कर्नाटक की राजनीति में लम्बे समय से चली आ रही खींचतान के बाद आखिरकार डी.के. शिवकुमार मुख्यमंत्री बन गए लेकिन सीएम पद सम्भालते ही उन्हें पहला बड़ा राजनीतिक झटका लग गया है। मंत्रिमंडल गठन और विभागों के बंटवारे को लेकर असंतोष खुलकर सामने आ गया है। वरिष्ठ कांग्रेस नेता मंत्री रामलिंगा रेड्डी ने मनचाहा विभाग नहीं मिलने पर मंत्री पद से इस्तीफा दे दिया है। सूत्रों के अनुसार रेड्डी बेंगलुरु विकास विभाग की जिम्मेदारी चाहते थे। बताया जाता है कि उन्हें 2023 से ही यह विभाग देने का आश्वासन मिला था लेकिन नई कैबिनेट में यह विभाग कृष्णा बैरे गौड़ा को सौंप दिया गया। इसी से नाराज होकर उन्होंने मंत्री पद छोड़ने का फैसला किया। अपने इस्तीफे पर प्रतिक्रिया देते हुए रामलिंगा रेड्डी ने स्पष्ट किया कि उनका कांग्रेस छोड़ने का कोई इरादा नहीं है। ‘मैं पिछले 53 वर्षों से कांग्रेस में हूं और कई मुख्यमंत्रियों की कैबिनेट में मंत्री के रूप में काम कर चुका हूं। मैंने कभी किसी से मंत्री पद नहीं मांगा।’ उनके बयान से साफ है कि नाराजगी पार्टी से नहीं बल्कि विभागों के बंटवारे को लेकर है। यह घटनाक्रम मुख्यमंत्री डी.के. शिवकुमार के सामने मौजूद चुनौतियों को भी उजागर करता है। ऐसे में राजनीतिक गलियारों में सवाल उठ रहे हैं कि शिवकुमार इस असंतोष को कैसे संभालते हैं और पार्टी के भीतर एकजुटता बनाए रखने में कितने सफल होते हैं। राजनीतिक पंडितों का कहना है कि कर्नाटक कांग्रेस लम्बे समय से विभिन्न गुटों में बंटी रही है। ऐसे में मुख्यमंत्री के रूप में शिवकुमार को सरकार और संगठन दोनों में संतुलन बनाए रखना होगा। मंत्रिमंडल में वरिष्ठ नेताओं की महत्वाकांक्षाओं को संतुष्ट करना आसान नहीं होगा और किसी भी तरह की नाराजगी सरकार की स्थिरता को प्रभावित कर सकती है।
राजनीतिक चुनौतियों के साथ-साथ शिवकुमार के सामने प्रशासनिक मोर्चे पर भी बड़ी जिम्मेदारियां हैं। रोजगार, बुनियादी ढांचा, किसानों की समस्याएं और निवेश आकर्षित करने जैसे मुद्दों पर सरकार के प्रदर्शन पर जनता की नजर रहेगी, वहीं भाजपा और जेडीएस भी सरकार के हर कदम पर नजर रखेंगे। ऐसे में रामलिंगा रेड्डी का इस्तीफा डी.के. शिवकुमार सरकार के लिए शुरुआती चेतावनी माना जा सकता है। देखना दिलचस्प होगा कि मुख्यमंत्री इस असंतोष को कैसे संभालते हैं और पार्टी के भीतर एकजुटता बनाए रखने में सफल होते हैं या नहीं।

मिशन पंजाब की ओर भाजपा

हाल ही में हुए पंजाब के नगर निकाय चुनावों के नतीजों ने राज्य की राजनीति को नए संकेत दिए हैं। सत्तारूढ़ आम आदमी पार्टी ने 8 नगर निगमों में से 5 पर कब्जा जमाते हुए और बड़ी संख्या में नगर परिषदों व नगर पंचायतों में जीत हासिल कर यह संदेश दिया है कि वह 2027 के विधानसभा चुनावों के लिए मजबूत स्थिति में है तो वहीं भाजपा ने अबोहर नगर निगम में बहुमत हासिल कर अपनी मौजूदगी दर्ज कराई जबकि कांग्रेस ने कपूरथला में बेहतर प्रदर्शन किया। पठानकोट में भाजपा सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी लेकिन बहुमत से दूर रही। चुनाव परिणामों का एक दिलचस्प पहलू निर्दलीय उम्मीदवारों का प्रदर्शन रहा। राज्य चुनाव आयोग के आंकड़ों के अनुसार आप ने 954 वार्ड, कांग्रेस ने 393, निर्दलीयों ने 251, शिरोमणि अकाली दल ने 192 और भाजपा ने 172 वार्डों में जीत हासिल की। 251 वार्डों में जीत के साथ निर्दलीय उम्मीदवार तीसरी सबसे बड़ी राजनीतिक ताकत बनकर उभरे। यह परिणाम दर्शाता है कि पंजाब में स्थानीय नेतृत्व और व्यक्तिगत जनाधार अब भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। इन नतीजों के बाद भाजपा आगामी पंजाब विधानसभा चुनावों को लेकर अभी से अपनी राजनीतिक जमीन मजबूत करने की तैयारी में जुट गई  है। पार्टी विधानसभा चुनाव अपने दम पर लड़ने और खुद को सत्ता के मजबूत दावेदार के रूप में स्थापित करने की रणनीति पर काम कर रही है। भाजपा संगठन विस्तार, जनसम्पर्क अभियान और नए राजनीतिक समीकरणों पर विशेष ध्यान दे रही है। राजनीतिक जानकारों का मानना है कि भाजपा उन चुनावी रणनीतियों और संगठनात्मक ‘माॅडलों’ का अध्ययन कर रही है जिन्होंने 2022 में आम आदमी पार्टी को पंजाब में ऐतिहासिक सफलता दिलाई थी। साथ ही विभिन्न दलों से भाजपा में शामिल हो रहे नेताओं से भी पार्टी का आत्मविश्वास बढ़ा है।
दो तिहाई बहुमत पर एनडीए की नजर

देश के 10 राज्यों की 24 राज्यसभा सीटों के लिए 18 जून को मतदान होना है। यह चुनाव केंद्र की सत्तारूढ़ एनडीए सरकार के लिए बेहद अहम माना जा रहा है। वर्तमान में 245 सदस्यीय राज्यसभा में एनडीए के पास 148 सांसद हैं और दो-तिहाई बहुमत के आंकड़े तक पहुंचने के लिए उसे 15 और सदस्यों की जरूरत है। ऐसे में राजनीतिक हलकों में चर्चा है कि क्या यह चुनाव एनडीए को उस लक्ष्य के करीब पहुंचा पाएगा? राज्यसभा की जिन सीटों पर चुनाव होना है, उनमें आंध्र प्रदेश और गुजरात की 4-4, मध्य प्रदेश और राजस्थान की 3-3, कर्नाटक की 4, झारखंड की 2 तथा मणिपुर, मेघालय, अरुणाचल प्रदेश और मिजोरम की 1-1 सीट शामिल हैं। इसके अलावा दो सीटों पर उपचुनाव भी कराए जाएंगे। संख्या बल के आधार पर आंध्र प्रदेश में एनडीए सभी चार सीटें जीतता नजर आ रहा है। गुजरात में भी भाजपा चारों सीटों पर मजबूत स्थिति में है। राजस्थान और मध्य प्रदेश में भाजपा के दो-दो तथा कांग्रेस के एक-एक सीट जीतने की संभावना है। कर्नाटक में एक सीट एनडीए और दो सीटें कांग्रेस के खाते में जाती दिख रही हैं जबकि चौथी सीट पर मुकाबला रोचक हो सकता है, वहीं झारखंड में इंडिया गठबंधन के पास स्पष्ट बहुमत है और दोनों सीटें उसके खाते में जाती दिखाई दे रही हैं। मौजूदा समीकरणों के अनुसार 24 में से कम से कम 13 सीटें एनडीए के पक्ष में जाती नजर आ रही हैं, हालांकि कुछ राज्यों में रणनीतिक मतदान और संभावित क्राॅस-वोटिंग नतीजों को दिलचस्प बना सकती है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह चुनाव केवल राज्यसभा की सीटों का नहीं बल्कि संसद में शक्ति संतुलन और भविष्य के राजनीतिक समीकरणों का भी संकेतक है। भले ही एनडीए तत्काल दो-तिहाई बहुमत के आंकड़े तक न पहुंचे लेकिन बेहतर प्रदर्शन उसे उच्च सदन में और अधिक मजबूत स्थिति दिला सकता है। वहीं विपक्षी दलों में सम्भावित क्राॅस-वोटिंग की स्थिति एनडीए को अपेक्षा से अधिक लाभ पहुंचा सकती है और उसके बहुमत के लक्ष्य को आगे बढ़ाने में मददगार साबित हो सकती है।

अलग पार्टी बनाएंगे अन्नामलाई

तमिलनाडु की राजनीति में लम्बे समय तक भाजपा का प्रमुख चेहरा रहे अन्नामलाई हाल के महीनों में पार्टी नेतृत्व से मतभेदों को लेकर सुर्खियों में रहे हैं। भाजपा को बड़ा झटका तब लगा जब पार्टी हाईकमान ने अन्नामलाई का इस्तीफा स्वीकार होने के बाद  खुद अन्नामलाई ने साफ कर दिया है कि वह केवल राजनीति छोड़ने नहीं जा रहे बल्कि एक ‘नया आंदोलन’ शुरू करने की तैयारी में हैं। उनकी इस घोषणा ने तमिलनाडु की राजनीति में हलचल मचा दी है। खास बात यह है कि अन्नामलाई ने अपने इस्तीफे को किसी व्यक्तिगत नाराजगी की बजाय ‘तमिलनाडु के भविष्य’ से जोड़ा है। ऐसे में सवाल उठ रहे हैं कि क्या वह नई पार्टी बनाएंगे? कोई सामाजिक आंदोलन शुरू करेंगे या फिर राज्य की राजनीति में तीसरे बड़े विकल्प के तौर पर खुद को स्थापित करने की कोशिश करेंगे? सूत्रों के अनुसार 2026 विधानसभा चुनाव की तैयारियों के दौरान वे खुद को निर्णय प्रक्रिया से अलग-थलग महसूस कर रहे थे। उम्मीदवार चयन, सीट बंटवारे और गठबंधन प्रबंधन जैसे मुद्दों पर उनकी राय को पर्याप्त महत्व नहीं मिलने की चर्चाएं रहीं। तीन-भाषा नीति जैसे विषयों पर भी उन्होंने पार्टी लाइन से अलग रुख अपनाया था। हाल के दिनों में मदुरै और कोयम्बटूर में उनके समर्थकों ने पोस्टर लगाकर उनसे तमिलनाडु के लिए ‘नया राजनीतिक विकल्प’ देने की अपील की थी। हालांकि अन्नामलाई ने अभी तक नई पार्टी की घोषणा नहीं की है लेकिन उनके इस्तीफे के बाद यह सवाल फिर जोर पकड़ रहा है कि क्या वे अपनी नई राजनीतिक पारी शुरू करेंगे। गौरतलब है कि अन्नामलाई और भाजपा नेतृत्व के बीच मतभेदों की चर्चा काफी समय से चल रही थी। सबसे बड़ा विवाद भाजपा और एआईएडीएमके के बीच गठबंधन को लेकर माना जाता है। अन्नामलाई इस गठबंधन के आलोचक रहे जबकि पार्टी नेतृत्व ने चुनावी रणनीति के तहत एआईएडीएमके के साथ हाथ मिलाया। 2024 के लोकसभा चुनाव में भाजपा ने तमिलनाडु में अकेले चुनाव लड़ा था और एक भी सीट नहीं जीत सकी। अन्नामलाई भी कोयम्बटूर से चुनाव हार गए थे। इसके बाद अप्रैल 2025 में उन्हें प्रदेश अध्यक्ष पद से हटाकर नैनार नागेंद्रन को जिम्मेदारी सौंपी गई। राजनीतिक हलकों में माना गया कि यह बदलाव एआईएडीएमके के साथ संबंध बेहतर बनाने की रणनीति का हिस्सा था। अब अन्नामलाई के इस्तीफे ने तमिलनाडु भाजपा के सामने नई चुनौती खड़ी कर दी है।

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