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मजाक, विद्रोह या नई राजनीति?

‘देश हमारा किधर जा रहा, कहो नरेंद्र मजा आ रहा…’ पिछले कुछ समय में यह गीत सोशल मीडिया पर सिर्फ एक गाना बनकर नहीं उभरा बल्कि युवाओं की बेचैनी, व्यंग्य और राजनीतिक असंतोष की आवाज बनकर सामने आया है। इंटरनेट पर यह गीत लाखों-करोड़ों लोगों तक पहुंच चुका है। रील्स, मीम्स, शाॅर्ट वीडियो और राजनीतिक बहसों में इसकी पंक्तियां लगातार सुनाई दे रही हैं। दिलचस्प बात यह है कि यही वो युवा हैं जिन्हें हाल के दिनों में ‘काॅकरोच’ कहकर निशाना बनाया गया। अब जरा सोचिए अगर वही युवा, जिन्हें व्यवस्था तिलचट्टा समझ रही है, ऐसा गीत बना सकते हैं जो पूरे इंटरनेट पर छा जाए, अगर वही युवा मीम, व्यंग्य और सोशल मीडिया के जरिए राष्ट्रीय बहस खड़ी कर सकते हैं तो क्या होगा? ये सारे ‘काॅकरोच’ सचमुच एक साथ खड़े हो जाएं क्या होगा? शायद ये सवाल इस समय भारतीय राजनीति, सत्ता और व्यवस्था के सामने खड़े होते दिखाई दे रहे हैं

भारतीय राजनीति में विरोध के प्रतीक हमेशा बदलते रहे हैं। कभी सड़कों पर लिखे नारे सत्ता को चुनौती देते थे, कभी कविताएं और नुक्कड़ सभाएं जनभावनाओं की आवाज बनती थीं लेकिन डिजिटल युग में विरोध की भाषा बदल चुकी है। अब मीम, इंस्टाग्राम रील, ट्रेंडिंग हैशटैग और व्यंग्यात्मक सोशल मीडिया अकाउंट राजनीतिक असंतोष की नई अभिव्यक्ति बन रहे हैं।

इसी बदलते भारत में अचानक एक अजीब-सा प्रतीक उभरकर सामने आया है काॅकरोच यानी तिलचट्टा। इसी से जन्म हुआ है ‘काॅकरोच जनता पार्टी’ यानी सीजेपी का। पहली नजर में यह इंटरनेट का कोई मजाक लगता है लेकिन कुछ ही दिनों में यह मजाक सत्ता, न्यायपालिका, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और युवा असंतोष पर राष्ट्रीय बहस का विषय बन चुका है लेकिन इस पूरे विवाद को समझने से पहले यह समझना भी जरूरी है कि आखिर ‘काॅकरोच’ क्या है?

‘काॅकरोच’ शब्द मूल रूप से स्पेनिश भाषा के शब्द Cucaracha से आया माना जाता है, जिसका अर्थ तिलचट्टा होता है। यह एक ऐसा कीट है जो करोड़ों वर्षों से धरती पर मौजूद है और अपनी जिद्दी जीवित रहने की क्षमता के लिए जाना जाता है। वैज्ञानिक मानते हैं कि काॅकरोच के पूर्वज लगभग 32 करोड़ साल पहले पैदा हुए थे यानी डायनासोर आने से भी बहुत पहले। यही वजह है कि इन्हें प्रकृति के सबसे बड़े ‘सर्वाइवर’ जीवों में गिना जाता है।

काॅकरोच लगभग हर माहौल में खुद को ढाल लेते हैं, चाहे भीषण गर्मी हो, गंदगी हो, नमी हो या अंधेरा। यही कारण है कि वे दुनिया के लगभग हर हिस्से में पाए जाते हैं। इनकी एक और खास बात यह है कि ये अकेले कम और समूह में ज्यादा रहते हैं। वे एक-दूसरे को गंध और रासायनिक संकेतों से पहचानते हैं। अगर एक जगह कई कॉकरोच इकट्ठा हो जाएं तो बाकी भी उसी जगह पहुंचने लगते हैं। यानी वे सामूहिक तरीके से फैसले लेने की क्षमता रखते हैं।

कॉकरोच ज्यादातर रात में सक्रिय होते हैं, अंधेरे में रहना पसंद करते हैं और बेहद तेजी से फैलते हैं। यही वजह है कि इंसानी समाज में अक्सर कॉकरोच को गंदगी, अव्यवस्था और हर परिस्थिति में जिंदा बच निकलने के प्रतीक के रूप में देखा जाता है। सरल भाषा में कहें तो काॅकरोच एक ऐसा प्राचीन और बेहद अनुकूलनशील जीव है जो परिस्थितियां कैसी भी हों, जीवित रहने का रास्ता खोज ही लेता है। शायद यही वजह है कि इंटरनेट पर शुरू हुआ यह व्यंग्य अब एक राजनीतिक प्रतीक में बदलता जा रहा है। जिन युवाओं को ‘काॅकरोच’ कहकर अपमानित करने की कोशिश हुई, उन्होंने उसी शब्द को प्रतिरोध की पहचान बना लिया है। जैसे मानो वे कहना चाहते हों- ‘हमें मिटाना इतना आसान नहीं है।’

पूरा विवाद उस समय शुरू हुआ जब सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश जस्टिस सूर्यकांत की एक टिप्पणी सोशल मीडिया पर वायरल हो गई। सुनवाई के दौरान उन्होंने कथित तौर पर बेरोजगार युवाओं, पत्रकारिता और एक्टिविज्म की ओर बढ़ रहे लोगों की तुलना ‘काॅकरोच’ और ‘परजीवियों’ से कर दी। बयान सामने आते ही सोशल मीडिया पर तीखी प्रतिक्रिया शुरू हो गई। युवाओं ने इसे केवल एक टिप्पणी नहीं बल्कि व्यवस्था की मानसिकता का प्रतीक माना, एक ऐसी मानसिकता जिसमें सवाल पूछने वाले, आलोचना करने वाले और बेरोजगार युवा बोझ की तरह देखे जाते हैं। हालांकि विवाद बढ़ने के बाद जस्टिस सूर्यकांत ने सफाई दी। उन्होंने कहा कि मीडिया के एक हिस्से ने उनकी टिप्पणी को तोड़-मरोड़कर पेश किया है और उनका इशारा पूरे युवावर्ग की तरफ नहीं बल्कि ‘फर्जी और बेहूदा डिग्री’ वाले कुछ लोगों की तरफ था लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी थी। इंटरनेट ने इस टिप्पणी को पकड़ लिया था और उसे व्यंग्य में बदल दिया था। यहीं से सोशल मीडिया पर एक सवाल उभरा- ‘अगर सारे काॅकरोच एक साथ आ जाएं तो क्या होगा?’

इस सवाल को सबसे पहले संगठित रूप देने वाले व्यक्ति हैं अभिजीत दीपके। महाराष्ट्र के छत्रपति संभाजीनगर से आने वाले अभिजीत दीपके कोई पारम्परिक राजनीतिक नेता नहीं हैं। वह राजनीतिक कम्युनिकेशन से जुड़े रहे हैं, आम आदमी पार्टी की कम्युनिकेशन टीम में काम कर चुके हैं और बाद में उच्च शिक्षा के लिए अमेरिका की बोस्टन यूनिवर्सिटी चले गए। अभिजीत बताते हैं कि जब उन्होंने सीजेआई की टिप्पणी देखी तो उन्हें गुस्सा भी आया और यह बात हास्यास्पद भी लगी कि संविधान की रक्षा करने वाले सर्वोच्च पद पर बैठा व्यक्ति युवाओं के लिए ऐसे शब्द इस्तेमाल करे। उन्होंने सोशल मीडिया पर व्यंग्यात्मक अंदाज में लिखा कि अगर युवा ‘काॅकरोच’ हैं तो फिर उन्हें एक साथ आना चाहिए। यही पोस्ट देखते-देखते वायरल हो गई।

इसके बाद ‘काॅकरोच जनता पार्टी’ नाम से सोशल मीडिया अभियान शुरू हुआ। इसकी सदस्यता की शर्तें ही पूरे सिस्टम पर व्यंग्य थीं, सदस्य बेरोजगार होना चाहिए, आलसी होना चाहिए, लगातार आॅनलाइन रहना चाहिए और ‘प्रोफेशनल तरीके से भड़ास निकालने’ की क्षमता होनी चाहिए। यानी जिन शब्दों से युवाओं को अपमानित करने की कोशिश हुई, उन्हीं को आंदोलन ने अपनी पहचान बना लिया। कुछ ही घंटों में हजारों लोग इस अभियान से जुड़ने लगे। फिर वेबसाइट बनी, पार्टी का घोषणापत्र जारी हुआ और इंस्टाग्राम पर इसकी लोकप्रियता विस्फोटक तरीके से बढ़ने लगी। कुछ ही दिनों में इसके फाॅलोअर्स लाखों से करोड़ों में पहुंच गए हैं। लाखों युवाओं ने खुद को इसका सदस्य बताया है।

पूर्व क्रिकेटर और सांसद कीर्ति आजाद से लेकर टीएमसी सांसद महुआ मोइत्रा तक कई चर्चित चेहरों ने इस अभियान का समर्थन किया है लेकिन असली मोड़ तब आया जब काॅकरोच जनता पार्टी का एक्स यानी ट्विटर अकाउंट भारत में ब्लाॅक या ‘विदहोल्ड’ कर दिया गया। यहीं से मामला महज इंटरनेट मीम से आगे बढ़कर अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और सत्ता की असहिष्णुता पर बड़ी बहस बन चुका है।

राजनीतिक विश्लेषक योगेंद्र यादव मानते हैं कि अगर इस अकाउंट को बैन नहीं किया जाता तो सम्भव है यह पूरा मामला कुछ दिनों में इंटरनेट के सामान्य शोर में दब जाता लेकिन जैसे ही अकाउंट पर कार्रवाई हुई, इसने युवाओं के भीतर मौजूद गुस्से को और गहरा कर दिया। योगेंद्र यादव कहते हैं, ‘‘तानाशाह हुकूमतों को सबसे ज्यादा डर चुटकुलों से लगता है। जो सरकार चुटकुला सुन नहीं सकती, वह खुद एक चुटकुला बन जाती है।’’

उनके अनुसार, किसी मीम अकाउंट को ब्लाॅक करना केवल तकनीकी कार्रवाई नहीं बल्कि यह संदेश देना है कि व्यवस्था अब व्यंग्य से भी असहज होने लगी है। वह कहते हैं कि अब तक चुटकुला जनता और सत्ता के बीच था लेकिन जैसे ही बैन लगाया गया, सरकार खुद उस चुटकुले का हिस्सा बन गई। योगेंद्र यादव इस पूरे घटनाक्रम को भारतीय राजनीति के बड़े ऐतिहासिक पैटर्न से जोड़कर देखते हैं। उनके अनुसार जब भी सत्ता बहुत मजबूत दिखाई देती है और संस्थागत रास्ते बंद होने लगते हैं, तब असंतोष अप्रत्याशित रूपों में फूटता है।

वर्ष 1971 में इंदिरा गांधी की प्रचंड जीत के बाद जेपी आंदोलन, 2009 के बाद अन्ना आंदोलन और 2019 के बाद किसान आंदोलन, हर दौर में जनता ने किसी न किसी नए माध्यम से अपनी बेचैनी व्यक्त की। आज के दौर में वही भूमिका सोशल मीडिया मीम निभा रहे हैं लेकिन इस कहानी का सबसे दिलचस्प हिस्सा अभी बाकी था। कॉकरोच जनता पार्टी का एक्स अकाउंट ब्लॉक होने के कुछ ही घंटों बाद अभिजीत दीपके ने नया अकाउंट शुरू कर दिया। नए हैंडल के साथ लिखा गया ‘काॅकरोच इज बैक’ और टैगलाइन थी ‘काॅकरोचेज डोन्ट डाई’। यह सिर्फ एक लाइन नहीं थी। यह उस पूरे आंदोलन का मनोविज्ञान बन चुका है।

जिस तरह असली काॅकरोच हर परिस्थिति में जीवित रहने का रास्ता खोज लेते हैं, उसी तरह यह डिजिटल आंदोलन भी प्रतिबंधों के बाद और तेजी से फैलने लगा। नया अकाउंट शुरू होते ही लोग उससे जुड़ने लगे। पहले कुछ घंटों में ही हजारों फाॅलोअर्स जुड़ गए। फिर संख्या लगातार बढ़ती चली गई। सोशल मीडिया पर ‘काॅकरोच इज बैक’ और‘काॅकरोचेज डाॅन्ट डाई’ जैसे हैशटैग ट्रेंड करने लगे हैं। यानी जिस कार्रवाई का उद्देश्य इस व्यंग्यात्मक आंदोलन को रोकना था, उसी ने उसे और बड़ा बना दिया है। योगेंद्र यादव इसी संदर्भ में कहते हैं कि अगर अकाउंट ब्लाॅक नहीं किया गया होता तो सम्भव है यह पूरा मामला कुछ दिनों में शांत हो जाता, लेकिन जब व्यवस्था लोगों को ‘गुबार निकालने’ से भी रोकने लगे, तब गुस्सा और गहरा हो जाता है। उनके अनुसार अब सरकार खुद इस चुटकुले का हिस्सा बन चुकी है और इसलिए यह बहस और दूर तक जाने वाली है। दरअसल, भारतीय जेन जी की राजनीतिक भाषा पुरानी पीढ़ियों से अलग है। यह पीढ़ी लम्बी विचारधारात्मक बहसों से ज्यादा व्यंग्यात्मक कंटेंट के जरिए संवाद करती है। पहले राजनीतिक पोस्टर बनते थे, अब मीम बन रहे हैं। पहले मैनिफेस्टो पढ़े जाते थे, अब इंस्टाग्राम रील और यूट्यूब शाॅर्ट्स देखे जा रहे हैं।

योगेंद्र यादव इसे ‘बदले जमाने का नया ग्रामर’ कहते हैं। उनके अनुसार, यह मान लेना गलती होगी कि मीम राजनीति गम्भीर राजनीति नहीं है। कई बार व्यंग्य समाज की सबसे गहरी बेचैनी को व्यक्त करता है। शायद यही वजह है कि काॅकरोच जनता पार्टी केवल एक मजाक बनकर नहीं रह गई है। यह बेरोजगारी, राजनीतिक निराशा, संस्थाओं पर घटते भरोसे और प्रतिनिधित्व की कमी से परेशान युवाओं के लिए एक प्रतीक बनती जा रही है।

यह आंदोलन हिंसक भाषा नहीं बोलता। इसके समर्थक काॅकरोच की पोशाक पहनकर सफाई अभियान करते दिखाई दे रहे हैं, मीम बना रहे हैं, व्यंग्य लिख रहे हैं और डिजिटल माध्यम से व्यवस्था पर सवाल उठा रहे हैं लेकिन इस पूरी घटना ने एक बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है कि क्या भारत की राजनीतिक व्यवस्था और संस्थाएं आलोचना तथा व्यंग्य को स्वीकार करने की क्षमता खो रही हैं? क्योंकि किसी लोकतंत्र की असली ताकत केवल चुनाव जीतने में नहीं बल्कि आलोचना सहने में होती है। जब युवा खुद को ‘काॅकरोच’ कहे जाने के बाद उसी शब्द को प्रतिरोध के प्रतीक में बदल देते हैं तो यह केवल इंटरनेट ट्रेंड नहीं रहता। यह उस पीढ़ी की सामूहिक मनःस्थिति बन जाता है जिसे लगता है कि उसकी बात सुनने वाला कोई नहीं है। शायद यही इस पूरे आंदोलन का सबसे बड़ा संदेश बनकर उभर रहा है। काॅकरोच केवल एक कीट नहीं बल्कि उस पीढ़ी का प्रतीक बन चुका है जो हर परिस्थिति में अपने अस्तित्व और आवाज को बचाए रखने की जिद रखता है।

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