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क्या भारत आर्थिक संकट की दहलीज पर है?

लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी पिछले कुछ समय से लगातार चेतावनी दे रहे हैं कि भारत एक बड़ी आर्थिक उथल-पुथल की ओर बढ़ रहा है। इसी बीच मोदी सरकार में वित्त सचिव रह चुके सुभाष चंद्र गर्ग ने भी बेहद तीखे शब्दों में कहा है कि भारतीय अर्थव्यवस्था की वास्तविक स्थिति उतनी मजबूत नहीं है जितनी दिखाई जाती है। दूसरी ओर सरकार और अंतरराष्ट्रीय संस्थाएं अभी भी भारत को दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ती बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में गिन रही हैं। ऐसे में सवाल यह है कि क्या राहुल गांधी और सुभाष गर्ग भविष्य का खतरा देख रहे हैं या फिर यह राजनीतिक और बौद्धिक अतिशयोक्ति है? सच्चाई शायद इन दोनों ध्रुवों के बीच कहीं मौजूद है

भारतीय राजनीति में इन दिनों ‘आर्थिक सुनामी’ शब्द अचानक चर्चा के केंद्र में आ गया है। राहुल गांधी पिछले कुछ समय से लगातार यह चेतावनी दे रहे हैं कि देश की अर्थव्यवस्था एक बड़े संकट की ओर बढ़ रही है और सरकार वास्तविक आर्थिक हालात को जनता से छिपा रही है। उनके अनुसार देश में ऐसी परिस्थितियां बन रही हैं जिनका असर आने वाले वर्षों में रोजगार, आय, व्यापार और आम लोगों के जीवन पर दिखाई देगा। भाजपा ने इस बयान को राजनीतिक डर फैलाने की कोशिश बताया लेकिन बहस उस समय और गम्भीर हो गई जब मोदी सरकार में वित्त सचिव रह चुके वरिष्ठ नौकरशाह सुभाष चंद्र गर्ग ने भी भारतीय अर्थव्यवस्था को लेकर बेहद कठोर टिप्पणियां कीं।

सुभाष चंद्र गर्ग कोई विपक्षी नेता नहीं हैं। वे भारत सरकार के वित्त सचिव रह चुके हैं और आर्थिक नीतियों के निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभा चुके हैं। इसलिए जब उन्होंने यह कहा कि भारत ‘फ्रैजाइल फाइव’ से निकलकर ‘वल्नरेबल वन’ बनने की दिशा में बढ़ रहा है तो इस टिप्पणी ने आर्थिक और राजनीतिक दोनों हलकों में बहस छेड़ दी। गर्ग का कहना है कि भारत की आर्थिक स्थिति का मूल्यांकन केवल जीडीपी वृद्धि दर के आधार पर नहीं किया जा सकता। उनके अनुसार किसी भी अर्थव्यवस्था की वास्तविक ताकत इस बात से तय होती है कि वह कितने रोजगार पैदा कर रही है, कितने नए निवेश आकर्षित कर रही है, उसका निर्यात कितना बढ़ रहा है और उसके नागरिकों की आय में कितनी वृद्धि हो रही है। उनका मानना है कि इन मोर्चों पर तस्वीर उतनी उत्साहजनक नहीं है जितनी सरकार के दावों में दिखाई देती है।

दरअसल भारतीय अर्थव्यवस्था का सबसे बड़ा विरोधाभास यही है कि एक तरफ विकास दर अपेक्षाकृत ऊंची बनी हुई है और दूसरी ओर रोजगार का संकट लगातार चर्चा का विषय बना हुआ है। पिछले कुछ वर्षों में भारत दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ती बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में शामिल रहा है लेकिन इसके बावजूद लाखों शिक्षित युवाओं को उपयुक्त रोजगार नहीं मिल पा रहा। सरकारी परीक्षाओं में करोड़ों आवेदन, छोटी नौकरियों के लिए भारी प्रतिस्पर्धा और युवाओं में बढ़ती बेचैनी इस बात की ओर संकेत करती है कि विकास का लाभ रोजगार के रूप में पर्याप्त मात्रा में परिवर्तित नहीं हो पा रहा है। राहुल गांधी लम्बे समय से इसी मुद्दे को उठाते रहे हैं। उनका कहना है कि भारत में ‘जाॅबलेस ग्रोथ’ हो रही है, अर्थात अर्थव्यवस्था बढ़ रही है लेकिन रोजगार उसी अनुपात में नहीं बन रहे।

सुभाष चंद्र गर्ग भी इसी चिंता को भारत की सबसे बड़ी आर्थिक चुनौती मानते हैं। उनका कहना है कि हर वर्ष लाखों युवा रोजगार बाजार में प्रवेश कर रहे हैं लेकिन अर्थव्यवस्था उनके लिए पर्याप्त अवसर पैदा नहीं कर पा रही। यदि यह स्थिति लम्बे समय तक बनी रहती है तो यह केवल आर्थिक समस्या नहीं रहेगी बल्कि सामाजिक और राजनीतिक अस्थिरता का कारण भी बन सकती है। किसी भी देश की आर्थिक शक्ति केवल उसके शेयर बाजार, जीडीपी या विदेशी निवेश से नहीं मापी जाती बल्कि इस बात से मापी जाती है कि आम नागरिक के जीवन में कितनी समृद्धि आ रही है।

भारतीय अर्थव्यवस्था को लेकर एक दूसरी बड़ी चिंता निजी निवेश की है। पिछले एक दशक में सरकार ने सड़क, रेलवे, एयरपोर्ट, बंदरगाह और रक्षा क्षेत्र में बड़े पैमाने पर निवेश किया है। इंफ्रास्ट्रक्चर निर्माण के मामले में भारत ने उल्लेखनीय प्रगति भी की है। लेकिन अर्थशास्त्रियों का एक वर्ग मानता है कि केवल सरकारी खर्च के सहारे लम्बे समय तक तेज विकास दर बनाए रखना सम्भव नहीं है। किसी भी अर्थव्यवस्था में स्थायी विकास के लिए निजी क्षेत्र का सक्रिय निवेश आवश्यक होता है। नई फैक्ट्रियां, नए उद्योग, नई तकनीक और बड़े पैमाने पर रोजगार मुख्यतः निजी क्षेत्र ही पैदा करता है। सुभाष चंद्र गर्ग का कहना है कि निजी निवेश की गति अभी भी अपेक्षित स्तर तक नहीं पहुंची है और यही भविष्य की सबसे बड़ी चुनौतियों में से एक है।

इसके साथ ही निर्यात का सवाल भी भारत के सामने एक गम्भीर चुनौती के रूप में खड़ा है। चीन ने अपनी आर्थिक ताकत मुख्य रूप से विनिर्माण और निर्यात के आधार पर विकसित की। भारत भी लम्बे समय से वैश्विक विनिर्माण केंद्र मैन्युफैक्चरिंग बनने का सपना देख रहा है लेकिन अभी तक वह उस स्तर की प्रतिस्पर्धात्मक क्षमता विकसित नहीं कर पाया है जो चीन, वियतनाम या अन्य एशियाई अर्थव्यवस्थाओं ने हासिल की है। वैश्विक व्यापार में बढ़ती अनिश्चितता, अमेरिका की संरक्षणवादी नीतियां और भू-राजनीतिक तनाव भारत के निर्यात क्षेत्र पर अतिरिक्त दबाव डाल रहे हैं। यदि निर्यात की वृद्धि धीमी रहती है तो रोजगार और औद्योगिक विकास दोनों प्रभावित हो सकते हैं।

राहुल गांधी की आर्थिक सुनामी वाली चेतावनी का एक महत्वपूर्ण संदर्भ पश्चिम एशिया में बढ़ता तनाव भी है। भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों का बड़ा हिस्सा आयातित तेल से पूरा करता है। यदि पश्चिम एशिया में युद्ध या संघर्ष बढ़ता है और तेल की कीमतें लम्बे समय तक ऊंची बनी रहती हैं तो उसका सीधा असर भारतीय अर्थव्यवस्था पर पड़ेगा। महंगाई बढ़ सकती है, रुपए पर दबाव बढ़ सकता है, व्यापार घाटा बढ़ सकता है और सरकार के वित्तीय संतुलन पर भी असर पड़ सकता है। यही कारण है कि कई अंतरराष्ट्रीय संस्थाएं भी भारत की विकास दर के सामने ऊर्जा कीमतों को एक महत्वपूर्ण जोखिम मानती हैं।

हाल के वर्षों में एक नया खतरा कृत्रिम बुद्धिमत्ता अर्थात एआई के रूप में सामने आया है। भारत की सेवा आधारित अर्थव्यवस्था विशेष रूप से आईटी और बिजनेस प्रोसेस आउटसोर्सिंग पर काफी हद तक निर्भर रही है। लेकिन एआई तकनीक के तेजी से विस्तार ने रोजगार के भविष्य को लेकर नए सवाल खड़े कर दिए हैं। कई कम्पनियां अब कम कर्मचारियों के साथ अधिक काम करने की दिशा में बढ़ रही हैं। इससे उत्पादकता तो बढ़ सकती है लेकिन रोजगार सृजन की गति पर असर पड़ सकता है। यदि भारत की युवा आबादी को पर्याप्त रोजगार नहीं मिलता तो उसका लाभांश, जिसे कभी भारत की सबसे बड़ी ताकत माना जाता था, भविष्य में चुनौती में बदल सकता है।

हालांकि इन सभी चिंताओं के बावजूद यह कहना भी सही नहीं होगा कि भारत किसी तत्काल आर्थिक पतन की ओर बढ़ रहा है। अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष, विश्व बैंक और कई अन्य वैश्विक संस्थाएं अभी भी भारत को दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ती बड़ी अर्थव्यवस्था मानती हैं। भारत के पास विशाल घरेलू बाजार है, विदेशी मुद्रा भंडार अपेक्षाकृत मजबूत है, बैंकिंग क्षेत्र पहले की तुलना में अधिक स्थिर माना जाता है, डिजिटल भुगतान व्यवस्था ने पूरी दुनिया का ध्यान आकर्षित किया है और बुनियादी ढांचे में बड़े पैमाने पर निवेश हुआ है। इन उपलब्धियों को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।

वास्तविकता यह है कि भारत एक ऐसे मोड़ पर खड़ा है जहां अवसर और जोखिम दोनों साथ-साथ मौजूद हैं। एक तरफ दुनिया चीन पर अत्यधिक निर्भरता कम करने की कोशिश कर रही है और भारत के सामने वैश्विक विनिर्माण केंद्र बनने का अवसर है। दूसरी ओर यदि भारत रोजगार, शिक्षा, कौशल विकास और औद्योगिक प्रतिस्पर्धा के क्षेत्र में अपेक्षित सुधार नहीं कर पाया तो यह अवसर हाथ से निकल भी सकता है। यही वह संदर्भ है जिसमें सुभाष चंद्र गर्ग की चेतावनियां महत्वपूर्ण हो जाती हैं। वे यह नहीं कह रहे कि भारत कल आर्थिक रूप से ध्वस्त हो जाएगा बल्कि उनका तर्क यह है कि यदि वर्तमान चुनौतियों का समाधान नहीं किया गया तो आने वाले वर्षों में समस्याएं गम्भीर रूप ले सकती हैं।

राहुल गांधी की ‘आर्थिक सुनामी’ वाली भाषा निश्चित रूप से राजनीतिक है और उसमें अतिशयोक्ति का तत्व भी देखा जा सकता है लेकिन इसके पीछे जो मुद्दे उठाए जा रहे हैं जैसे रोजगार, निवेश, निर्यात, आय असमानता और वैश्विक अनिश्चितता, उन्हें केवल राजनीति कहकर खारिज नहीं किया जा सकता। इसी प्रकार सुभाष चंद्र गर्ग की टिप्पणियों को भी केवल सरकार-विरोधी दृष्टिकोण मानकर नजरअंदाज करना उचित नहीं होगा क्योंकि वे स्वयं आर्थिक प्रशासन के उच्चतम स्तर पर काम कर चुके हैं और व्यवस्था की कार्यप्रणाली को भीतर से समझते हैं।

भारतीय अर्थव्यवस्था की वास्तविक तस्वीर न तो पूरी तरह निराशाजनक है और न ही पूरी तरह आश्वस्त करने वाली। भारत आज किसी आर्थिक सुनामी के बीच खड़ा नहीं है लेकिन समुद्र पूरी तरह शांत भी नहीं है। विकास की चमकदार सतह के नीचे कई ऐसी चुनौतियां मौजूद हैं जो भविष्य में बड़े संकट का रूप ले सकती हैं। यदि रोजगार सृजन, निजी निवेश, निर्यात विस्तार और मानव पूंजी निर्माण पर पर्याप्त ध्यान नहीं दिया गया तो आज जो चेतावनियां अतिशयोक्ति प्रतीत होती हैं, वे कल वास्तविकता में बदल सकती हैं। इसलिए सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न यह नहीं है कि राहुल गांधी सही हैं या सरकार सही है। वास्तविक प्रश्न यह है कि क्या भारत अपनी वर्तमान आर्थिक ताकत को स्थायी और समावेशी विकास में बदल पाएगा। आने वाले वर्षों में इसी प्रश्न का उत्तर तय करेगा कि भारत विश्व अर्थव्यवस्था का अगला महाशक्ति केंद्र बनता है या फिर अवसरों के बावजूद अपनी सम्भावनाओं से पीछे रह जाता है।

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