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डीएमके ने बढ़ाई विपक्ष की चिंता

लोकसभा चुनाव 2024 के बाद विपक्षी ‘इंडिया’ अलायंस को लेकर जिस एकजुटता की तस्वीर पेश की गई थी अब उसमें दरारें दिखाई देने लगी हैं। तमिलनाडु की प्रमुख क्षेत्रीय पार्टी द्रविड़ मुनेत्र कड़गम के हालिया रुख ने विपक्षी खेमे की चिंताओं को बढ़ा दिया है। पार्टी प्रवक्ता टीकेएस एलंगोवन ने घोषणा की है कि डीएमके इंडिया ब्लाॅक का हिस्सा नहीं रहेगी। डीएमके के इस फैसले के पीछे कांग्रेस का वह कदम माना जा रहा है जिसने तमिलनाडु की राजनीति के समीकरण बदल दिए हैं। लम्बे समय तक डीएमके की सहयोगी रही कांग्रेस ने विधानसभा चुनाव के बाद पार्टी से दूरी बनाते हुए सी. जोसेफ विजय के नेतृत्व वाली टीवीके सरकार को समर्थन देने का फैसला किया। यही निर्णय अब दोनों दलों के बीच टकराव की मुख्य वजह बन गया है।

डीएमके ने अपने आधिकारिक बयान में कांग्रेस पर ‘धोखा’ देने का आरोप लगाया है। पार्टी का कहना है कि चुनाव के बाद कांग्रेस ने सत्ता में हिस्सेदारी के लिए अपने पुराने सहयोगी का साथ छोड़ दिया। डीएमके नेतृत्व का दावा है कि इस कदम से पार्टी कार्यकर्ताओं में भारी नाराजगी है और उनकी भावनाओं का सम्मान करते हुए पार्टी ने गठबंधन से दूरी बनाने का निर्णय लिया है। इस राजनीतिक विवाद का असर अब संसद में भी दिखाई देने लगा है। मीडिया रिपोर्टों के अनुसार डीएमके सांसदों ने लोकसभा में कांग्रेस सांसदों से अलग बैठने की मांग की है। डीएमके सांसद कनिमोझी करुणानिधि ने लोकसभा अध्यक्ष को पत्र लिखकर सीटिंग व्यवस्था में बदलाव का अनुरोध किया है। यह घटनाक्रम दोनों दलों के बीच बढ़ती राजनीतिक दूरी का स्पष्ट संकेत माना जा रहा है। सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या यह केवल तमिलनाडु तक सीमित राजनीतिक विवाद है या फिर ‘इंडिया’ गठबंधन के भविष्य में बड़े बदलावों की शुरुआत।

राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि तमिलनाडु विधानसभा चुनाव के नतीजों ने भी इस बदलाव की पृष्ठभूमि तैयार की। चुनाव में टीवीके 108 सीटों के साथ सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी। सरकार गठन के लिए उसे कांग्रेस, वीसीके, आईयूएमएल, सीपीआई और सीपीएम का समर्थन मिला। कांग्रेस को सरकार में शामिल होने के बदले दो कैबिनेट मंत्री पद भी मिले, जबकि अन्य सहयोगी दलों को भी सत्ता में हिस्सेदारी दी गई।

ओर कर्नाटक की मेकेदातु बांध परियोजना को लेकर भी कांग्रेस और डीएमके के बीच उभरे मतभेदों ने गठबंधन की आंतरिक चुनौतियों को और उजागर कर दिया है। यह परियोजना लम्बे समय से कर्नाटक और तमिलनाडु के बीच विवाद का विषय रही है। कर्नाटक सरकार इसे विकास और पेयजल जरूरतों के लिए जरूरी बता रही है जबकि तमिलनाडु को आशंका है कि इससे उसके हिस्से के कावेरी जल पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ेगा। कर्नाटक के मुख्यमंत्री डी.के. शिवकुमार द्वारा परियोजना के समर्थन के बाद डीएमके ने स्पष्ट कर दिया है कि वह तमिलनाडु के जल हितों से किसी भी कीमत पर समझौता नहीं करेगी। एक ओर कांग्रेस कर्नाटक में इस परियोजना का समर्थन कर रही है वहीं दूसरी तरफ डीएमके इसका विरोध कर रही है। इससे कांग्रेस के सामने
राजनीतिक संतुलन बनाए रखने की चुनौती खड़ी हो गई है।

यह विवाद केवल जल बंटवारे या तमिलनाडु की राजनीति तक सीमित नहीं है बल्कि इंडिया गठबंधन के भीतर मौजूद वैचारिक और क्षेत्रीय अंतर्विरोधों को भी सामने लाता है। क्षेत्रीय दल अपने-अपने राज्यों के हितों को प्राथमिकता देते हैं जबकि राष्ट्रीय दल व्यापक राजनीतिक समीकरणों को साधने की कोशिश करते हैं। ऐसे में मतभेदों का बढ़ना स्वाभाविक है। हालांकि डीएमके ने संकेत दिया है कि संसद में जनहित के मुद्दों पर वह विपक्षी दलों का समर्थन करती रहेगी लेकिन कांग्रेस के साथ उसके सम्बंधों में आई खटास ने विपक्षी गठबंधन की एकजुटता पर गम्भीर सवाल खड़े कर दिए हैं। ऐसे समय में जब विपक्ष भाजपा के खिलाफ साझा रणनीति बनाने की कोशिश कर रहा है, डीएमके और कांग्रेस के बीच बढ़ता टकराव विपक्षी एकता के लिए बड़ी चुनौती साबित हो सकता है।

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