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लोकतंत्र, मीडिया और दमन चक्र अदालत की फटकार और जांच एजेंसियों पर गहराते सवाल

दिल्ली उच्च न्यायालय ने न्यूज पोर्टल ‘न्यूजक्लिक’ और उसके संस्थापक प्रबीर पुरकायस्थ के खिलाफ दर्ज आर्थिक अपराध शाखा (ईओडब्ल्यू) की एफआईआर तथा उसके आधार पर प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) द्वारा दर्ज मामले को रद्द करते हुए इसे ‘कानून की प्रक्रिया का घोर दुरुपयोग’ करार दिया है। अदालत ने कहा कि आरोपों को पूरी तरह सच मान लेने पर भी धोखाधड़ी और आपराधिक विश्वासघात जैसे अपराध नहीं बनते। यह फैसला केवल एक मीडिया संस्थान को राहत देने वाला निर्णय नहीं है बल्कि इसने एक बार फिर उस बहस को केंद्र में ला दिया है कि क्या जांच एजेंसियों का इस्तेमाल राजनीतिक और वैचारिक असहमति को नियंत्रित करने के लिए किया जा रहा है

‘न्यूजक्लिक’ एक डिजिटल समाचार मंच है जिसकी स्थापना पत्रकार प्रबीर पुरकायस्थ ने की थी। यह पोर्टल लम्बे समय से श्रमिक आंदोलनों, किसान आंदोलन, विश्वविद्यालयों, नागरिक अधिकारों, अल्पसंख्यक मुद्दों और सरकार की नीतियों पर आलोचनात्मक रिपोर्टिंग के लिए जाना जाता रहा है। विशेष रूप से 2020-21 के किसान आंदोलन के दौरान ‘न्यूजक्लिक’ ने आंदोलनकारी किसानों के पक्ष और उनकी मांगों को व्यापक कवरेज दिया था। सरकार समर्थक हलकों में लम्बे समय से यह आरोप लगाया जाता रहा कि ‘न्यूजक्लिक’ की रिपोर्टिंग एकतरफा है और वह सरकार विरोधी राजनीतिक विमर्श को बढ़ावा देता है। दूसरी ओर पत्रकार संगठनों और प्रेस स्वतंत्रता के समर्थकों का कहना था कि सरकार को समस्या किसी वित्तीय अनियमितता से अधिक उसकी आलोचनात्मक पत्रकारिता से थी। 2021 में आयकर विभाग ने ‘न्यूजक्लिक’ के कार्यालयों पर छापे मारे। इसके बाद आर्थिक अपराध शाखा (ईओडब्ल्यू) ने विदेशी निवेश और फंडिंग को लेकर मामला दर्ज किया। इसी एफआईआर के आधार पर प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) ने धनशोधन का मामला शुरू किया। बाद के वर्षों में दिल्ली पुलिस की स्पेशल सेल ने भी अलग से यूएपीए के तहत कार्रवाई की जिसमें चीन से कथित सम्बंधों और विदेशी फंडिंग के आरोप लगाए गए। इन कार्रवाइयों ने ‘न्यूजक्लिक’ को राष्ट्रीय बहस के केंद्र में ला दिया।
अदालत ने क्या कहा?

दिल्ली उच्च न्यायालय ने आर्थिक अपराध शाखा (ईओडब्ल्यू) की एफआईआर को रद्द करते हुए कहा कि शिकायत में जिन तथ्यों का उल्लेख किया गया है वे भारतीय दंड संहिता की उन धाराओं के अनुसार नहीं हैं जिनके तहत मामला दर्ज किया गया था। अदालत ने कहा कि यदि शिकायत में वर्णित सभी आरोपों को सही भी मान लिया जाए तब भी धोखाधड़ी और आपराधिक विश्वासघात का मामला नहीं बनता। न्यायालय ने यह भी माना कि जिस एफआईआर पर ईडी की पूरी कार्रवाई आधारित थी उसके निरस्त हो जाने के बाद धनशोधन का मामला भी स्वतः समाप्त हो जाता है। अपने निर्णय में अदालत ने यह टिप्पणी भी की कि मुकदमे को जारी रखना कानून की प्रक्रिया का घोर दुरुपयोग होगा।
सरकार और ‘न्यूजक्लिक’ के बीच टकराव की पृष्ठभूमि
‘न्यूजक्लिक’ के खिलाफ कार्रवाई को समझने के लिए उसकी संपादकीय भूमिका को भी देखना आवश्यक है। पिछले एक दशक में ‘न्यूजक्लिक’ उन चुनिंदा मीडिया संस्थानों में रहा जिसने नोटबंदी, जीएसटी, कृषि कानूनों, नागरिकता संशोधन कानून (सीएए), विश्वविद्यालयों में सरकारी हस्तक्षेप, बेरोजगारी, निजीकरण और कॉरपोरेट -सरकार सम्बंधों जैसे मुद्दों पर लगातार आलोचनात्मक सामग्री प्रकाशित की। किसान आंदोलन के दौरान उसका कवरेज विशेष रूप से सरकार समर्थक वर्ग के निशाने पर रहा। सरकार के आलोचकों का तर्क है कि ‘न्यूजक्लिक’ के खिलाफ कार्रवाई उसी व्यापक प्रवृत्ति का हिस्सा थी जिसके तहत आलोचनात्मक पत्रकारिता करने वाले संस्थानों को वित्तीय और कानूनी दबाव में लाने की कोशिश की गई। हालांकि सरकार का आधिकारिक रुख हमेशा यही रहा कि कार्रवाई का सम्बंध केवल वित्तीय अनियमितताओं और विदेशी फंडिंग से था, पत्रकारिता की सामग्री से नहीं। क्या यह पहला मामला है जिसमें अदालत ने एजेंसियों की कार्रवाई पर सवाल उठाए हैं?
‘न्यूजक्लिक’ का मामला कोई अपवाद नहीं है। पिछले कुछ वर्षों में कई ऐसे मामले सामने आए हैं जिनमें अदालतों ने जांच एजेंसियों की कार्रवाई पर गम्भीर टिप्पणियां कीं या मामलों को खारिज कर दिया।
सर्वोच्च न्यायालय ने 2024 में प्रबीर पुरकायस्थ की गिरफ्तारी को अवैध ठहराते हुए कहा था कि गिरफ्तारी के आधारों की उचित जानकारी नहीं दी गई थी। इस फैसले ने व्यक्तिगत स्वतंत्रता और प्रक्रिया सम्बंधी अधिकारों को लेकर महत्वपूर्ण प्रश्न उठाए। इसी प्रकार ‘नेशनल हेराल्ड’ मामले में भी अदालत ने जांच प्रक्रिया पर कई कानूनी प्रश्न उठाए। विपक्ष लम्बे समय से इस मामले को गांधी परिवार के खिलाफ राजनीतिक प्रतिशोध का उदाहरण बताता रहा है जबकि सरकार इसे वित्तीय अनियमितताओं की जांच मानती है।
अन्य विवादित मामले जिनमें अदालतों ने जांच एजेंसियों पर सवाल उठाए
‘न्यूजक्लिक’ प्रकरण अकेला ऐसा मामला नहीं है जिसमें अदालत ने जांच एजेंसियों की कार्यप्रणाली पर गम्भीर टिप्पणियां की हों। पिछले कुछ वर्षों में कई हाई-प्रोफाइल मामलों में न्यायपालिका ने या तो जांच प्रक्रिया पर सवाल उठाए हैं या एजेंसियों की कार्रवाई को कानूनी कसौटी पर कमजोर पाया है। सबसे चर्चित मामला ‘दिल्ली आबकारी नीति’ (एक्साइज पाॅलिसी) से जुड़ा है जिसमें प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) और सीबीआई ने आम आदमी पार्टी के कई नेताओं को आरोपी बनाया। पूर्व मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल की गिरफ्तारी के बाद विपक्ष ने आरोप लगाया था कि यह कार्रवाई लोकसभा चुनाव से ठीक पहले राजनीतिक लाभ के उद्देश्य से की गई है। सर्वोच्च न्यायालय ने केजरीवाल को राहत देते हुए व्यक्तिगत स्वतंत्रता के महत्व पर बल दिया था। बाद में एक अदालत ने भ्रष्टाचार के एक प्रमुख मामले को अपर्याप्त आधार बताते हुए खारिज भी कर दिया, जिसे आम आदमी पार्टी ने अपनी राजनीतिक बेगुनाही का प्रमाण बताया।
इसी प्रकार ‘भीमा कोरेगांव’ मामले में गिरफ्तार किए गए कई सामाजिक कार्यकर्ताओं और बुद्धिजीवियों को लेकर भी जांच एजेंसियों की भूमिका विवादों में रही। वर्षों तक जेल में रहने के बाद कई आरोपियों को उच्च न्यायालयों और सर्वोच्च न्यायालय से जमानत मिली तथा अदालतों ने जांच और गिरफ्तारी की प्रक्रिया से जुड़े अनेक प्रश्न उठाए। मानवाधिकार संगठनों ने इसे असहमति की आवाजों को दबाने का मामला बताया जबकि सरकार ने इसे राष्ट्रीय सुरक्षा का प्रश्न कहा।
नागरिक अधिकार कार्यकर्ता तीस्ता सीतलवाड़ के मामले में भी सर्वोच्च न्यायालय ने उनकी गिरफ्तारी और जांच प्रक्रिया को लेकर महत्वपूर्ण टिप्पणियां की थीं। अदालत ने उन्हें राहत देते हुए यह संकेत दिया था कि जांच एजेंसियों की शक्तियों का प्रयोग संवैधानिक मर्यादाओं के भीतर होना चाहिए। इसके अलावा अनेक राज्यों में विपक्षी नेताओं पर ईडी और सीबीआई की कार्रवाई को लेकर भी अदालतों ने समय-समय पर सवाल उठाए हैं। कई मामलों में वर्षों तक चली जांच के बावजूद आरोप सिद्ध नहीं हो सके जबकि कुछ मामलों में अदालतों ने एजेंसियों को प्रक्रिया सम्बंधी खामियों के लिए फटकार लगाई। यही कारण है कि विपक्ष बार- बार आरोप लगाता रहा है कि जांच एजेंसियां राजनीतिक प्रतिशोध का टूल बनती जा रही हैं जबकि सरकार इन आरोपों को निराधार बताती है।
ईडी की बढ़ती ताकत और आंकड़ों की कहानी
प्रवर्तन निदेशालय मूल रूप से विदेशी मुद्रा विनियमन कानून और आर्थिक अपराधों की जांच के लिए बनाई गई एजेंसी थी लेकिन पिछले एक दशक में उसकी भूमिका और शक्तियों का विस्तार अभूतपूर्व रूप से हुआ है। विशेष रूप से धनशोधन निवारण अधिनियम (पीएमएलए) के तहत एजेंसी को गिरफ्तारी, पूछताछ, सम्पत्ति जब्त करने और लम्बी अवधि तक जांच चलाने के व्यापक अधिकार प्राप्त हुए हैं। विपक्षी दलों और नागरिक अधिकार संगठनों का तर्क है कि इन शक्तियों के बढ़ते उपयोग के साथ-साथ एजेंसी की जवाबदेही को लेकर भी सवाल बढ़े हैं। संसद में सरकार द्वारा प्रस्तुत आंकड़ों से यह तथ्य सामने आया है कि पिछले वर्षों में ईडी द्वारा दर्ज मामलों की संख्या में भारी वृद्धि हुई है। इसके साथ ही यह भी बहस का विषय रहा है कि हजारों मामलों की जांच के बावजूद दोषसिद्धि की दर अपेक्षाकृत कम क्यों है?
मीडिया संस्थानों पर कार्रवाई और प्रेस स्वतंत्रता की बहस
‘न्यूजक्लिक’ का मामला केवल एक वित्तीय जांच का मामला नहीं है। इसे भारत में प्रेस की स्वतंत्रता और मीडिया पर बढ़ते दबाव की बहस के संदर्भ में भी देखा जा रहा है। पिछले कुछ वर्षों में कई ऐसे मीडिया संस्थान जांच एजेंसियों के निशाने पर आए हैं जो सरकार की नीतियों की आलोचनात्मक रिपोर्टिंग करते रहे हैं। ‘बीबीसी’ पर आयकर विभाग की कार्रवाई, ‘द वायर’ के पत्रकारों के खिलाफ दर्ज मामले, ‘न्यूजलाॅन्ड्री’ से जुड़ी जांचें, ‘दैनिक भास्कर’ समूह पर आयकर छापे और विभिन्न स्वतंत्र पत्रकारों के खिलाफ दर्ज मुकदमों ने इस बहस को और तेज किया है। सरकार का पक्ष यह रहा है कि किसी भी मीडिया संस्थान को कानून से ऊपर नहीं माना जा सकता। यदि कर चोरी, वित्तीय अनियमितता या अन्य अपराधों के आरोप हैं तो जांच एजेंसियां कार्रवाई करने के लिए स्वतंत्र हैं लेकिन आलोचकों का कहना है कि जब कार्रवाई का केंद्र बार-बार वही संस्थान बनते हैं जो सरकार की आलोचना करते हैं तब स्वाभाविक रूप से राजनीतिक उद्देश्य की आशंका पैदा होती है।
क्या बन रहा है एक पैटर्न?
‘न्यूजक्लिक’, ‘दिल्ली आबकारी घोटाला’, ‘भीमा कोरेगांव’ और अन्य विवादित मामलों को एक साथ रखकर देखने पर एक महत्वपूर्ण प्रश्न उभरता है। यदि किसी मामले में वर्षों तक जांच चलती है, व्यापक मीडिया ट्रायल होता है, गिरफ्तारियां होती हैं और अंततः अदालतें आरोपों को कमजोर या कानूनी रूप से अस्थिर पाती हैं तो इसका असर केवल आरोपियों पर ही नहीं बल्कि जांच एजेंसियों की विश्वसनीयता पर भी पड़ता है। दिल्ली उच्च न्यायालय द्वारा ‘न्यूजक्लिक’ मामले में ‘कानून की प्रक्रिया का घोर दुरुपयोग’ जैसी कठोर टिप्पणी इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि यह केवल एक मुकदमे पर फैसला नहीं है। यह उस व्यापक चिंता को भी सामने लाती है जिसमें राज्य की जांच शक्तियों, मीडिया की स्वतंत्रता, राजनीतिक प्रतिद्वंद्विता और नागरिक अधिकारों के बीच संतुलन का प्रश्न शामिल है। लम्बी जांच, मीडिया में व्यापक प्रचार और वर्षों तक चलने वाली कानूनी प्रक्रिया स्वयं एक प्रकार की सजा बन जाती है, भले ही अंततः अदालत में आरोप सिद्ध न हों।
लोकतंत्र, मीडिया और न्यायपालिका का प्रश्न
‘न्यूजक्लिक’ मामले का महत्व केवल इतना नहीं है कि एक एफआईआर और उससे जुड़ी जांच रद्द हो गई। यह मामला लोकतंत्र में मीडिया की भूमिका, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और राज्य की जांच शक्तियों की सीमाओं पर भी सवाल खड़े करता है। लोकतंत्र में सरकार की आलोचना करना किसी मीडिया संस्थान का अधिकार ही नहीं बल्कि उसका दायित्व भी माना जाता है। दूसरी ओर किसी भी मीडिया संस्थान को कानून से ऊपर भी नहीं माना जा सकता। इसलिए ऐसे मामलों में सबसे महत्वपूर्ण भूमिका न्यायपालिका की होती है जो यह तय करती है कि कार्रवाई वास्तव में कानून के दायरे में थी या फिर सत्ता और असहमति के बीच संघर्ष का हिस्सा।

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