इलेक्टोरल बाॅन्ड योजना खत्म होने के बावजूद राजनीतिक चंदे का बड़ा हिस्सा सत्ता के आस-पास ही सिमटा हुआ है। 2024-25 में सत्ताधारी भाजपा को कुल चंदे का 82 प्रतिशत मिला जबकि विपक्षी दल संसाधनों के संकट से जूझते दिखे। उड़ीसा में बीजू जनता दल का सत्ता से बाहर होते ही चंदा लगभग समाप्त हो जाना इस पूरे तंत्र पर गम्भीर सवाल खड़े करता है
इलेक्टोरल बाॅन्ड योजना को असंवैधानिक घोषित किए जाने के बाद यह उम्मीद की जा रही थी कि भारतीय राजनीति में राजनीतिक फंडिंग के स्वरूप में बदलाव आएगा और सत्ता तथा पूंजी के बीच बने असंतुलन पर कुछ हद तक अंकुश लगेगा। सुप्रीम कोर्ट के फैसले को पारदर्शिता की दिशा में एक बड़ा कदम माना गया था। लेकिन चुनाव आयोग को सौंपे गए 2024-25 के योगदान और ऑडिट आंकड़े यह संकेत देते हैं कि इलेक्टोरल बाॅन्ड भले ही समाप्त हो गए हों लेकिन राजनीतिक चंदे का प्रवाह अब भी उसी दिशा में बह रहा है जहां सत्ता केंद्रित है।
चुनाव आयोग के रिकाॅर्ड के अनुसार वर्ष 2024-25 में भारतीय जनता पार्टी को कुल 6,088 करोड़ रुपए का चंदा प्राप्त हुआ। इसके मुकाबले कांग्रेस को 522 करोड़ रुपए का योगदान मिला। यह अंतर केवल दो दलों के बीच संसाधनों की तुलना नहीं है बल्कि यह उस व्यापक राजनीतिक परिदृश्य को दर्शाता है जिसमें सत्ताधारी दल और विपक्षी दलों के बीच आर्थिक असमानता लगातार बढ़ती जा रही है।
आंकड़ों के अनुसार 2024-25 में देश के सभी राजनीतिक दलों को मिले कुल चंदे का लगभग 82 प्रतिशत हिस्सा भाजपा के खाते में गया। शेष 18 प्रतिशत में कांग्रेस सहित डीएमके, टीमसी, बीआरएस, टीडीपी, आप, वाम दल और अन्य क्षेत्रीय दलों को हिस्सेदारी करनी पड़ी। भाजपा को प्राप्त कुल चंदा न केवल कांग्रेस से कई गुना अधिक रहा बल्कि विपक्षी दलों के संयुक्त चंदे से भी काफी आगे निकल गया।
यह स्थिति तब सामने आई है, जब इलेक्टोरल बॉन्ड योजना समाप्त हो चुकी है और राजनीतिक दलों को मिलने वाले चंदे के स्रोतों को अपेक्षाकृत अधिक पारदर्शी माना जा रहा था। लेकिन व्यवहार में बाॅन्ड की जगह अब इलेक्टोरल ट्रस्टों ने ले ली है। प्रूडेंट इलेक्टोरल ट्रस्ट, प्रोग्रेसिव इलेक्ट्रोरल ट्रस्ट और न्यू डेमोक्रेटिक इलेक्ट्रोरल ट्रस्ट जैसे ट्रस्ट 2024-25 में राजनीतिक फंडिंग के प्रमुख माध्यम बनकर उभरे हैं।
चुनाव आयोग के आंकड़े बताते हैं कि प्रूडेंट इलेक्ट्रीराल ट्रस्ट ने 2024-25 में 2,668 करोड़ रुपए से अधिक की राशि राजनीतिक दलों में वितरित की। इसमें से लगभग 2,180 करोड़ रुपए भाजपा को प्राप्त हुए। प्रोग्रेसिव इलेक्ट्रीराल ट्रस्ट और अन्य ट्रस्टों से आए धन का बड़ा हिस्सा भी भाजपा के खाते में गया। कांग्रेस और अन्य विपक्षी दलों को इन ट्रस्ट्स से सीमित राशि ही मिल सकी।
इन आंकड़ों से यह स्पष्ट होता है कि इलेक्टोरल ट्रस्टों के माध्यम से आने वाला अधिकांश धन सत्ताधारी दल के आसपास केंद्रित है। हालांकि यह व्यवस्था कागजों में पारदर्शी मानी जाती है लेकिन वितरण के पैटर्न यह संकेत देते हैं कि राजनीतिक चंदे का झुकाव अब भी सत्ता की ओर बना हुआ है।
राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि चुनावी राजनीति में धन की भूमिका लगातार बढ़ती जा रही है। प्रचार, डिजिटल अभियान, संगठन विस्तार और जमीनी स्तर पर गतिविधियों के लिए बड़े संसाधनों की आवश्यकता होती है। ऐसे में जिस दल के पास अधिक वित्तीय संसाधन होते हैं, उसकी चुनावी क्षमता स्वाभाविक रूप से बढ़ जाती है। यह स्थिति विपक्षी दलों के लिए असमान प्रतिस्पर्धा का कारण बन रही है।
इस पूरे परिदृश्य को समझने में उड़ीसा का उदाहरण महत्वपूर्ण माना जा रहा है। बीजू जनता दल लम्बे समय तक उड़ीसा की सत्ता में रही। सत्ता में रहते हुए पार्टी को इलेक्टोरल ट्रस्ट और अन्य स्रोतों से नियमित चंदा मिलता रहा लेकिन 2024 में सत्ता से बाहर होने के बाद 2024-25 के आंकड़ों में बीजेडी को मिलने वाला चंदा लगभग समाप्त हो गया।
चुनाव आयोग के रिकाॅर्ड के अनुसार, बीजेडी को 2024-25 में मिलने वाला योगदान नगण्य स्तर पर आ गया। यह बदलाव ऐसे समय में हुआ है, जब पार्टी का संगठन और उसका जनाधार पूरी तरह समाप्त नहीं हुआ है। राजनीतिक पर्यवेक्षकों के अनुसार, यह स्थिति यह संकेत देती है कि राजनीतिक चंदे का प्रवाह अब सत्ता की स्थिति से गहराई से जुड़ा हुआ है।
इलेक्टोरल बॉन्ड योजना के दौरान भी यह आरोप लगता रहा था कि कॉरपोरेट दानदाता सत्ता के करीबी दलों को प्राथमिकता देते हैं। सुप्रीम कोर्ट ने फरवरी 2024 में अपने फैसले में यह कहा था कि मतदाताओं को यह जानने का अधिकार है कि राजनीतिक दलों को धन कौन दे रहा है। इसके बाद यह उम्मीद की जा रही थी कि राजनीतिक फंडिंग में संतुलन आएगा। लेकिन बाॅन्ड के बाद के आंकड़े बताते हैं कि संरचना बदली है, प्रवृत्ति नहीं।
राजनीतिक वैज्ञानिक मिलन वैष्णव ने अपनी पुस्तक मनी एंड मसल्स पावर (Money and Muscle Power) में भारतीय राजनीति में धन की भूमिका पर विस्तार से चर्चा की है। पुस्तक में यह उल्लेख किया गया है कि भारत में चुनावी राजनीति में पैसा केवल प्रचार का साधन नहीं बल्कि सत्ता तक पहुंचने और सत्ता में बने रहने का एक महत्वपूर्ण कारक बन चुका है। राजनीतिक चंदे का प्रवाह अक्सर इस आकलन पर आधारित होता है कि कौन-सा दल सत्ता में है या सत्ता में आने की सम्भावना रखता है। इलेक्टोरल ट्रस्टों के आंकड़े भी इसी प्रवृत्ति की ओर संकेत करते हैं। सत्ताधारी दल को मिलने वाला भारी चंदा और विपक्षी दलों को सीमित संसाधन यह दर्शाते हैं कि राजनीतिक फंडिंग का संतुलन अब भी असमान बना हुआ है। इससे चुनावी प्रक्रिया की निष्पक्षता को लेकर सवाल उठ रहे हैं। इस पूरे मामले में सुप्रीम कोर्ट और चुनाव आयोग की भूमिका भी महत्वपूर्ण मानी जा रही है। सुप्रीम कोर्ट ने जहां इलेक्टोरल बाॅन्ड पर रोक लगाकर पारदर्शिता की दिशा में कदम उठाया, वहीं चुनाव आयोग ने बाॅन्ड और ट्रस्टों से जुड़े आंकड़े सार्वजनिक कर राजनीतिक फंडिंग की स्थिति को सामने रखा। हालांकि विशेषज्ञों का कहना है कि केवल आंकड़े सार्वजनिक करना पर्याप्त नहीं है। राजनीतिक फंडिंग के मौजूदा ढांचे में सुधार के लिए व्यापक नीतिगत कदमों की आवश्यकता है ताकि सत्ता और विपक्ष के बीच संसाधनों की खाई कम की जा सके।
वर्तमान स्थिति में यह साफ दिखता है कि सत्ताधारी दल के पास संसाधनों की भरपूर उपलब्धता है जबकि विपक्षी दल सीमित संसाधनों के साथ चुनावी मुकाबले में उतरने को मजबूर हैं। यह असंतुलन लोकतांत्रिक प्रक्रिया पर प्रभाव डाल सकता है क्योंकि चुनावी प्रतिस्पर्धा का आधार समान नहीं रह जाता।
उड़ीसा में बीजू जनता दल के उदाहरण को लेकर राजनीतिक हलकों में चर्चा है कि सत्ता से बाहर होने के बाद पार्टी को मिलने वाला चंदा लगभग समाप्त हो जाना राजनीतिक फंडिंग की मौजूदा संरचना को उजागर करता है। इसे केवल एक राज्य या एक दल का मामला नहीं माना जा रहा बल्कि इसे राष्ट्रीय स्तर पर उभरती प्रवृत्ति के रूप में देखा जा रहा है।
इलेक्टोरल बाॅन्ड खत्म होने के बाद भी राजनीतिक चंदे का यह पैटर्न यह सवाल खड़ा करता है कि क्या मौजूदा व्यवस्था वास्तव में लोकतांत्रिक संतुलन को मजबूत कर पा रही है। जब चंदे का बड़ा हिस्सा सत्ता के आस-पास केंद्रित हो तो विपक्षी राजनीति के लिए चुनौतियां बढ़ना स्वाभाविक है। चुनाव आयोग के 2024-25 के आंकड़े यह संकेत देते हैं कि राजनीतिक चंदे की दिशा में अभी भी व्यापक सुधार की आवश्यकता है। इलेक्टोरल ट्रस्टों के माध्यम से होने वाले दान पर निगरानी, चंदे की सीमा और वितरण के संतुलन जैसे मुद्दे आने वाले समय में राजनीतिक बहस के केंद्र में रह सकते हैं।
फिलहाल उपलब्ध आंकड़े यह दर्शाते हैं कि इलेक्टोरल बाॅन्ड के बाद भी राजनीतिक फंडिंग की बुनियादी संरचना में बड़ा बदलाव नहीं आया है। सत्ता में बैठे दल को भारी चंदा और विपक्षी दलों को सीमित संसाधन मिलने की स्थिति बनी हुई है। यह परिदृश्य भारतीय लोकतंत्र में राजनीतिक वित्तपोषण को लेकर जारी बहस को और तेज करता है।
आंकड़ों के अनुसार 2024-25 में देश के सभी राजनीतिक दलों को मिले कुल चंदे का लगभग 82 प्रतिशत हिस्सा भाजपा के खाते में गया। शेष 18 प्रतिशत में कांग्रेस सहित डीएमके, टीमसी, बीआरएस, टीडीपी, आप, वाम दल और अन्य क्षेत्रीय दलों को हिस्सेदारी करनी पड़ी। भाजपा को प्राप्त कुल चंदा न केवल कांग्रेस से कई गुना अधिक रहा बल्कि विपक्षी दलों के संयुक्त चंदे से भी काफी आगे निकल गया।
यह स्थिति तब सामने आई है, जब इलेक्टोरल बॉन्ड योजना समाप्त हो चुकी है और राजनीतिक दलों को मिलने वाले चंदे के स्रोतों को अपेक्षाकृत अधिक पारदर्शी माना जा रहा था। लेकिन व्यवहार में बाॅन्ड की जगह अब इलेक्टोरल ट्रस्टों ने ले ली है। प्रूडेंट इलेक्टोरल ट्रस्ट, प्रोग्रेसिव इलेक्ट्रोरल ट्रस्ट और न्यू डेमोक्रेटिक इलेक्ट्रोरल ट्रस्ट जैसे ट्रस्ट 2024-25 में राजनीतिक फंडिंग के प्रमुख माध्यम बनकर उभरे हैं।
चुनाव आयोग के आंकड़े बताते हैं कि प्रूडेंट इलेक्ट्रीराल ट्रस्ट ने 2024-25 में 2,668 करोड़ रुपए से अधिक की राशि राजनीतिक दलों में वितरित की। इसमें से लगभग 2,180 करोड़ रुपए भाजपा को प्राप्त हुए। प्रोग्रेसिव इलेक्ट्रीराल ट्रस्ट और अन्य ट्रस्टों से आए धन का बड़ा हिस्सा भी भाजपा के खाते में गया। कांग्रेस और अन्य विपक्षी दलों को इन ट्रस्ट्स से सीमित राशि ही मिल सकी।
इन आंकड़ों से यह स्पष्ट होता है कि इलेक्टोरल ट्रस्टों के माध्यम से आने वाला अधिकांश धन सत्ताधारी दल के आसपास केंद्रित है। हालांकि यह व्यवस्था कागजों में पारदर्शी मानी जाती है लेकिन वितरण के पैटर्न यह संकेत देते हैं कि राजनीतिक चंदे का झुकाव अब भी सत्ता की ओर बना हुआ है।
राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि चुनावी राजनीति में धन की भूमिका लगातार बढ़ती जा रही है। प्रचार, डिजिटल अभियान, संगठन विस्तार और जमीनी स्तर पर गतिविधियों के लिए बड़े संसाधनों की आवश्यकता होती है। ऐसे में जिस दल के पास अधिक वित्तीय संसाधन होते हैं, उसकी चुनावी क्षमता स्वाभाविक रूप से बढ़ जाती है। यह स्थिति विपक्षी दलों के लिए असमान प्रतिस्पर्धा का कारण बन रही है।
इस पूरे परिदृश्य को समझने में उड़ीसा का उदाहरण महत्वपूर्ण माना जा रहा है। बीजू जनता दल लम्बे समय तक उड़ीसा की सत्ता में रही। सत्ता में रहते हुए पार्टी को इलेक्टोरल ट्रस्ट और अन्य स्रोतों से नियमित चंदा मिलता रहा लेकिन 2024 में सत्ता से बाहर होने के बाद 2024-25 के आंकड़ों में बीजेडी को मिलने वाला चंदा लगभग समाप्त हो गया।
चुनाव आयोग के रिकाॅर्ड के अनुसार, बीजेडी को 2024-25 में मिलने वाला योगदान नगण्य स्तर पर आ गया। यह बदलाव ऐसे समय में हुआ है, जब पार्टी का संगठन और उसका जनाधार पूरी तरह समाप्त नहीं हुआ है। राजनीतिक पर्यवेक्षकों के अनुसार, यह स्थिति यह संकेत देती है कि राजनीतिक चंदे का प्रवाह अब सत्ता की स्थिति से गहराई से जुड़ा हुआ है।
इलेक्टोरल बॉन्ड योजना के दौरान भी यह आरोप लगता रहा था कि कॉरपोरेट दानदाता सत्ता के करीबी दलों को प्राथमिकता देते हैं। सुप्रीम कोर्ट ने फरवरी 2024 में अपने फैसले में यह कहा था कि मतदाताओं को यह जानने का अधिकार है कि राजनीतिक दलों को धन कौन दे रहा है। इसके बाद यह उम्मीद की जा रही थी कि राजनीतिक फंडिंग में संतुलन आएगा। लेकिन बाॅन्ड के बाद के आंकड़े बताते हैं कि संरचना बदली है, प्रवृत्ति नहीं।
राजनीतिक वैज्ञानिक मिलन वैष्णव ने अपनी पुस्तक मनी एंड मसल्स पावर (Money and Muscle Power) में भारतीय राजनीति में धन की भूमिका पर विस्तार से चर्चा की है। पुस्तक में यह उल्लेख किया गया है कि भारत में चुनावी राजनीति में पैसा केवल प्रचार का साधन नहीं बल्कि सत्ता तक पहुंचने और सत्ता में बने रहने का एक महत्वपूर्ण कारक बन चुका है। राजनीतिक चंदे का प्रवाह अक्सर इस आकलन पर आधारित होता है कि कौन-सा दल सत्ता में है या सत्ता में आने की सम्भावना रखता है। इलेक्टोरल ट्रस्टों के आंकड़े भी इसी प्रवृत्ति की ओर संकेत करते हैं। सत्ताधारी दल को मिलने वाला भारी चंदा और विपक्षी दलों को सीमित संसाधन यह दर्शाते हैं कि राजनीतिक फंडिंग का संतुलन अब भी असमान बना हुआ है। इससे चुनावी प्रक्रिया की निष्पक्षता को लेकर सवाल उठ रहे हैं। इस पूरे मामले में सुप्रीम कोर्ट और चुनाव आयोग की भूमिका भी महत्वपूर्ण मानी जा रही है। सुप्रीम कोर्ट ने जहां इलेक्टोरल बाॅन्ड पर रोक लगाकर पारदर्शिता की दिशा में कदम उठाया, वहीं चुनाव आयोग ने बाॅन्ड और ट्रस्टों से जुड़े आंकड़े सार्वजनिक कर राजनीतिक फंडिंग की स्थिति को सामने रखा। हालांकि विशेषज्ञों का कहना है कि केवल आंकड़े सार्वजनिक करना पर्याप्त नहीं है। राजनीतिक फंडिंग के मौजूदा ढांचे में सुधार के लिए व्यापक नीतिगत कदमों की आवश्यकता है ताकि सत्ता और विपक्ष के बीच संसाधनों की खाई कम की जा सके।
वर्तमान स्थिति में यह साफ दिखता है कि सत्ताधारी दल के पास संसाधनों की भरपूर उपलब्धता है जबकि विपक्षी दल सीमित संसाधनों के साथ चुनावी मुकाबले में उतरने को मजबूर हैं। यह असंतुलन लोकतांत्रिक प्रक्रिया पर प्रभाव डाल सकता है क्योंकि चुनावी प्रतिस्पर्धा का आधार समान नहीं रह जाता।
उड़ीसा में बीजू जनता दल के उदाहरण को लेकर राजनीतिक हलकों में चर्चा है कि सत्ता से बाहर होने के बाद पार्टी को मिलने वाला चंदा लगभग समाप्त हो जाना राजनीतिक फंडिंग की मौजूदा संरचना को उजागर करता है। इसे केवल एक राज्य या एक दल का मामला नहीं माना जा रहा बल्कि इसे राष्ट्रीय स्तर पर उभरती प्रवृत्ति के रूप में देखा जा रहा है।
इलेक्टोरल बाॅन्ड खत्म होने के बाद भी राजनीतिक चंदे का यह पैटर्न यह सवाल खड़ा करता है कि क्या मौजूदा व्यवस्था वास्तव में लोकतांत्रिक संतुलन को मजबूत कर पा रही है। जब चंदे का बड़ा हिस्सा सत्ता के आस-पास केंद्रित हो तो विपक्षी राजनीति के लिए चुनौतियां बढ़ना स्वाभाविक है। चुनाव आयोग के 2024-25 के आंकड़े यह संकेत देते हैं कि राजनीतिक चंदे की दिशा में अभी भी व्यापक सुधार की आवश्यकता है। इलेक्टोरल ट्रस्टों के माध्यम से होने वाले दान पर निगरानी, चंदे की सीमा और वितरण के संतुलन जैसे मुद्दे आने वाले समय में राजनीतिक बहस के केंद्र में रह सकते हैं।
फिलहाल उपलब्ध आंकड़े यह दर्शाते हैं कि इलेक्टोरल बाॅन्ड के बाद भी राजनीतिक फंडिंग की बुनियादी संरचना में बड़ा बदलाव नहीं आया है। सत्ता में बैठे दल को भारी चंदा और विपक्षी दलों को सीमित संसाधन मिलने की स्थिति बनी हुई है। यह परिदृश्य भारतीय लोकतंत्र में राजनीतिक वित्तपोषण को लेकर जारी बहस को और तेज करता है।

