Uttarakhand

फिर बाहर निकला बोतल से जिन्न

हाईकोर्ट स्थानांतरण का मुद्दा

उत्तराखण्ड उच्च न्यायालय में मुख्य न्यायाधीश रितु बाहरी की अध्यक्षता वाली खंडपीठ द्वारा एक माह के अंदर उच्च न्यायालय के लिए नया स्थान चयनित करने हेतु सरकार को निर्देशित करने के आदेश बाद नैनीताल से हाईकोर्ट शिफ्टिंग का जिन्न फिर बाहर आ गया है। इस आदेश बाद सत्ता गलियारों में नाना प्रकार की अफवाहों का बाजार भी गर्म हो चला है। कहा जा रहा है कि इसके तार कुमाऊं और गढ़वाल की राजनीति से जुड़े हैं। भाजपा के एक वरिष्ठ नेता नाम न छापने की शर्त पर कहते हैं कि ‘पार्टी के एक बड़े नेता मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के बढ़ते आभा मंडल से खासे परेशान हैं और इस मुद्दे को हवा देकर सीएम की छवि धूमिल करना चाहते हैं।’ इन नेता की मानें तो केंद्र की राजनीति में खासे ताकतवर यह नेता हाईकोर्ट को गढ़वाल में स्थानांतरित कराने के खेला के मुख्य सूत्रधार हैं। केंद्रीय गृहमंत्री के करीबी माने जाने वाले इन नेता की इच्छा राज्य सरकार का मुखिया बनने की बताई जाती है। समान नागरिक संहिता को प्रदेश में लागू करा मुख्यमंत्री धामी भाजपा के उन शीर्ष नेताओं की कतार में शामिल हो चुके हैं जो राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के हिंदुत्ववादी एजेंडे को प्रभावशाली तरीके से आगे बढ़ा रहे हैं। प्रधानमंत्री मोदी, गृहमंत्री अमित शाह और उत्तर
प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के बाद इस श्रेणी में धामी का शामिल होना इन नेताओं को खासा अखर रहा है

उत्तराखण्ड उच्च न्यायालय में मुख्य न्याधीश रितु बाहरी की अध्यक्षता वाली खंडपीठ द्वारा एक माह के अंदर उच्च न्यायालय के लिए नया स्थान चयनित करने हेतु सरकार को निर्देशित करने के आदेश बाद नैनीताल से हाईकोर्ट शिफ्टिंग का जिन्न फिर बाहर आ गया है। उच्च न्यायालय के इस आदेश ने अधिवक्ताओं और आम जनता के साथ-साथ सियासी पारे को भी चढ़ा दिया है। गौरतलब है कि मुख्य न्यायाधीश की अध्यक्षता वाली पीठ ने एक अन्य मुद्दे पर सुनवाई के दौरान पहले तो मौखिक रूप से सरकार को नैनीताल से इतर किसी अन्य स्थान पर स्थानांतरित करने के लिए हल्द्वानी के गौलापार में चयनित की जा चुकी जमीन के बजाय ऋषिकेश स्थित आईडीपीएल परिसर का परीक्षण करने को कहा। अधिवक्ताओं के विरोध और उनका पक्ष सुनने के बाद हाईकोर्ट ने अपने लिखित आदेश में व्यापक जनहित के आट्टाार पर नैनीताल से हाईकोर्ट को शिफ्ट किया जाना आवश्यक बताते हुए राज्य सरकार को कोर्ट ने एक माह के अंदर उचित स्थान बताने को कहा है। उत्तराखण्ड हाईकोर्ट कहां शिफ्ट होगा? कब शिफ्ट होगा इसका जवाब आने वाले समय में मिलेगा लेकिन इसने कुमाऊं- गढ़वाल की धुंधली होती लकीर को गाढ़ा करने का काम जरूर कर दिया है। जिस प्रकार अधिवक्ता कुमाऊं-गढ़वाल के खेमों में बंटे दिखे उसने क्षेत्रीयता की भावना को एक बार फिर से उभारने का काम कर डाला है।

विश्लेषण

उत्तराखण्ड राज्य निर्माण के समय क्षेत्रीय संतुलन साधने की कवायद के चलते नवगठित राज्य की राजधानी देहरादून और उच्च न्यायालय नैनीताल में स्थापित किया गया था। गढ़वाल को राजधानी के रूप में देहरादून और कुमाऊं को उच्च न्यायालय नैनीताल में मिला। उत्तराखण्ड राज्य बनने की पृष्ठभूमि में जाएं तो उत्तराखण्ड राज्य की स्थापना का उद्देश्य एक पर्वतीय राज्य की परिकल्पना थी। उत्तर प्रदेश के समय सुदूर पहाड़ी इलाकों से राजधानी लखनऊ और उच्च न्यालय इलाहाबाद था जिसकी एक खंडपीठ लखनऊ में थी। उत्तराखण्ड राज्य की मांग और गठन का उद्देश्य ही था कि राज्य बनने के बाद पर्वतीय क्षेत्रों में नई मूलभूत सुविधाओं का विकास होगा। नये इंफ्रास्ट्रक्चर के साथ राज्य के पर्वतीय क्षेत्रों में सुविधाएं बढ़ेंगी। हाईकोर्ट नैनीताल में स्थापित तो हुआ लेकिन अपने साथ नाना प्रकार की समस्याएं इस पर्यटन नगरी के लिए लेकर आया। समूचित इन्फ्रास्ट्रक्चर न होने के कारण अंततः यह निर्णय लिया गया कि हाईकोर्ट को किसी ऐसे इलाके में स्थानांतरित कर दिया जाए जहां वादियों और वकीलों के लिए कनेक्टविटी सुगम रहे तथा न्यायाधीशों के लिए भी सभी बुनियादी सुविधाएं उपलब्ध कराई जा सके। लंबी जद्दोजहद के बाद हल्द्वानी के गौलापार क्षेत्र में 64 एकड़ जमीन को नई हाईकोर्ट के लिए सरकार ने उपयुक्त पाया। यह लगभग तय हो चुका है कि केंद्र सरकार के वन एवं पर्यावरण मंत्रालय से अनापत्ति मिलते ही यहां पर हाईकोर्ट निर्माण का काम शुरू कर दिया जाएगा। पर्यावरण अनापत्ति लिया जाना इसलिए भी जरूरी है क्योंकि चयनित भूमि के 75 प्रतिशत क्षेत्र में सघन वन हैं। सूत्रों के मुताबिक राज्य सरकार को यह अनापत्ति पत्र इसी माह केंद्र सरकार से मिलने जा रहा है। इसी बीच लेकिन यकायक ही इस मुद्दे का मुख्य न्यायाधीश की अध्यक्षता वाली पीठ के समक्ष उठना नाना प्रकार की चर्चाओं, आरोपों और प्रत्यारोपों को जन्म दे रहा है।

हाईकोर्ट ने अपने आदेश में कहा है कि गौलापार में जहां हाईकोर्ट के लिए जगह चिन्हित है वहां 75 प्रतिशत वन भूमि है और घना जंगल है। वहां पेड़ काटने के बाद हाईकोर्ट की स्थापना उचित नहीं है। हाईकोर्ट इसके पक्ष में नहीं है। हाईकोर्ट ने कहा कि नैनीताल में वादकारियों और युवा अधिवक्ताओं की होने वाली कठिनाईयों, चिकित्सा सुविधाओं और कनेक्टिविटी की कमी के अलावा कोर्ट में 75 प्रतिशत से अधिक मामलों में राज्य सरकार के पक्षकार होने और अधिकारियों और कर्मचारियों के नैनीताल हाईकोर्ट आने में टीए, डीए में होने वाले खर्च को देखते हुए उच्च न्यायालय को नैनीताल से स्थानांतरित करना जरूर आवश्यक है। कोर्ट ने रजिस्ट्रार जनरल को निर्देश दिए हैं कि एक पोर्टल बनाए जिसमें अधिवक्ताओं और जनसामान्य के सुझाव लिए जाएं कि वे नैनीताल से हाईकोर्ट शिफ्ट करने के पक्ष में हैं या नहीं। ये आदेश मुख्य न्यायाधीश रितु बाहरी और न्यायमूर्ति राकेश थपलियाल की बेंच ने दिया।

आदेश ने बढ़ाया राजनीतिक तापमान
हाईकोर्ट के इस आदेश ने अधिवक्ताओं को तो खेमों में बांटा ही, पहाड़-मैदान, कुमाऊं-गढ़वाल की ट्टवनियां सभी हलकों में सुनी जाने लगी हैं। नैनीताल से हाईकोर्ट शिफ्ट करने की कवायद पर महाराष्ट्र के पूर्व राज्यपाल और उत्तराखण्ड के पूर्व मुख्यमंत्री भगत सिंह कोश्यारी ने अपनी असहमति जाहिर की है। मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी को लिखे पत्र में कोश्यारी ने कहा है कि ‘राज्य की कौन सी संस्था और विभाग कहां रहे इसका निर्णय संसद या विधानसभा करते आए हैं। यदि कोर्ट इस संबंध में निर्णय लेने लगेंगे तो पीआईएल कार्यकर्ता किसी विभाग, जिला और तहसील आदि की मांग को लेकर न्यायालय पहुंचते रहेंगे। इससे केंद्र व राज्य सरकारों को दिए गए अधिकार क्षेत्र में हस्तक्षेप की संभावना बढ़ जाएगी।’ कोश्यारी ने हाईकोर्ट के लिए जनमत संग्रह जैसी प्रथा से बचने का सुझाव दिया है। उन्होंने कहा कि गौलापार के बजाय अन्य जगह पर वैकल्पिक स्थान ढूंढ़ने के लिए दिए गए कोर्ट के निर्देश से असंतोष फैलने की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता।

हाईकोर्ट का हैरतनाक हस्तक्षेप

मुख्य न्यायाधीश की अध्यक्षता वाली खंडपीठ के समक्ष हाईकोर्ट को स्थानांतरित करने का कोई प्रकरण लंबित नहीं था। न्यायालय में 7 मई को प्रदेश में भड़की वनाग्नि से जुड़े मामले की सुनवाई चल रही थी। इसी दौरान मुख्य न्यायाधीश ने 21 मई के दिन सुनी जाने वाली एक याचिका जो आईडीपीएल ऋषिकेश से जुड़े एक मामले को लेकर थी, को 8 मई के दिन सुने जाने का निर्देश दिया। मुख्य न्यायाधीश ने कहा कि ऐसा इसलिए किया जा रहा है ताकि आईडीपीएल ऋषिकेश की खाली पड़ी जमीन पर हाईकोर्ट स्थानांतरित किए जाने पर विचार हो सके। कोर्ट का कहना है कि गौलापार की 75 प्रतिशत वन आच्छादित जमीन से वनों को काटा जाना उचित नहीं है, विशेषकर तब जब वनाग्नि चलते प्रदेश के वन बर्बाद हो रहे हैं।

उच्च न्यायालय द्वारा यकायक ही तथा हाईकोर्ट स्थानांतरण से सम्बंधित कोई वाद लंबित न होते हुए भी इस प्रकरण पर नया आदेश जारी करना कई प्रश्न खड़े कर रहा है। गौरतलब है कि वर्ष 2020 में हाईकोर्ट की एक बेंच को गढ़वाल मंडल में स्थापित करने की याचिका पर तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति रमेश रंगनाथन एवं न्यायमूर्ति आर.सी. खुल्ले की पीठ ने याचिका खारिज करते हुए महत्वपूर्ण टिप्पणी की थी कि ‘उत्तराखण्ड राज्य दो मंडलों में विभक्त है- कुमाऊं और गढ़वाल। इन दोनों मंडलों की जनभावनाओं को ध्यान में रखते हुए राज्य की राजधानी गढ़वाल मंडल के देहरादून और हाईकोर्ट को कुमाऊं मंडल के नैनीताल में स्थापित किया गया था, यद्यपि मैदानी क्षेत्रों के न्यायालयों में पहाड़ी क्षेत्रों के मुकाबले अधिक मुकदमें होते हैं तथा हाईकोर्ट में भी मैदानी क्षेत्रों के अधिक फाइलें लंबित हैं। गढ़वाल मंडल का हरिद्वार जनपद तथा कुमाऊं मंडल का ऊधमसिंह नगर जनपद पूरी तरह मैदानी क्षेत्र है, गढ़वाल मंडल का देहरादून जनपद और कुमाऊं का नैनीताल जनपद पहाड़ी एवं मैदानी इलाकों में है। सभी नौ जनपद, गढ़वाल के पांच तथा कुमाऊं चार पूरी तरह से पहाड़ी क्षेत्र में हैं। इन ऐतिहासिक तथ्यों के चलते ही सम्भवतः 9 नवम्बर 2000 में राज्य के गठन के समय हाईकोर्ट को नैनीताल में स्थापित करने का निर्णय लिया गया था।’

न्यायमूर्ति रंगनाथन की पीठ ने इस तरह से यह स्पष्ट कर दिया कि हाईकोर्ट कुमाऊं मंडल में ही रहेगा। इतना ही नहीं वर्ष 2022 में राज्य मंत्रिमंडल ने भी हाईकोर्ट को गौलापार में स्थानांतरित करने का निर्णय लिया था। जिसे तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति विपिन सांघी की अध्यक्षता में फुलकोर्ट मीटिंग में स्वीकार लिया गया था। अब जबकि राज्य सरकार गौलापार में जमीन तलाश चुकी है और केंद्रीय वन एवं पर्यावरण मंत्रालय को अनापत्ति प्रमाण पत्र मिलते ही नई हाईकोर्ट का निर्माण कार्य शुरू होना तय है, यकायक ही इस मुद्दे पर हाईकोर्ट द्वारा जनशुमारी कराना और उसके इस फैसले बाद प्रदेश का राजनीतिक तापमान गढ़वाल बनाम कुमाऊं की विभाजक रेखा को चौड़ा करता नजर आ रहा है।

उफान पर भाजपा का आंतरिक सत्ता संघर्ष
उच्च न्यायालय के इस आदेश बाद सत्ता गलियारों में नाना प्रकार की अफवाहों का बाजार भी गर्म हो चला है। कहा जा रहा है कि इसके तार कुमाऊं और गढ़वाल की राजनीति से जुड़े हैं। भाजपा के एक वरिष्ठ नेता नाम न छापने की शर्त पर कहते हैं कि ‘पार्टी के एक बड़े नेता मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के बढ़ते आभा मंडल से खासे परेशान हैं और इस मुद्दे को हवा देकर सीएम की छवि धूमिल करना चाहते हैं।’ इन नेता की मानें तो केंद्र की राजनीति में खासे ताकतवर यह नेता हाईकोर्ट को गढ़वाल में स्थानांतरित कराने के खेला के मुख्य सूत्रधार हैं। केंद्रीय गृहमंत्री के करीबी माने जाने वाले इन नेता की इच्छा राज्य सरकार का मुखिया बनने की बताई जाती है। समान नागरिक संहिता को प्रदेश में लागू करा मुख्यमंत्री धामी भाजपा के उन शीर्ष नेताओं की कतार में शामिल हो चुके हैं जो राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के हिंदुत्ववादी एजेंडे को प्रभावशाली तरीके से आगे बढ़ा रहे हैं। प्रधानमंत्री मोदी, गृहमंत्री अमित शाह और उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के बाद इस श्रेणी में धामी का शामिल होना इन नेताओं को खासा अखर रहा है। प्रदेश भाजपा युवा मोर्चा के एक पूर्व मंत्री तल्ख स्वर में कहते हैं कि ‘हाईकोर्ट कहां स्थापित होगा यह फैसला राज्य सरकार के अधिकार क्षेत्र में है और यह तय है कि मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी अपने वायदेनुसार हाईकोर्ट को कुमाऊं में ही स्थापित करेंगे। यह दुर्भाग्य की बात है कि हमारे ही कुछ नेता उनकी राह का रोड़ा बन रहे हैं।’
गढ़वाल में हाईकोर्ट का विरोध अकारण नहीं दरअसल उत्तराखण्ड उच्च न्यायालय के गढ़वाल शिफ्टिंग की संभावना के विरोध में उठते स्वर अकारण नहीं हैं। राज्य गठन के पश्चात कुमाऊं से कई महत्वपूर्ण कार्यालय विरोध के बावजूद कार्य गतिशीलता के नाम पर देहरादून शिफ्ट होते गए। खासकार पहाड़ी क्षेत्रों से कार्यालय सुविधा के नाम पर स्थानांतरित होते गए। निबंधन का कार्यालय अल्मोड़ा से अन्यत्र स्थापित कर दिया गया। 2010 में केंद्र सरकार ने उत्तराखण्ड में राष्ट्रीय विधिक विश्वविद्यालय (लॉ यूनिवर्सिटी) की स्थापना के लिए मंजूरी दी थी। सरकारें इस पर हीला-हवाली करती रहीं 2014 में उत्तराखण्ड उच्च न्यायालय में एक जनहित याचिका के बाद किच्छा में 25 एकड़ जमीन चिन्ह्ति कर राजस्व विभाग ने उच्च शिक्षा विभाग को सौंप दी। लेकिन ये योजना धरातल पर उतरती उससे पहले ही ये राजनीतिक हस्तक्षेप का शिकार हो गई। त्रिवेंद्र सिंह रावत के मुख्यमंत्रित्वकाल में इसे डोईवाला के रानीपोखरी में ले जाने का फैसला कर 2019 में शिलान्यास भी कर दिया। 50 लाख रुपए शुरुआती कार्य के लिए मंजूर भी कर दिए गए।

राजनीपोखरी में शिफ्ट करने के खिलाफ वरिष्ठ अधिवक्ता डॉ. भूपाल सिंह भाकुनी ने उच्चतम न्यायालय में याचिका दाखिल कर दी। तब से राष्ट्रीय विधिक विश्वविद्यालय का मुद्दा ठंडे बस्ते में चला गया है। इसी प्रकार रानीखेत के चौबटिया में स्थापित उद्यान निदेशालय को भी देहरादून शिफ्ट करने की कवायदें हो चुकी हैं लेकिन जन विरोध के चलते अधिकारियों के मंसूबे सफल नहीं हो पा रहे हैं। खास बात यह है कि उत्तर प्रदेश के समय से ही उद्यान निदेशालय चौबटिया रानीखेत में स्थापित है। उस वक्त निदेशालय का काम सहज रूप से चलता रहा लेकिन पृथक राज्य बनने के बाद अधिकारियों को यह स्थान असहज लगने लगा। आज जब से हाईकोर्ट ने हाईकोर्ट के लिए नई जगह तलाशने के निर्देश सरकार को दिए हैं और गौलापार में उच्च न्यायालय के लिए अनिच्छा जाहिर की है तो सरकार के सामने विकल्प क्या हैं? क्या आईडीपीएल ऋषिकेश जहां उच्च न्यालय की मुख्य न्यायाधीश वाली खंडपीठ ने उच्च न्यायालय की बेंच स्थापित करने की संभावनाएं ढूंढने का मौखिक निर्देश दिया था फिर कोई अन्य स्थान? उत्तराखण्ड कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष गणेश गोदियाल और कुछ अन्य क्षेत्रीय संगठन इसे गैरसैंण शिफ्ट करने का सुझाव दे रहे हैं। सवाल है कि युवा अधिवक्ता, वादियों और राज्य सरकार के लोगों को ये जगह मुफीद लगेगी? जिस गैरसैंण में ग्रीष्मकालीन राजधानी होने के बावजूद जनप्रतिनिधि व सरकारी अधिकारियों को एक सत्र आयोजित करने में ठंड लग जाती है वहां पूर्णकालिक उच्च न्यायालय के लिए स्थान चयन का जोखिम सरकार उठा पाएगी? पहाड़ों में इतनी ज्यादा जमीन जिस पर बिना पेड़ काटे मूलभूत सुविधाएं विकसित की जा सकें, ढूंढ पाना सरकार के लिए इतना आसान नहीं है। फिर विकल्प के तौर पर मैदानी जिले ही हैं। ऊधमसिंह नगर, रामनगर के अधिवक्ताओं ने भी अपने-अपने स्थानों पर उच्च न्यायालय के स्थापना के लिए जगह सुझाना शुरू कर दिया है। कुमाऊं से जुड़े अधिवक्ताओं और जनप्रतिनिधियों ने उच्च न्यायालय की शिफ्टिंग का विरोध शुरू कर दिया है। हाईकोर्ट बार एसोशिएशन से लेकर नैनीताल, अल्मोड़ा, बागेश्वर, पिथौरागढ़ और चंपावत की बार एसोशिएशन हाईकोर्ट शिफ्टिंग के विरोध में उत्तर आई हैं। पिथौरागढ़ बार एसोशिएशन का कहना है कि उच्च न्यायालय की बेंच स्थापना इतनी जरूरी है तो इसे पिथौरागढ़ में स्थापित किया जाए क्योंकि सबसे ज्यादा परेशानियों का सामना तो सीमांत लोगों को करना पड़ता है।

उत्तराखण्ड राज्य बनने के बाद सरकारों ने राजधानी के सवाल को जैसे टाले रखा उसी प्रकार नैनीताल में उच्च न्यायालय होने के बावजूद वहां वो मूलभूत सुविधाएं प्रदान करने में विफल रही। नैनीताल एक महत्वपूर्ण पर्यटन स्थल भी है। पर्यटन सीजन में पर्यटकों के बढ़ते दबाव को देखते हुए जैसी सुविधाओं की दरकार थी वह सरकारें विकसित नहीं कर पाई। सबसे महत्वपूर्ण पार्किंग जैसी सुविधाओं की स्थापना सरकारी तंत्र में उलझकर रह गईं। हिमाचल, सिक्कम, मेघालय जैसे पर्वतीय राज्यों में भी उच्च न्यायालय चल रहे है। सरकार को आत्मवलोकन करना होगा कि उसने ऐसी परिस्थितियां आने क्यों दी? फिलहाल नैनीताल उच्च न्यायालय शिफ्टिंग के मुद्दे ने उत्तराखण्ड की फिजाओं में गर्मी तो ला ही दी है। देखना होगा कि एक माह के अंदर सरकार उच्च न्यायालय के शिफ्टिंग के लिए कौन-सा नया स्थान सुझाती है।

बात अपनी-अपनी
सरकार को चाहिए कि वो हाईकोर्ट को लेकर स्थिति साफ करे। जब मुख्यमंत्री के पास कानून विभाग भी है तो उन्हें जनता के सामने हाईकोर्ट के मुद्दे पर अपनी स्पष्ट राय रखनी चाहिए।
यशपाल आर्य, नेता प्रतिपक्ष

उत्तराखण्ड राज्य आंदोलन की भावना के अनुरूप उत्तराखण्ड की स्थाई राजधानी तत्काल गैरसैंण घोषित करने के साथ उत्तराखण्ड उच्च न्यायालय को भी गैरसैंण में स्थापित किया जाना चाहिए। उत्तराखण्ड उच्च न्यायालय को लेकर सरकार और न्यायपालिका कोई सर्वसम्मत फैसला नहीं ले पाई है। हमारे शासकों को जिन सुविधाओं की दरकार है उसके लिए तो यही उचित है कि उत्तराखण्ड हाईकोर्ट को राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र अथवा दिल्ली में स्थापित कर देना चाहिए।
पी.सी. तिवारी, अध्यक्ष, उत्तराखण्ड परिवर्तन पार्टी

उत्तराखण्ड राज्य की स्थापना के समय जनआकांक्षाओं के अनुरूप देहरादून में राजधानी और नैनीताल में उच्च न्यायालय बनाया गया। हाईकोर्ट ने कुमाऊं को पहचान दी है। हाईकोर्ट को अन्यत्र ले जाने की कवायद पर अधिवक्ता सहमत नहीं हैं। अगर इस फैसले को वापस नहीं लिया गया तो आक्रोश बढ़ेगा।
डॉ. महेंद्र पाल, पूर्व अध्यक्ष, हाईकोर्ट बार एसोसिएशन

पहाड़ी राज्य की अवधारणा के अनुरूप नैनीताल में हाईकोर्ट को स्थापित किया गया। अब जब हाईकोर्ट को नैनीताल में स्थापित हुए 24 वर्ष पूरे होने जा रहे हैं इसे शिफ्ट करने की बात दुर्भाग्यपूर्ण है। उत्तराखण्ड हाईकोर्ट में कुमाऊं, गढ़वाल और हरिद्वार सहित कई क्षेत्रों के अधिवक्ता प्रैक्टिस करते हैं उन्होंने अपने को यहां स्थापित कर लिया है। जैसे यहां उन्होंने मकान बना लिए हैं, बच्चों की शिक्षा यहीं है, इतना स्टाफ है। सबके विषय में सोचा जाना चाहिए। बेवजह या बिना किसी कारण के हाईकोर्ट शिफ्ट किए जाने का उत्तराखण्ड बार एसोसिएशन पुरजोर विरोध करती है। प्रश्न कुमाऊं गढ़वाल का नहीं है दोनों ही उत्तराखण्ड की पहचान हैं। नैनीताल से हाईकोर्ट की शिफ्टिंग की बात से हम सहमत नहीं हैं इसका हम विरोध करेंगे।
डी.एस. रावत, अध्यक्ष, उत्तराखण्ड बार एसोसिएशन

हाईकोर्ट के इस निर्णय बाद हमने बार एसोसिएशन देहरादून की आमसभा 15 मई को बुलाई थी जिसमें यह प्रस्ताव पारित किया गया कि उच्च न्यायालय उत्तराखण्ड नैनीताल से अन्यत्र स्थान पर स्थानांतरित किया जाना नितांत आवश्यक है। जनमत कराने हेतु पारित आदेश के लिए सभी सदस्यों ने मुख्य न्यायाधीश रितु बाहरी एवं न्यायमूर्ति राकेश थपलियाल जी का हार्दिक धन्यवाद भी प्रकट किया। हम अपने स्तर से भी जनमत कराने के लिए आमजन को जागृत कर रहे हैं।
राजीव शर्मा (बंटु), अध्यक्ष, बार एसोसिएशन, देहरादून

 

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