तो विभाग इस सड़क की जिम्मदारी पीएमजीएसवाई के सिर डालकर चुप्पी मार गया जिससे इस क्षेत्र के सैकड़ों सेब किसानों को भारी नुकसान उठाना पड़ा। जब सड़क मार्ग खुला तो सेब के भाव इतने गिर गए कि किसानों को भाड़ा काटकर कुछ ही हजार रुपए मिल पाए जिस कारण अनेक किसानों का सेब पेटियों में पैक ही सड़ गया। आज भी हर किसान के खेत और सड़क के आस-पास सड़ता हुआ सेब बर्बाद हुए किसानों की कहानी कहता नजर आ रहा है। स्थानीय सेब किसान और पूर्व ग्राम प्रधान कल्याण सिंह कानू बताते हैं कि इस बार सेब की फसल अच्छी हुई और जब हमने फलों को तोड़कर पेटियों में पैक किया तो सड़क कई जगह टूटने से बंद हो गई। 17 दिनों के बाद सड़क खोली गई तब तक सेब पेटियों में ही सड़ गया जो कुछ बचा वह किसी तरह से बाजार में ले गए तो वहां दाम बहुत नीचे गिर गए जिससे भाड़ा तक निकालना मुश्किल हो गया। उनका स्वयं 4 से 5 टन सेब सड़ गया जिसे खेत में फेंक दिया गया।
स्वास्थ्य और चिकित्सा के क्षेत्र में भी कलीच गांव के साथ-साथ दो दर्जन गांवों के लिए प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र तक की सुविधा नहीं है। 17-18 किमी दूर आराकोट में केवल प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र है जो कि चिकित्सक की बजाय फार्मासिस्ट के भरोसे चल रहा है। इस कारण क्षेत्र की 12 हजार की आबादी हिमाचल के शिमला जिले के रोहडू में इलाज करवाने के लिए जाने को मजबूर है। हैरत की बात यह है कि विभागीय मानकों के अनुसार 10 हजार की आबादी में एक प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र होना जरूरी है बावजूद इसके 12 हजार की आबादी को स्वास्थ्य सेवाएं मयस्सर नहीं हो पाई है।
इसी तरह से शिक्षा के क्षेत्र में भी कलीच गांव के हालात बदहाल ही नजर आते हैं। जूनियर हाईस्कूल के अलावा एक प्राथमिक स्कूल कलीच गांव में है जिसमें स्टाफ और अध्यापकों की कमी तो नहीं है लेकिन 2019 की आपदा में प्राथमिक स्कूल बुरी तरह से क्षतिग्रस्त हो गया जिस कारण इसमें छात्रों के लिए खतरा पैदा हो गया। इस स्कूल को जूनियर हाईस्कूल में स्थानांतरित कर दिया गया। एक कमरे में ही प्राथमिक स्कूल के छात्र पढ़ाई के लिए मजबूर हंै। हैरत की बात यह है कि 7 वर्ष बीत जाने के बावजूद प्राथमिक स्कूल के नए भवन का निर्माण तक नहीं हो पाया है यहां तक कि इसकी मरम्मत भी नहीं हो पाई है। इंटर की पढ़ाई के लिए 18 किमी दूर आराकोट और डिग्री काॅलेज के लिए 35 किमी दूर त्यूणी में छात्रों को जाना पड़ता है।
राजनीतिक तौर पर कलीच गांव भी राजनेताओं के लिए उदासीन ही रहा है। हालांकि स्थानीय निवासी बताते हैं कि कलीच गांव के अधिकांश मतदाता भाजपा समर्थित रहे हैं बावजूद इसके आज तक टिहरी सांसद महारानी माला राजलक्ष्मी इस गांव में कभी नहीं आई। यहां तक कि वोट मांगने के लिए भी कभी प्रचार में नहीं आई। इसी तरह से पुरोला के भाजपा विधायक दुर्गेश्वर लाल भी इस क्षेत्र के प्रति उदासीन ही रहे हैं। स्थानीय निवासियों का कहना है कि भाजपा समर्थित होने के चलते कलीच गांव को सुविधाओं की कमी से जूझना पड़ रहा है। विधायक द्वारा इसी वर्ष मंदिर के सौंदर्यीकरण के लिए विधायक निधी से 5 लाख और 5 लाख जिला निधी से देने की घोषणा की थी लेकिन आज तक इस घोषणा पर अमल नहीं हो पाया है। यही नहीं सड़क के डामरीकरण के अलावा सिंचाई की सुविधा हेतु कई बार मांग की गई लेकिन इन मांगों पर कोई काम तक नहीं किया गया।
बात अपनी-अपनी
आराकोट कलीच मोटरमार्ग पीडब्ल्यूडी द्वारा निर्माण किया गया है। अब इस सड़क को प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना में दिए जाने का प्रस्ताव बनाया जा चुका है। शायद जनवरी 2026 में सड़क ट्रांसफर हो जाएगी फिर तत्काल ही इस सड़क को पक्का कर दिया जाएगा। जहां तक सिंचाई की सुविधा न होने की बात है तो इसका अगर कोई प्रस्ताव आया होगा तो उस पर काम किया जाएगा नहीं तो मैं जल्द ही इरिगेशन डिपार्टमेंट की विजिट कलीच गांव में करवा देता हूं जो भी रिपोर्ट मुझे मिलेगी उसके अनुसार तुरंत काम किया जाएगा।
प्रशांत आर्य, जिलाधिकारी उत्तरकाशी
2019 में आराकोट कलीच मोटर मार्ग स्वीकृत हुई भी जो 2021 में बन गई थी। यह रोड अभी पूरी तरह से कच्ची रोड है। हमने आराकोट कलीच मार्ग पर पांच किलोमीटर रोड पक्की कर दी थी अब केवल 13 किलोमीटर ही कच्ची है। 2024 में इस सड़क को प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना में प्रस्तावित कर दिया गया था जिसे भारत सरकार ने अपनी सहमती दे दी है। अब इसका प्रस्ताव अंतिम चरण में है। इसलिए अब यह रोड पीएमजीएसवाई के ही आधीन है। लेकिन जब तक यह सड़क ट्रांसफर नहीं होती तब तक इसका स्वामित्व लोक निर्माण विभाग के ही पास है और हमने समय-समय पर इस रोड को खुलवाया है। यह रोड कभी भी 17 दिनों तक बंद नहीं रही। जब-जब बंद हुई हमने इसमें काम करवाया है। आपको डाटा की जानकारी होना चाहिए। लोग क्या कह रहे हैं? क्यों कह रहे हैं? यह हम नहीं जानते, हम तो अपने विभाग के डाटा की बात करेंगे।
बलराम मिश्रा, अधिशासी अभियंता, लोक निर्माण विभाग, पुरोला
आरोकाट कलीच मोटर मार्ग पीएमजीएवाई को ट्रांसफर होने के लिए प्रस्ताव अंतिम चरण में है। नवम्बर 2025 तक हमें भारत सरकार से आदेश मिल जाएगा तो हम इस सड़क को मानकों के अनुसार 5 मीटर चैड़ी बना देंगे। फिलहाल इसका संचालन लोक निर्माण के ही पास है और वही इसकी देखरेख आदि काम कर सकता है। हमारे पास जब यह आ जाएगी तब इसकी सारी जिम्मेदारी हमारी होगी।
योगेंद्र कुमार सिंह, अधिशासी अभियंता, प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना पुरोला
आजादी के 50 साल के बाद हमें सड़क नसीब हुई लेकिन आज तक यह सड़क पक्की नहीं हो पाई है। बरसात में हर बार यह सड़क टूट जाती है तो कई-कई दिनों तक बंद हो जाती है। इसलिए हमलोग अपनी उपज खास तौर पर सेब को बाजार में नहीं ले जा पाते। कई-कई टन सेब सड़ जाता है। भाजपा और टिहरी राजपरिवार को हम वोट देते-देते मर गए लेकिन आज तक सांसद महारानी माला राजलक्ष्मी को मैंने अपने गांव में नहीं देखा, वह वोट मांगने भी कभी नहीं आई। छह साल पहले बेसिक स्कूल टूट गया लेकिन आज तक उसकी मरम्मत नहीं हुई। प्राथमिक स्वास्थ केंद्र भी 18 किलोमीटर दूर आराकोट में है जिसका कोई फायदा नहीं है। हमंे आज भी हिमाचल के रोहडू में जाना पड़ता है।
महेंद्र चौहान, स्थानीय निवासी और किसान, ग्राम कलीच
हमारा कलीच गांव आत्मनिर्भर रहा है। सेब की फसल जितना हमारे गांव में बगैर सुविधा, बगैर सिंचाई के होती है उतना शायद ही कहीं और होती होगी। हमें सरकार की तरफ से न तो मदद मिलती है न ही योजनाएं। कई किसान घेरबाड़ योजना चाहते हैं लेकिन उनको कभी मिलती ही नहीं। आपको आश्चर्य होगा कि हमारे गांव में पलायन बहुत ही कम हुआ है। जबकि प्रदेश में गांव के गांव खाली हो गए हंै। कम से कम हमें इस बात के लिए सराहना और सरकारी मदद तो मिलनी ही चाहिए।
जयेंद्र चौहान, स्थानीय निवासी, कलीच
हमलोग तो पहले ही दुर्गम में बैठे हैं तो सरकार और प्रशासन भी हमारे लिए दुर्गम ही रहा हैै। कुछ भाई लोग और हमारे प्रतिनिधि दबाव बना देते हैं तो सरकार इस गांव के लिए कुछ काम कर देती है। हमें कोल्ड स्टोरेज की बहुत जरूरत है। हम सेब उगाते हैं लेकिन हमें चंढीगढ़ या दिल्ली बाजार खोजने जाना पड़ता है। सड़क बंद होने से कई-कई टन सेब खेतों में ही सड़ गया है उसके ढेर लगे पड़े हैं। इससे आप समझ सकते हैं कि हमारी क्या स्थिति है?
कल्याण सिंह कानू, पूर्व प्रधान एवं किसान, कलीच
