बिहार की सियासत में एक नई हलचल तब तेज हो गई जब तेज प्रताप यादव और प्रशांत किशोर की मुलाकात सामने आई। पटना में हुई इस बैठक का वीडियो खुद तेज प्रताप यादव ने सोशल मीडिया पर साझा किया जिसमें दोनों नेताओं की गर्मजोशी साफ नजर आई। तेज प्रताप ने इस मुलाकात को महत्वपूर्ण बताते हुए कहा कि इसमें जनहित, भविष्य की राजनीति और बदलते सियासी समीकरणों पर गहन चर्चा हुई। उन्होंने साफ संकेत दिया कि यह सिर्फ औपचारिक मुलाकात नहीं थी बल्कि आने वाले समय की राजनीति को प्रभावित करने वाली बातचीत रही। इस घटनाक्रम के बाद बिहार में नए राजनीतिक समीकरणों को लेकर अटकलें तेज हो गई हैं। खासकर इसलिए क्योंकि तेज प्रताप यादव लम्बे समय से अपने अलग राजनीतिक रास्ते तलाशते नजर आ रहे हैं। आरजेडी और लालू परिवार से दूरी के बाद उन्होंने अपनी अलग राजनीतिक पहचान बनाने की कोशिश की लेकिन उन्हें अपेक्षित सफलता नहीं मिली। अब सम्राट चैधरी के नेतृत्व में बदलते सियासी माहौल के बीच यह मुलाकात और भी अहम मानी जा रही है। सवाल उठ रहा है कि क्या तेज प्रताप यादव, प्रशांत किशोर के साथ मिलकर नई राजनीतिक पारी की शुरुआत करेंगे या यह सिर्फ एक रणनीतिक संवाद भर है। हालांकि दोनों नेताओं की ओर से किसी गठबंधन या राजनीतिक साझेदारी को लेकर आधिकारिक बयान नहीं आया है लेकिन राजनीतिक विश्लेषक इसे बिहार में सम्भावित नए समीकरणों की शुरुआत के तौर पर देख रहे हैं। उनका कहना है कि यह मुलाकात भले ही औपचारिक बताई जा रही हो, इसके सियासी मायने गहरे हैं। अब नजर इस बात पर है कि क्या यह बातचीत आगे किसी ठोस राजनीतिक कदम में बदलती है या सिर्फ चर्चाओं तक ही सीमित रह जाती है।

किसे मिलेगा ‘प्लेट पाॅलिटिक्स’ फायदा?
पश्चिम बंगाल में विधानसभा चुनाव 2026 के लिए दो चरणों 23 और 29 अप्रैल को मतदान हो गया है और परिणाम 4 मई को घोषित किए जाएंगे। लेकिन इस बार चुनाव का केंद्र मुद्दे नहीं बल्कि ‘खान पान’ बनता दिखा। ममता ने पीएम के झालमुड़ी खाने को न सिर्फ दिखावा बताया बल्कि यहां तक कहा कि वह उनके लिए खुद मछली पका सकती हैं। टीएमसी ने आरोप लगाया कि बीजेपी सत्ता में आई तो बंगाल के खान-पान खासतौर पर मछली, मांस और अंडे पर असर पड़ सकता है। इसी नैरेटिव को तोड़ने के लिए  बीजेपी ने इसे आम लोगों से जुड़ाव का प्रतीक बताया। बीजेपी नेताओं ने ‘माछ-भात’ खाकर खुद को बंगाली संस्कृति से जोड़ने की कोशिश की। अनुराग ठाकुर और हिमंत बिस्वा सरमा जैसे नेता खुलकर इस ‘फूड पाॅलिटिक्स’ में नजर आए। इसके बाद से मीडिया और सोशल मीडिया से लेकर राजनीतिक गलियारों में सवाल पूछे जा रहे हैं कि क्या अबकी बार ‘प्लेट पाॅलिटिक्स’ बंगाल की कुर्सी तक पहुंचाएगी? क्या इसका असर चुनाव परिणामों पर दिखाई देगा? जनता इस सियासी थाली में किसे अपनाएगी जैसे तमाम प्रश्न उठ रहे हैं। राजनीतिक पंडितों का कहना है कि बीजेपी की रणनीति साफ है कि बंगाली अस्मिता से जुड़े खाने-पीने के प्रतीकों के जरिए यह संदेश देना कि पार्टी स्थानीय संस्कृति का सम्मान करती है। बंगाल में मछली सिर्फ भोजन नहीं, पहचान है। ऐसे में ‘प्लेट पाॅलिटिक्स’ इस चुनाव में बड़ा फैक्टर साबित हो सकती है। अब देखना यह होगा कि जनता इस सियासी थाली में किसे अपना मानती है। गौरतलब है कि इस विवाद की शुरुआत तब हुई जब पीएम मोदी ने झारग्राम में एक दुकान से झालमुड़ी खाई। टीएमसी ने इसे दिखावा बताया और आरोप लगाया कि बीजेपी सत्ता में आने पर बंगाल के खान-पान पर असर डाल सकती है। यह नैरेटिव सीधे बंगाली अस्मिता से जुड़ा जहां मछली सिर्फ भोजन नहीं बल्कि संस्कृति का हिस्सा है। इसी धार को कुंद करने के लिए बीजेपी ने ‘फूड पाॅलिटिक्स’ का सहारा लिया। अनुराग ठाकुर से लेकर हिमंत बिस्वा सरमा सहित अन्य नेता भी बंगाल की गलियों में मछली खाते और स्थानीय लोगों से जुड़ते दिखाई दिए। अब देखना दिलचस्प होगा कि ‘प्लेट पाॅलिटिक्स’ के इस खेल में बंगाल की सत्ता किसे मिलती है।

जल्द होगा योगी कैबिनेट का विस्तार!
उत्तर प्रदेश में योगी आदित्यनाथ सरकार के कैबिनेट विस्तार को लेकर लम्बे समय से चल रही अटकलें अब फिर तेज हो गई हैं। चर्चा है कि पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव के बाद इस पर अंतिम मुहर लग सकती है। सम्भावित फेरबदल में कुछ नए चेहरों को मौका मिल सकता है, वहीं कुछ मंत्रियों को संगठन में भेजा जा सकता है। साथ ही विभागों के पुनर्वितरण की भी सम्भावना है। पार्टी सूत्रों की मानें तो भाजपा 2027 विधानसभा चुनाव को ध्यान में रखते हुए संगठन को मजबूत करने में जुटी है। ऐसे में अनुभवी और प्रभावी नेताओं को संगठन में अहम जिम्मेदारियां दी जा सकती हैं। दूसरी ओर मंत्री परिषद के गठन में जातीय और क्षेत्रीय संतुलन साधने पर खास जोर रहेगा। यहां तक कि शुरुआती स्तर पर कुछ नाम तय किए जा चुके हैं, जिन पर अंतिम निर्णय का इंतजार है। राजनीतिक हलकों में चर्चा जोरों पर है कि किसी वरिष्ठ ब्राह्मण नेता को मंत्रिमंडल में जगह मिल सकती है वहीं सपा के ‘पीडीए’ की काट में दलित समुदाय से भी किसी नेता को मंत्री पद मिल सकता है। सबसे ज्यादा चर्चा किसी महिला को मंत्री बनाए जाने की है। ऐसा इसलिए क्योंकि महिला आरक्षण विधेयक लोकसभा में गिरने के बाद भाजपा इसे मुद्दा बना रही है। ऐसे में किसी महिला को मंत्री बनाकर भाजपा के पास मौका होगा कि वह उदाहरण देते हुए विपक्ष को घेरे। ओबीसी समीकरण की बात करें तो भूपेंद्र चैधरी का नाम लगभग तय माना जा रहा है। जाट समुदाय से आने वाले भूपेंद्र चौधरी को मंत्रिमंडल में शामिल कर पश्चिमी उत्तर प्रदेश में मजबूत संदेश देने की तैयारी है। फिलहाल मुख्यमंत्री और डिप्टी सीएम में पश्चिम यूपी का प्रतिनिधित्व नहीं है, ऐसे में इस क्षेत्रीय असंतुलन को दूर करना भी पार्टी की प्राथमिकता में शामिल है। भाजपा का यह सम्भावित कैबिनेट विस्तार सिर्फ प्रशासनिक बदलाव नहीं बल्कि 2027 के चुनावी रण की तैयारी के तौर पर देखा जा रहा है जहां ‘पीडीए’ के जवाब में भाजपा अपनी नई सामाजिक और राजनीतिक रणनीति गढ़ती नजर आ रही है।

दिग्गजों का ठिकाना बनेगा सम्राट मंत्रिमंडल?
बिहार में सत्ता परिवर्तन के बाद सियासी हलचल तेज है। सम्राट चौधरी ने मुख्यमंत्री बनने के बाद दिल्ली में पीएम नरेंद्र मोदी और संगठन के कई बड़े नेताओं से चर्चा की। इस दौरान विनोद तावड़े और संघ के पदाधिकारियों के साथ बैठक ने यह संकेत दिया है कि बिहार में जल्द ही मंत्रिमंडल विस्तार हो सकता है। दिल्ली रवाना होने से पहले सम्राट ने ललन सिंह से भी मुलाकात की थी जिससे सहयोगी दलों के साथ तालमेल के संकेत मिलते हैं। इन बैठकों के बाद यह माना जा रहा है कि बिहार की नई सरकार अपने मंत्रिमंडल को लेकर जल्द बड़ा फैसला ले सकती है। इस बीच अमित शाह का वह चुनावी बयान फिर चर्चा में आ गया है जिसमें उन्होंने कुछ नेताओं को ‘बड़ा आदमी’ बनाने की बात कही थी। अब जब सम्राट चौधरी खुद मुख्यमंत्री बन चुके हैं तो सवाल उठ रहा है कि क्या बाकी नेताओं को भी उसी वादे के तहत बड़ी जिम्मेदारी मिलेगी? सबसे ज्यादा चर्चा विजय कुमार सिन्हा और जीवेश कुमार को लेकर है। विजय कुमार सिन्हा जो विधानसभा अध्यक्ष और उपमुख्यमंत्री रह चुके हैं, उनका अनुभव और संगठन में पकड़ मजबूत मानी जाती है। नई सरकार में उनकी भूमिका को लेकर अटकलें हैं कि क्या वे फिर से मंत्री बनेंगे या संगठन में कोई बड़ी जिम्मेदारी सम्भालेंगे। वहीं जीवेश कुमार जो अपनी कार्यशैली और तेज फैसलों के लिए जाने जाते हैं को लेकर भी सवाल है कि क्या उन्हें फिर से मौका मिलेगा। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि बिहार में सरकार बनाना जितना अहम होता है उससे ज्यादा चुनौतीपूर्ण मंत्रिमंडल का गठन होता है। इसमें जातीय, क्षेत्रीय और राजनीतिक संतुलन साधना जरूरी होता है। यही वजह है कि हर नाम पर कई स्तरों पर मंथन होता है। बीजेपी के भीतर दावेदारों की लम्बी सूची है। मंगल पांडेय, रामकृपाल यादव, दिलीप जायसवाल और श्रेयसी सिंह जैसे नाम चर्चा में हैं। इसके अलावा लखेंद्र पासवान, रमा निषाद और प्रमोद कुमार चंद्रवंशी भी दावेदार माने जा रहे हैं। जेडीयू की ओर से विजय कुमार चौधरी और विजेंद्र प्रसाद यादव पहले ही डिप्टी सीएम बन चुके हैं। वहीं श्रवण कुमार, अशोक चौधरी, लेसी सिंह और मदन सहनी जैसे नाम संभावित मंत्रियों में गिने जा रहे हैं।  एनडीए के सहयोगी दलों को भी मंत्रिमंडल में प्रतिनिधित्व मिल सकता है। संतोष कुमार सुमन, संजय पासवान और दीपक प्रकाश जैसे नाम चर्चा में हैं। लेकिन बिहार में मंत्रिमंडल गठन केवल प्रशासनिक प्रक्रिया नहीं बल्कि सामाजिक समीकरणों का संतुलन भी है। ब्राह्मण, भूमिहार, यादव, कुर्मी, दलित और अति पिछड़े वर्गों को साधना जरूरी होता है। सम्राट चैधरी के सामने सबसे बड़ी चुनौती यह है कि किसे जगह दें और किसे नहीं । अब देखना यह होगा कि क्या सम्राट कैबिनेट सच में दिग्गजों का ठिकाना बनता है या फिर संतुलन की राजनीति में कुछ बड़े चेहरे फिर इंतजार में रह जाते हैं।

You may also like