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राजकुमार गिरफ्तार, पुरी का हिला संसार

पुलिस हिरासत में प्रिंस एंड्रयू और सकते में हरदीप सिंह पुरी
एपस्टीन फाइल्स के नए खुलासों के बाद प्रिंस एंड्रयू की गिरफ्तारी ने ब्रिटेन से लेकर अमेरिका और भारत तक राजनीतिक हलचल तेज कर दी है। ब्रिटेन के किंग चाल्र्स ने अपने भाई से जुड़े मामले में हस्तक्षेप न करते हुए साफ कहा है कि कानून अपना काम करेगा। राजकुमार की गिरफ्तारी बाद बिल गेट्स पर बढ़ते सवालों और भारत आयोजित एआई समिट से उनकी दूरी के बीच केंद्रीय मंत्री हरदीप सिंह पुरी पर भी त्यागपत्र देने का दबाव बढ़ने लगा है


ब्रिटेन में राजनीतिक और संवैधानिक हलचल इस समय और तेज हो चली हैं क्योंकि किंग चाल्र्स के भाई एंड्रयू माउंटबेटन विंडसर को एपस्टीन फाइल्स से जुड़े खुलासों के बाद गिरफ्तार कर लिया गया है। ब्रिटिश जांच एजेंसियों ने उनके पुराने सम्पर्कों और आधिकारिक दौरों से जुड़े दस्तावेजों के बाद यह अविश्वसनीय सा प्रतीत होने वाला कदम उठा पूरी दुनिया को सकते में डाल दिया है।

इस पूरे घटनाक्रम के बीच सबसे महत्वपूर्ण तथ्य यह कि ब्रिटेन के महाराजा चार्ल्स तृतीय ने किसी भी प्रकार के हस्तक्षेप से स्पष्ट इनकार कर दिया। बकिंघम पैलेस की ओर से संकेत दिया गया कि राजा इस मामले में दखल नहीं देंगे और ‘कानून अपना काम करेगा।’ यह बयान इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि इससे राजशाही की संवैधानिक निष्पक्षता और न्यायिक प्रक्रिया की स्वतंत्रता पर सार्वजनिक भरोसा मजबूत करने की कोशिश दिखाई देती है।

प्रिंस एंड्रयू के खिलाफ आरोपों का केंद्र यह है कि उनके और दिवंगत अमेरिकी फाइनेंसर जेफ्री एडवर्ड एपस्टीन एपस्टीन के बीच सम्पर्क थे। सार्वजनिक दस्तावेजों में 2010-11 के दौरान सम्पर्कों और मुलाकातों का उल्लेख सामने आया है। हालांकि गिरफ्तारी या पूछताछ दोष सिद्ध होने का प्रमाण नहीं है लेकिन यह स्पष्ट संकेत है कि मामला अब औपचारिक कानूनी जांच के दायरे में है।

एपस्टीन प्रकरण की जड़ें अमेरिका में हैं, जहां जैफरी एपस्टीन पर नाबालिग लड़कियों के यौन शोषण और मानव तस्करी के गम्भीर आरोप लगे थे। 2019 में गिरफ्तारी के बाद उसकी जेल में मृत्यु हो गई लेकिन उसके बाद अदालतों में प्रस्तुत दस्तावेजों और गवाहियों ने एक व्यापक नेटवर्क की ओर संकेत किया।

‘एपस्टीन फाइल्स’ के नाम से चर्चित इन दस्तावेजों में उड़ानों के लाॅग, ईमेल, मीटिंग रिकाॅर्ड और कई प्रभावशाली व्यक्तियों के नाम शामिल हैं। यह ध्यान रखना आवश्यक है कि किसी का नाम इन फाइलों में आने का अर्थ स्वतः आपराधिक दोष सिद्ध होना नहीं है लेकिन इससे राजनीतिक, सामाजिक और नैतिक सवाल अवश्य खड़े होते हैं।
इन्हीं नामों में माइक्रोसाॅफ्ट के सह संस्थापक बिल गेट्स का उल्लेख भी सामने आया। गेट्स पहले सार्वजनिक रूप से स्वीकार कर चुके हैं कि उन्होंने एपस्टीन से मुलाकात की थी लेकिन उन्होंने स्पष्ट कहा है कि वे उस सम्बंध को ‘गलती’ मानते हैं और किसी भी अवैध गतिविधि से उनका कोई सम्बंध नहीं रहा।

नए दस्तावेजों में ईमेल सम्पर्कों और सामाजिक बैठकों के संदर्भ सामने आने के बाद उन पर सार्वजनिक दबाव बढ़ा। आलोचकों का आरोप है कि इतनी गम्भीर पृष्ठभूमि वाले व्यक्ति से सम्पर्क बनाए रखना नैतिक रूप से प्रश्न खड़े करता है। हालांकि उनके खिलाफ किसी आपराधिक संलिप्तता का प्रत्यक्ष प्रमाण सार्वजनिक रूप से सामने नहीं आया है।

भारत में आयोजित ‘एआई इम्पैक्ट समिट’ में उनका मुख्य भाषण प्रस्तावित था। बढ़ते विवाद और सम्भावित विरोध की आशंका के बीच उन्होंने कार्यक्रम में भाग नहीं लेने का निर्णय लिया। आधिकारिक तौर पर इसे कार्यक्रमगत कारण बताया गया लेकिन विश्लेषकों का मानना है कि यह निर्णय विवाद की तीव्रता को देखते हुए छवि प्रबंधन का हिस्सा था। यह स्पष्ट है कि एपस्टीन प्रकरण केवल अदालतों तक सीमित नहीं है, यह प्रतिष्ठा और सार्वजनिक विश्वास पर भी असर डाल रहा है।

भारत में यह मुद्दा तब राजनीतिक बहस का केंद्र बना जब केंद्रीय मंत्री हरदीप सिंह पुरी का नाम भी एपस्टीन से जुड़े सम्पर्कों के संदर्भ में आ चुका है। शुरुआत में इस विषय पर स्पष्ट और विस्तृत जानकारी सामने नहीं आई। बाद में मीडिया के बढ़ते सवालों के बीच हरदीप पुरी ने बयान देते हुए स्वीकार किया कि वे एपस्टीन से तीन-चार बार मिले थे। उन्होंने यह भी कहा कि ये मुलाकातें राजनयिक और औपचारिक संदर्भ में थीं तथा उनका किसी भी अवैध गतिविधि से कोई सम्बंध नहीं है।

विपक्ष इस पूरे प्रकरण पर सरकार, विशेषकर प्रधानमंत्री मोदी पर हमलावर है। राहुल गांधी का कहना है कि पुरी द्वारा जान-बूझकर जानकारी सार्वजनिक नहीं की गई और बाद में मीडिया के दबाव में बयान दिए गए। इसी आधार पर नैतिक जवाबदेही और इस्तीफे की मांग विपक्षी दल कर रहे हैं। फिलहाल उपलब्ध सार्वजनिक जानकारी में ऐसा कोई प्रत्यक्ष आपराधिक साक्ष्य सामने नहीं आया है जो तत्काल इस्तीफे को अनिवार्य बनाए लेकिन अंतरराष्ट्रीय घटनाओं, विशेषकर प्रिंस एंड्रयू की गिरफ्तारी और बिल गेट्स के कार्यक्रम से दूरी, ने इस बहस को और तीखा बना दिया है।

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यदि भविष्य में और ठोस दस्तावेज सामने आते हैं तो दबाव बढ़ सकता है। अन्यथा मामला संसदीय बहस, स्पष्टीकरण और राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप तक सीमित रह सकता है। ब्रिटेन में किंग चाल्र्स द्वारा ‘कानून अपना काम करेगा’ कहकर दूरी बनाना इस पूरे प्रकरण का सबसे
प्रतीकात्मक संदेश है कि चाहे राजपरिवार हो, उद्योग जगत हो या राजनीति, एपस्टीन प्रकरण ने प्रभावशाली नामों को भी सार्वजनिक जांच के दायरे में ला खड़ा किया है। भारत में भी अब यह प्रश्न उठ रहा है कि क्या नैतिक जवाबदेही केवल कानूनी दोष सिद्ध होने पर तय होगी या फिर सार्वजनिक विश्वास के आधार पर भी।

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