बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार घोषित तौर पर देश के सबसे बडे़ ‘पल्टूमार’ नेता का दर्जा पा चुके हैं। खुद को समाजवादी बताने वाले नीतीश बाबू सत्ता में बने रहने के लिए कभी खांटी धर्मनिरपेक्ष नेता बन जाते हैं तो कभी घोर दक्षिणपंथी भाजपा के बगलगीर। उनकी यह कार्यशैली लेकिन अब जदयू भीतर उनके नेतृत्व के खिलाफ माहौल तेज करने लगी है। सूत्रों की मानें तो जदयू इस समय दो खेमों में बंट चुकी है। एक खेमा उन नेताओं का है जो हर कीमत पर भाजपा के साथ चिपके रहना चाहते हैं तो दूसरा खेमा उन नेताओं का है जो पार्टी और स्वयं की विचारधारा से समझौता नहीं करना चाहते। नीतीश के पुराने सहयोगी केसी त्यागी ने लेटरल इंट्री, समान नागरिक संहिता और इजरायल-फिलिस्तीन मुद्दे पर भारतीय विदेश नीति से असहज हो जदयू के मुख्य प्रवक्ता पद से इस्तीफा दे दिया है। खबर लेकिन यह भी है कि त्यागी को यह पद छोड़ने का संकेत सीधे नीतीश बाबू से आया था। जानकारों की मानें तो नीतीश कुमार त्यागी के कुछ बयानों से सहमत नहीं थे इसलिए उन्हें मुख्य प्रवक्ता के पद छोड़ने को कहा गया। खबर यह भी गर्म है कि पार्टी कोटे से केंद्र में मंत्री ललन सिंह का तेजी से भाजपामय होना कई वरिष्ठ नेताओं को खल रहा है। ऐसे नेताओं में नीतीश सरकार में शामिल मंत्री विजय कुमार चौधरी सबसे आगे हैं। ललन सिंह द्वारा वक्फ सम्पत्ति कानून में संशोधन को सही ठहराना चौधरी के गले नहीं उतरा है। चर्चा जोरों पर है कि अगले वर्ष राज्य विधानसभा चुनाव से पहले या तो जदयू में बड़ी टूट होगी या फिर कई बड़े नेता राजद में शामिल हो जाएंगे।
टूट की कगार पर जदयू

