ब्रिटेन की प्रधानमंत्री रहीं मार्गरेट थैचर 1980 के दशक दौरान अपने देश की डगमगाती अर्थव्यवस्था को पटरी में लाने के लिए खुली और उदारवादी अर्थव्यवस्था को एक मात्र विकल्प बताती थीं। उनका मानना था- ‘The economic crisis has nothing to do with capitalism. It is the result of socialism. And there is no alternative to returning to free enterprise’ (आर्थिक संकट का पूंजीवाद से कोई लेना-देना नहीं है। यह समाजवाद का परिणाम है और मुक्त बाजार अर्थव्यवस्था के अलावा कोई विकल्प नहीं है।) यहीं से एक नए राजनीतिक सिद्धांत ने जन्म लिया ‘TINA FACTOR [ There is No Alternative]’ वर्तमान समय में प्रधानमंत्री मोदी भारतीय राजनीति में ‘टीना फैक्टर’ बनकर उभरे हैं। वे और उनके नेतृत्व वाली भारतीय जनता पार्टी यह स्थापित करने में सफल रही है कि उनके नेतृत्व के अलावा कोई विकल्प देश के समक्ष मौजूद नहीं है। मोदी से पहले इंदिरा गांधी के उत्कर्ष काल में भी कुछ ऐसा ही भ्रम फैलाया गया था। तब ‘इंदिरा ही भारत है और भारत ही इंदिरा है’ जैसे नारों के जरिए कांग्रेस यह धारणा स्थापित कर पाने में सफल रही थी कि बगैर इंदिरा देश अस्थिर हो जाएगा। विपक्ष तब बेहद कमजोर हो गया था और इंदिरा गांधी पूरी तरह निरंकुश।
लोकतांत्रिक मूल्यों का क्षरण, संविधान की धज्जियां उड़ना और ‘गरीबी हटाओ’ जैसे लोक-लुभावने नारों का इस मुल्क की गलियों में वशीकरण मंत्र सरीखा प्रभाव उस दौर की विशेषता रही थी। 2014 के बाद एक बार फिर से कुछ ऐसा ही होते हर वह भारतीय देख पा रहा है जो चैतन्य है, जिसकी आस्था संविधान के प्रति अक्षुण्ण है और जो यह समझता है कि विकल्प लोकतंत्र की आत्मा है, विकल्प नहीं है तो निश्चित ही लोकतंत्र का मूल भाव कमजोर होगा, एकाधिकारवादी प्रवृत्तियों का विस्तार होगा और अंततः लोकतंत्र के स्थान पर तानाशाही का वर्चस्व स्थापित हो जाएगा। ‘टीना फैक्टर’ का स्मरण और उसके सम्भावित खतरों की आशंका बीते दिनों संसद में पारित वक्फ बिल के चलते मुझे गहराती नजर आ रही है। इसे मैं नरेंद्र मोदी का रणनीतिक कौशल मानता हूं कि वे बीते दस सालों से विपक्ष को उबरने-उभरने का मौका नहीं दे रहे हैं। वह भी ऐसे हालातों में जब बेरोजगारी, महंगाई, भ्रष्टाचार इत्यादि आमजन मानस को प्रभावित करने वाली कई ऐसी समस्याएं हैं, कई मुद्दे हैं, जिनका समाधान तलाश पाने में मोदी पूरी तरह विफल रहे हैं। बावजूद इस सबके, आमजन उनके प्रभामंडल से, उनके मोह से, सम्मोहन से बाहर निकल नहीं पा रहा है और विपक्ष इन विसंगतियों का लाभ उठाने में सर्वथा विफल रहता स्पष्ट नजर आ रहा है। 2024 के आम चुनाव में विपक्षी दलों ने 2019 की बनिस्पत बेहतर प्रदर्शन कर भाजपा को बहुमत से दूर कर दिया था। मोदी तीसरी बार प्रधानमंत्री बन पाने में सफल जरूर रहे थे लेकिन जदयू और तेलगुदेशम की बैसाखियों सहारे। यह उनका सबसे कमजोर दौर था। वे इस दौरान कमजोर प्रतीत भी होने लगे थे लेकिन वक्फ बिल के लोकसभा और राज्यसभा से पारित होने के बाद वे एक बार फिर से सर्व शक्तिशाली बन उभर गए हैं। 2024 के चुनाव नतीजों बाद विपक्षी दलों के बढ़ते आत्मविश्वास को याद कीजिए और उस दौरान नीतीश कुमार और चंद्रबाबू नायडू के चेहरे की चमक को भी याद कीजिए। मोदी लेकिन सब पर भारी पड़े हैं। नीतीश और नायडू को साध पाने में वे सफल ही नहीं रहे, बल्कि वक्फ जैसे संवेदनशील मुद्दे पर भी उन्होंने इन दोनों नेताओं को एनडीए से छिटकने नहीं दिया। उनकी रणनीति को, उनके कौशल को समझने का प्रयास करिए। बीते ग्यारह सालों के दौरान किसी भी महत्वपूर्ण अथवा विवादास्पद विधेयक पर हमारी संसद में व्यापक चर्चा नहीं हुई। सत्तारूढ़ दल अपनी संख्या बल के दम पर बगैर व्यापक चर्चा कराए ही अनुच्छेद 370 को समाप्त करना, ट्रिपल तलाक को अपराध बनाना, 2020 में तीन कृषि कानूनों सम्बंधी विधेयक, जम्मू-कश्मीर का पुनर्गठन करने सम्बंधी विधेयक, नागरिकता संशोधन अधिनियम, दिल्ली राष्ट्रीय राजधानी शासन (संशोधन) अधिनियम, टेली कम्युनिकेशन बिल इत्यादि संसद से पारित करा दिए गए।
विपक्षी दल इनमें से कई बिलों पर व्यापक चर्चा की मांग करते रहे, सदनों से कई बार बर्हिगमन किया गया, संयुक्त सदस्यीय समिति बनाने की मांग भी विपक्ष ने की लेकिन सरकार ने नहीं मानी। वक्फ संशोधन विधेयक पर लेकिन सरकार ने सदन में व्यापक चर्चा कराई। ऐसे विधेयक पर जो खासा विवादित और नीतीश-नायडू के कोर वोट बैंक को प्रभावित करने की क्षमता रखता हो, केंद्र सरकार का व्यापक बहस के लिए तैयार होना और एनडीए के घटक दलों द्वारा पूरे दमखम के साथ सरकार के साथ रहना नरेंद्र मोदी की राजनीतिक सूझबूझ, रणनीतिक कौशल और उनके ‘टीना फैक्टर’ बन उभरने का सबसे सशक्त प्रमाण है। ऐसा तब जबकि वक्फ विधेयक शुद्ध रूप से राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ और भाजपा के प्रोजेक्ट हिंदुत्व को आगे बढ़ाने की नीयत से लाया गया विधेयक है। यहां यह स्वीकारना और समझना जरूरी है कि वक्फ सम्पत्तियों पर निश्चित तौर पर एक माफिया मंत्र का कब्जा लम्बे अर्से से काबिज रहता आया है और अल्लाह के नाम पर दान की गई इन सम्पत्तियों को जमकर खुर्द-बुर्द मस्लिम समाज के रहनुमाओं द्वारा किया जाता रहा है। यह भी सच है कि वक्फ कानून में कई विसंगतियां रही हैं जिनकी आड़ में भू-माफिया गैर वक्फ यहां तक कि हिंदू अथवा अन्य धर्म के उपासकों की सम्पत्ति को हड़पने का प्रयास करते रहते हैं। लेकिन ऐसा केवल वक्फ की सम्पत्तियों के साथ ही नहीं है। हिंदू मठों की सम्पत्तियों में भी भारी भ्रष्टाचार और कुप्रबंधन है। चर्च की सम्पदा को भी जमकर खुर्द-बुर्द किया जाता है। सरकार की मंशा यदि साफ और किसी धर्म विशेष को टारगेट करने की नहीं होती तो सभी धार्मिक संस्थानों की सम्पत्तियों बाबत व्यापक सुधार, कानून में संशोधन लाया जाता। बहरहाल इस विधेयक पर सदन में व्यापक चर्चा कराए जाने के पीछे सरकार का इरादा स्पष्ट था। वह एक हाथ अपने हिंदुत्ववादी एजेंडे को साधना चाहती थी, विपक्ष को मुस्लिम परस्त दिखाना चाहती थी तो दूसरी तरफ उसका एक उद्देश्य यह भी प्रमाणित करना था कि नरेंद्र मोदी का कोई विकल्प न है, न ही होने की सम्भावना है। अपने दोनों ही लक्ष्य पाने में वह सफल रही और विपक्षी गठबंधन एक बार फिर से मोदी-शाह की कुशल रणनीति के आगे परास्त हो गया। इस विधेयक ने एक काम और किया है। तात्कालिक तौर पर ही सही, भाजपा इसके सहारे उन असल मुद्दों से आमजन का ध्यान हटाने में सफल रही जिन पर वह बात करना ही नहीं चाहती। भाजपा बेरोजगारी पर, लड़खड़ाती अर्थव्यवस्था पर, भ्रष्टाचार पर, हर उस मुद्दे पर जिनका हल तलाश पाने में वह पूरी तरह विफल रही है, बात नहीं करना चाहती। वह ऐसे मुद्दों को हवा देती है जो भावनात्मक हैं, भले ही छद्म हैं लेकिन जिनको हवा देने से आमजन का ध्यान बुनियादी मुद्दों से भटक जाता है। विपक्ष भी बार-बार भाजपा की इस कूटनीति के जाल में फंस रहा है। ‘इंडिया गठबंधन’ बिखराव की राह पर है। ऐसे में मोदी ‘टीना फैक्टर’ बन उभर चुके हैं। लोकतंत्र की आत्मा है विकल्प। जब किसी देश की जनता यह मानने लगती है कि सत्ता में बैठे व्यक्ति या दल के अतिरिक्त कोई विकल्प नहीं है, तो यह स्थिति केवल एक राजनीतिक प्रवृत्ति नहीं, बल्कि एक गम्भीर लोकतांत्रिक संकट का संकेत होती है। यह विचार जितना सतही रूप से एक नेतृत्व की मजबूती का प्रतीक लगता है, उतना ही गहराई से यह लोकतंत्र की विविधता, बहस और विकल्प की भावना को कुंद करता है।
स्मरण रहे उच्चतम न्यायालय के चार न्यायाधीशों ने 12 जनवरी, 2018 के दिन एक अभूतपूर्व और अप्रत्याशित कदम उठाते हुए दिल्ली में एक प्रेस कॉन्फ्रेंस का आयोजन कर यह आशंका व्यक्त कर डाली थी कि ‘लोकतंत्र खतरे में है।’ यह कोई मामूली घटना नहीं थी। देश के सबसे शक्तिशाली चार न्यायाधीशों का बजरिए मीडिया देश को सम्बोधित करना दरअसल, उस खतरे को भांप लेना था जिसका विस्तार 2018 की बनिस्पत आज कहीं ज्यादा हो चला है। इस तानाशाही मनोवृत्ति के विस्तार से कहीं ज्यादा घातक है इस प्रवृत्ति का विरोध न होना। तमाम विसंगतियों के बावजूद आमजन चेत नहीं रहा है। उसकी चैतन्यता, धर्म के नाम पर कब्जा कर लिया गया है और वह मान बैठा है कि हिंदुत्व का झंडा बुलंद करने वाले नरेंद्र मोदी ही एकमात्र ऐसे नेता हैं जिनके हाथों में देश सुरक्षित है।
‘टीना फैक्टर’ उस मनोवैज्ञानिक स्थिति का नाम है जिसमें आम जन, मीडिया और संस्थान यह मान बैठते हैं कि वर्तमान नेतृत्व के अतिरिक्त कोई सक्षम विकल्प नहीं है। यह धारणा धीरे-धीरे आलोचना को हतोत्साहित करती है, विपक्ष को महत्वहीन बनाती है और सत्ता के केंद्रीकरण को नैतिक वैधता दे देती है।
यह लोकतंत्र के लिए शुभ संकेत नहीं है। इसका सीधा प्रभाव एकाधिकारवादी प्रवृत्तियों के उभरने और लोकतंत्र के स्थान पर तानाशाही की स्थापना के संकट से जुड़ता है। यह लोकतंत्र के उस मौलिक विचार को खारिज करता है जिसमें जनता के पास अपनी सरकार को चुनने अथवा बदलने का अधिकार होता है। विकल्पहीनता के चलते यह लोकतंत्रात्मक एकतंत्र की राह पकड़ लेता है। लोकतंत्र की खूबसूरती और उसकी शक्ति इसी में है कि आज का सर्वमान्य नेता कल जनता द्वारा अस्वीकार्य किया जा सकता है। यदि कोई भी समाज यह मान ले कि अब उसके पास विकल्प बचा नहीं है तो न केवल लोकतंत्र खतरे में पड़ जाएगा, बल्कि आज नहीं तो कल तानाशाही को स्थापित करने का कारक बन बैठेगा।

