उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव 2027 से पहले सियासी सरगर्मियां तेज हो गई हैं। सत्ताधारी पार्टी भाजपा जहां लगातार बैठकों और संगठनात्मक बदलावों के जरिए चुनावी रणनीति मजबूत करने में जुटी है। हाल ही में योगी सरकार के कैबिनेट विस्तार में छह नए मंत्रियों को शामिल किया गया जबकि दो मंत्रियों को स्वतंत्र प्रभार सौंपा गया। बीजेपी इस बार भी राष्ट्रीय लोक दल, अपना दल, निषाद पार्टी और सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी के साथ गठबंधन में चुनाव लड़ने की तैयारी कर रही है। दूसरी तरफ समाजवादी पार्टी के प्रमुख अखिलेश यादव ने पिछड़ा, दलित और अल्पसंख्यक समीकरण यानी (पीडीए) के जरिए बीजेपी को चुनौती देने की रणनीति बनाई है लेकिन कांग्रेस और सपा के बीच गठबंधन को लेकर अभी तस्वीर साफ नहीं हो पाई है। दोनों दलों के नेताओं की बयानबाजी से संकेत जरूर मिल रहे हैं कि गठबंधन सम्भव है मगर सीट बंटवारे पर कड़ा संघर्ष तय माना जा रहा है।
गौरतलब है कि लोकसभा चुनाव 2024 में सपा ने 62 सीटों पर चुनाव लड़कर 37 सीटें जीती थीं, जबकि कांग्रेस ने 17 सीटों पर चुनाव लड़कर 6 सीटों पर जीत हासिल की थी। अब विधानसभा चुनाव में दोनों के बीच गठबंधन को लेकर राजनीतिक हलकों में चर्चा है कि लोकसभा चुनाव के आधार पर कांग्रेस करीब 70 विधानसभा सीटों की मांग कर रही है तो सपा 50 से ज्यादा सीटें देने के पक्ष में नहीं दिख है। इस बीच बसपा सुप्रीमो मायावती से कुछ कांग्रेसी नेताओं ने मुलाकात की कोशिश की। हालांकि मुलाकात नहीं हो पाई लेकिन इसके बाद समाजवादी पार्टी ने कहा कि वह सभी 403 सीटों पर अपनी तैयारी कर रही है। इसके जवाब में कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष अजय राय ने सभी सीटों पर चुनाव लड़ने का दावा कर प्रदेश की राजनीति में नई हलचल पैदा कर दी है। माना जा रहा है कि कांग्रेस चाहती है कि बीएसपी भी विपक्षी गठबंधन का हिस्सा बने ताकि मुस्लिम और दलित वोटों का बिखराव रोका जा सके। चर्चा यह भी गर्म है कि असदुद्दीन ओवैसी की पार्टी एआईएमआईएम करीब 50 सीटों पर उम्मीदवार उतारने की तैयारी में है। खासकर मुरादाबाद, सहारनपुर, आजमगढ़, मेरठ, मुजफ्फरनगर, बिजनौर और मऊ जैसे इलाकों में। ऐसे में मुस्लिम वोटों के बिखराव को रोकने के लिए सपा को कांग्रेस की जरूरत पड़ सकती है। कांग्रेस की कोशिश है कि मायावती को भी गठबंधन में शामिल किया जाए क्योंकि यदि बीएसपी अलग चुनाव लड़ती है और मुस्लिम उम्मीदवार उतारती है तो सपा और कांग्रेस को नुकसान हो सकता है तो चंद्रशेखर आजाद की सक्रियता भी विपक्षी समीकरणों को प्रभावित कर सकती है।
राजनीतिक जानकार मानते हैं कि बीएसपी, ओवैसी और चंद्रशेखर आजाद की आजाद समाज पार्टी का अलग-अलग चुनाव लड़ना बीजेपी को फायदा पहुंचा सकता है। उत्तर प्रदेश की राजनीति में अभी केवल शुरुआत हुई है और आगे की तस्वीर साफ नहीं है लेकिन फिलहाल गठबंधन, जातीय समीकरण और सीट शेयरिंग सबसे बड़ा मुद्दा बन चुके हैं। आने वाले महीनों में सपा-कांग्रेस के रिश्ते और विपक्षी एकजुटता की पिक्चर साफ होगी क्योंकि पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव के बाद कुछ राजनीतिक घटनाएं ऐसी हुई हैं जिन्हें विपक्षी इंडिया गठबंधन के लिए शुभ संकेत नहीं माना जा रहा है। बंगाल में राहुल गांधी ने ममता बनर्जी पर तीखा हमला किया लेकिन ममता बनर्जी की हार के बाद अखिलेश यादव का कोलकाता जाकर उनके साथ खड़ा होना कांग्रेस को पसंद नहीं आया। दिल्ली से लेकर लखनऊ तक नेताओं से बातचीत से यह संकेत मिलते हैं कि कांग्रेस और सपा का गठबंधन तो होगा लेकिन सीट बंटवारे पर कड़ी मशक्कत करनी पड़ेगी।