‘तुम्हारी फाइलों में गांव का मौसम गुलाबी है, मगर ये आंकड़े झूठे, ये दावा किताबी है’ -शायर अदब गोंडवी की ये पंक्तियां रामनगर विधानसभा की सड़कों पर हूबहू उतर रही हैं। प्रदेश सरकार के ‘गड्ढा मुक्त उत्तराखण्ड’ के दावे यहां धूल, गड्ढों और उखड़ी डामर के नीचे दम तोड़ रहे हैं। पर्यटन नगरी की सड़कें खुद पर्यटकों, श्रद्धालुओं, व्यापारियों और मरीजों के लिए सजा बन गई हैं। काॅर्बेट नेशनल पार्क की वजह से देश-दुनिया के नक्शे पर चमकने वाले रामनगर की अंदरूनी सड़कों की हालत देखकर कोई भी मेहमान पहली नजर में ही व्यवस्था पर सवाल उठा देता है।
छोई से हनुमान धाम और दर्जनों रिजाॅट्र्स को जोड़ने वाला महज 700 मीटर का रास्ता पिछले कई सालों से गड्ढों का पर्याय बना हुआ है। काॅर्बेट और हनुमान धाम दर्शन को देश-विदेश से आने वाले सैलानी इस मार्ग पर हिचकोले खाने को मजबूर हैं। सुबह-सुबह जंगल सफारी को निकले पर्यटकों की गाड़ियां जब इन गड्ढों में फंसती हैं तो उनकी यात्रा की शुरुआत ही खराब हो जाती है। रिजाॅट्र्स, होटलों और गेस्ट हाउस का हब कहे जाने वाले छोई की पहचान अब ‘टूटी सड़क वाले इलाके’ के रूप में बन रही है। स्थानीय रिजाॅट्र्स स्वामी बताते हैं कि कई बार ऑनलाइन बुकिंग कैंसिल हो जाती है क्योंकि पर्यटक गूगल रिव्यू में खराब सड़क का जिक्र कर देते हैं। बड़े-बड़े गड्ढे, उखड़ी डामर उड़ती धूल से श्रद्धालु, पर्यटक और जिप्सी चालक सब त्रस्त हैं। उनका कहना है कि एक सीजन में शाॅकर, टायर और सस्पेंशन बदलवाने में अतिरिक्त खर्च आ रहा है। ऑटो चालकों ने बताया कि धूल से सांस के मरीज बढ़ रहे हैं और गाड़ियों के फिल्टर हर हफ्ते साफ कराने पड़ते हैं।
स्थानीय जनप्रतिनिधियों के दबाव पर लोक निर्माण विभाग ने करीब छह माह पहले मिट्टी-कंकरीट से पैबंद जरूर लगाए लेकिन बारिश और भारी वाहनों के दबाव से वह अस्थायी मरम्मत पूरी तरह ध्वस्त हो गई। अब सड़क पहले से ज्यादा खतरनाक हो गई है क्योंकि पैबंद के उखड़ने से नुकीले पत्थर बाहर निकल आए हैं। दोपहिया वाहन चालकों के फिसलने की घटनाएं रोज हो रही हैं। स्कूली बच्चे भी इसी मार्ग से गुजरते हैं और अभिभावक हर दिन डर के साए में रहते हैं।
अप्रैल 2026 में हनुमान जयंती पर मुख्यमंत्री के दौरे की सूचना मिलते ही विभाग की नींद टूटी। रात को छोई चौराहे से हनुमान धाम मार्ग पर अचानक हलचल बढ़ गई। रात में जेसीबी लगाकर गड्ढों में मिट्टी-रोड़ी भर दी गई। ऐसा लगता है कि उन्हें सख्त हिदायत दी गई होगी कि सुबह वीआईपी मूवमेंट से पहले काम दिखना चाहिए। बिना रोलर, बिना डामर के इस खानापूर्ति का आलम ये रहा कि सुबह डाली गई मिट्टी शाम तक वाहनों के दबाव से उखड़ गई। शाम को मंदिर से लौट रहे श्रद्धालुओं की कारें फिर से उन्हीं गड्ढों में हिचकोले खाती दिखीं। स्थानीय व्यक्ति राहुल सिंह धर्मवाल का आरोप है कि हर बार वीआईपी मूवमेंट पर ही सड़कों की याद आती है। जनता के टैक्स का पैसा हर साल ऐसे अस्थायी कामों में बहा दिया जाता है। बारिश न होने के बावजूद पैचवर्क उखड़ गया और गड्ढे फिर मुंह बाए खड़े हैं।
क्षेत्रवासी और होटल कारोबारी आरोप लगा रहे हैं कि विभाग स्थायी समाधान की जगह हर बार अस्थायी काम से सरकारी बजट ठिकाने लगा रहा है। इस 700 मीटर सड़क के पुनर्निर्माण के लिए कोई कुछ प्रयास करने को तैयार नहीं है। सवाल ये है कि जिस क्षेत्र से सरकार को पर्यटन के नाम पर हर साल करोड़ों का राजस्व मिलता है, उसकी सड़क प्राथमिकता में क्यों नहीं?
यही हाल ‘पर्यटन गांव’ क्यारी का भी है। बेलगढ़ से क्यारी जाने वाली करीब 4.5 किलोमीटर की सड़क लोक निर्माण विभाग (लोनिवि) की कार्यशैली की पोल खोल रही है। 2012 में प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना के तहत बनी यह सड़क 2019 में लोनिवि को हस्तांतरित हुई। विभाग ने 1.3 करोड़ का बजट देकर ठेकेदार से 2023 में दोबारा बनवाई लेकिन अक्टूबर 2024 में पहली बारिश में ही सड़क उखड़ने लगी। डेढ़ साल में ही पूरी सड़क जानलेवा गड्ढों में बदल चुकी है। स्थानीय लोग बताते है कि बरसात में हालात ऐसे हो जाते हैं कि बाइक तो दूर, पैदल चलना भी मुश्किल है। ग्रामीणों का कहना है कि इस मार्ग से मरीज को अस्पताल ले जाना जान जोखिम में डालना है। पिछले महीने एक गर्भवती महिला को रामनगर ले जाते समय एम्बुलेंस गड्ढे में ऐसी उछली कि रास्ते में ही प्रसव हो गया। एम्बुलेंस चालक कहते हैं कि झटकों से मरीज की हालत और बिगड़ जाती है।
वर्ष 1998 से पर्यटन गतिविधियों का केंद्र रहे क्यारी गांव की आबादी करीब 1000 है और यहां 20 से 25 रिसाॅर्ट चल रहे हैं। होम-स्टे कल्चर के कारण लगभग हर तीसरे घर में पर्यटक रुकते हैं। गांव में 7 नए रिजॉर्ट निर्माणाधीन हैं। टूटी सड़क सरकार के ‘पर्यटन बढ़ाओ, रोजगार बढ़ाओ’ अभियान को मुंह चिढ़ा रही है। रिजाॅर्ट संचालकों का कहना है कि विदेशी पर्यटक सबसे ज्यादा शिकायत करते हैं। वे कहते हैं ‘योर रोड्स आर वेरी बैड’। हैरानी की बात है कि रामनगर से क्यारी होकर ढिकुली जाने वाले कई अधिकारी और जनप्रतिनिधि भी रोज इसी मार्ग से गुजरते हैं। वन विभाग की रेंजर पोस्ट भी इसी रास्ते पर है, फिर भी मरम्मत नहीं हुई।
स्थानीय लोग इसे ठेकेदार की घटिया गुणवत्ता और विभागीय मिलीभगत का नतीजा बता रहे हैं। तकनीकी विशेषज्ञों का कहना है कि सड़क में जीएसबी और डब्ल्यूबीएम की परत मानक के अनुरूप नहीं डाली गई। थिकनेस कम रखी गई और रोलिंग भी ठीक से नहीं हुई। डेढ़ साल में सड़क उखड़ना निगरानी तंत्र पर बड़ा सवाल है। ग्रामीणों ने चेतावनी दी है कि जल्द सुधार नहीं हुआ तो 2027 के चुनाव में सरकार को जनता की नाराजगी झेलनी पड़ेगी। रामनगर विधानसभा के ग्रामीण इलाकों पाटकोट, चुकुम, मालधनचैड़, आमपोखरा में भी सड़कों की हालत खराब है।
लोक निर्माण विभाग से सीधे सवाल
डेढ़ साल में सड़क उखड़ जाए तो ठेकेदार को ब्लैकलिस्ट क्यों नहीं किया गया? डिफेक्ट लायबिलिटी पीरियड में मरम्मत ठेकेदार से क्यों नहीं कराई गई? हर साल पैचवर्क के नाम पर लाखों बहाने के बाद भी सड़क वैसी की वैसी क्यों? सीएम दौरे पर रातोंरात लीपापोती हो सकती है तो जनता के लिए 700 मीटर सड़क स्थायी क्यों नहीं बन सकती? अब सबकी नजर धामी सरकार पर है कि वह लोनिवि की मनमानी, ठेकेदारों की लूट और भ्रष्टाचार पर कब लगाम लगाती है। फिलहाल रामनगर की सड़कें सरकार के दावों की पोल खोल रही हैं और गड्ढों में विकास की रफ्तार धंस चुकी है। यदि पर्यटन नगरी की सड़कें ही पर्यटकों को मुंह चिढ़ाएंगी तो ‘गड्ढा मुक्त उत्तराखण्ड’ का सपना फाइलों में ही दफन हो जाएगा।