प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और राजस्थान की पूर्व मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे की हालिया मुलाकात ने राजनीतिक गलियारों में नई चर्चाओं को जन्म दे दिया है। यह मुलाकात भले ही निजी और शिष्टाचार पूर्ण बताई जा रही हो लेकिन इसके राजनीतिक मायने भी तलाशे जा रहे हैं। खास तौर पर यह सवाल उठने लगा है कि क्या भाजपा नेतृत्व भविष्य में वसुंधरा राजे को किसी नई भूमिका में आगे बढ़ाने की तैयारी कर रहा है। चर्चा यह भी है कि क्या उन्हें संगठन में ही सक्रिय रखा जाएगा या फिर संसद की राजनीति में नई जिम्मेदारी दी जा सकती है। बताया जा रहा है कि यह मुलाकात बीते 9 मार्च की रात प्रधानमंत्री आवास पर हुई। इस दौरान वसुंधरा राजे अपने पूरे परिवार के साथ मौजूद थीं। तस्वीर में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने वसुंधरा राजे को अपने ठीक बगल में समान प्रकार की कुर्सी पर बैठाकर सम्मान दिया। इस मुलाकात को औपचारिक और पारिवारिक बताया गया है लेकिन इस मुलाकात की एक तस्वीर ने सियासी चर्चाओं को और हवा दे दी। राजनीतिक जानकार इस प्रतीकात्मक संकेत को भी अलग-अलग नजरिए से देख रहे हैं। कई विश्लेषकों का मानना है कि भाजपा नेतृत्व के साथ उनके रिश्ते अब भी मजबूत हैं और भविष्य में उन्हें फिर से बड़ी भूमिका दी जा सकती है। भले ही यह मुलाकात निजी बताई जा रही हो लेकिन भाजपा जैसे अनुशासित संगठन में वरिष्ठ नेताओं की हर गतिविधि को राजनीतिक नजर से देखा जाता है। वसुंधरा राजे लम्बे समय तक राजस्थान की राजनीति का बड़ा चेहरा रही हैं और राज्य में उनका व्यापक जनाधार माना जाता है। ऐसे में यह सवाल स्वाभाविक है कि पार्टी भविष्य में उनके अनुभव का उपयोग किस रूप में करती है। आने वाले समय में यह देखना दिलचस्प होगा कि क्या वसुंधरा राजे फिर किसी नई भूमिका में राष्ट्रीय राजनीति के मंच पर नजर आती हैं या नहीं।
बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के राज्यसभा जाने के फैसले के बाद प्रदेश के नए मुख्यमंत्री को लेकर कई नामों की चर्चा हो रही थी लेकिन बीते दिनों नीतीश कुमार की जमुई जनसभा में एक छोटा-सा दृश्य बड़े राजनीतिक सवाल खड़े कर गया। ‘समृद्धि यात्रा’ के दौरान सीएम खुद चलकर डिप्टी सीएम सम्राट चौधरी के पास पहुंचे, उनकी पीठ थपथपाई और बस यहीं से अटकलों का दौर शुरू हो गया है। सम्राट चौधरी का विनम्र अंदाज हाथ जोड़कर खड़े रहना भी इन कयासों को और हवा देता दिखा। इसके बाद से राजनीतिक हलकों में चर्चा जोरों पर है कि क्या नीतीश सम्राट चौधरी को सौंपेंगे कमान या यह साइलेंट गेम प्लान है? मीडिया और सोशल मीडिया पर वायरल हो रहे वीडियो को कई लोग राजनीतिक संकेत मान रहे हैं। हालांकि अभी तक किसी भी नेता की ओर से आधिकारिक प्रतिक्रिया नहीं आई है। ऐसे में यह सवाल बना हुआ है कि क्या यह सिर्फ एक सामान्य इशारा था या भविष्य की रणनीति? क्या सम्राट चौधरी बिहार की कमान सम्भालने वाले अगले नेता होंगे या फिर में फिर कोई खेला होने वाला है? राजनीतिक पंडितों का कहना है कि नीतीश जब भी कोई तूफानी करने वाले होते हैं तो किसी को अपनी रणनीति की भनक तक नहीं लगने देते। दिलचस्प बात यह है कि नीतीश कुमार पहले तेजस्वी यादव को भी इसी तरह आगे बढ़ा चुके हैं और उन्हें बिहार का भविष्य बताया था लेकिन बाद में सियासी समीकरण बदल गए। नीतीश कुमार की राजनीति को सरप्राइज फैक्टर के लिए जाना जाता है। ऐसे में जमुई का यह दृश्य महज संयोग है या किसी बड़े बदलाव का संकेत यह आने वाला वक्त ही बताएगा। जमुई की यह तस्वीर फिलहाल एक संकेत है, फैसला नहीं। बिहार की राजनीति में ‘खेला’ कब और कैसे होगा इस पर सभी की नजरें टिकी हैं। अब देखना है कि नीतीश का गेम प्लान बिहार और देश के लिए क्या है।
चुनाव से ठीक पहले असम के हिमंत बिस्वा सरमा के नेतृत्व वाली भाजपा सरकार ने करीब 40 लाख आर्थिक रूप से कमजोर महिलाओं के खातों में ‘ओरुनोदोई योजना’ के तहत 9-9 हजार रुपए ट्रांसफर किए हैं। यह राशि चार महीने की अग्रिम सहायता और ‘बिहू बोनस’ को मिलाकर दी गई है। योजना के तहत महिलाओं को हर महीने 1 हजार 250 रुपए मिलते हैं। इस बार जनवरी से अप्रैल तक की किस्त अग्रिम दी गई, साथ ही 4 हजार रुपए का विशेष ‘बिहू बोनस’ भी जोड़ा गया। गुवाहाटी में आयोजित कार्यक्रम में मुख्यमंत्री सरमा ने लाभार्थियों से संवाद करते हुए कहा कि अगर भाजपा को तीसरी बार जनादेश मिलता है तो राज्य में दो लाख नौकरियां दी जाएंगी और हर परिवार को मुफ्त राशन के रूप में नमक, चीनी, दाल, सरसों का तेल और चाय भी दी जाएगी। ऐसे में सवाल है कि क्या कांग्रेस बीजेपी के विजय रथ को रोक पाएगी। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि पिछले कुछ चुनावों से तकरीबन हर राज्य में महिलाओं के लिए विशेष योजना चलाई जा रही है जिसका असर भी दिख रहा है। ऐसी स्थिति में महिलाओं को केंद्र में रखकर चलाई जा रही कल्याणकारी योजनाएं असम की चुनावी राजनीति में बड़ा असर डाल सकती हैं। इस योजना के माॅडल को बिहार ने भी अपनाया और वहां विधानसभा चुनाव में एनडीए की जीत में यह एक अहम कारक माना गया। ऐसे में यह देखना दिलचस्प होगा कि असम में कांग्रेस भाजपा के इस चुनावी विजय रथ को रोक पाती है या नहीं।
झारखंड के मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन के असम दौरे ने राज्य की राजनीति में नई चर्चा छेड़ संकेत दिया है कि वह असम में अपनी राजनीतिक मौजूदगी बढ़ाने की दिशा में कदम बढ़ा सकते हैं। बिस्वनाथ जिले के मिजिका चाय बागान में आयोजित रैली में जय भारत पार्टी ने जेएमएम के साथ गठबंधन की घोषणा की। पार्टी के अध्यक्ष तेहारू गौर ने कहा कि दोनों दल मिलकर करीब 40 सीटों पर उम्मीदवार उतारने की योजना बना रहे हैं। दूसरी तरह रैली में हेमंत सोरेन ने आदिवासी एकता, सामाजिक न्याय और मतदान के महत्व पर जोर दिया तथा महंगाई, खासकर रसोई गैस की बढ़ती कीमतों का मुद्दा उठाया। हालांकि जब पत्रकारों ने उनसे पूछा कि क्या जेएमएम असम में चुनाव लड़ने की तैयारी कर रही है तो सोरेन ने स्पष्ट जवाब देने से बचते हुए कहा कि राजनीति परिस्थितियों के अनुसार चलती है और फैसले भी उसी हिसाब से लिए जाते हैं। इसके बाद से राजनीतिक हलकों में चर्चा है कि क्या झामुमो असम में चुनाव लड़ेगा? राजनीतिक पंडितों का कहना है कि यह रैली असम की राजनीति में एक नए समीकरण की ओर इशारा करती है। झारखंड की क्षेत्रीय पार्टी जेएमएम का उत्तर-पूर्व की राजनीति में सक्रिय होना आने वाले समय में चुनावी मुकाबले को और दिलचस्प बना सकता है।