Uttarakhand

सवालों के घेरे में मित्र पुलिस

नैनीताल के भीमताल में वर्षों से चल रहे कथित शोषण, पहचान छुपाकर सम्बंध बनाने और धर्मांतरण दबाव के आरोपों से जुड़े मामले में मुख्य आरोपी मोहम्मद यूनुस की गिरफ्तारी के बावजूद बड़ा सवाल कायम है कि आखिर पीड़िता को अदालत का दरवाजा क्यों खटखटाना पड़ा? और तब जाकर ही पुलिस-प्रशासन सक्रिय क्यों हुआ? जबकि प्रशासन को भेजा गया उसका शिकायती पत्र पहले ही गम्भीर और संगठित पैटर्न की ओर इशारा कर रहा था। सवाल जिला भाजपा संगठन के उन पदाधिकारियों की मंशा पर भी उठते हैं जिन्होंने पीड़िता पर अपराधी के विरुद्ध यौन शोषण का आरोप शिकायत पत्र से हटाने के लिए दबाव बनाया

उत्तराखण्ड के नैनीताल जिले के भीमताल क्षेत्र में गत् पखवाड़े सामने आया मामला अब केवल एक आपराधिक प्रकरण नहीं बल्कि सिस्टम की कार्यप्रणाली पर गम्भीर सवाल खड़े करने वाला प्रकरण बन चुका है। एक युवती द्वारा प्रशासन को भेजा गया शिकायती पत्र में जिस व्यक्ति का उल्लेख है, मोहम्मद यूनुस उर्फ ‘एएमडीवाई उर्फ बाॅबी’ का जिक्र है, उस पर लगे आरोप केवल व्यक्तिगत सम्बंधों तक सीमित नहीं बल्कि एक लम्बे समय से चले आ रहे कथित पैटर्न की ओर इशारा करते हैं। युवती के अनुसार, वर्ष 2020 में शुरू हुआ सम्पर्क धीरे-धीरे एक ऐसे जाल में बदल गया जिसमें विश्वास के नाम पर छल किया गया। आरोप है कि आरोपी ने अपनी वास्तविक पहचान छुपाई, खुद को धर्म से परे दिखाकर भरोसा जीता और जब विवाह की बात आई तो धर्म परिवर्तन की शर्त सामने रख दी। यह केवल भावनात्मक धोखे का मामला नहीं बल्कि पहचान को एक औजार की तरह इस्तेमाल करने का आरोप है।

चिट्ठी का सबसे गम्भीर पहलू यह है कि युवती दावा करती है कि यह सब पहली बार और केवल उसके साथ नहीं हुआ। उसके अनुसार, पिछले 14-15 वर्षों से यही पैटर्न चलता रहा है, जिसमें कई महिलाओं और यहां तक कि 15-16 वर्ष की नाबालिग लड़कियों को भी इस व्यक्ति द्वारा कथित रूप से निशाना बनाया गया। आरोप है कि पहले उन्हें भावनात्मक रूप से जोड़ा जाता है, फिर अलग-थलग किया जाता है और अंततः उन पर शारीरिक सम्बंधों तथा धर्म परिवर्तन का दबाव बनाया जाता है।

युवती ने एक अन्य पीड़िता का भी जिक्र किया है, जिसके साथ कथित तौर पर बेहद क्रूर हिंसा की गई, चेहरे पर वार, शरीर पर गम्भीर चोटें, जिससे उसकी तबीयत बिगड़ गई। यदि ये आरोप सही हैं तो यह केवल रिलेशनशिप एब्यूज नहीं बल्कि गम्भीर आपराधिक हिंसा का मामला है।

चिट्ठी में आरोपी के विचारों को लेकर भी चिंताजनक दावे किए गए हैं। युवती के अनुसार, वह ओसामा बिन लादेन जैसे आतंकी को सही ठहराता है, कश्मीर के मुद्दे पर भारतीय सेना की आलोचना करता है और विभाजनकारी सोच को सामान्य बनाने की कोशिश करता है। इन दावों की स्वतंत्र पुष्टि जांच का विषय है लेकिन यह पहलू मामले को और व्यापक बना देता है।

मदद की जगह सलाह : सिस्टम की भूमिका पर सवाल
इस पूरे घटनाक्रम का सबसे असहज हिस्सा तब सामने आता है जब पीड़िता बताती है कि उसने स्थानीय स्तर पर भाजपा से जुड़े राजनीतिक व्यक्तियों से मदद मांगी। आरोप है कि खुद को कट्टर हिंदुत्ववादी बताने वाले कुछ लोगों ने उसे अपनी शिकायत से ‘यौन शोषण’ जैसे गम्भीर आरोप हटाने की सलाह दी। यहीं से यह मामला केवल एक आरोपी बनाम पीड़िता नहीं रह जाता बल्कि उस तंत्र का आईना बन जाता है जो खुद को ‘संरक्षक’ बताता है लेकिन जमीनी स्तर पर पीड़िता को ही समझौते की ओर धकेलता है।

कोर्ट के बाद हरकत में आया सिस्टम
सबसे बड़ा सवाल यही है कि जब इतने गम्भीर आरोप सामने थे तो कार्रवाई पहले क्यों नहीं हुई? क्यों पीड़िता को न्याय के लिए पहले अदालत की शरण लेनी पड़ी? कोर्ट के सख्त रुख बाद थाना मल्लीताल, नैनीताल में 29/04/2026 को उत्तराखण्ड धार्मिक स्वतंत्रता अधिनियम 2018 की धारा 3/5 तथा भारतीय न्याय संहिता (बीएनएस) की धारा 115, 319, 69 के तहत मुकदमा दर्ज किया गया।

एफआईआर के अनुसार आरोपी ने फोटोग्राफी, वीडियो शूट, ट्रैकिंग और म्यूजिक सेशन जैसी गतिविधियों के माध्यम से सम्पर्क बढ़ाया और वर्ष 2020 के बाद पीड़िता से करीब 17 लाख रुपए विभिन्न उपकरणों (कैमरा, लेंस, मोबाइल आदि) के नाम पर खर्च कराए। विवाह का झांसा देकर पहचान छुपाने और बाद में धर्म परिवर्तन के दबाव के आरोप भी इसमें लगाए गए हैं। मामले में अन्य पीड़िताओं द्वारा भी इसी प्रकार के आरोप सामने आने से इसकी गम्भीरता और बढ़ गई है।

पुलिस कार्रवाई : गिरफ्तारी लेकिन सवाल कायम
मामले की संवेदनशीलता से पूरी तरह बेखबर नैनीताल जनपद की पुलिस तब एक्शन में आई जब नैनीताल हाई कोर्ट ने कड़ा रुख अपनाते हुए वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक नैनीताल को तत्काल कार्रवाई करने की निर्देश दिए। हाईकोर्ट के आदेश बाद एक विशेष टीम गठित की गई और फरार आरोपी को नैनीताल क्षेत्र से गिरफ्तार किया गया। गिरफ्तारी से बचने के लिए आरोपी ने हाईकोर्ट का रुख भी किया लेकिन उसे राहत नहीं मिली। बाद में उसे न्यायालय में पेश कर 14 दिन की न्यायिक हिरासत में जेल भेज दिया गया है। नैनीताल के एसएसपी मंजूनाथ टी.सी. का कहना है कि जिले में इस प्रकार की गतिविधियों के खिलाफ ‘जीरो टाॅलरेंस’ नीति अपनाई जाएगी। सवाल लेकिन यह है कि यह कैसी ‘जीरो टाॅलरेंस’ नीति है जिसमें कार्यवाही तब होती है जब कोर्ट हस्तक्षेप करता है?

राष्ट्रीय परिप्रेक्ष्य और बड़ा सवाल
देशभर में ऐसे मामलों को लेकर बहस तेज रही है जहां एक पक्ष इसे संगठित अपराध और सांस्कृतिक चुनौती मानता है वहीं दूसरा पक्ष हर मामले में निष्पक्ष जांच की आवश्यकता पर जोर देता है। उत्तराखण्ड सहित कई राज्यों में धर्मांतरण विरोधी कानून लागू हैं लेकिन इनकी प्रभावशीलता भी तभी साबित होती है जब कार्रवाई समय पर हो। भीमताल का यह मामला केवल एक गिरफ्तारी की खबर नहीं है। यह उस पूरी प्रक्रिया का आईना है जिसमें एक पीड़िता को पहले संघर्ष करना पड़ा, फिर अदालत जाना पड़ा, और तब जाकर सिस्टम सक्रिय हुआ। अब असली सवाल यह है कि क्या जांच पूरी सच्चाई तक पहुंचेगी, क्या अन्य सम्भावित पीड़िताओं को सामने आने का भरोसा मिलेगा और क्या यह मामला केवल एक गिरफ्तारी तक सीमित रहेगा या पूरे पैटर्न की परतें भी खुलेंगी क्योंकि अगर न्याय पाने के लिए हर बार अदालत का दरवाजा खटखटाना पड़े तो यह सिर्फ एक केस नहीं बल्कि पूरे सिस्टम की कार्यप्रणाली पर सवाल है।

महिलाओं के खिलाफ बढ़ते अपराध
भारत में महिलाओं के खिलाफ अपराध और धर्मांतरण को लेकर चल रही बहस के बीच अगर ठोस आधार पर बात की जाए तो नेशनल क्राइम रिकाॅड्र्स ब्यूरो (एनसीआरबी) के आंकड़े एक महत्त्वपूर्ण लेकिन जटिल तस्वीर सामने रखते हैं। एनसीआरबी की ‘क्राइम इन इंडिया 2022’ रिपोर्ट के अनुसार देशभर में महिलाओं के खिलाफ कुल 4,45,256 मामले दर्ज किए गए, जो पिछले वर्ष की तुलना में वृद्धि को दर्शाते हैं और यह संकेत देते हैं कि यह समस्या लगातार बनी हुई ही नहीं बल्कि विस्तार भी ले रही है। इन मामलों में सबसे बड़ी हिस्सेदारी पति या ससुराल पक्ष द्वारा क्रूरता की है, जो कुल मामलों का लगभग एक-तिहाई है, इसके बाद अपहरण, छेड़छाड़ और बलात्कार जैसे अपराध आते हैं। यह आंकड़े इस बात की ओर साफ इशारा करते हैं कि महिलाओं के खिलाफ सबसे अधिक खतरा अक्सर उनके परिचित दायरे, रिश्तों और विश्वास के दायरे के भीतर ही मौजूद होता है।
इसी संदर्भ में जब उन मामलों को देखा जाता है जिनमें सम्बंध, प्रेम, शादी का झांसा या भरोसे का इस्तेमाल कर शोषण के आरोप सामने आते हैं तो यह पैटर्न एनसीआरबी के व्यापक ट्रेंड से मेल खाता हुआ दिखाई देता है। खासतौर पर नाबालिग और युवतियों के मामलों में यह प्रवृत्ति और गम्भीर हो जाती है जहां कई मामलों में नौकरी, शादी या बेहतर जीवन के नाम पर उन्हें जाल में फंसाने की शिकायतें दर्ज होती रही हैं।

हालांकि धर्मांतरण को लेकर जितनी तीखी बहस सार्वजनिक और राजनीतिक मंचों पर दिखाई देती है, एनसीआरबी के आंकड़ों में उतनी स्पष्टता नहीं मिलती। दरअसल एनसीआरबी धर्म के आधार पर अपराधों का अलग से वर्गीकरण नहीं करता और ‘जबरन धर्मांतरण’ नाम से कोई अलग राष्ट्रीय डेटा उपलब्ध नहीं है। ऐसे मामलों को आमतौर पर धोखाधड़ी, अपहरण, यौन अपराध या सम्बंधित राज्य कानूनों के तहत दर्ज किया जाता है। यही वजह है कि देशभर में जबरन धर्मांतरण के मामलों की कोई समेकित और आधिकारिक संख्या उपलब्ध नहीं है जिससे इस विषय पर बहस अक्सर तथ्यों से ज्यादा धारणा और आरोप-प्रत्यारोप पर आधारित हो जाती है।
इधर कई राज्यों जैसे उत्तराखण्ड, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश और गुजरात ने धर्मांतरण से जुड़े कानून बनाए हैं, जिनमें जबरन, प्रलोभन या धोखे से धर्म परिवर्तन को अपराध की श्रेणी में रखा गया है लेकिन इन कानूनों के तहत दर्ज मामलों का डेटा भी राज्य स्तर पर बिखरा हुआ है और राष्ट्रीय स्तर पर एकीकृत तस्वीर सामने नहीं आती।
इस पूरी बहस के बीच एक और महत्त्वपूर्ण पहलू सामने आता है, धार्मिक आधार पर वैमनस्य और नफरत से जुड़े मामलों में वृद्धि।

एनसीआरबी के अनुसार ऐसे मामलों में हाल के वर्षों में उल्लेखनीय बढ़ोतरी हुई है जिससे यह संकेत मिलता है कि अपराध और उसकी व्याख्या दोनों ही अब सामाजिक-राजनीतिक तनाव से प्रभावित हो रहे हैं।
कुल मिलाकर एनसीआरबी का डेटा तीन स्पष्ट संकेत देता है पहला, महिलाओं के खिलाफ अपराध एक व्यापक और लगातार बना हुआ संकट है। दूसरा, इन अपराधों का बड़ा हिस्सा भरोसे और रिश्तों के दायरे में घटित होता है और तीसरा, धर्मांतरण को लेकर बहस जितनी व्यापक है, उसके मुकाबले ठोस और एकीकृत डेटा का अभाव है। ऐसे में जरूरी यह है कि हर मामले को तथ्यों, जांच और कानून के आधार पर देखा जाए ताकि न तो किसी पीड़िता की आवाज दबे और न ही किसी मुद्दे को बिना पर्याप्त प्रमाण के व्यापक सामाजिक या साम्प्रदायिक रूप दे दिया जाए।

बात अपनी-अपनी
इस मामले को उठाने वाले ही भाजपा के नेता हैं। कुछ सामाजिक संगठनों ने भी इस मुद्दे पर हमारा साथ दिया है। मुख्यमंत्री जी ऐसे जिहादियों को किसी भी कीमत पर नहीं बख्श रहे हैं। ऐसे में अगर कोई हमारी पार्टी का नेता लड़की पर दबाव बनाकर केस कमजोर करने की कोशिश कर रहा है तो हम उसकी जांच करेंगे और अगर मामला सही निकला तो उस नेता पर कार्रवाई करेंगे।
प्रताप सिंह बिष्ट, जिला अध्यक्ष, भाजपा, नैनीताल

इस मामले में हमने आरोपी को अरेस्ट कर जेल भेज दिया है। मामला न्यायालय में चल रहा है। अभी भी हमारी जांच जारी है। अन्य कई पीड़िता के मामलों की भी जांच चल रही है जिसके लिए हमने टीम गठित कर दी है।
डाॅ. मंजूनाथ टी.सी., वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक, नैनीताल

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