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वह आवाज जिसे हमने पहचानने में देर कर दी एक उपेक्षित किंतु अमर स्वर की स्मृति में

इकत्तीस मई 2026 की शाम भारतीय संगीत जगत के लिए एक और उदास खबर लेकर आई। हिंदी और मराठी फिल्मों की महान पाश्र्व गायिका सुमन कल्याणपुर ने मुम्बई स्थित अपने निवास पर 89 वर्ष की आयु में अंतिम सांस ली। उनके निधन के साथ भारतीय फिल्म संगीत के स्वर्णिम युग का एक और अध्याय हमेशा के लिए बंद हो गया। उनके जाने के बाद अचानक अखबारों, चैनलों और सोशल मीडिया पर उनके गीत गूंजने लगे। लोग लिखने लगे कि वे कितनी बड़ी गायिका थीं। श्रद्धांजलियों का सिलसिला शुरू हुआ लेकिन यह प्रश्न भी उतनी ही मजबूती से सामने आया कि यदि वे इतनी महान थीं तो फिर उन्हें उनके जीवनकाल में वह स्थान क्यों नहीं मिला जिसकी वे पूरी तरह अधिकारी थीं?

सुमन कल्याणपुर की कहानी केवल एक गायिका की कहानी नहीं है। यह भारतीय फिल्म संगीत की उस विडम्बना की कहानी भी है जिसमें कई बार असाधारण प्रतिभाएं लोकप्रियता की राजनीति और स्थापित नामों की छाया में दब जाती हैं।

28 जनवरी 1937 को ब्रिटिश भारत के ढाका में जन्मी सुमन हेम्मडी बाद में सुमन कल्याणपुर बनीं। उनका परिवार संगीत प्रेमी था और बचपन से ही उन्हें शास्त्रीय संगीत का वातावरण मिला। विभाजन के बाद परिवार मुम्बई आ गया। यहां उन्होंने संगीत की विधिवत शिक्षा प्राप्त की और धीरे-धीरे फिल्म संगीत की दुनिया में अपने लिए जगह बनाई।

पचास के दशक के उत्तरार्ध में उन्होंने पाश्र्व गायन शुरू किया। शुरुआती दौर में उन्हें सीमित अवसर मिले लेकिन उनकी आवाज की मिठास और सुरों पर असाधारण पकड़ ने जल्द ही संगीतकारों का ध्यान आकर्षित किया। नौशाद, रोशन, मदन मोहन, रवि, चित्रगुप्त, शंकर- जयकिशन और लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल जैसे संगीतकारों ने समय-समय पर उनकी प्रतिभा का उपयोग किया लेकिन सुमन कल्याणपुर के जीवन का सबसे बड़ा सौभाग्य और सबसे बड़ा दुर्भाग्य एक ही चीज बनी, उनकी आवाज। उनकी आवाज में ऐसी पारदर्शिता, ऐसी कोमलता और ऐसी सुर-सिद्धता थी कि उसमें लता मंगेशकर के स्वर की झलक महसूस होती थी। यह समानता शुरू में प्रशंसा का कारण बनी लेकिन धीरे-धीरे यही उनके लिए एक अदृश्य दीवार बन गई। हजारों नहीं, लाखों श्रोताओं ने वर्षों तक उनके गीतों को लता मंगेशकर का गीत समझकर सुना।

आज भी यदि किसी संगीत प्रेमी से पूछा जाए कि ‘ना तुम हमें जानो’, ‘ना ना करते प्यार तुम ही से कर बैठे’, ‘मेरा प्यार भी तू है’, ‘दिल ने फिर याद किया’, ‘तुमने पुकारा और हम चले आए’, ‘अजहुं न आए बालमा’, ‘परबतों के पेड़ों पर शाम का बसेरा है’ या ‘आजकल तेरे मेरे प्यार के चर्चे’ किसने गाए हैं तो बहुत से लोग ठिठक जाते हैं। उन्हें आश्चर्य होता है कि ये गीत सुमन कल्याणपुर के स्वर में हैं। यह किसी कलाकार के लिए सबसे विचित्र त्रासदी होगी कि उसकी सबसे बड़ी उपलब्धियां भी किसी और के खाते में लिख दी जाएं।

साठ के दशक में एक महत्वपूर्ण मोड़ आया। राॅयल्टी और पारिश्रमिक के मुद्दे पर मोहम्मद रफी और लता मंगेशकर के बीच मतभेद हो गए। दोनों ने कुछ समय तक साथ गाना बंद कर दिया। संगीतकारों के सामने संकट था कि रफी साहब के साथ कौन गाएगा। तब सबकी नजर सुमन कल्याणपुर पर गई। यही वह समय था जब हिंदी फिल्म संगीत को कुछ ऐसे अमर गीत मिले जो आज भी संगीत प्रेमियों की जुबान पर हैं। रफी और सुमन की जोड़ी ने एक से बढ़कर एक गीत दिए। कहा जाता है कि दोनों ने लगभग डेढ़ सौ के आस-पास युगल गीत रिकाॅर्ड किए।

‘ना ना करते प्यार तुम ही से कर बैठे’, ‘तुमने पुकारा और हम चले आए’, ‘दिल ने फिर याद किया’, ‘आजकल तेरे मेरे प्यार के चर्चे’, ‘तुझको दिलबरी की कसम’, ‘चांद तकता है इधर’, ‘तुमसे ओ हसीना’ जैसे गीतों ने उन्हें घर-घर पहुंचा दिया। विडम्बना यह रही कि इन गीतों की लोकप्रियता तो बढ़ती गई लेकिन गायिका का नाम उतनी मजबूती से लोगों की स्मृति में दर्ज नहीं हो पाया। उनके बारे में एक मशहूर किस्सा अक्सर सुनाया जाता है। फिल्म बात ‘एक रात की’ का गीत ‘ना तुम हमें जानो’ जब बेहद लोकप्रिय हुआ तो बड़ी संख्या में श्रोताओं ने उसे लता मंगेशकर का गीत मान लिया। बाद में जब रिकाॅर्ड कम्पनियों और रेडियो उद्घोषकों ने स्पष्ट किया कि यह गीत सुमन कल्याणपुर ने गाया है, तब भी अनेक लोग विश्वास नहीं कर पाए। यह केवल एक गीत की कहानी नहीं थी बल्कि उनके पूरे करियर की कहानी थी।

एक और दिलचस्प प्रसंग संगीतकारों और रिकाॅर्डिंग स्टूडियो के लोगों के बीच वर्षों तक चर्चा का विषय रहा। कई बार रिकाॅर्डिंग के दौरान नए तकनीशियन यह समझ बैठते थे कि स्टूडियो में लता मंगेशकर आई हैं जबकि सामने सुमन कल्याणपुर खड़ी होती थीं। उनकी आवाज की समानता ने उन्हें पहचान से अधिक भ्रम दिया लेकिन उन्होंने कभी सार्वजनिक रूप से शिकायत नहीं की। न कोई कटुता दिखाई, न कोई विवाद खड़ा किया। वे गरिमा और सादगी के साथ अपना काम करती रहीं। यही उनकी सबसे बड़ी खूबी थी।

सुमन कल्याणपुर केवल हिंदी फिल्मों तक सीमित नहीं थीं। मराठी संगीत में उनका योगदान असाधारण है। ‘केशवा माधवा’, ‘निंबोणीच्या झाडामागे’, ‘सावल्या विठ्ठला’, ‘ओंकार प्रधान रूप गणेशाचे’ जैसे गीत महाराष्ट्र की सांस्कृतिक स्मृति का हिस्सा बन चुके हैं। उनके भक्ति-गीतों ने लाखों लोगों के आध्यात्मिक जीवन को स्वर दिया। यदि उनकी गायकी की विविधता को समझना हो तो कुछ गीत पर्याप्त हैं।
‘बुझा दिए हैं खुद अपने हाथों’ में दर्द का अथाह सागर है।
‘मेरा प्यार भी तू है’ में प्रेम की कोमलता है।
‘आजकल तेरे मेरे प्यार के चर्चे’ में चंचलता और आधुनिकता है।
‘दिल एक मंदिर है’ में भावनात्मक गहराई है।
‘ना तुम हमें जानो’ में वह रहस्यमयी मिठास है जो श्रोता को दशकों तक बांधे रखती है। यानी वे किसी एक शैली की गायिका नहीं थीं। वे हर तरह के गीत को अपना बना लेने की क्षमता रखती थीं।

फिर भी फिल्म उद्योग ने उन्हें कभी केंद्र में नहीं रखा। वे अक्सर ‘दूसरी आवाज’ के रूप में प्रस्तुत की गईं। उन्हें कई बार ‘द अदर लता’ कहा गया। यह सुनने में भले सम्मानजनक लगे लेकिन किसी कलाकार के लिए इससे बड़ा अन्याय क्या हो सकता है कि उसकी अपनी पहचान ही किसी और की छाया में परिभाषित की जाए? इसके बावजूद उन्होंने हिंदी, मराठी, बंगाली, गुजराती, पंजाबी, उड़िया, असमिया और अन्य भाषाओं में सैकड़ों गीत गाए। उनके खाते में सात सौ से अधिक रिकाॅर्डिंग दर्ज हैं। यह किसी भी दृष्टि से एक विशाल संगीत-यात्रा थी।  समय बदला। रेडियो का युग समाप्त होने लगा। कैसेट आए, फिर सीडी और फिर डिजिटल प्लेटफार्म। धीरे-धीरे नई पीढ़ी ने उनका नाम कम और उनके गीत अधिक सुने लेकिन कुछ आवाजें समय के साथ पुरानी नहीं होतीं। सुमन कल्याणपुर उन्हीं आवाजों में थीं।

जीवन के उत्तरार्ध में उन्हें अनेक सम्मान मिले। महाराष्ट्र सरकार ने उन्हें लता मंगेशकर पुरस्कार से सम्मानित किया। बाद में उन्हें कई जीवन-गौरव सम्मान प्राप्त हुए। भारत सरकार ने भी उन्हें पद्म भूषण से सम्मानित कर उनके योगदान को औपचारिक मान्यता दी लेकिन सच्चाई यह है कि किसी कलाकार की सबसे बड़ी पहचान पुरस्कार नहीं, उसके गीत होते हैं।

जब भी ‘ना ना करते प्यार तुम ही से कर बैठे’ बजेगा, जब भी ‘ना तुम हमें जानो’ की धुन हवा में तैरेगी, जब भी ‘मेरा प्यार भी तू है’ किसी रेडियो स्टेशन पर सुनाई देगा, तब यह एहसास होगा कि भारतीय संगीत ने कितनी अनमोल आवाज पाई थी। शायद तब यह कसक भी महसूस होगी कि हमने उन्हें उतना नहीं सुना, जितना सुनना चाहिए था।

भारतीय फिल्म संगीत के इतिहास में शायद ही कोई दूसरा उदाहरण मिलेगा जहां किसी कलाकार की प्रतिभा को इतना व्यापक स्वीकार मिला हो लेकिन पहचान इतनी सीमित रही हो। सुमन कल्याणपुर उन विरल कलाकारों में थीं जिनकी आवाज घर-घर पहुंची मगर नाम नहीं पहुंच पाया। उनके गीत लोकप्रिय हुए लेकिन प्रसिद्धि अक्सर किसी और के हिस्से में चली गई। यही कारण है कि उनका निधन केवल एक गायिका का निधन नहीं बल्कि उस पीढ़ी की स्मृतियों का एक और पन्ना बंद हो जाना है जिसने रेडियो के युग में संगीत को जीया था।
आज जब हम उन्हें विदा कर रहे हैं तब शायद पहली बार पूरे मन से स्वीकार कर रहे हैं कि भारतीय संगीत जगत ने इस महान गायिका को वह स्थान नहीं दिया जिसकी वह अधिकारपूर्वक हकदार थीं। वे चली गई हैं लेकिन अपने पीछे सुरों की ऐसी विरासत छोड़ गई हैं जिसे समय कभी मिटा नहीं सकेगा।

सुमन कल्याणपुर जैसी आवाजें मरती नहीं हैं। वे रेडियो की किसी पुरानी तरंग में, किसी भूले हुए ग्रामोफोन रिकाॅर्ड में, किसी कार के एफएम पर, किसी बूढ़े श्रोता की स्मृतियों में और किसी युवा संगीत प्रेमी की नई खोज में हमेशा जीवित रहती हैं। उनकी आवाज अब मौन हो चुकी है लेकिन उनके गीत अभी बहुत लंबे समय तक गूंजते रहेंगे। स्वर-साधना, विनम्रता और उपेक्षित प्रतिभा की इस विलक्षण प्रतीक को विनम्र
श्रद्धांजलि।

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