केरल के अब्दुल रहीम को सऊदी अरब में मौत की सजा से राहत मिली, अब उनकी घर वापसी का रास्ता साफ हो गया है। दुनिया भर के लोगों ने ‘ब्लड मनी’ चुकाने के लिए करीब 47 करोड़ रुपए जुटाए हैं इनमें से लगभग 34 करोड़ रुपए पीड़ित परिवार को दिए गए जबकि बाकी राशि अतिरिक्त दान के रूप में आई। भारतीय दूतावास के पूर्व वेलफेयर ऑफिसर  सवाद युसूफ ने इस पूरे अभियान में सबसे अहम भूमिका निभाई है। सऊदी अरब में शरीयत कानून के तहत पीड़ित परिवार आर्थिक मुआवजा लेकर आरोपी को माफ कर सकता है

करीब 20 वर्ष पहले रोजगार की तलाश में सऊदी अरब गए केरल के अब्दुल रहीम की कहानी आज पूरी दुनिया में चर्चा का विषय बन चुकी है। एक ऐसा व्यक्ति जिसे सऊदी अदालत ने मौत की सजा सुनाई थी, अब उसकी घर वापसी का रास्ता साफ हो गया है। यह केवल एक कानूनी लड़ाई की कहानी नहीं है बल्कि यह मानवीय संवेदना, प्रवासी भारतीयों की एकजुटता और क्राउड फंडिंग की ताकत का भी बड़ा उदाहरण बन चुकी है।
इस पूरे मामले में सबसे महत्वपूर्ण भूमिका भारतीय दूतावास में वेलफेयर आॅफिसर रह चुके सवाद युसूफ ने निभाई। वर्षों तक लगातार प्रयास करने वाले युसूफ ने न केवल रहीम के मामले को जीवित रखा बल्कि पीड़ित परिवार, सऊदी प्रशासन और भारतीय समुदाय के बीच पुल का काम भी किया। खाड़ी देशों में रहने वाले भारतीयों के बीच सवाद युसूफ को लम्बे समय से ऐसे व्यक्ति के रूप में देखा जाता है जो संकट में फंसे प्रवासियों की कानूनी और मानवीय सहायता के लिए हमेशा आगे रहते हैं। बताया जाता है कि वह पहले भी कई भारतीयों को सऊदी अरब में मौत की सजा से बचाने में भूमिका निभा चुके हैं।

क्या है पूरा मामला?
अब्दुल रहीम वर्ष 2006 में बेहतर रोजगार की तलाश में सऊदी अरब गए थे। वहां उन्हें एक सऊदी परिवार में ड्राइवर और एक दिव्यांग किशोर की देखभाल की जिम्मेदारी दी गई थी। मीडिया रिपोर्टों के अनुसार एक यात्रा के दौरान कार में लगे लाइफ सपोर्ट सिस्टम की ट्यूब कथित तौर पर हट गई, जिससे उस किशोर की मौत हो गई।
इस घटना के बाद सऊदी पुलिस ने रहीम को गिरफ्तार कर लिया। मामला अदालत तक पहुंचा और बाद में उन्हें मौत की सजा सुना दी गई। रहीम के परिवार के लिए यह किसी भयावह सपने जैसा था। केरल में उनका परिवार लगातार कानूनी लड़ाई लड़ता रहा लेकिन सऊदी की अदालतों में मौत की सजा बरकरार रही। धीरे-धीरे यह मामला प्रवासी भारतीय समुदाय तक पहुंचा। खाड़ी देशों में रहने वाले मलयाली समाज ने इसे केवल एक व्यक्ति का मामला नहीं माना बल्कि इसे मानवीय संकट के रूप में देखा। यहीं से शुरू हुआ वह अभियान जिसने आगे चलकर इतिहास बना दिया।

दुनिया भर से जुटे करोड़ों रुपए
जब पीड़ित परिवार ‘ब्लड मनी’ स्वीकार करने के लिए तैयार हुआ तब रहीम की जान बचाने की उम्मीद जगी। इसके बाद दुनिया भर के भारतीयों और खासकर मलयाली समुदाय ने बड़े स्तर पर क्राउड फंडिंग अभियान शुरू किया। शुरुआती लक्ष्य करीब 34 करोड़ रुपए जुटाने का था क्योंकि इतनी राशि पीड़ित परिवार को ‘दियाह’ यानी ब्लड मनी के रूप में देनी थी लेकिन यह अभियान इतना बड़ा बन गया कि कुल फंड लगभग 47 करोड़ रुपए तक पहुंच गया।

बताया जाता है कि हजारों लोगों ने छोटी-बड़ी रकम दान की। किसी ने 100 रुपए दिए तो किसी ने लाखों रुपए तक सहयोग किया। सोशल मीडिया, मस्जिदों, सामुदायिक संगठनों और प्रवासी भारतीय नेटवर्क के जरिए यह अभियान पूरी दुनिया तक पहुंच गया।
करीब 34 करोड़ रुपए पीड़ित परिवार को दिए गए जबकि बाकी अतिरिक्त राशि कानूनी खर्चों, प्रशासनिक प्रक्रियाओं और अभियान से जुड़ी अन्य जरूरतों के लिए उपयोग की गई। यह भारत के सबसे बड़े मानवीय क्राउड फंडिंग अभियानों में से एक माना जा रहा है।

सवाद युसूफ क्यों बने इस अभियान का सबसे अहम चेहरा?
इस पूरे मामले में भारतीय दूतावास के पूर्व वेलफेयर ऑफिसर सवाद युसूफ की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण रही। खाड़ी देशों में काम करने वाले लाखों भारतीयों के बीच वह लम्बे समय से सामाजिक सहायता और कानूनी सहयोग के लिए जाने जाते हैं। रिपोर्टों के अनुसार युसूफ ने वर्षों तक इस मामले पर लगातार काम किया। उन्होंने पीड़ित परिवार के साथ संवाद बनाए रखा, कानूनी प्रक्रियाओं को समझा, भारतीय समुदाय को संगठित किया और यह सुनिश्चित किया कि रहीम का मामला भुलाया न जाए।सवाद युसूफ इससे पहले भी ऐसे कई मामलों में सक्रिय रहे हैं जहां भारतीय नागरिक सऊदी अरब में गम्भीर कानूनी संकट में फंसे थे। यही कारण है कि अब्दुल रहीम मामले में उन्हें इस अभियान का सबसे महत्वपूर्ण चेहरा माना जा रहा है।
क्या है ‘ब्लड मनी’ या ‘दियाह’ कानून?
सऊदी अरब की न्याय व्यवस्था इस्लामी शरीयत कानून पर आधारित है। हत्या या गम्भीर अपराधों के मामलों में वहां ‘दियाह’ या ‘ब्लड मनी’ का प्रावधान मौजूद है। सरल शब्दों में समझें तो यदि किसी व्यक्ति की मौत हो जाती है और अदालत आरोपी को दोषी मानती है तो पीड़ित परिवार के पास यह अधिकार होता है कि वह आरोपी को माफ कर दे। इसके बदले आरोपी या उसके समर्थक पीड़ित परिवार को आर्थिक मुआवजा देते हैं। इसी मुआवजे को ‘ब्लड मनी’ कहा जाता है। हालांकि यह प्रक्रिया पूरी तरह पीड़ित परिवार की इच्छा पर निर्भर करती है। यदि परिवार माफी देने से इनकार कर दे तो आरोपी को मौत की सजा का सामना करना पड़ सकता है लेकिन यदि परिवार अदालत में लिखित रूप से आरोपी को माफ कर दे और मुआवजा स्वीकार कर ले तो अदालत मौत की सजा को रद्द या कम कर सकती है। इसी कानून ने अब्दुल रहीम को भी नया जीवन दिया। यदि पीड़ित परिवार माफी के लिए तैयार नहीं होता तो शायद रहीम की फांसी टलनी मुश्किल हो जाती।

करीब दो दशक बाद घर वापसी की उम्मीद
करीब 20 वर्षों तक जेल में रहने और मौत की सजा के साये में जीवन बिताने के बाद अब अब्दुल रहीम की घर वापसी की उम्मीद ने केरल में भावनात्मक माहौल पैदा कर दिया है। उनका परिवार वर्षों से इस दिन का इंतजार कर रहा था। यह मामला केवल एक व्यक्ति की रिहाई की कहानी नहीं है। यह कहानी बताती है कि किस तरह हजारों अनजान लोगों की मदद, सामुदायिक एकजुटता और लगातार कानूनी प्रयास किसी की जिंदगी बदल सकते हैं। अब्दुल रहीम का मामला अब खाड़ी देशों में रहने वाले भारतीयों के बीच उम्मीद और मानवीय सहयोग की सबसे बड़ी मिसालों में गिना जा रहा है।

You may also like