धूर जैसे ‘भुतहा गांव’ में होली खेलने का प्रतीकात्मक संदेश अपनी जगह है लेकिन जब 2026 की जनगणना और उसके बाद सम्भावित परिसीमन उत्तराखण्ड की विधानसभा सीटों के भविष्य को प्रभावित कर सकता है, तब सवाल यह है कि अनिल बलूनी सरीखे ताकतवर सांसद क्यों राष्ट्रीय स्तर पर ऐसी संवैधानिक-राजनीतिक पहल नहीं करते, जिससे पहाड़ी क्षेत्रों का प्रतिनिधित्व सुरक्षित रह सके? पूर्वोत्तर के कई राज्यों में जनसंख्या आधारित कठोर फार्मूले से अलग व्यवस्था है। मुख्यमंत्री की कुर्सी को लेकर चल रही अंतहीन खींचतान, लॉबिंग और शक्ति-प्रदर्शन की राजनीति से इतर पलायन को लेकर कोई सार्थक परिणाम निकालने की मंशा है तो पूर्वोत्तर के राज्यों का मॉडल लागू करना होगा। अनिल बलूनी जैसे प्रभावशाली नेता यदि वास्तव में पहाड़ के भविष्य को लेकर चिंतित हैं तो उन्हें राष्ट्रीय नेतृत्व पर धारा 371 जैसी विशेष संवैधानिक व्यवस्था लागू कराने का दबाव बनाना चाहिए। अन्यथा 2026 के बाद सम्भावित परिसीमन उत्तराखण्ड की पहाड़ी अवधारणा को ही बदल सकता है
पौड़ी गढ़वाल से सांसद अनिल बलूनी जब धूर जैसे ‘भुतहा गांव’ में 28 फरवरी को होली खेलने पहुंचे तो यह एक भावनात्मक दृश्य था। कुछ परिवार, लौटे हुए प्रवासी, सूने घर और रंगों के बीच भविष्य की चिंता। बलूनी ने पलायन को स्वीकार किया, गांवों के खाली होने की बात कही और लौटकर बसने का आह्वान भी किया लेकिन इस पूरे प्रसंग का सबसे महत्वपूर्ण पहलू वह था, जिस पर राजनीतिक विमर्श अभी केंद्रित नहीं हुआ है, जनसंख्या घटने का राजनीतिक प्रतिनिधित्व पर प्रभाव और 2026 के बाद सम्भावित परिसीमन से पहाड़ की सीटों पर मंडराता खतरा।
2011 की जनगणना के अनुसार उत्तराखण्ड की कुल जनसंख्या लगभग 1.01 करोड़ थी। राज्य में 70 विधानसभा सीटें हैं। यदि कुल आबादी को 70 से विभाजित किया जाए तो औसतन प्रति विधायक लगभग 1.44 लाख लोगों का प्रतिनिधित्व निकलता है लेकिन यह आंकड़ा सतही है। वास्तविक चुनावी गणित मतदाताओं की संख्या पर आधारित होता है। हाल के चुनावों के समय राज्य में कुल मतदाता लगभग 82 से 83 लाख के बीच रहे हैं। इस हिसाब से औसतन एक विधानसभा क्षेत्र में लगभग 1.15 से 1.20 लाख मतदाता आते हैं।
फिर भी औसत तस्वीर पूरी सच्चाई नहीं बताती। पर्वतीय जिलों की कई सीटों पर मतदाता संख्या 40 से 60 हजार के बीच सिमटी हुई है जबकि हरिद्वार और ऊधमसिंह नगर जैसे मैदानी जिलों में अनेक सीटों पर यह संख्या डेढ़ लाख से अधिक है। पलायन का सीधा असर मतदाता सूची पर पड़ता है। जब लोग स्थायी रूप से देहरादून, हल्द्वानी, हरिद्वार या राज्य से बाहर बस जाते हैं तो उनके नाम पहाड़ी गांवों की सूची से हट जाते हैं। यही गिरती हुई संख्या भविष्य के परिसीमन में निर्णायक बन सकती है।
2026 के बाद जब नई जनगणना के आधार पर परिसीमन की प्रक्रिया आगे बढ़ेगी तो सम्भावना है कि जनसंख्या अनुपात के आधार पर सीटों का पुनर्संतुलन किया जाए। यदि ऐसा हुआ तो मैदानी क्षेत्रों में सीटें बढ़ सकती हैं और पर्वतीय क्षेत्रों में घट सकती हैं। यह केवल संख्या का बदलाव नहीं होगा वरन् यह नीति-निर्माण की प्राथमिकताओं में बदलाव होगा। विधानसभा में पहाड़ की आवाज कमजोर होगी तो विकास, संसाधन आवंटन और प्रशासनिक निर्णयों में भी उसका प्रभाव घटेगा।
ऐसे में पूर्वोत्तर के राज्यों का उदाहरण महत्वपूर्ण हो जाता है। सिक्किम की आबादी लगभग छह लाख है, फिर भी वहां 32 सदस्यीय विधानसभा है। इसका अर्थ है कि एक विधायक औसतन लगभग उन्नीस हजार लोगों का प्रतिनिधित्व करता है। अरुणाचल प्रदेश की आबादी लगभग चौदह लाख के आस-पास है लेकिन वहां 60 विधानसभा सीटें हैं और प्रति विधायक जनसंख्या लगभग तेईस हजार बैठती है। मिजोरम में लगभग ग्यारह लाख की आबादी पर 40 विधायक हैं, यानी एक विधायक करीब सत्ताईस हजार लोगों का प्रतिनिधित्व करता है।
नागालैंड में लगभग बीस लाख की आबादी के बावजूद 60 सदस्यीय विधानसभा है जहां प्रति विधायक औसतन तैंतीस हजार लोग आते हैं। मेघालय की लगभग तीस लाख की आबादी के लिए भी 60 विधायक हैं और प्रति विधायक प्रतिनिधित्व लगभग पचास हजार के आस-पास है। त्रिपुरा, जिसकी आबादी लगभग सैंतीस लाख है, वहां भी 60 सदस्यीय विधानसभा है और प्रति विधायक जनसंख्या लगभग इकसठ हजार के आसपास है।
इन राज्यों में प्रतिनिधित्व का पैमाना केवल जनसंख्या के कठोर गणित पर आधारित नहीं है। भौगोलिक दुर्गमता,
सांस्कृतिक-जनजातीय विशिष्टता और राष्ट्रीय सुरक्षा जैसे कारकों को ध्यान में रखते हुए संविधान के अनुच्छेद 371 के तहत विशेष प्रावधान किए गए। इन व्यवस्थाओं का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना था कि कम आबादी या बिखरी हुई आबादी वाले क्षेत्रों की राजनीतिक आवाज कमजोर न पड़े।
उत्तराखण्ड की परिस्थितियां भी कम जटिल नहीं हैं। राज्य का बड़ा हिस्सा पर्वतीय है, सीमावर्ती है, आपदा ग्रस्त रहता है और हजारों गांव पलायन की मार झेल रहे हैं। यदि प्रतिनिधित्व पूरी तरह जनसंख्या के आधार पर तय होगा तो जिन क्षेत्रों ने दशकों तक संसाधन दिए और सांस्कृतिक पहचान को जीवित रखा, वही क्षेत्र राजनीतिक रूप से हाशिए पर चले जाएंगे। यह दोहरी मार होगी, पहले विकास से वंचित होना और फिर प्रतिनिधित्व से भी।
ऐसे में अनिल बलूनी की भूमिका पर सवाल उठना स्वाभाविक है। वे राष्ट्रीय स्तर पर प्रभावशाली माने जाते हैं, प्रधानमंत्री और गृहमंत्री के करीबी समझे जाते हैं, पार्टी संगठन में मजबूत पकड़ रखते हैं। यदि वे सचमुच पहाड़ के भविष्य को लेकर चिंतित हैं तो उन्हें इस मुद्दे को राष्ट्रीय मंच पर उठाना चाहिए। धारा 371 जैसी संवैधानिक व्यवस्था, या कोई वैकल्पिक माॅडल, जिसके तहत पर्वतीय क्षेत्रों के लिए न्यूनतम विधानसभा सीटों की गारंटी हो, उस दिशा में एक कदम हो सकता है। इसके लिए संवैधानिक संशोधन की आवश्यकता होगी लेकिन
राजनीतिक इच्छाशक्ति हो तो यह असम्भव नहीं लेकिन राज्य की राजनीति का एक दूसरा चेहरा भी है, अंदरूनी खेमेबाजी। लम्बे समय से यह चर्चा है कि मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के खिलाफ एक मजबूत लाॅबी सक्रिय रहती है। इस धामी विरोधी लाॅबी में पूर्व मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत, तीरथ सिंह रावत, विधानसभा की वर्तमान अध्यक्ष ऋतु खण्डूड़ी और अन्य कुछ वरिष्ठ नेता शामिल माने जाते हैं। इन्हें दिल्ली दरबार में खासा प्रभाव रखने वाले बलूनी का समर्थन रहता है। पिछले दिनों रुद्रपुर के विधायक अरविंद पाण्डे के साथ इन नेताओं की सार्वजनिक मौजूदगी ने अंदरुनी गुटबाजी को खुलकर सतह पर लाने का काम किया।
यदि यह ऊर्जा मुख्यमंत्री की कुर्सी के समीकरण साधने में खर्च होती रही तो राज्य के दीर्घकालिक हित पीछे छूट जाएंगे। उत्तराखण्ड का सवाल केवल यह नहीं है कि मुख्यमंत्री कौन होगा? असली प्रश्न यह है कि भविष्य में पहाड़ का राजनीतिक प्रतिनिधित्व कितना बचेगा। यदि परिसीमन के बाद मैदानी सीटों की संख्या बढ़ती है तो स्वाभाविक रूप से नेतृत्व का केंद्र भी मैदान की ओर झुकेगा। तब यह सम्भव है कि उत्तराखण्ड का मुख्यमंत्री पहाड़ी क्षेत्र से न हो। यह केवल राजनीतिक परिवर्तन नहीं होगा, यह उस पहाड़ी राज्य की मूल अवधारणा पर प्रश्नचिह्न होगा, जिसके लिए अलग राज्य का आंदोलन चला था।
पलायन और प्रतिनिधित्व का संकट परस्पर जुड़ा हुआ है। जब गांव खाली होते हैं तो मतदाता घटते हैं। जब मतदाता घटते हैं तो परिसीमन में सीटें खतरे में पड़ती हैं और जब सीटें घटती हैं तो नीति-निर्माण में
प्राथमिकताएं बदलती हैं। इस चक्र को तोड़ने के लिए दो समानांतर रणनीतियां जरूरी हैं। पहला पहाड़ में स्थायी रोजगार और बुनियादी ढांचे का सशक्त विकास दूसरा राजनीतिक प्रतिनिधित्व की संवैधानिक सुरक्षा।
धूर गांव में होली मनाना प्रतीक है लेकिन प्रतीक तब इतिहास बनते हैं जब वे नीति में बदलें। यदि अनिल बलूनी और अन्य प्रभावशाली नेता सचमुच पहाड़ की चिंता करते हैं तो उन्हें व्यक्तिगत महत्वाकांक्षाओं से ऊपर उठकर राष्ट्रीय स्तर पर पहल करनी होगी। धारा 371 जैसी व्यवस्था की मांग उठाना आसान नहीं है, यह लम्बी संवैधानिक प्रक्रिया है। लेकिन यदि अभी चर्चा शुरू नहीं हुई तो 2026 के बाद बहुत देर हो सकती है।
उत्तराखण्ड आज एक चैराहे पर खड़ा है। एक रास्ता वही चित- परिचित रास्ता है, खेमेबाजी, शक्ति-संतुलन और कुर्सी की राजनीति। दूसरा रास्ता है संरचनात्मक सुधार, संवैधानिक सुरक्षा और पहाड़ी अवधारणा को स्थायी बनाना। इतिहास गवाह है कि जो राज्य अपने दीर्घकालिक हितों की रक्षा समय रहते नहीं करते, वे धीरे-धीरे अपने मूल स्वरूप को खो देते हैं।
अब यह देखना है कि अनिल बलूनी जैसे ताकतवर नेता किस राह का चुनाव करते हैं। क्या वे मुख्यमंत्री की कुर्सी के इर्द-गिर्द घूमती राजनीति से ऊपर उठकर उत्तराखण्ड के लिए विशेष संवैधानिक सुरक्षा की मांग करेंगे? या फिर धूर की होली केवल एक प्रतीक बनकर रह जाएगी जबकि आने वाले परिसीमन में पहाड़ की राजनीतिक जमीन खिसकती जाएगी?
यह केवल एक राजनीतिक बहस नहीं है बल्कि यह उस राज्य की आत्मा का प्रश्न है, जिसकी पहचान ही पहाड़ से है। यदि प्रतिनिधित्व का संतुलन बिगड़ा तो पहाड़ का भविष्य केवल भावनात्मक विमर्श तक सीमित रह जाएगा। निर्णय का समय अब है।

