डीडीहाट विधानसभा क्षेत्र में दो बार हैट्रिक लगाने वाले विधायक बिशन सिंह चुफाल की राजनीतिक बिसात के आगे कोई नहीं टिक पाया। क्षेत्र के लोगों का कहना है कि वे शांत और सीधे, सरल स्वभाव वाले जमीन से जुड़े नेता हैं। सभी के साथ मिलना-जुलना तथा उनका सौम्य व्यवहार ही है कि वे लगातार छह बार से डीडीहाट का नेतृत्व कर रहे हैं। इसके इतर अगर डीडीहाट को विकास की दृष्टि से देखें तो लोगों की नजर में क्षेत्र का अपेक्षित विकास नहीं हो पाया है। आज भी यहां के लोगों को इलाज कराने के लिए पिथौरागढ़ और हल्द्वानी का सफर तय करना पड़ता है। ‘हर घर नल, हर घर जल’ का ढिंढ़ोरा पीटने के बावजूद अभी भी बहुत से लोग ऐसे हैं जिनके लिए समुचित पेयजल आपूर्ति नहीं हो पा रही है। सड़क और शिक्षा के मामले में पिछड़ापन है। लोगों को सबसे ज्यादा मलाल यह है कि जिस विधायक को वे पिछले तीस साल से अपना बहुमूल्य वोट देकर जिताते रहे हैं उन्हें विकास के नाम पर सिर्फ कोरे आश्वासन मिले हैं। यहां की अधिकतर जनता जिले की मांग बरसों से करती रही है। डीडीहाट को जिला बनाने के नाम पर हर विधानसभा चुनाव से पूर्व सिर्फ घोषणा होती रही। ‘दि संडे पोस्ट’ टीम ने जब डीडीहाट विधानसभा क्षेत्र की ग्राउंड रिपोर्टिंग की तो जन प्रतिनिधि के वादों और जमीनी हकीकत के बीच का अंतर साफ नजर आया
उत्तराखण्ड में पिथौरागढ़ जिले की डीडीहाट विधानसभा राज्य की सबसे चर्चित और प्रभावशाली सीटों में गिनी जाती है। यह सीट लम्बे समय से भाजपा का मजबूत गढ़ रही है। 1993 में महज एक बार कांग्र्रेस यहां से जीत दर्ज कर पाई। उसके बाद 1996 से लगातार इस सीट पर बीजेपी का कब्जा रहा है। भाजपा के वरिष्ठ नेता बिशन सिंह चुफाल इस सीट का सबसे बड़ा चेहरा रहे हैं। उन्होंने यहां से लगातार 6 बार जीत हासिल कर एक तरह से डबल हैट्रिक पूरी की है। हर चुनाव में कड़ी टक्कर के बावजूद उन्होंने अपनी सीट बरकरार रखी है। डीडीहाट में चुनावी मुकाबला अक्सर त्रिकोणीय रहता है जहां बीजेपी, कांग्रेस और निर्दलीय प्रत्याशी आमने-सामने होते हैं। कई बार निर्दलीय उम्मीदवार भी यहां चुनाव को बेहद दिलचस्प बना देते हैं।
2027 में किशन होंगे दावेदार!
डीडीहाट की जनता चाहती है कि 2027 में क्षेत्र का नया विधायक हो। चर्चा है कि बिशन सिंह चुफाल को एज फैक्टर चलते सातवीं बार डीडीहाट से टिकट सम्भव नहीं है। ऐसे में उनके साथी रहे किशन सिंह भंडारी यहां से 2027 में भाजपा से दावेदारी कर सकते हैं। भंडारी पूर्व में टिकट न मिलने से नाराज हो वर्तमान विधायक के खिलाफ निर्दलीय चुनाव लड़ चुके हैं। कई लोगों ने कहा कि हम किशन सिंह भंडारी को जितना चाहते थे लेकिन अब वह बिशन सिंह चुफाल से जा मिले हैं जिससे कई लोग में नाराजगी भी जताई जा रही हैं।
पिथौरागढ़ के पूर्व जिला पंचायत अध्यक्ष किशन सिंह भंडारी और विधायक बिशन सिंह चुफाल कभी गहरे दोस्त हुआ करते थे लेकिन राजनीतिक प्रतिद्वंद्विता के चलते दोनों में छत्तीस का आंकड़ा हो गया। किशन सिंह भंडारी करीब 10 सालों से बिशन सिंह चुफाल को घेरने की कोशिश करते रहे लगातार उनकी नीतियों का विरोध करते रहे और क्षेत्र की समस्याओं को उठाते रहे लेकिन पहली बार राजनीतिक समीकरण ऐसा हो रहा है कि किशन सिंह, बिशन सिंह चुफाल के साथ है और उन्हें कोई और घेर रहा है।
डीडीहाट के एक व्यापारी का कहना है कि किशन सिंह भी चाहते हैं वह विधायक बने। उन्होंने निर्दलीय होकर भी एक बार तो अच्छी-खासी टक्कर भी दी थी लेकिन अब किशन सिंह, बिशन सिंह चुफाल से मिल गए है और इस समय दोनों एक ही पार्टी में हैं। ये भी कहा जा रहा है कि जब किशन सिंह पाटी छोड़कर विशन सिंह चुफाल के खिलाफ चुनाव लड़ रहे थे तो किशन सिंह के कई काम रोके गए। उनकी माइंस के काम रुकवा दिए गए जिससे उन्हें काफी नुकसान हुआ। शायद यही वजह है कि किशन सिंह दोबारा बीजेपी में आ चुके हैं।
मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी का पैतृक गांव डीडीहाट विधानसभा में ही है। चर्चा है कि वे यहां से 2027 में चुनाव लड़ सकते हैं लेकिन जनता का कहना है, उनके मुख्यमंत्री बनने से क्षेत्र में कोई खास बदलाव नहीं आया। खासतौर पर जब डीडीहाट की जनता लगातार कहती है कि यहां विकास कार्य नहीं हुए और न ही यहां के छह बार के विधायक बिशन सिंह चुफाल के कार्यकाल में कोई बदलाव देखने को मिला है।
डीडीहाट के व्यापारियों का कहना है कि अभी तक जितने भी कार्य हुए हैं वह सभी विधायक निधि से हुए हैं। चुनाव के समय मुद्दों पर चर्चा और वादे जरूर होते हैं लेकिन उसके बाद मुद्दे खो जाते हैं, सब भूल जाते हैं लेकिन बावजूद इसके जनता दोबारा उन्हें ही वोट देती है।
बिशन की लगातार जीत पर जनता की राय
कई लोगों का कहना है कि बिशन सिंह चुफाल मजबूत दावेदारी में हैं। 2027 के चुनाव में अगर पार्टी टिकट दे देती है तो शायद जीत भी जाएं क्योंकि उनकी जड़ मजबूत है। सोचने का विषय तो यह है की डीडीहाट में 30 साल में कोई विकास कार्य नहीं हुआ और जब गांवों में कोई सुविधा नहीं है तो विधायक चुनाव जीत कैसे जाते हैं?
इस पर अधिकांश का कहना है कि क्षेत्र की जनता के साथ व्यवहार अच्छा होने के कारण बिशन सिंह चुफाल का क्षेत्रवासी सम्मान करते हैं। विधायक चुफाल सरल स्वभाव वाले, जमीन से जुड़े इंसान हैं और उनका व्यवहार सभी के साथ काफी अच्छा है, जिस कारण वह चुनाव जीत रहे हैं। दूसरा कारण क्षेत्र में ऐसा प्रभावशाली नेता भी उनके सामने नहीं है जो उन्हें कड़ी टक्कर दे सके। यही एक कारण उनकी जीत का है। उनके प्रतिद्वंद्वी कांग्रेस या यूकेडी से खड़े जरूर होते हैं लेकिन कोई दमदार उम्मीदवार नहीं होता है। कई लोगों ने किशन सिंह भंडारी के लिए कहा की वह काफी दमदार व्यक्ति है। अगर बिशन सिंह चुफाल को कोई टक्कर दे सकता है, वो किशन सिंह ही है।
समस्याओं से घिरा है डीडीहाट
डीडीहाट विधानसभा ज्यादा समस्याओं से घिरा हुआ है। डीडीहाट में अस्पताल, सिराकोट सड़क, जिला बनाने की घोषणा, पाॅलिटेक्निक, खादी ग्राम उद्योगों के खिसकने के साथ ही रेशम पार्क भी सिसक रहा है। जनसुविधाएं न होने के कारण पलायन हो रहा है। लोग डीडीहाट से पिथौरागढ़ या हल्द्वानी तथा अन्य स्थानों पर जा रहे हैं। स्थानीय लोगों के अनुसार, अपेक्षित स्तर का विकास यहां पूरी तरह नजर नहीं आता। 2027 के चुनाव में पूर्व की भांति एक बार फिर डीडीहाट को जिला बनाने का मुद्दा उठना स्वाभाविक है।
पलायन, शिक्षा व्यवस्था जैसी मूलभूत समस्याएं आज भी यहां बनी हुई हैं। इन्हीं सवालों के जवाब तलाशने के लिए ‘दि संडे पोस्ट’ टीम डीडीहाट पहुंची। जहां टीम को ग्राउंड रिपोर्टिंग में विभिन्न इलाकों और अस्पतालों में किए गए सर्वे, जनप्रतिनिधि के वादों और जमीनी हकीकत के बीच का अंतर साफ नजर आता है।
लक्ति गांव की निवासी पूजा देवी इलाज के लिए पैसे न होने के कारण अपनी नवजात बच्ची खो बैठीं। सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र डीडीहाट में इलाज करा रही पूजा देवी ने बताया कि उनके साथ हुई घटना क्षेत्र में स्वास्थ्य सुविधाओं और आर्थिक स्थिति से जुड़े कई गम्भीर पहलुओं को सामने लाती है। आर्थिक तंगी के कारण वे समय पर इलाज के लिए नहीं जा सकीं, जिसका सीधा असर उनकी गर्भावस्था पर पड़ा। उन्हें अल्ट्रासाउंड जांच के लिए कई बार पिथौरागढ़ जाना पड़ा। वहां डाॅक्टरों ने बताया था कि बच्चे के गले में नाभि (नाल) फंसी हुई है जिसकी समय पर देखभाल से स्थिति सम्भल सकती थी। आर्थिक स्थिति कमजोर होेने के कारण वे दो-तीन बार पिथौरागढ़ जाने के बाद चैथी बार नहीं जा पाईं। सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र डीडीहाट से उन्हें रेफर किया गया लेकिन उस समय एम्बुलेंस की सुविधा उपलब्ध नहीं थी क्योंकि वाहन कहीं और गया हुआ था। डाॅक्टरों से अनुरोध करने के बाद उनकी डिलीवरी वहीं करवाई गई, जिससे उनकी जान तो बच गई लेकिन बच्चा पहले ही गर्भ में मृत हो चुका था।
अस्पताल से घर लौटने के लिए भी उनके पास पर्याप्त पैसे नहीं थे। ‘खुशियों की सवारी’ योजना के तहत मिलने वाली वाहन सुविधा भी उस समय उपलब्ध नहीं थी। ऐसे में उन्हें निजी साधनों से घर लौटने के लिए कहा गया। उनके गांव में पेयजल की समुचित व्यवस्था नहीं है। सड़क जैसी बुनियादी सुविधाएं भी पूरी तरह विकसित नहीं हैं। गांव के सरकारी स्कूल में केवल एक ही शिक्षक है और छात्र संख्या भी कम है क्योंकि अधिकांश बच्चे निजी स्कूलों में पढ़ने के लिए बाहर जा रहे हैं। उन्होंने यह भी बताया कि गांव में रोजगार के साधन नहीं हैं, जिससे लोगों को जीवन-यापन में लगातार कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है। यह मामला केवल एक परिवार की व्यक्तिगत पीड़ा नहीं है बल्कि पूरे डीडीहाट क्षेत्र में स्वास्थ्य सुविधाओं, परिवहन व्यवस्था, आर्थिक तंगी और बुनियादी ढांचे की कमी को उजागर करता है।
बीमार हैं स्वास्थ्य सेवाएं
सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र डीडीहाट में विशेषज्ञ डाॅक्टरों की कमी के कारण गम्भीर मरीजों को पिथौरागढ़ रेफर करना पड़ता है। अल्ट्रासाउंड की सुविधा नियमित नहीं है और महीने में केवल एक दिन कैम्प के माध्यम से मरीजों की जांच होती है।
अस्पताल में कई बार दवाइयों, उपकरणों और नर्सिंग स्टाफ की कमी भी देखने को मिलती है। एम्बुलेंस सेवा भी पूरी तरह सुचारू नहीं है। मरीजों का कहना है कि डाॅक्टर और स्टाफ सहयोगी हैं लेकिन सुविधाओं की कमी के कारण उन्हें बाहर जाना पड़ता है, जिससे उनकी परेशानी बढ़ जाती है।
सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र डीडीहाट में एलएमओ के पद पर कार्यरत डाॅ. ज्योति आर्या के अनुसार वर्तमान में स्वास्थ्य केंद्र में कुल चार डाॅक्टर तैनात हैं जिनमें दो पुरुष और दो महिला डाॅक्टर शामिल हैं। वहीं नर्सिंग स्टाफ की संख्या चार है जबकि मानकों के अनुसार यहां सात नर्सिंग स्टाफ होने चाहिए। महीने में महज एक दिन अल्ट्रासाउंड का कैम्प आयोजित किया जाता है। प्राथमिकता के आधार पर गर्भवती महिलाओं के अल्ट्रासाउंड किए जाते हैं, साथ ही सामान्य मरीजों की भी जांच की जाती है। यहां दवाइयां अस्पताल में उपलब्ध नहीं होतीं, ऐसे में मरीजों को बाहर से दवाइयां मंगवानी पड़ती हैं।
डाॅ. आर्या बताती हैं कि विशेषज्ञ डाॅक्टरों की कमी के चलते गम्भीर मरीजों को पिथौरागढ़ रेफर किया जाता है। वर्तमान में यह स्वास्थ्य केंद्र सीएचसी स्तर पर है और इसे उच्चीकृत (अपग्रेड) करने का प्रस्ताव दिया गया है। इसे भविष्य में एचडीएच (हायर डिपेंडेंसी हाॅस्पिटल) में परिवर्तित करने की योजना है। यहां विशेषज्ञ डाॅक्टरों की नियुक्ति की प्रक्रिया भी शुरू हो चुकी है। हाल ही में एक बाल रोग विशेषज्ञ ने कार्यभार सम्भाला है और आगे भी अन्य विशेषज्ञ डाॅक्टरों की नियुक्ति की जाएगी। फिलहाल अस्पताल में केवल एक ही एम्बुलेंस है और वह भी खराब पड़ी है। यदि मरीज को यहां भर्ती किया जाता है तो उसे हीटर भी उपलब्ध कराना पड़ता हैं लेकिन क्षेत्र में अत्यधिक ठंड होने के कारण यह व्यवस्था पूरी तरह से प्रभावी नहीं हो पाती।
शिक्षा संस्थान के पास शराब की दुकानों
डीडीहाट क्षेत्र में शैक्षणिक संस्थानों के आस-पास शराब की दुकानों को लेकर महिलाओं में नाराजगी हैं। स्थानीय महिलाओं ने बताया कि सूर्या मोंटेसरी स्कूल, डीडीहाट के नीचे कुछ ही दूरी पर दो शराब की दुकानें संचालित हो रही हैं जो नियमों के विरुद्ध बताई जा रही हैं। महिलाओं का कहना है कि नियमों के अनुसार स्कूलों और शैक्षणिक संस्थानों से शराब की दुकानों की एक न्यूनतम दूरी तय होती है ताकि छात्रों और शिक्षकों का वातावरण सुरक्षित और सकारात्मक बना रहे लेकिन यहां इस नियम का पालन होता नजर नहीं आ रहा है।
ग्राम भनडा निवासी श्रीमती भागीरथी देवी कहती हैं कि सरकारी अस्पतालों में सुविधाओं का भारी अभाव है। मरीजों को सही इलाज नहीं मिल पाता और कई बार डाॅक्टर बाहर से दवाइयां लाने की सलाह देते हैं। ऐसे में गरीब लोगों के लिए इलाज कराना मुश्किल हो जाता है। अस्पतालों में न तो पर्याप्त डाॅक्टर हैं और न ही जरूरी मशीनें उपलब्ध हैं। छोटी-छोटी बीमारियों के लिए भी मरीजों को हल्द्वानी या पिथौरागढ़ रेफर कर दिया जाता है। कई बार मरीजों को डाॅक्टर के अभाव में बार-बार अस्पताल के चक्कर लगाने पड़ते हैं। हालांकि सड़क बनने से पहले के मुकाबले अब आवागमन में कुछ सुविधा हुई है लेकिन स्वास्थ्य सेवाओं की स्थिति अब भी संतोषजनक नहीं है। अल्ट्रासाउंड और डिलीवरी जैसी जरूरी सुविधाएं स्थानीय स्तर पर उपलब्ध नहीं हैं।
चुनाव के समय नेता बड़े-बड़े वादे करते हैं लेकिन बाद में क्षेत्र की समस्याओं की ओर ध्यान नहीं देते। आम लोगों की समस्याएं जस की तस बनी रहती हैं। विधायक द्वारा गांव तक शराब की भट्ठियां खोलना एक गलत निर्णय साबित हुआ है। इसके कारण सामाजिक माहौल पर बुरा असर पड़ा है और कई होनहार बच्चे तथा परिवार प्रभावित हुए हैं। वे आक्रोशित हो कहती हैं कि यह ऐसा काम है जिससे गांव का माहौल बिगड़ा है। युवा पीढ़ी पर इसका सीधा असर पड़ रहा है और कई परिवार इससे परेशान हैं। सरकार ने शराब भट्ठियों को बढ़ावा दिया जबकि अस्पताल और अन्य जरूरी सुविधाओं पर ध्यान नहीं दिया गया। इस मुद्दे को लेकर पहले भी विधायक से बात की जा चुकी है लेकिन स्थिति में कोई खास सुधार नहीं हुआ। गांव में अधिकांश दुकानों पर शराब आसानी से उपलब्ध हो जाती है। अधिकतर विद्यालय बाजार क्षेत्रों में हैं जबकि गांव में केवल एक सरकारी विद्यालय है। वहां भी बच्चों की संख्या बहुत कम है जिससे पढ़ाई प्रभावित हो रही है और शिक्षक होने के बावजूद शिक्षा व्यवस्था मजबूत नहीं हो पा रही है।
ग्राम भनडा निवासी पुष्पा देवी के अनुसार सरकार की ओर से गांव में कोई खास विकास कार्य नहीं हुआ है। लोग मूलभूत सुविधाओं के लिए भी संघर्ष कर रहे हैं। गांव में बिजली की समस्या बनी रहती है और रास्तों की स्थिति भी ठीक नहीं है। स्वास्थ्य सुविधाओं का अभाव है। डीडीहाट को जिला बनाने की घोषणा तो की गई थी लेकिन अब तक इस पर कोई ठोस काम नहीं हुआ। यदि क्षेत्र को जिला बनाया जाता तो यहां विकास की गति तेज होती और लोगों को बेहतर सुविधाएं मिल पातीं। गांव में सौर ऊर्जा की व्यवस्था की गई लेकिन पूरे गांव में केवल एक ही सोलर लाइट लगाई गई, जिससे इसका कोई खास लाभ नहीं मिल पाया। गांव में अब तक केवल एक सड़क का निर्माण हुआ है जबकि अन्य जरूरी विकास कार्य अब भी अधूरे हैं।
भनडा गांव के ही खड़क राम कोहली बताते हैं कि गांव में अब तक कोई खास विकास कार्य नहीं हुआ है और लोग आज भी मूलभूत सुविधाओं के लिए जूझ रहे हैं। गांव में पानी, रास्ते और बिजली की गम्भीर समस्या बनी हुई है। सौर ऊर्जा की भी कोई व्यवस्था नहीं है। गांव के रास्ते लोगों ने अपने हाथों से खुद बनाए हैं। पिछले 10 वर्षों से इन रास्तों पर सरकार की तरफ से कोई काम नहीं हुआ है। पानी की टंकी तो बनाई गई है लेकिन उसमें पानी की व्यवस्था नहीं है। खेत बंजर पड़े हुए हैं और खेती करना मुश्किल हो गया है। गांव के लोग जंगली जानवरों से भी परेशान हैं। विधायक विशन सिंह चुफाल कभी-कभी ही क्षेत्र में दिखाई देते हैं। उनके द्वारा विकास कार्यों पर अपेक्षित ध्यान नहीं दिया गया है। खासकर हरिजन बस्ती में अब तक कोई विशेष कार्य नहीं हुआ है।
ग्राम सभा ओगला के बाशिंदे देवेंद्र सिंह की मुख्य समस्या आवारा पशुओं की है। गांव में आवारा जानवर घूमते रहते हैं जिससे लोगों को काफी परेशानी हो रही है। गांव में बने शौचालय अब जानवरों के रहने का स्थान बन गए हैं क्योंकि शौचालयों का निर्माण अधूरा रह गया है। पानी की कमी के कारण भी शौचालयों का उपयोग नहीं हो पा रहा है। पहले गांव में कई विभाग कार्य करते थे लेकिन अब धीरे-धीरे कई विभाग यहां से हट गए हैं। बस डिपो और अन्य विभाग भी यहां से जा चुके हैं जिससे क्षेत्र में सुविधाएं और कम हो गई हैं। पशुपालन विभाग की सुविधा पहले आई थी लेकिन भूमि के अभाव में वह भी आगे नहीं बढ़ पाई। पानी की समस्या के कारण शौचालय अधूरे रह गए हैं। इस विषय में विधायक जी से कई बार बात की गई लेकिन अभी तक कोई समाधान नहीं हो पाया है। गांव में स्वास्थ्य सुविधाएं बिल्कुल नहीं हैं। किसी भी आपात स्थिति में मरीज को पिथौरागढ़ या डीडीहाट ले जाना पड़ता है। उन्होंने कहा कि गांव में बुनियादी सुविधाओं का अभाव है और लोगों को रोजमर्रा की समस्याओं से जूझना पड़ रहा है।
चिरकटिया टोंक गांव के रहने वाले गणेश कोहली कहते हैं कि यहां शिक्षा, सड़क, बिजली और पानी जैसी मूलभूत सुविधाओं का अभाव है। गांव के बच्चे कक्षा 8 तक बलगाड़ी स्कूल में पढ़ते हैं लेकिन आगे की पढ़ाई के लिए उन्हें डीडीहाट जीआईसी जाना पड़ता है जो लगभग 10 किलोमीटर दूर है। दिन के स्कूल होने के कारण बच्चे शाम 6-7 बजे तक घर पहुंचते हैं, जिससे अंधेरे में चलना पड़ता है और परिवार वालों को आधे रास्ते तक लेने जाना पड़ता है।
गांव में घर दूर-दूर स्थित हैं और पूरा क्षेत्र जंगल से घिरा हुआ है। ऐसे में सौर ऊर्जा लाइट की जरूरत ज्यादा है लेकिन पूरे इलाके में केवल एक ही (सोलर लाइट) लगाई गई है जबकि अन्य गांवों में पर्याप्त लाइटें लगाई गई हैं। करीब 40 वर्षों से क्षेत्र में कोई बड़ा विकास कार्य नहीं हुआ। केवल एक सड़क बनी है, जिससे कुछ हद तक आवागमन आसान हुआ है। बाकी रास्ते ग्रामीणों ने खुद बनाए हैं। पानी की भारी कमी के कारण खेत बंजर पड़े हैं। स्थानीय जल स्रोतों का पानी डीडीहाट की ओर मोड़ा गया है जबकि गांव में पानी की समुचित व्यवस्था नहीं की गई। जल स्रोतों पर टंकी न होने से पानी व्यर्थ बह जाता है। घर-घर नल योजना के तहत कनेक्शन तो दिए गए हैं लेकिन गर्मियों में पानी नहीं आता जबकि बिल नियमित लिया जाता है। जंगली जानवरों द्वारा पशुओं को नुकसान पहुंचाने की घटनाएं होती रही हैं लेकिन इसके बाद मुआवजा नहीं मिल पाता, जिस कारण काफी नुकसान हो जाता है।
क्षेत्र की समस्याओं पर बात करते हुए ग्राम सभा खोलिलया की शिवांगी ने बताया कि गांव में स्वास्थ्य सुविधाएं अभी भी पर्याप्त नहीं हैं। अस्पताल होने के बावजूद, डिलीवरी या आॅपरेशन जैसी गम्भीर परिस्थितियों में मरीजों को पिथौरागढ़ ले जाना पड़ता है जिससे समय और जोखिम दोनों बढ़ जाते हैं। गांव में पेयजल की समस्या भी लगातार बनी हुई है। पानी की आपूर्ति नियमित नहीं है जिसके कारण लोगों को रोजमर्रा की जरूरतों के लिए भी संघर्ष करना पड़ता है। साथ ही गांव के रास्तों की हालत ठीक नहीं है और निकास नालियों का अभाव है जिससे बरसात के समय स्थिति और खराब हो जाती है और लोगों को आवागमन में दिक्कतों का सामना करना पड़ता है। फिलहाल गांव में कोई खास विकास कार्य नजर नहीं आता है। हालांकि उन्हें उम्मीद है कि आने वाले समय में क्षेत्र में ठोस विकास कार्य होंगे जिससे ग्रामीणों को राहत मिल सकेगी।
अस्कोट निवासी रेखा देवी का कहना है कि उनके गांव में विधायक द्वारा कोई खास विकास कार्य नहीं किया गया है। विधायक क्षेत्र में देखने तक नहीं आते हैं। गांव में केवल एक सोलर लाइट लगाई गई है, उसी को ही विकास के नाम पर गिना जाता है। स्वास्थ्य सुविधाओं की बात करें तो गांव में कोई अस्पताल नहीं है। इलाज के लिए लोगों को अस्कोट या फिर पिथौरागढ़ जाना पड़ता है, जिससे काफी परेशानी होती है। पानी की समस्या भी गम्भीर बनी हुई है। पानी सही तरीके से नहीं आता लेकिन उसका बिल नियमित रूप से भेज दिया जाता है। गांव में केवल दो-तीन परिवार ही रहते हैं और यहां किसी प्रकार की बुनियादी सुविधा उपलब्ध नहीं है जिससे लोगों को रोजमर्रा की जिंदगी में कई दिक्कतों का सामना करना पड़ता है।
अस्कोट के बाशिंदे हरीश पाल कहते हैं कि पिछले लगभग 30 वर्षों से क्षेत्र में एक ही विधायक प्रतिनिधित्व कर रहे हैं लेकिन इसके बावजूद विकास कार्य अपेक्षित स्तर पर नहीं हो पाए हैं। छोटे-मोटे काम तो होते हैं लेकिन उनकी गुणवत्ता ठीक नहीं होती, जिस कारण हर साल फिर से बनाना पड़ता है। कई जगह सड़कें नालियों जैसी संकरी और जर्जर हालत में हैं। शिक्षा के क्षेत्र में भी गिरावट आई है जहां पहले विद्यालयों में करीब 300 बच्चे पढ़ते थे वहां अब संख्या घटकर लगभग 100 रह गई है। स्वास्थ्य सेवाओं में भी कमी बनी हुई है। अस्पतालों में डाॅक्टर तो तैनात हैं लेकिन दवाइयों की पर्याप्त उपलब्धता नहीं है। अल्ट्रासाउंड और एक्स-रे जैसी जरूरी सुविधाएं भी नहीं हैं जिससे मरीजों को बाहर जाना पड़ता है। सड़कों के लिए करोड़ों रुपये का बजट खर्च होने के बावजूद उनकी हालत खराब है। कार्य होते तो हैं लेकिन सही ढंग से नहीं किए जाते। जनप्रतिनिधि के काम अधिकतर अपने करीबी लोगों तक ही सीमित रह जाते हैं जबकि व्यापक स्तर पर विकास नजर नहीं आता। पिछले 30 वर्षों में क्षेत्र में कोई बड़ा और स्थायी विकास कार्य देखने को नहीं मिला है। रोजगार के अवसरों की कमी के कारण क्षेत्र से पलायन लगातार बढ़ रहा है जो एक गम्भीर समस्या बन चुकी है।
ग्राम खोलियां के रहने वाले सुरेंद्र पाल कहते हैं कि उनके गांव में हाल के समय में कुछ घरों में सोलर लाइट जरूर लगाई गई है लेकिन इसके अलावा अन्य सुविधाओं में खास सुधार नहीं हुआ है। गांव से करीब एक किलोमीटर दूरी पर एक प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र है लेकिन वहां पर्याप्त सुविधाएं उपलब्ध नहीं हैं। सामान्य दवाइयों तक ही सेवा सीमित रहती है। गम्भीर स्थिति होने पर लोगों को पिथौरागढ़ जाना पड़ता है।
शिक्षा के क्षेत्र में गांव में एक सरकारी स्कूल है लेकिन आजकल ज्यादातर बच्चे प्राइवेट स्कूलों में पढ़ाई कर रहे हैं। विधायक गांव में कभी नहीं आते हैं और उनके क्षेत्र में कोई विशेष विकास कार्य नहीं हुआ है। कुछ कार्यकर्ताओं को ही काम दिया गया जिसके तहत मंदिर पर एक धर्मशाला का निर्माण हुआ, जिसमें लगभग 50,000 की सहायता दी गई थी। रोजगार के अवसर गांव में नहीं हैं जिससे खेती-बाड़ी भी प्रभावित हो रही है और कई खेत बंजर पड़े हैं। साथ ही बंदरों की समस्या भी काफी बढ़ गई है जिससे फसलों को नुकसान होता है। आने वाले चुनाव में किसी योग्य और प्रशासनिक समझ रखने वाले व्यक्ति को विधायक चुना जाना चाहिए जो हर परिवार की समस्याओं को समझकर उनका समाधान कर सके।
डीडीहाट के सामाजिक कार्यकर्ता प्रकाश बोरा मानते हैं कि विधायक द्वारा जो भी विकास कार्य हुए हैं, वे मुख्य रूप से विधायक निधि के अंतर्गत ही किए गए हैं। इन्हें बहुत बड़ी उपलब्धि नहीं माना जा सकता क्योंकि जनप्रतिनिधि का काम ही जनता तक विकास पहुंचाना होता है। डीडीहाट की सबसे बड़ी समस्या सड़कों की है। ओगला से थल तक की सड़क को वे वर्षों से देख रहे हैं, कागजों में भले ही इसे डबल रोड दिखाया गया हो लेकिन जमीनी स्तर पर स्थिति अलग है। हर साल सड़क का निर्माण या मरम्मत होती है, फिर भी हालत में सुधार नहीं होता। स्वास्थ्य सुविधाओं को लेकर उन्होंने बताया कि वे स्वयं 35 दिनों तक आंदोलन पर बैठे थे जो केवल अल्ट्रासाउंड और एक्स-रे मशीनों की मांग को लेकर था। इस आंदोलन में लोगों ने काफी प्रयास किए। बाद में मशीनें तो उपलब्ध हो गईं लेकिन डाॅक्टरों की कमी आज भी बनी हुई है। डाॅक्टर यहां आना ही नहीं चाहते क्योंकि न तो सड़क सुविधा सही है और न ही स्वास्थ्य ढांचा मजबूत है। जो डाॅक्टर आते भी हैं, वे कुछ समय बाद असुविधा के कारण अपना स्थानांतरण करवा लेते हैं। इस कारण स्वास्थ्य सेवाओं की स्थिति संतोषजनक नहीं है।
प्रकाश बोरा तल्ख स्वर में कहते हैं कि विधायक की बेटी वर्तमान में जिला पंचायत उपाध्यक्ष है। ऐसा लगता है कि विधायक द्वारा अपने परिवार को आगे बढ़ाने पर अधिक ध्यान दिया गया है। ‘तीलू रौतेली’ जैसे पुरस्कार भी मिल रहे हैं लेकिन आम जनता के लिए ठोस कार्य जमीन पर नजर नहीं आते। उनके अनुसार कई काम केवल कागजों में ही सीमित दिखाई देते हैं।
क्षेत्र में बिशन सिंह चुफाल और किशन सिंह भंडारी के रूप में दो प्रमुख धड़े बन गए हैं। पहले दोनों एक ही पार्टी में थे और काफी अच्छे मित्र माने जाते थे लेकिन बाद में दोनों ने अलग-अलग दलों का रुख किया और एक-दूसरे के खिलाफ चुनाव भी लड़ा। उन्होंने कहा कि एक बार नहीं बल्कि दो बार उनके बीच मुकाबला हुआ। अंत में दोनों के सम्बंध फिर सामान्य हो गए। हालांकि इस राजनीतिक खींचतान का असर समाज पर पड़ा और कई परिवारों में आपसी मतभेद भी देखने को मिले। वर्तमान में ‘किशन दल’ और ‘बिशन दल’ के रूप में अलग-अलग समूह काम कर रहे हैं। जो कार्य एक पक्ष नहीं कर रहा, वह दूसरा पक्ष कर रहा है। इस कारण लोग भी अलग-अलग समूहों में बंटते जा रहे हैं। ठेकेदारी और विकास कार्यों में भी इसी प्रकार का प्रभाव देखने को मिलता है। इन परिस्थितियों में जनता कहीं न कहीं विभाजित हो गई है और आगे क्या स्थिति बनेगी, यह स्पष्ट नहीं है।
आज के समय में सभी लोग सोशल मीडिया से जुड़े हैं और सब कुछ देख-समझ रहे हैं लेकिन इसके बावजूद खुलकर आवाज उठाने से बचते हैं। समाज में एक तरह का दबाव या भय का माहौल बना हुआ है कि लोग आपस में तो कहते हैं कि इस बार विधायक के खिलाफ आवाज उठाएंगे लेकिन जब समय आता है तो कोई खुलकर सामने नहीं आते। स्थिति यह है कि आम लोग सीधे तौर पर विधायक के सामने विकास कार्यों को लेकर अपनी बात तक नहीं रख पाते। झंडाधार नामक क्षेत्र में सबसे पहले एक हेलीपैड बनाया गया, जिसे विधायक बिशन सिंह चुफाल के बेटे द्वारा बनाया गया था।
झंडाधार हेलीपैड पर केवल एक ओर दीवार बनाई गई है। वहां न तो पर्याप्त जगह उपलब्ध है और न ही वाहनों के आने-जाने की समुचित व्यवस्था है। स्थिति यह है कि वहां चार गाड़ियां भी ठीक से खड़ी नहीं हो सकतीं। इसके निर्माण में सरकारी धन का दुरुपयोग हुआ होगा।
नानपाकू क्षेत्र में लगभग 80 लाख रुपए के बजट का प्रावधान बताया गया लेकिन यह कार्य अभी तक पूरी तरह धरातल पर नहीं उतर पाया है। जंगल क्षेत्र से सड़क तो काटी गई है लेकिन समुचित विकास कार्य अधूरे हैं। वर्तमान में यदि डीडीहाट क्षेत्र में हेलीकाॅप्टर उतर पाता है तो उसका मुख्य केंद्र मिर्थी में स्थित आईटीबीपी कैम्प है।
चिरकटिया गांव के निवासी दीपक कुमार कोहली कहते हैं कि गांव में पानी और बिजली की गम्भीर समस्या बनी हुई है। गांव जंगल के बीच बसा हुआ है जहां मूलभूत सुविधाओं का अभाव है। गांव में लगभग 30-35 परिवार रहते हैं लेकिन आज तक किसी भी तरह की पर्याप्त सुविधा नहीं मिल पाई है। न तो पानी की व्यवस्था है, न बिजली की और न ही ठीक से रास्ता बना है। गांव के लोगों को अपने रास्ते खुद ही बनाने और सुधारने पड़ते हैं। क्षेत्र के विधायक छह बार से निर्वाचित हो चुके हैं लेकिन गांव में उनका आना-जाना बहुत कम होता है। गांव की सबसे बड़ी मांग पानी की सुविधा है जहां अन्य गांवों में पहले से रास्ते होने के बावजूद नए रास्ते बनाए जा रहे हैं वहीं उनके गांव में आज तक सही रास्ता नहीं बन पाया है। विधायक गांव में आते तो हैं लेकिन काम नहीं हो पाता। आश्वासन दिए जाते हैं लेकिन उनका असर जमीन पर नजर नहीं आता।
नोट:- विधायक बिशन सिंह चुफाल से साक्षात्कार के लिए कई बार सम्पर्क साधा गया लेकिन उनसे बातचीत नहीं हो पाई।
बात अपनी-अपनी
कब होगी डीडीहाट को जिला बनाने की मांग पूरी डीडीहाट में विकास हुआ है या नहीं, इसका सही जवाब जनता ही दे सकती है। राज्य बनने से पहले भी वर्तमान विधायक क्षेत्र का प्रतिनिधित्व कर रहे थे और आज भी कर रहे हैं। उनके हिसाब से कुछ काम हुए हैं, इसलिए विकास हुआ है, इसमें कोई संदेह नहीं है। अस्पताल तो बने हैं, पर वहां सुविधाएं और स्टाफ नहीं है। विद्यालय बने हैं लेकिन वहां भी शिक्षकों की कमी है। सड़कें बनी हैं लेकिन कई जगहों पर गाड़ियां नहीं चल पा रही हैं। ऐसे में यह कैसा विकास है, यह जनता बेहतर समझती है। अस्पताल बने, पर स्टाफ और सुविधाओं की कमी, स्कूल बने, पर शिक्षकों का अभाव बन हुआ है। सड़कें बनीं, पर परिवहन ठीक नहीं है। रोडवेज बस सेवा धीरे-धीरे खत्म हो रही है। सरकारी कार्यालय खुले लेकिन बाद में शिफ्ट या बंद हो गए। डीडीहाट को जिला बनाने की मांग अधूरी है। क्षेत्र में मालिकाना हक (भूमि अधिकार) का मुद्दा बना हुआ है।
दिनेश गुरुरानी, अध्यक्ष उत्तराखण्ड क्रांति दल अधिकारी-कर्मचारी प्रकोष्ठ
विद्युत और सिंचाई विभाग कार्यालय का पलायन डीडीहाट में विधायक द्वारा बड़े-बड़े विकास कार्यों की घोषणा लगातार की गई लेकिन धरातल पर बहुत कम काम दिखाई देता है। यदि किसी प्रमुख विकास की बात की जाए तो पाॅलिटेक्निक संस्थान ही नजर आता है, इसके अलावा अन्य बड़े कार्य स्पष्ट रूप से नहीं दिखते। ‘डीडीहाट महोत्सव’ के दौरान मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी द्वारा सिराकोट क्षेत्र के विकास की रूपरेखा की घोषणा भी की गई थी लेकिन वह अब तक जमीन पर नहीं उतर सकी है। कई दिनों के धरने के बाद यहां एक्स-रे और अल्ट्रासाउंड मशीन तो उपलब्ध कराई गई लेकिन अल्ट्रासाउंड केवल महीने में एक दिन ही हो पाता है। डाॅक्टरों की कमी भी लगातार बनी रहती है जो डाॅक्टर यहां आते हैं, वे लम्बे समय तक नहीं रूकते। हाल ही में एक सेवानिवृत्त डाॅ. मेहरा अपनी इच्छा से यहां सेवा देने पहुंचे हैं जो यहीं के निवासी हैं। जीआईसी विद्यालय का मैदान ही मुख्य केंद्र है जहां अधिकांश खेल गतिविधियां होती हैं। स्थानीय स्तर पर बैडमिंटन कोर्ट बनाया गया है जहां 30-40 बच्चे नियमित अभ्यास करते हैं। बैडमिंटन हाॅल के लिए विधायक निधि से भी लगभग 3-4 लाख रुपए की सहायता दी गई थी।
मिनी स्टेडियम का कार्य जमीन की कमी के कारण लम्बे समय से अधूरा पड़ा है जबकि इसके लिए बजट पहले ही स्वीकृत हो चुका है। निकट भविष्य में भनडां गांव के बड़े मैदान को स्टेडियम के रूप में विकसित करने की योजना पर भी विचार किया जा रहा है जिससे खिलाड़ियों को बेहतर सुविधाएं मिल सकें।
पर्यटन के बजट से छोटा टैक्सी स्टैंड बनाया गया लेकिन बिना सही स्थल निरीक्षण के भारी ढांचा खड़ा कर दिया गया। यह कार्य लम्बे समय से अधूरा पड़ा है। सिंचाई विभाग का कार्यालय अब धारचूला स्थानांतरित हो गया है। इसी तरह विद्युत उपखंड का मुख्य कार्यालय भी धारचूला चला गया है जबकि यहां केवल एक शाखा ही संचालित हो रही है जिससे स्थानीय लोगों को दिक्कतों का सामना करना पड़ता है। डीडीहाट में अभी भी कई सरकारी सुविधाओं की आवश्यकता बनी हुई है। इस बार ऐसे प्रत्याशी को चुना जाना चाहिए जो अपने वादों को जमीन पर उतारे।
नगर पालिका का गठन कांग्रेस सरकार के दौरान हुआ था और हरीश रावत के कार्यकाल में इसे स्थापित किया गया। नगर पालिका बनने के बाद क्षेत्र में कुछ विकास कार्य हुए हैं और पर्यटन को बढ़ावा देने के लिए भी प्रयास किए जा रहे हैं। डीडीहाट क्षेत्र आपदा प्रभावित है जिसके कारण बजट का बड़ा हिस्सा आपदा प्रबंधन में खर्च हो जाता है। इसके बावजूद धीरे-धीरे विकास कार्यों को आगे बढ़ाने का प्रयास किया जा रहा है।
कविंद्र शाही, सभासद, नगर पालिका, डीडीहाटविधायक को युवाओं के भविष्य की चिंता नहीं पिछले 10 वर्षों से उत्तराखण्ड में भारतीय जनता पार्टी की सरकार है और इस ‘ट्रिपल इंजन’ की सरकार होने के बावजूद क्षेत्र में अपेक्षित विकास नहीं हुआ है। वर्तमान विधायक लगभग 30 वर्षों से लगातार चुने जा रहे हैं और छह बार विधायक रह चुके हैं लेकिन इसके बावजूद डीडीहाट में विकास की मजबूत नींव दिखाई नहीं देती। वर्ष 2023-24 में हुए आंदोलन के बाद ही डीडीहाट सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र में अल्ट्रासाउंड मशीन लगाई जा सकी। 30 वर्षों में एक अल्ट्रासाउंड मशीन का लगना ही स्वास्थ्य व्यवस्था की स्थिति को दर्शाता है। इसी दौरान एक्स-रे मशीन भी लगाई गई लेकिन उसके संचालन के लिए विशेषज्ञ डाॅक्टरों की उपलब्धता अभी भी एक चुनौती बनी हुई है। डीडीहाट विधानसभा में अब तक कोई आईटीआई काॅलेज स्थापित नहीं हो पाया है। न तो तकनीकी शिक्षा का विस्तार हुआ है और न ही युवाओं के लिए पर्याप्त अवसर उपलब्ध हो सके हैं। क्षेत्र में युवाओं के लिए खेल मैदानों की कमी है और रोजगार के अवसर सीमित हैं।
विधायक अक्सर लोगों से सामान्य हालचाल पूछते हैं, जैसे गाय दूध देती है या नहीं। युवाओं के रोजगार और उनके भविष्य को लेकर कोई गम्भीर चर्चा नहीं करते। भारतीय जनता पार्टी की सरकार के दौरान तहसील निर्मााण के लिए कोई कार्य नहीं हो सका लेकिन जैसे ही कांग्रेस की सरकार बनी और वे स्वयं ब्लाॅक प्रमुख बने, तब हरीश रावत के नेतृत्व में डीडीहाट विधानसभा क्षेत्र के अंतर्गत कनालीछीना और देवलथल, दोनों को तहसील का दर्जा दिया गया। थल तहसील गठन भी कांग्रेस सरकार के दौरान ही हुआ। कनालीछीना और थल में गैस गोदाम स्थापित किए गए। कांग्रेस सरकार के दौरान देवलथल में पाॅलिटेक्निक काॅलेज खोला गया और मुवानी में डिग्री काॅलेज की स्थापना की गई। साथ ही डीडीहाट को नगर पालिका का दर्जा भी उसी समय मिला।
मुवानी में डिग्री काॅलेज खोला गया लेकिन आज तक उसकी भवन व्यवस्था पूरी तरह तैयार नहीं हो पाई है। यदि कोई व्यक्ति विधायक के खिलाफ आवाज उठाता है तो उसे विभिन्न प्रकार की परेशानियों का सामना करना पड़ता है और उसके कार्यों में बाधाएं डाली जाती हैं। विधायक स्वयं यह कहते हैं कि उनकी बात नहीं सुनी जाती जबकि केंद्र और राज्य, दोनों स्तर पर उनकी ही सरकार है। साथ ही स्थानीय स्तर पर भी उनका प्रभाव है, चाहे वह ब्लाॅक प्रमुख हो, नगर पालिका हो या जिला पंचायत, ऐसे में विकास कार्यों की जिम्मेदारी भी उन्हीं पर बनती है।
वर्ष 2027 के चुनाव नजदीक हैं लेकिन अभी तक उन्हें क्षेत्र में कोई बड़ा विकास कार्य नजर नहीं आता। जो विधायक स्वयं को छह बार का जनप्रतिनिधि बताते हैं, उनके अपने गृह क्षेत्र में भी सड़क का निर्माण और चैड़ीकरण पूरा नहीं हो पाया है। गृह क्षेत्र में पार्किंग निर्माण के लिए लाखों रुपए का बजट स्वीकृत हुआ था लेकिन वह कार्य जमीनी स्तर पर स्पष्ट रूप से दिखाई नहीं देता और इसकी स्थिति को लेकर लोगों में असमंजस बना हुआ है। कुछ सड़कों का विकास प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना के तहत हुआ है लेकिन कई स्थानों पर गुणवत्ता को लेकर सवाल उठते हैं। कई सड़कों पर केवल सतही रूप से डामर बिछाया गया जिससे वे अधिक समय तक टिकाऊ नहीं रह पाईं।
वर्ष 2016-17 में कलानीछीना से देवलथल सड़क के लिए लगभग 11 करोड़ रुपए का टेंडर हुआ था लेकिन 2017 में सरकार बदलने के बाद वह कार्य आगे नहीं बढ़ पाया और आज तक अधूरा है।
प्रशांत भंडारी, पूर्व ब्लाॅक प्रमुख, डीडीहाट
डीडीहाट विधानसभा 2026 – विधायक रिपोर्ट कार्ड
विधायक : बिशन सिंह चुफाल (अवधि : 4 वर्ष)
क्र. क्षेत्र मुद्दा / जमीनी स्थिति अंक (10 में)
- सड़क व सम्पर्क मार्ग सड़कों की हालत खराब, गुणवत्ता पर सवाल, कई गांव अब भी कटे 2.5/10
- स्वास्थ्य सेवाएं डाॅक्टर, दवाइयां, एम्बुलेंस व उपकरणों की भारी कमी 2/10
- शिक्षा व उच्च शिक्षा शिक्षक कमी, छात्र घटे, उच्च शिक्षा के लिए पलायन 3/10
- पेयजल व बिजली पानी की किल्लत, ‘नल हैं पर जल नहीं’, बिजली समस्या 2.5/10
- रोजगार व पलायन रोजगार के अवसर नहीं, लगातार पलायन 2/10
- कृषि व ग्रामीण अर्थव्यवस्था खेती चौपट, जंगली जानवरों का आतंक 2/10
- बुनियादी ढांचा अधूरी परियोजनाएं, बजट उपयोग पर सवाल 2.5/10
- प्रशासनिक व राजनीतिक प्रभाव लम्बा कार्यकाल, लेकिन जमीनी असर सीमित 3/10
- सामाजिक मुद्दे शराब की दुकानों से नाराजगी, सामाजिक असर 3/10
- जनसम्पर्क व नेतृत्व सरल छवि, लेकिन क्षेत्रीय सक्रियता सीमित 4/10
औसत : 2.65/10 फाइनल ग्रेड : फेल