Uttarakhand

कपकोट की पहाड़ियों में चुनावी तपिश

आगामी विधानसभा चुनाव 2027 में अभी समय है लेकिन कपकोट की पहाड़ियों में राजनीतिक तपिश अभी से बढ़ने लगी है। यहां भाजपा में कई नेता अपनी दावेदारी कर रहे हैं जबकि कांग्रेस में सिर्फ दो ही नेता उम्मीदवार की दौड़ में शामिल हैं। सम्भावना जताई जा रही है कि आने वाले महीनों में यहां नए राजनीतिक समीकरण भी बन सकते हैं जो विधानसभा चुनाव के मुकाबले को और दिलचस्प बना सकते हैं

आगामी विधानसभा चुनाव 2027 में बागेश्वर जनपद की कपकोट सीट पर मुकाबला बेहद रोचक होने की सम्भावना है। यहां भाजपा और कांग्रेस ही विजयी पताका फहराती आई है। हालांकि अगर अब तक के आंकड़ों को देखें तो यह सीट भाजपा मूल की है। यहां कांग्रेस का कैंडिडेट अभी तक केवल एक बार ही जीत दर्ज कर पाया है जबकि भाजपा ने अब तक एक उपचुनाव सहित कुल पांच बार यह सीट जीतकर रिकॉर्ड बनाया है। राजनीतिक वजूद के हिसाब से यहां पूर्व मुख्यमंत्री भगत सिंह कोश्यारी का आधिपत्य स्थापित रहा है। कभी वे खुद यहां से दो बार जनप्रतिनिधि रहें हैं तो कभी उनके शिष्य यहां से विधायक बने हैं। चाहे वह शेर सिंह गढ़िया हो या सुरेश गढ़िया।

राजनीतिक पंडितों की मानें तो सम्भावना है कि 2027 में भी यहां कोश्यारी की पसंद का ही उम्मीदवार घोषित किया जा सकता है।

उधर दूसरी तरफ कांग्रेस में मुख्य रूप से दो ही नेता आगामी विधानसभा चुनावों में अपनी-अपनी दावेदारी कर रहे हैं। सम्भावना यह भी जताई जा रही है कि अगर भाजपा की अंदरूनी गुटबाजी बढ़ी तो इसका फायदा कांग्रेस को फायदा मिल सकता है लेकिन यदि युवा सीएम पुष्कर सिंह धामी की सरकार का विकास एजेंडा जनता को प्रभावित करता है तो भाजपा फिर से यहां अपना वर्चस्व स्थापित कर सकती है।

कपकोट विधानसभा क्षेत्र के अब तक के राजनीतिक इतिहास को देखें तो 2002 में इस सीट के सृजित होने के बाद भाजपा ने कब्जा जमाया था। सबसे पहले यहां भाजपा से भगत सिंह कोश्यारी विधायक बने थे उसके बाद 2007 के चुनाव में फिर से जीत का सेहरा कोश्यारी के सिर बंधा था। 2011 में कोश्यारी द्वारा नैनीताल से लोकसभा चुनाव लड़ने के कारण यह सीट खाली हो गई थी। तब यहां उपचुनाव हुआ और कोश्यारी के शिष्य कहे जाने वाले शेर सिंह गढ़िया विधायक बने। गढ़िया सिर्फ एक साल ही विधायक रह पाए।

2012 में जब विधानसभा चुनाव हुए तो यह सीट पहली बार कांग्रेस के खाते में गई। तब यहां से ललित फर्स्वाण विधायक बने। 2017 के विधानसभा चुनाव में यहां से बलवंत सिंह भौर्याल चुनाव जीते उन्होंने कांग्रेस के ललित फर्स्वाण को हराया। 2022 के विधानसभा चुनाव में एक बार फिर भाजपा ने बाजी मारी। तब यहां से भगत सिंह कोश्यारी के पीआरओ रहे सुरेश गढ़िया विधायक बने।

फिलहाल, भाजपा में वर्तमान विधायक सुरेश गढ़िया और पूर्व विधायक बलवंत सिंह भौर्याल की दावेदारी चल रही है। ‘दि संडे पोस्ट’ से हुई बातचीत में बलवंत सिंह भौर्याल ने माना कि वे आगामी विधानसभा चुनाव में अपनी दावेदारी कर रहे हैं लेकिन साथ ही उन्होंने कहा कि जो भी हाईकमान फैसला करेगा वह उन्हें मंजूर होगा।
इसी के साथ भाजपा का एक युवा तुर्क भी यहां विधानसभा चुनाव में दो बार अपनी किस्मत आजमा चुका है। वह भूपेश उपाध्याय है। भूपेश उपाध्याय पहले कांग्रेस में थे। इसके बाद भाजपा में आ गए थे लेकिन 2017 में जब भाजपा ने उनको टिकट नहीं दिया तो वे बहुजन समाज पार्टी में चले गए। बसपा के बैनर पर ही उपाध्याय ने विधानसभा चुनाव लड़ा। तब उन्हें 8000 मत मिले थे। इसके बाद 2022 के विधानसभा चुनाव में भूपेश उपाध्याय ने एक बार फिर पलटी मारी। भाजपा से बसपा और बसपा से होते हुए वह आम आदमी पार्टी में गए और इस पार्टी के बैनर पर उम्मीदवार बने लेकिन तब वह अपने पूर्व के 8,000 वोटों को भी नहीं बचा पाए। वह 4,000 वोट तक ही सिमट गए। अपने वोट बैंक के आधा रह जाने के बाद भी वह हिम्मत नहीं हारे हैं। फिलहाल बहुत जोर-शोर से आगामी विधानसभा चुनाव की तैयारी कर रहे हैं।

धामी सरकार में जैविक उत्पाद परिषद के उपाध्यक्ष (दर्जाधारी मंत्री) भूपेश उपाध्याय की सक्रियता को देखते हुए लगता है कि वह एक बार फिर विधानसभा चुनाव के मद्देनजर क्षेत्र में अपनी पूरी ताकत झोंक रहें हैं लेकिन वहीं दूसरी तरफ वे भाजपा के राजनीतिक एजेंडे के तहत अपने आपको आगामी विधानसभा चुनावों में प्रत्याशी मानकर नहीं चल रहे हैं। ‘दि संडे पोस्ट’ से बातचीत में उन्होंने कहा कि मेरी तरफ से आप लिख दीजिए कि उन्होंने चुनाव लड़ने के लिए साफ मना कर दिया है।

कांग्रेस से पूर्व विधायक ललित फर्स्वाण की मजबूत दावेदारी को चुनौती देते नजर आ रहे हैं हरीश ऐठानी। ऐठानी पूर्व में बागेश्वर के जिला पंचायत अध्यक्ष रहे हैं। फिलहाल वे यहां से जिला पंचायत सदस्य हैं। ऐठानी कपकोट के युवाओं में काफी लोकप्रिय है। उधर पूर्व विधायक ललित फर्स्वाण गरूड़ निवासी होने के चलते कपकोट में बाहरी प्रत्याशी माने जा रहे हैं। ऐसे में हरीश ऐठानी की उम्मीदवारी मजबूत दिखाई दे रही है। कपकोट से 2012 में कांग्रेस के विधायक रहे ललित फर्स्वाण के ऊपर पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत की कृपा दृष्टि है जिससे उम्मीद जताई जा रही है कि चौथी बार फिर से कांग्रेस ललित फर्स्वाण पर ही दांव लगा सकती है। यूकेडी यहां के हर जन मुद्दे पर सक्रिय है। शायद ही कोई ऐसा मुद्दा होगा जिस पर वह भाजपा सरकार के खिलाफ समय-समय पर धरना- प्रदर्शन न करती हों। फिलहाल यहां आशीष नेगी को छोड़कर कोई ऐसा नेता नहीं है जो सम्भावित कैंडिडेट के रूप में अपनी दावेदारी कर रहा हो।

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