Uttarakhand

प्राचीन इन्द्रप्रस्थ में शुरू सियासी जंग

आगामी विधानसभा चुनाव 2027 से पहले रामनगर में राजनीतिक हलचल चरम पर है। भाजपा और कांग्रेस दोनों टिकट चयन को लेकर गहरे अंतर्विरोधों से जूझ रही हैं। एक ओर पुराने दिग्गज अपनी राजनीतिक जमीन बचाने की लड़ाई लड़ रहे हैं तो दूसरी तरफ नए चेहरे दावेदारी को लेकर पूरी ताकत झोंक चुके हैं। ऐसे में इस बार मुकाबला केवल भाजपा बनाम कांग्रेस नहीं बल्कि दोनों दलों के भीतर भी निर्णायक साबित होने जा रहा है

उत्तराखण्ड राज्य विधानसभा चुनाव 2027 की आहट शुरू होते ही राजनीतिक सरगर्मियां भी तेज हो चुकी हैं। द्वापर युग से अपनी ऐतिहासिकता संजोए नैनीताल जनपद के प्रमुख शहर रामनगर को ‘प्राचीन इन्द्रप्रस्थ’ का हिस्सा माना जाता है। रामनगर विधानसभा सीट राज्य की सबसे चर्चित विधानसभा सीटों में गिनी जाती है। उत्तराखण्ड की पहली निर्वाचित सरकार में प्रदेश का पहला मुख्यमंत्री नारायण दत्त तिवारी के रूप में देने का गौरव रामनगर विधानसभा को ही प्राप्त है। 2002 में रामनगर से उपचुनाव लड़कर नारायण दत्त तिवारी विधानसभा पहुंचे थे। अब 2027 के विधानसभा चुनाव को लेकर रामनगर विधानसभा क्षेत्र में राजनीतिक दलों और दावेदारों ने अपनी तैयारियां शुरू कर दी हैं। पौड़ी लोकसभा क्षेत्र और नैनीताल जनपद में आने वाली रामनगर विधानसभा सीट के लिए जहां भारतीय जनता पार्टी और कांग्रेस में अपने अंतर्विरोध हैं तो उत्तराखण्ड क्रांति दल, उत्तराखण्ड परिवर्तन पार्टी, बहुजन समाज पार्टी, समाजवादी पार्टी सहित अन्य राजनीतिक दल भी यहां अपनी उपस्थिति दर्ज कराते रहे हैं।

2000 में उत्तराखण्ड राज्य गठन के बाद अस्तित्व में आई रामनगर विधानसभा सीट के लिए पहला विधानसभा चुनाव 2002 में हुआ। 2002 से 2022 तक हुए 6 विधानसभा चुनावों में तीन बार भाजपा और दो बार कांग्रेस ने इस सीट से विधानसभा में प्रतिनिधित्व किया है। 2002 में उत्तराखण्ड राज्य के पहले विधानसभा चुनाव में कांग्रेस के योगम्बर सिंह रावत ने भाजपा के दीवान सिंह बिष्ट को हराया था। 2002 में नारायण दत्त तिवारी के मुख्यमंत्री मनोनीत होने के बाद योगम्बर सिंह रावत ने नारायण दत्त तिवारी के लिए सीट खाली कर दी थी। तब रामनगर उपचुनाव में नारायण दत्त तिवारी ने भाजपा के राम सिंह बिष्ट को हराया था। 2007 के विधानसभा चुनाव में दीवान सिंह बिष्ट ने योगम्बर सिंह रावत को हराकर ये सीट भाजपा की झोली में डाल दी थी।। 2012 के चुनाव में दीवान सिंह बिष्ट अपनी सीट बरकरार नहीं रख पाए और कांग्रेस की अमृता रावत से लगभग 4 हजार वोटों से हार गए। 2017 का चुनाव बदले समीकरणों का चुनाव था, 2012 में कांग्रेस से विधायक बनी अमृता रावत अपने पति सतपाल महाराज के साथ भाजपा में जा चुकी थीं। 2017 में भी भाजपा ने दीवान सिंह बिष्ट को ही अपना उम्मीदवार बनाया तो कांग्रेस से हरीश रावत सरकार में ताकतवर भूमिका में रहे रणजीत रावत चुनाव मैदान में थे। तब रणजीत रावत की उम्मीदवारी का कांग्रेस के अंदर ही विरोध हुआ था। रणजीत रावत दीवान सिंह बिष्ट से आठ हजार छह सौ ग्यारह मतों के अंतर से हार गए। 2022 का चुनाव कांग्रेस की अंदरूनी कलह की भेंट चढ़ गया। हरीश रावत और कभी उनके हनुमान कहे जाने वाले रणजीत रावत के बीच राजनीतिक अदावत ने कांग्रेस को ऐसी स्थिति में डाला कि उसके समीकरण ही गड़बड़ा गए जिसका असर नैनीताल जिले की राजनीति में देखने को मिला जहां कांग्रेस महज हल्द्वानी की सीट ही जीत पाई। रामनगर से लड़ने की इच्छा रखने वाले हरीश रावत और रणजीत रावत दोनों को आखिरकार लालकुआं और सल्ट जाना पड़ा। इसने एक मजबूत उम्मीदवार संजय नेगी के लिए कांग्रेस के अंदर रास्ते बंद कर दिए और वाया कालाढूंगी, रामनगर चुनाव लड़ने पहुंचे महेंद्रपाल सिंह रामनगर का मुकाबला दीवान सिंह बिष्ट से हार गए। निर्दलीय चुनाव लड़कर संजय नेगी ने अच्छा-खासा वोट हासिल किया जो महेंद्र पाल की हार का बड़ा कारण बना। जातिगत समीकरणों में ठाकुर बाहुल्य माने जाने वाली सीट पर  लगभग एक लाख 20 हजार मतदाता हैं जिसमें मुस्लिम-22 हजार, वैश्य मतदाता 5 हजार, अनुसुचित जाति 26 हजार, ब्राह्माण 26 हजार, ठाकुर-31 हजार, बुक्सा जनजाति साढ़े तीन हजार, सैनी 3 हजार अन्य  जिनमें राय सिख, पंजाबी, चैधरी, गुजर, इसाई, अन्य ओबीसी शामिल हैं, लगभग साढ़े आठ हजार मतदाता हैं। हालांकि यहां ठाकुर और ब्राह्माण मतदाताओं के बीच महज 5 हजार वोटों का अंतर है लेकिन इस सीट पर नारायण दत्त तिवारी को छोड़ दें तो भाजपा कांग्रेस दोनों ने ही ब्राह्माण प्रत्याशी देने से परहेज किया है और अब तक दोनो दलों ने ठाकुर प्रत्याशी को ही प्राथमिकता दी है।

भाजपा कांग्रेस की बात करें तो यहां भाजपा-कांग्रेस के लिए कमोवेश हालात 2022 की तरह ही हैं। दावेदारियों के साथ आपसी कलह भी कम नहीं है। इन अंतर्विरोधों के बीच सामंजस्य बैठाना आसान नहीं होगा। जहां कांग्रेस के अंदर हरीश रावत बनाम रणजीत रावत की लड़ाई है तो भाजपा के अंदर बदलाव की आवाज सुनाई देने लगी है, साथ ही भाजपा का परम्परागत वोट माना जाने वाला ब्राह्माण वर्ग अपनी हिस्सेदारी के लिए मुखर हो रहा है।

कांग्रेस में प्रमुख दावेदारों में सल्ट से पूर्व विधायक रणजीत रावत, पूर्व दर्जाधारी मंत्री रहे पुष्कर दुर्गापाल, दायित्वधरि रहे डाॅ. निशांत पपनै प्रमुख हैं। 2012 में अपनी परम्परागत सीट सल्ट में भाजपा के सुरेंद्र सिंह जीना से मिली करारी हार के बाद रणजीत रावत ने अपनी राजनीतिक जमीन रामनगर में तलाशनी शुरू कर दी थी। 2017 का विधानसभा चुनाव भी उन्होंने रामनगर से लड़ा लेकिन पराजित हो गए थे। रणजीत रावत ने रामनगर के कांग्रेस संगठन पर अपनी पकड़ मजबूत की है। हालांकि कुछ लोग उन पर कांग्रेस संगठन को कब्जाने का आरोप लगाते हैं। पुष्कर दुर्गापाल पुराने कांग्रेसी हैं, कांग्रेस सरकार में दर्जा प्राप्त राज्यमंत्री रह चुके हैं और नगर पालिका चुनावों में भी किस्मत आजमा चुके हैं। एक नाम जो इस बीच उभर कर आया है वो है निशांत पपनै का। रामनगर के रसूखदार परिवार से ताल्लुक रखने वाले निशांत पपनै का परिवार परम्परागत रूप से कांग्रेसी रहा है। इस बीच रामनगर विधानसभा से एक और चेहरे की चर्चा है वो हैं संजय नेगी। उनको कांग्रेस में शामिल करने को लेकर हरीश रावत और कांग्रेस के अन्य नेताओं में ठन गई थी। हरीश रावत उनकी कांग्रेस में वापसी चाहते थे लेकिन उस पर अनिर्णय के चलते कांग्रेस में अंदरूनी घमासान चरम पर था। इसलिए उन पर कांग्रेस का नेतृत्व अभी तक कोई निर्णय नहीं ले पाया है। क्या कांग्रेस उन्हें शामिल कर रामनगर से प्रत्याशी बनाएगी या फिर 2022 ही दोहराया जाएगा? संजय नेगी की पत्नी वर्तमान में रामनगर की ब्लॉक प्रमुख और खुद संजय नेगी रामनगर ब्लॉक के ज्येष्ठ प्रमुख हैं। 1996 में युवा अवस्था से राजनीति में सक्रिय संजय नेगी 1997 में रामनगर महाविद्यालय छात्रसंघ में सचिव पद के लिए चुने गए। 2017 और 2022 में भी वो कांग्रेस से दावेदार थे लेकिन उन्हें टिकट नहीं मिला। रणजीत रावत से उनकी रार किसी से छिपी नहीं है। अब सवाल है कि वो कांग्रेस से प्रत्याशी होंगे या फिर रणजीत रावत की राह का रोड़ा बनेंगे?

जहां तक भाजपा का प्रश्न है तो वर्तमान विधायक दीवान सिंह बिष्ट 2002, 2017 और 2022 में भी भाजपा से विधायक रह चुके हैं। उन्होंने 2022 के चुनाव को अपना अंतिम चुनाव बताया था, ऐसे में भाजपा के अंदर दावेदारों में उम्मीद जगी हैं। जिस प्रकार की परिस्थितियां नजर आ रही हैं इस बार भाजपा में टिकट का बदलाव तय माना जा रहा है। भाजपा के अंदरूनी समीकरण भी उनके बहुत अनुकूल नजर नहीं आ रहे हैं। पाला बदल कर पौड़ी सांसद अनिल बलूनी के पाले में शामिल हुए दीवान सिंह बिष्ट मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी की गुडबुक में नहीं होने की चर्चा आम है। 3 बार के विधायक रहे दीवान सिंह बिष्ट काम करने वाले जनप्रतिनिधि की छवि नहीं बना पाए। हालांकि उनका मृदुल एवं कुशल व्यवहार उनका सकारात्मक पक्ष जरूर है। जिस प्रकार भाजपा के सूत्र बता रहे हैं कि पार्टी कुछ वर्तमान विधायकों के टिकट काटकर नए चेहरों को अवसर दे सकती है, वहां पर दीवान सिंह बिष्ट को परेशानी आ सकती है। इसलिए खुद को टिकट न मिलने की स्थिति में दीवान सिंह बिष्ट ने अपने पुत्र जगमोहन सिंह बिष्ट को टिकट की इच्छा सार्वजनिक रूप से व्यक्त की है। जगमोहन सिंह बिष्ट पूर्व में छात्रसंघ अध्यक्ष के साथ भाजपा के युवा मोर्चा के पदाधिकारी रह चुके हैं।  भाजपा में एक नए युवा चेहरा इंदर सिंह रावत का है। उनकी पत्नी रेखा रावत रामनगर की ब्लॉक प्रमुख रह चुकी हैं।

भाजपा के पूर्व जिला मंत्री राकेश नैनवाल जिन्हें रामनगर भाजपा का चाणक्य कहा जाता है, मजबूत दावेदारों में हैं। भाजपा प्रदेश कार्यकारिणी के सदस्य रहे राकेश नैनवाल संगठन में सुनियोजित तालमेल के लिए जाने जाते हैं। नैनीताल-ऊधमसिंह नगर से सांसद अजय भट्ट के खास माने जाने वाले राकेश नैनवाल की काबिलियत उस वक्त ब्लॉक प्रमुख चुनावों में दिखी थी जब उन्होंने रामनगर के विधायक दीवान सिंह बिष्ट की बहू के मुकाबले रेखा रावत को पार्टी की प्रत्याशी घोषित कर चुनाव जितवाकर अपनी रणनीति का लोहा मनवाया था। उत्तर प्रदेश, पश्चिम बंगाल के लोकसभा एवं विधानसभा चुनावों में पार्टी ने उन्हें चुनाव-प्रचार के लिए भेजा था। 2014 के लोकसभा चुनाव में वे भुवन चंद्र खण्डूड़ी और 2019 के लोकसभा चुनावों में तीरथ सिंह रावत के चुनाव संयोजक रहे। मंडी समिति रामनगर के चेयरमैन, पूर्व प्रदेश मंत्री रहे राकेश नैनवाल पूर्णकालिक स्वयंसेवक हैं। राकेश नैनवाल भाजपा का एक मजबूत ब्राह्मण चेहरा हैं। भाजपा से ही दिनेश महरा की दावेदारी की भी चर्चा है। सल्ट विधानसभा क्षेत्र के रहने वाले दिनेश महरा रामनगर विधानसभा क्षेत्र में काफी लम्बे समय से सक्रिय हैं। कांग्रेस के मजबूत गढ़ रहे सल्ट क्षेत्र में भाजपा को मजबूत करने का श्रेय दिनेश महरा और उनके भाई गणेश महरा 2012 में सल्ट विधानसभा से मजबूत दावेदार दिनेश महरा ने सुरेंद्र सिंह जीना को जिताने के लिए अपनी दावेदारी छोड़ दी थी।

भाजपा संगठन के निचले स्तर से राजनीति शुरू करने वाले दिनेश महरा मंडल पदाधिकारी से लेकर प्रदेश स्तर के पदाधिकारी के साथ त्रिवेंद्र सरकार में दर्जा राज्यमंत्री रहे दिनेश महरा रामनगर विधानसभा क्षेत्र से मजबूत दावेदारों में हैं। भाजपा नेता मदन जोशी जो पिछले निकाय चुनावों में रामनगर नगर पालिका अध्यक्ष चुनाव में भाजपा के प्रत्याशी थे तभी से दावेदारों की दौड़ में खुद को मजबूती से शामिल कर रहे हैं। कभी पौड़ी से सांसद अनिल बलूनी के करीबी रहे मदन जोशी की दूरियां अनिल बलूनी से बढ़ गईं हैं और वो अब मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के प्रशंसकों में शामिल हो गए हैं। बताया जाता है कि पिछले दिनों गोमांस प्रकरण में उनकी गिरफ्तारी के दौरान उन्हें अनिल बलूनी का वो साथ नहीं मिला जिसकी मदन जोशी अपेक्षा कर रहे थे। इसके अलावा पत्रकारिता से भाजपा की राजनीति में शामिल हुए गणेश रावत और मुख्यमंत्री के करीबी संजय डोर्बी भी भाजपा से दावेदारों में गिने जा रहे हैं। बहुजन समाज पार्टी से विनोद अंजान, उत्तराखण्ड क्रांति दल से भुवन सत्यवली भी दावेदारों में हैं। उत्तराखण्ड परिवर्तन पार्टी के प्रभात ध्यानी पिछली बार भी विधानसभा चुनाव के मैदान में थे इसलिए जितना संघर्ष वो क्षेत्र में जनता की समस्याओं के लिए करते दिखते हैं जनता ऐन चुनाव के वक्त उनके इन संघर्षों को भूल जाती है।

उत्तराखण्ड परिवर्तन पार्टी रामनगर में कोई बड़ी शक्ति के रूप में उभर नहीं पाई है लेकिन अपनी संघर्ष की जिजीविषा दिखाते हुए प्रभात ध्यानी इस बार भी दावेदार होंगे। 2027 के विधानसभा चुनावों के लिए रामनगर से प्रत्याशी का चयन भाजपा और कांग्रेस दोनों के लिए चुनौती है क्योंकि दोनों दल इस बार कोई कसर नहीं छोड़ना चाहते।

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