उत्तराखण्ड के सुदूर गांव में होती छोटी-छोटी घटनाएं या शहरों में जबरदस्ती पैदा किए गए विवाद जिस प्रकार सम्प्रदाय विशेष को कटघरे में खड़े करने का साधन बन गए हैं, वह दिन दूर नहीं जब पूरा प्रदेश नफरत के आगोश में समा जाएगा। 23 अक्टूबर को रामनगर में एक डीप-फ्रिजर वाहन में वैध कागजात के साथ लाए जा रहे मांस को प्रतिबंधित मांस बताकर वाहन चालक नासिर के साथ मारपीट की गई थी। बैलपड़ाव चैकी में पुलिस के सामने वाहन में तोड़-फोड़ भी की गई। पुलिस ने चालक नासिर की पत्नी नूरजहां की तहरीर पर भाजपा नेता मदन जोशी समेत पांच नामजद और कई अज्ञात पर मुकदमा दर्ज किया था। मदन जोशी पर भीड़ को उत्तेजित कर गम्भीर घटना को अंजाम देने का आरोप है। हल्द्वानी में भी वही रामनगर वाला पैटर्न दोहराया गया। एक अफवाह फैलाई गई कि हल्द्वानी के एक प्रतिष्ठित रेस्टोरेंट में गोमांस मिला है और फिर भारतीय जनता पार्टी युवा मोर्चा के पूर्व प्रदेश महामंत्री विपिन पांडे, घटनास्थल पर पहुंच गए और घटना को इस तरीके से सोशल मीडिया पर पेश किया कि पूरा मामला साम्प्रदायिक रंग में रंग गया
‘बड़ी रौनक थी इस घर में, यह घर ऐसा नहीं था,
गिले-शिकवे भी रहते थे, मगर ऐसा नहीं था।
जहां कुछ सीधी बातें थी, वहीं कुछ तल्ख बातें थी,
मगर उन तल्ख बातों का,असर ऐसा नहीं था।
इन्हीं शाखों पर गुल थे, बर्क थे, कलियां थी, गुंचे थे,
यह मौसम जब ना ऐसा था,
शजर ऐसा नहीं था।’
मशहूर शायर जावेद अख्तर के शेर की ये पंक्तियां उत्तराखण्ड ही नहीं पूरे भारत के परिपेक्ष में उस माहौल को बयां करती हैं जिसने पिछले 12 सालों में नफरत की एक नई परिपाटी को जन्म दिया है। इस नफरत के नवाचार में ‘जिहाद’ शब्द के शोर में उस मशहूर शास्त्रीय संगीतकार उस्ताद अमानत हुसैन, जो उस रामनगर से थे जहां आज साम्प्रदायिकता का जहर फैलाया जा रहा है, के संगीत के सुर कहीं खो गए हैं, जिन्होंने उत्तराखण्ड की बैठकी होली को दुनिया भर में पहचान दी थी। उत्तराखण्ड जो पहले उत्तर प्रदेश का ही एक भाग था, उस वक्त भी यहां इस प्रकार की साम्प्रदायिकता का माहौल नहीं देखा गया। उत्तराखण्ड या कहें इस पर्वतीय क्षेत्र की पहचान हमेशा मिल-जुलकर रहने वाले क्षेत्र के रूप में रही है। लेकिन अब माहौल बीते वक्त की बात हो गई है।
उत्तराखण्ड के सुदूर गांव में होती छोटी-छोटी घटनाएं या शहरों में जबरदस्ती पैदा किए गए विवाद जिस प्रकार सम्प्रदाय विशेष को कटघरे में खड़े करने का साधन बन गए हैं, वह दिन दूर नहीं जब उत्तराखण्ड भी नफरत की आगोश में समा जाएगा। उत्तराखण्ड की धरती कभी नफरत के लिए नहीं जानी गई। उत्तराखण्ड बनने के बाद इसे देवभूमि तो मान लिया गया, लेकिन कुछ तत्व इसके देवत्व पर दाग लगाने पर आमादा हैं। हर उस घटना को जिसके पीछे किसी मुस्लिम का नाम आया नहीं कि उसे ‘जिहाद’ शब्द से जोड़कर एक नई शब्दावली गढ़ दी गई। मसलन ‘लव जिहाद’, ‘थूक जिहाद’, ‘लैंड जिहाद’, ‘नकल जिहाद’ जैसे शब्द उस नवाचार की अनोखी ऐसी उपलब्धि हैं, जिसमें उपलब्धि के नाम पर कुछ भी नजर नहीं आता, बस नजर आता है तो नफरत का तत्व। लेकिन इन्हीं घटनाओं के पीछे अगर हिंदू हो तो उसके लिए भी ‘जिहाद’ सरीखे शब्दों को गढ़ लेने से परहेज किया गया। अपराध का व्यक्ति विशेष के धर्म से कोई सीधा सम्बंध तो है नहीं। माना गया है कि अपराध की कोई जाति या धर्म नहीं होती। उत्तराखण्ड अब उस ओर मुखातिब है, जहां हिंदुत्व, गौरक्षा के नाम पर उठी अफवाहों का फायदा उठाइए, उसमें नफरत डालिए और बन जाइए हिंदुत्व के ठेकेदार, भले ही खबरों में सच्चाई ना हो। हिंदुत्व और गौरक्षा के नाम पर अराजक तत्वों का बोलबाला उत्तराखण्ड की वादियों को नफरत की ओर धकेल रहा है। हालिया घटनाएं बताती हैं कि झूठी अफवाहों के नाम पर माहौल को गर्म करने की कोशिश जारी है। गौमांस के नाम पर रामनगर और हल्द्वानी में घटी घटनाएं ऐसी ही नफरत की सोच का परिणाम है। उत्तराखण्ड अपनी शांति, पहाड़ी सरलता और सामाजिक सौहार्द के लिए जाना जाता है। दो अलग-अलग शहर लेकिन घटनाओं का पैटर्न इतना समान कि सवाल उठने लाजमी हैं। यह सिर्फ संयोग है या फिर सोची समझी रणनीति का हिस्सा? पहले रामनगर में संदिग्ध मांस मिलने की अफवाह, गाड़ियों में तोड़-फोड़, हिंसा आधी-अधूरी जानकारी पर गुस्सा और इसे साम्प्रदायिक मोड़ देने की कोशिश। चंद दिनों बाद हल्द्वानी में भी वही पैटर्न। एक बछड़े का काटा सिर मिलना उसे मंदिर के सामने फेंका मिलना, सच्चाई जाने बिना मान लिया जाना इसमें जरूर किसी मुस्लिम का ही हाथ है, फिर वही अफवाहों का आग फैलने वाला पैटर्न।
उत्तराखण्ड का कुमाऊं और गढ़वाल क्षेत्र अपनी शांति, पहाड़ी सरलता और सामाजिक सौहार्द के लिए जाना जाता है। 23 अक्टूबर को रामनगर में एक डीप-फ्रिजर वाहन में वैध कागजात के साथ लाए जा रहे मांस को प्रतिबंधित मांस बताकर वाहन चालक नासिर के साथ मारपीट की गई थी। बैलपड़ाव चैकी में पुलिस के सामने वाहन में तोड़-फोड़ भी गई। पुलिस ने चालक नासिर की पत्नी नूरजहां की तहरीर पर भाजपा नेता मदन जोशी समेत पांच नामजद और कई अज्ञात पर मुकदमा दर्ज किया था। मदन जोशी पर भीड़ को उत्तेजित कर गम्भीर घटना को अंजाम देने का आरोप है। एसआईटी का गठन कर पूरे प्रकरण की जांच की गई। फरार चल रहे मदन जोशी के विरुद्ध कोर्ट से गैर जमानती वारंट लिया गया। कुर्की वारंट को उनके घर पर चस्पा किया गया था। मामला हाईकोर्ट तक पहुंचा था और हाईकोर्ट की सख्ती के बाद एसएसपी टी सी मंजूनाथ सहित पूरा पुलिस महकमा दबाव में था। पुलिस मदन जोशी को गिरफ्तार नहीं कर पाई और उसको आत्मसमर्पण करना पड़ा। हालांकि आत्मसमर्पण के समय भी मदन जोशी के चेहरे में ऐसे भाव थे कि मानो कुछ हुआ ही न हो। भाजपा के पूर्व जिलाध्यक्ष और पिछले नगर निकाय चुनावों में भाजपा के नगर पालिका प्रत्याशी रहे मदन जोशी की राजनीति का आधार ही मुस्लिम विरोध रहा है। हालांकि वो नगरपालिका का चुनाव हार गए थे।
हल्द्वानी में भी वही रामनगर वाला पैटर्न दोहराया गया। 16 नवम्बर की शाम आम दिनों की तरह ही थी लेकिन सोशल मीडिया पर अचानक अफवाहों भरी पोस्ट वाइरल हुईं कि बरेली रोड में उजाला नगर के पास एक मंदिर के सामने एक बछड़े का सिर कटा हुआ पड़ा है। एक अफवाह फैलाई गई कि हल्द्वानी के एक प्रतिष्ठित रेस्टोरेंट में गोमांस मिला है तो क्या था भारतीय जनता पार्टी युवा मोर्चा के पूर्व प्रदेश महामंत्री विपिन पांडे, जिन्हें पार्टी ने पंचायत चुनावों के वक्त पार्टी से बाहर का रास्ता दिखा दिया था, उस घटनास्थल पर पहुंच गए और घटना को इस तरीके से सोशल मीडिया पर पेश किया और मान लिया गया कि किसी मुस्लिम का इसमें हाथ है, वह भी बिना तथ्यों को जाने। कुछ तस्वीरें और वीडियो वायरल हुए- ‘गौ-वंश के अवशेष मिले’, ‘हत्या हुई’, ‘किसी समुदाय की संलिप्तता’ जैसी बिना पुष्टि वाली बातें।
कुछ ही मिनटों में हालात बदल गए। लोग इकट्ठा होने लगे, गुस्सा उबलने लगा और भीड़ ने सड़कों पर तनाव का वातावरण बना दिया। अल्पसंख्यक समुदाय की सम्पत्तियों पर हमला बोल दिया रेस्टोरेंट और दुकानों में तोड़-फोड़ की गई और एक अराजकता का माहौल खास इलाके में फैलने की कोशिश की गई। पुलिस की जांच में स्पष्ट हुआ कि ‘अफवाहें वास्तविकता से बहुत दूर थीं’, लेकिन तब तक सोशल मीडिया अपनी भूमिका निभा चुका था। उकसावा, विभाजन और अविश्वास की आग फैल चुकी थी। सीसीटीवी फुटेज के बाद पता चला कि एक कुत्ता उस बछड़े के सिर को उठाकर ले आया था और मंदिर के आगे शायद वह छोड़ गया। पुलिस के अनुसार पास में ही एक गाय ने बछड़े को जन्म दिया था जो शायद मर गया था और वह कुत्ता उस अवशेष को घसीट कर ले आया। इंसान भले ही धर्म में विभाजित हो, लेकिन जानवरों के यहां ऐसी कोई पैमाना नहीं है या कहें उनके लिए कोई धर्म का बंधन तो नहीं है। ऐसे में यह समझ पाना मुश्किल है कि कुत्ता मुस्लिम था या हिंदू, वह तो सिर्फ जानवर था। लेकिन हिंदुत्व और गौ रक्षा के नाम पर अराजकता फैलाने वालों की मंशा सच्चाई जानने की नहीं थी। उनके द्वारा यह मान लिया गया कि गोवंश का बछड़े का सिर मिला है तो निश्चित ही यह किसी मुसलमान द्वारा किया गया कार्य होगा क्योंकि वह अपनी मानसिक स्थिति बना चुके हैं कि किसी भी प्रकार के मांस मिलने पर उसमें मुसलमान का ही हाथ होगा। भाजपा के पूर्व नेता विपिन पाण्डे भी पिछले कुछ समय से अपनी राजनीति का आधार भी मुस्लिम विरोधी और सनातनी के रूप में स्थापित करने के प्रयास में हैं। पुलिस ने उन्हें गिरफ्तार कर लिया, हालांकि अगले दिन जमानत भी मिल गई। रिहा होने के बाद भी ये खुद को हिंदुत्व के पैरोकार के रूप में ही पेश करते रहे। इस पूरे घटनाक्रम के दौरान काफी समय बाद लगा कि नैनीताल पुलिस में इकबाल अभी बाकी है। नए एसएसपी टी.सी. मंजूनाथ किसी दवाब में नहीं आए। उनके कड़े एक्शन जिनमें मदन जोशी की कुर्की करने का आदेश शामिल है। अंततः जोशी के जेल जाने के पीछे का कारण बना। शायद उन पर मदन जोशी प्रकरण में हल्का हाथ रखने का दिल्ली तक से दबाव था। हल्द्वानी में भी पुलिस ने समय रहते उपद्रवियों पर सख्त कार्रवाई कर तनाव को बढ़ने से रोक लिया। मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने भी शायद इन मामलों में सख्त कार्रवाई के निर्देश दिए थे।
पिछले 11 सालों में जिस प्रकार साम्प्रदायिक घटनाओं के लिए उत्तराखण्ड की चर्चा हो रही है, वह उत्तराखण्ड की कभी पहचान रही ही नहीं और न ही ऐसी घटनाओं को हमेशा साम्प्रदायिकता के एंगल से देखा गया। अभी हाल ही में हल्द्वानी के एक स्थान पर एक युवक द्वारा गोवंश के साथ अप्राकृतिक यौनकर्म करने का मामला सामने आया था। खास बात यह है कि उसे भी पहले हिंदू-मुस्लिम एंगल से देखा गया, लेकिन जब जांच में पता चला कि वह लड़का हिंदू था तो उसके बाद हिंदू संगठनों के अंदर से निकलने वाली गौरक्षा के प्रति प्रेम की ज्वाला शांत हो गई क्योंकि ऐसा कर्म करने वाला हिंदू था, मुसलमान नहीं। अगर शायद मुसलमान होता तो उनके लिए राजनीति का एक औजार बनता। गौरक्षा के नाम पर ये सलेक्टिव अप्रोच इन हिंदूवादी संगठनों की नीयत पर सवाल जरूर खड़े करती है। उत्तराखण्ड के इतिहासकारों की मानें तो उत्तराखण्ड की मूल जातियों में खास और कुछ दलित जातियां थी जिन्हें यहां का मूल निवासी माना गया इसके अलावा चाहे वह ब्राह्माण हो क्षत्रिय हो वैश्य हो वह सब यहां उत्तराखण्ड से बाहर के आए हुए लोग हैं जो यहां की संस्कृति जिन्होंने अपनी संस्कृति विकसित की और यहां की संस्कृति में रच बस गए। ये सच है कि मुसलमानों का उत्तराखण्ड में आक्रमणकारियों के रूप में आगमन जरूर हुआ लेकिन व्यापारियों के रूप में भी वो आए। चाहे भारत में मुसलमानों का शासन कितने लम्बे समय तक रहा हो लेकिन उत्तराखण्ड की धरती ने जैसे ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य लोगों को अपनी भूमि में स्थान दिया, वैसे ही मुस्लिम और सिख लोगों को भी अपनी भूमि में जगह दी। उत्तराखण्ड की भूमि में मुस्लिम और वैश्य एक व्यापारी के रूप में आए। मुस्लिम भी उत्तराखण्ड की संस्कृति से अछूते नहीं रहे। माना जाता है कि बरसों पहले अल्मोड़ा में बृज की टोलियां रामलीला करने आया करती थी। इन टोलियों में मुस्लिम कलाकार भी शामिल हुआ करते थे। 1870-80 के दशक में उस्ताद अमानत हुसैन अल्मोड़ा के प्रमुख शास्त्रीय होली गायकों में एक थे। उस्ताद अमानत हुसैन रामनगर के रहने वाले थे जो बाद में अल्मोड़ा के ही होकर रह गए। अंग्रेजी हुकूमत के दौरान उत्तराखण्ड के कुमाऊं इलाके की मशहूर खड़ी और बैठकी होली में शास्त्रीय संगीत का रंग भरने वाले उस्ताद अमानत हुसैन को याद किए बगैर होली का रंग फीका सा लगता है। बैठकी और खड़ी होली के दौरान जिस तरह पहाड़ और वनों के साथ-साथ पारम्परिक गीतों को गाया जाता है। अकबर के दरबार के नवरत्नों में से एक अब्दुर्रहीम खानखाना जब जीवनदायिनी मां गंगा की स्तुति अपने शब्दों में करते हैं :
‘‘अच्युत चरन तरंगिनी, शिव सिर मालति माल।
हरि न बनायौ सुरसरि, कीन्हौ इंदव भाल।।’’
बद्रीनाथ धाम में भोर का एलान करने वाली आरती नन्दप्रयाग के एक मुसलमान नसीरुद्दीन सिद्दीकी ने लगभग डेढ़ सौ वर्ष पूर्व रची थी। टिहरी निवासी इमाम खां विश्वनाथ संस्कृत महाविद्यालय उत्तरकाशी से शास्त्री की उपाधि लेकर शास्त्री इमाम खां बन गए। श्रीनगर, अल्मोड़ा, कर्णप्रयाग सहित उत्तराखण्ड के अन्य स्थानों पर होने वाली रामलीला में मुस्लिम लोग प्रबंधन, पात्रों की भूमिका निभाने, वाद्ययंत्र बजाने से लेकर हर चीज का हिस्सा हुआ करते हैं। मुस्लिम कलाकारों द्वारा बनाए गए रावण परिवार के पुतले दशहरे में आकर्षण का केंद्र हुआ करते थे। हिंदू-मुस्लिम सांस्कृतिक समन्वय का ताना बाना आज उन लोगों के चलते कमजोर होने की कगार पर है, जिनकी राजनीति के लिए नफरत एक जरूरी तत्व है।
सालों में जो एक नया विमर्श उत्तराखण्ड में या कहें कि पूरे भारत में चला है जो समुदाय विशेष, खासकर मुस्लिम को शक की दृष्टि से देखने की या नफरत की दृष्टि से देखने की जो एक धारणा बनी है, उसने उत्तराखण्ड के उस मूल सद्भाव की जो परम्परा वर्षों से चली आ रही, को नफरत में बदलने का प्रयास किया है। उत्तराखण्ड में घटी हालिया घटनाएं बताती हैं कि यह नफरत का खेल हिंदुत्व और गौरक्षा के नाम पर कुछ अराजक तत्व खेल रहे हैं, जिनको कभी-कभी कुछ राजनीतिक दलों का भी संरक्षण प्राप्त हो जाता है। गौर करने वाली बात यह है कि सोशल मीडिया आधुनिक दंगों का नया बारूद हो गया है। इसने दोनों शहरों में ‘माहौल बनाने’ में मुख्य भूमिका निभाई।
रामनगर और हल्द्वानी में पुलिस ने स्थिति को सम्भाल तनाव बढ़ने से रोका, सख्ती दिखाई गई। प्रशासन के प्रयासों से स्थिति काबू में आ गई, लेकिन एक तथ्य साफ दिखा। माहौल को बिगाड़ने के लिए 10 मिनट काफी हैं, लेकिन सुधारने के लिए 10 घंटे भी कम। ये घटनाएं सिर्फ अपराध या अफवाह नहीं हैं, ये उस बड़े खेल का हिस्सा हैं जहां पहचान की राजनीति को मजबूत करने के लिए धर्म, भावनाओं और गौ-वंश जैसे मुद्दों को हथियार की तरह इस्तेमाल किया जाता है। यह रणनीति नई नहीं है, लेकिन अब इसका डिजिटल संस्करण और भी खतरनाक हो चुका है। गौवंश विवाद, सिर्फ एक बहाना है। सवाल है इसमें से कितने लोग असली गौ सेवा में ईमानदारी से लगे हैं? सड़कों में आवारा घूमते कितने गौवंश को ये अपने घर ले गए सेवा करने के लिए? अगर ये कथित हिंदूवादी संगठनों के लोग एक गौवंश को अपने घर ले जाकर उनकी सेवा का संकल्प लेते तो आवारा गौवंश की समस्या एक हद तक हल हो जाती। लेकिन इनके लिए सुरक्षित गौवंश नहीं, अपितु आवारा गौवंश राजनीति चमकाने के साधन हैं।
युवा कवि भूपेंद्र सिंह की कविता की ये पंक्तियां उन लोगों को बहुत कुछ कहती हैं जो सम्प्रदाय के नजरिए से हर चीज को उल्टा देखते हैं।
धर्म के घनचक्करों ने पथ बनाया क्या भला?
उल्टे पैरों से सिखाते दूर जाने की कला,
जिस तरफ जाना है पीठ पर आंखें नहीं,
और कहते गर्व से तकनीक चलने की सही,
इस तरह के लम्पटों के ज्ञान को झंझोड़ना,
और आवश्यक है जूठे पात्र को खंकोलना,
संग इनके जब मनु उल्टी दिशा में जाएगा,
पीठ को आगे कहेगा गर्त में ही जाएगा।

