भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास में यदि किसी एक व्यक्ति के जीवन और मृत्यु को लेकर सबसे अधिक रहस्य, किंवदंतियां और विवाद रहे हैं तो वह नाम है सुभाष चंद्र बोस। नेताजी की असाधारण राजनीतिक यात्रा, उनका सैन्य संघर्ष और उनकी रहस्यमय मृत्यु, इन तीनों ने उन्हें भारतीय इतिहास का सबसे आकर्षक और जटिल व्यक्तित्व बना दिया है। 1945 में कथित विमान दुर्घटना में उनकी मृत्यु की आधिकारिक कहानी सामने आई लेकिन स्वतंत्रता के लगभग आठ दशक बाद भी यह प्रश्न पूरी तरह समाप्त नहीं हुआ कि क्या वास्तव में नेताजी उसी दुर्घटना में मारे गए थे। टोक्यो के रेनकोजी टेम्पल में रखी अस्थियां क्या वास्तव में उन्हीं की हैं? यह सवाल आज भी इतिहास और राजनीति के बीच खड़ा है। हाल ही में यह मुद्दा फिर चर्चा में तब आया जब नेताजी की बेटी अनीता बोस फाफ और पत्रकार आशीष राय ने अस्थियों को भारत लाने और उनका डीएनए परीक्षण कराने की मांग को लेकर सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया। इसी दौरान पूर्व राज्यसभा सांसद जवाहर सरकार का एक पत्र भी सार्वजनिक हुआ जिसमें उन्होंने सरकार से सीधा प्रश्न किया कि आखिर ऐसा कौन सा रहस्य है जो नेताजी की अस्थियों का डीएनए परीक्षण कराने से सरकार को रोक रहा है।
नेताजी की अस्थियां रहस्य, राजनीति और अनुत्तरित सवाल
नेताजी सुभाष चंद्र बोस की कथित अस्थियां आज भी टोक्यो के रेनकोजी टेम्पल में सुरक्षित हैं लेकिन 80 साल बाद भी यह स्पष्ट नहीं हो सका कि वे वास्तव में उन्हीं की हैं या नहीं। तीन-तीन सरकारी जांचों के बावजूद रहस्य बना हुआ है जबकि पूर्व सांसद जवाहर सिरकार के 12 पत्रों के बावजूद सरकार ने कोई अंतिम निर्णय नहीं लिया है। सुप्रीम कोर्ट में गत् पखवाड़े एक बार फिर यह मुद्दा उठा जहां याचिकाकर्ताओं को शपथ पत्र के साथ निचली अदालत जाने की सलाह दी गई। ऐसे में सबसे बड़ा सवाल अब भी कायम है कि जब डीएनए जांच से सच्चाई सामने आ सकती है तो आखिर देरी किस बात की है?
नेताजी की कथित मृत्यु की कहानी 18 अगस्त 1945 से शुरू होती है। द्वितीय विश्वयुद्ध के अंतिम दिनों में जापान की हार लगभग तय हो चुकी थी और नेताजी उस समय जापान के सहयोग से बनी आजाद हिंद फौज के माध्यम से ब्रिटिश शासन के खिलाफ संघर्ष कर रहे थे।
आधिकारिक कथा के अनुसार उस दिन नेताजी ताइवान के ताइहोकू एयरपोर्ट से जापानी सैन्य विमान में सवार हुए थे। कहा जाता है कि उड़ान भरने के कुछ ही देर बाद विमान में तकनीकी खराबी आ गई और वह दुर्घटनाग्रस्त हो गया। विमान में आग लग गई और नेताजी गम्भीर रूप से जल गए। उन्हें अस्पताल ले जाया गया जहां कुछ घंटों बाद उनकी मृत्यु हो गई। इसके बाद उनका अंतिम संस्कार किया गया और उनकी अस्थियां जापान भेज दी गईं। यही अस्थियां आज भी रेनकोजी मंदिर में सुरक्षित रखी हुई बताई जाती हैं लेकिन इस पूरी कहानी पर शुरू से ही संदेह रहा। दुर्घटना का कोई स्पष्ट भौतिक प्रमाण उपलब्ध नहीं था और प्रत्यक्षदर्शियों के बयान भी समय के साथ बदलते रहे। नेताजी के कई सहयोगियों और स्वतंत्रता सेनानियों को भी इस कहानी पर संदेह था। इसी कारण स्वतंत्र भारत में बार-बार जांच की मांग उठती रही और सरकार को अलग-अलग समय पर जांच समितियां और आयोग गठित करने पड़े।
सबसे पहली जांच 1956 में हुई जब सरकार ने एक समिति गठित की जिसकी अध्यक्षता शाहनवाज खान ने की। शाहनवाज खान स्वयं आजाद हिंद फौज के वरिष्ठ अधिकारी रहे थे और स्वतंत्रता के बाद कांग्रेस के नेता के रूप में संसद में भी सक्रिय रहे। नेताजी के साथ उनके व्यक्तिगत सम्बंध भी रहे थे, इसलिए सरकार को लगा कि उनकी अध्यक्षता में बनी समिति इस मामले को विश्वसनीय तरीके से देख सकेगी। इस समिति ने कई गवाहों के बयान दर्ज किए और अंततः निष्कर्ष दिया कि नेताजी की मृत्यु वास्तव में 18 अगस्त 1945 की विमान दुर्घटना में ही हुई थी और रेनकोजी मंदिर में रखी अस्थियां उन्हीं की हैं। हालांकि इस निष्कर्ष को लेकर तब भी कई लोगों ने असहमति जताई और यह विवाद पूरी तरह समाप्त नहीं हुआ।
इसके बाद 1970 में दूसरा जांच आयोग गठित किया गया जिसकी अध्यक्षता न्यायमूर्ति जी.डी. खोसला ने की। गोपाल दास खोसला पंजाब हाईकोर्ट के पूर्व मुख्य न्यायाधीश रह चुके थे और अपने समय के प्रतिष्ठित विधिवेत्ताओं में गिने जाते थे। उन्होंने विस्तृत जांच के बाद अपनी रिपोर्ट में कहा कि उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर यह माना जा सकता है कि नेताजी की मृत्यु विमान दुर्घटना में ही हुई थी लेकिन इस आयोग की रिपोर्ट भी विवादों से घिर गई और कई इतिहासकारों तथा शोधकर्ताओं ने इसे अंतिम सत्य मानने से इनकार कर दिया।
तीसरी और सबसे चर्चित जांच 1999 में गठित मनोज कुमार मुखर्जी आयोग ने की। न्यायमूर्ति मनोज कुमार मुखर्जी भारत के सुप्रीम कोर्ट के सेवानिवृत्त न्यायाधीश थे और उन्हें इस मामले की व्यापक और स्वतंत्र जांच के लिए नियुक्त किया गया था। इस आयोग ने कई देशों में जाकर साक्ष्य जुटाए और लम्बी जांच के बाद 2005 में अपनी रिपोर्ट प्रस्तुत की। इस रिपोर्ट में कहा गया कि विमान दुर्घटना में नेताजी की मृत्यु का कोई ठोस प्रमाण नहीं मिला और रेनकोजी मंदिर में रखी अस्थियां भी नेताजी की होने का प्रमाणित साक्ष्य उपलब्ध नहीं हैं। हालांकि जब यह रिपोर्ट संसद में प्रस्तुत की गई तो तत्कालीन केंद्र सरकार ने इसे स्वीकार नहीं किया। इस प्रकार तीन-तीन जांचों के बाद भी रहस्य पूरी तरह समाप्त नहीं हो सका।
नेताजी के जीवित होने की चर्चित कहानियों में सबसे प्रसिद्ध कथा गुमनामी बाबा से जुड़ी है। उत्तर प्रदेश के फैजाबाद में दशकों तक एक रहस्यमय साधु रहते थे जिन्हें लोग गुमनामी बाबा कहते थे। कुछ लोगों का दावा था कि वही वास्तव में नेताजी थे। उनके पास से कई ऐसे दस्तावेज और वस्तुएं मिलने की बात कही गई जो कथित रूप से नेताजी से जुड़ी थीं। हालांकि इस दावे को भी निर्णायक वैज्ञानिक प्रमाण नहीं मिल पाया। हाल के दिनों में इस पूरे विवाद ने नया मोड़ तब लिया जब नेताजी की बेटी अनीता बोस फाफ और पत्रकार आशीष राय ने रेनकोजी मंदिर में रखी अस्थियों को भारत लाने और उनका डीएनए परीक्षण कराने की मांग को लेकर सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की। सुनवाई के दौरान अदालत ने यह टिप्पणी की कि इस विषय पर पहले भी कई याचिकाएं दाखिल हो चुकी हैं और यदि याचिकाकर्ता इस मुद्दे को आगे बढ़ाना चाहते हैं तो वे शपथपत्र के साथ उपयुक्त निचली अदालत में याचिका दाखिल कर सकते हैं। इसके बाद याचिकाकर्ताओं के वकील ने याचिका वापस ले ली लेकिन अदालत की यह टिप्पणी इस बात का संकेत थी कि यदि विधिक प्रक्रिया का पालन किया जाए तो मामला आगे बढ़ाया जा सकता है।
इसी बीच पूर्व सांसद जवाहर सरकार का एक पत्र सामने आया जिसने इस मुद्दे को फिर राष्ट्रीय बहस का विषय बना दिया। उन्होंने राज्यसभा से इस्तीफा देने से पहले प्रधानमंत्री को एक पत्र लिखा था। इस पत्र में उन्होंने कहा कि नेताजी की अस्थियों के मुद्दे पर उन्होंने दो वर्षों के दौरान विदेश मंत्रालय और गृह मंत्रालय को बार-बार पत्र लिखे। उनके अनुसार उन्होंने कुल बारह पत्र लिखे लेकिन दोनों मंत्रालय एक-दूसरे पर जिम्मेदारी डालते रहे। एक मंत्रालय का कहना था कि यह दूसरे मंत्रालय का विषय है और दूसरा मंत्रालय भी वही जवाब देता रहा। उन्होंने अपने पत्र में इसे ‘जिम्मेदारी टालने का खेल’ बताया और प्रधानमंत्री को लिखा कि इस तरह का व्यवहार सरकार के कामकाज पर गम्भीर प्रश्न खड़े करता है। उन्होंने यह भी कहा कि प्रधानमंत्री कार्यालय ने उनके पत्र को स्वीकार तो किया लेकिन इस विषय पर कोई अंतिम जवाब नहीं दिया गया।
यही वह बिंदु है जहां से प्रश्न और गहरा हो जाता है। आज विज्ञान और डीएनए तकनीक इतनी विकसित हो चुकी है कि कई ऐतिहासिक रहस्यों को इससे सुलझाया जा चुका है। यदि रेनकोजी मंदिर में रखी अस्थियां वास्तव में नेताजी की हैं तो डीएनए परीक्षण के माध्यम से इसे सिद्ध किया जा सकता है। इसके लिए नेताजी के परिवार के डीएनए नमूनों से तुलना की जा सकती है। यदि परीक्षण में यह साबित हो जाए कि अस्थियां वास्तव में नेताजी की हैं तो यह विवाद समाप्त हो सकता है और उन्हें पूरे सम्मान के साथ भारत लाया जा सकता है लेकिन यदि परीक्षण से यह सिद्ध हो जाए कि अस्थियां उनकी नहीं हैं तो इतिहास के कई प्रश्न फिर नए सिरे से उठेंगे।
सम्भवतः यही कारण है कि इस विषय को लेकर सरकारें हमेशा सतर्क रही हैं। कुछ विशेषज्ञों का मानना है कि इसमें कूटनीतिक जटिलताएं भी हो सकती हैं क्योंकि अस्थियां जापान के एक धार्मिक स्थल में रखी गई हैं। कुछ लोग यह भी मानते हैं कि यदि डीएनए परीक्षण से स्थापित इतिहास पर प्रश्नचिह्न लग जाता है तो उसके दूरगामी राजनीतिक और ऐतिहासिक परिणाम हो सकते हैं लेकिन इन सभी सम्भावनाओं के बावजूद यह सवाल अपनी जगह बना हुआ है कि क्या किसी राष्ट्र को अपने सबसे महान स्वतंत्रता सेनानियों में से एक के बारे में अंतिम सत्य जानने का अधिकार नहीं होना चाहिए। नेताजी केवल एक ऐतिहासिक व्यक्ति नहीं हैं बल्कि भारत की राष्ट्रीय चेतना का हिस्सा हैं। उनकी आजाद हिंद फौज और उनका संघर्ष भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन की सबसे साहसिक घटनाओं में गिना जाता है।
लगभग अस्सी वर्ष बीत जाने के बाद भी यदि यह प्रश्न अनुत्तरित है कि रेनकोजी मंदिर में रखी अस्थियां वास्तव में नेताजी की हैं या नहीं तो यह स्वाभाविक है कि देश के नागरिक इसका स्पष्ट उत्तर चाहते हैं। पूर्व सांसद जवाहर सरकार का पत्र, नेताजी के परिवार की मांग और सुप्रीम कोर्ट में उठता यह मुद्दा इस बात का संकेत है कि यह रहस्य अभी समाप्त नहीं हुआ है।
इतिहास के कुछ प्रश्न ऐसे होते हैं जिन्हें समय के भरोसे नहीं छोड़ा जा सकता। उन्हें तथ्यों और वैज्ञानिक जांच के माध्यम से स्पष्ट करना ही पड़ता है। नेताजी की अस्थियों का रहस्य भी ऐसा ही प्रश्न है, एक ऐसा प्रश्न जिसका उत्तर केवल इतिहास के लिए नहीं बल्कि राष्ट्र की स्मृति और सत्य के लिए भी आवश्यक है।