शरद पवार ने प्रधानमंत्री मोदी की विदेश नीति और अंतरराष्ट्रीय मंच पर भारत की छवि मजबूत करने की सराहना की। उन्होंने कहा कि राष्ट्रीय हित के मुद्दों पर राजनीतिक मतभेद अलग रखे जाने चाहिए। महाराष्ट्र की राजनीति में शरद के इस बयान ने महाविकास अघाड़ी के भीतर नई बहस छेड़ दी है। एक तरफ पवार के इस बयान का मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस और भाजपा नेताओं ने स्वागत कर कहा कि यह प्रधानमंत्री मोदी के वैश्विक नेतृत्व की स्वीकारोक्ति है तो वहीं शिवसेना उद्धव गुट के सांसद संजय राउत ने अप्रत्यक्ष रूप से असहमति जताते हुए कहा कि लोकतंत्र में जवाबदेही जरूरी है और प्रधानमंत्री को प्रेस काॅन्फ्रेंस कर पत्रकारों के सवालों का सामना करना चाहिए। इस घटनाक्रम के बाद एमवीए गठबंधन के भीतर वैचारिक मतभेदों की चर्चा तेज हो गई है कि क्या महाविकास अघाड़ी के भीतर सब कुछ सामान्य नहीं है? राजनीतिक पंडित कहते हैं कि राजनीति में विरोधियों की तारीफ कोई नई बात नहीं है लेकिन जब विपक्ष का सबसे अनुभवी चेहरा सत्ता पक्ष के नेता की सार्वजनिक सराहना करे और उसी गठबंधन का दूसरा बड़ा चेहरा उस पर नाराजगी जता दे तो सवाल उठना तय है। खासकर तब जब महाराष्ट्र में विपक्ष पहले ही हार और अंदरूनी असमंजस से जूझ रहा हो। शरद पवार का बयान भाजपा के लिए राजनीतिक आॅक्सीजन बन गया जबकि संजय राउत ने इसे लेकर अलग ही सुर छेड़ दिए। इससे साफ दिखने लगा है कि एमवीए के भीतर विचारों की दूरी अब खुलकर सामने आने लगी है। गौरतलब है कि मुम्बई मराठी पत्रकार संघ के कार्यक्रम में शरद पवार ने कहा कि वैचारिक मतभेद अपनी जगह हैं लेकिन प्रधानमंत्री मोदी विदेशों में भारत की प्रतिष्ठा बनाए रखने का काम कर रहे हैं। उन्होंने यह भी कहा कि देश की साख और अंतरराष्ट्रीय छवि के मुद्दे पर राजनीतिक मतभेदों को अलग रख देना चाहिए। पवार का यह बयान इसलिए भी अहम माना जा रहा है क्योंकि वे लम्बे समय से भाजपा के सबसे मुखर विरोधियों में गिने जाते रहे हैं। इस दौरान एक तरफ पवार राष्ट्रीय हित और विदेश नीति के मुद्दे पर राजनीतिक संतुलन साधते दिखे तो दूसरी ओर संजय राउत ने विपक्ष की आक्रामक लाइन को बनाए रखने की कोशिश की। यही वजह है कि अब सवाल उठ रहे हैं कि क्या एमवीए आने वाले समय में साझा रणनीति के साथ आगे बढ़ पाएगा या फिर वैचारिक असहमति गठबंधन की मुश्किलें और बढ़ाएगी।
डीएमके-कांग्रेस में बढ़ती दूरी!
तमिलनाडु में डीएमके और कांग्रेस के रिश्तों में खुली दरार सामने आ गई है। डीएमके नेता उदयनिधि स्टालिन ने कांग्रेस पर विश्वासघात का आरोप लगाते हुए कहा ‘पार्टी ने विजय की सरकार को समर्थन देकर गठबंधन धर्म तोड़ा है। कांग्रेस के विधायक डीएमके कार्यकर्ताओं की मेहनत और एमके स्टालिन की लोकप्रियता के दम पर जीते लेकिन बाद में बिना जानकारी दिए गठबंधन छोड़ दिया। उन्होंने कांग्रेस पर अहसान फरामोशी का आरोप लगाते हुए कहा कि तमिलनाडु की जनता इसका जवाब देगी। उन्होंने यह भी कहा कि कांग्रेस की राजनीति ने देश में भाजपा को मजबूत किया है, वहीं डीएमके की बैठक में कांग्रेस के खिलाफ कई कड़े प्रस्ताव पारित हुए जिसमें पार्टी को पीठ में छुरा घोंपने वाली तक कहा गया। इस बीच एमके स्टालिन ने विजय की टीवीके सरकार पर हमला बोलते हुए दावा किया कि यह सरकार अपना कार्यकाल पूरा नहीं कर पाएगी। स्टालिन ने कांग्रेस, सीपीआई,सीपीआई (एम), वीसीके और आईयूएमएल पर भी निशाना साध कहा कि इन्होंने टीवीके सरकार का समर्थन किया। उन्होंने विजय सरकार की तुलना नए खिलौने से करते हुए कहा कि जनता जल्द ही इससे ऊब जाएगी और फिर डीएमके की ओर लौटेगी। इस पर कांग्रेस नेता मणिकम टैगोर ने पलटवार करते हुए कहा कि कांग्रेस मुश्किल समय में डीएमके के साथ खड़ी रही। जब वे अल्पमत में थे तब हम बाहर इंतजार करते रहे। टैगोर ने दावा किया कि कांग्रेस का डीएमके के नेतृत्व वाले ‘सेक्युलर प्रोग्रेसिव अलायंस’ से अलग होकर सुपरस्टार अभिनेता विजय की पार्टी के साथ गठबंधन करने का फैसला असल में बीजेपी को इस दक्षिणी राज्य में अपनी पैठ बनाने से रोकने के लिए लिया गया है। कांग्रेस हमेशा धर्मनिरपेक्ष गठबंधन के साथ खड़ी रही है लेकिन बीजेपी, डीएमके और एआईएडीएमके के बीच सम्पर्क साधने की कोशिश कर रही थी जो हमारे सिद्धांतों के खिलाफ है। बीजेपी के साथ किसी भी तरह की सहमति कांग्रेस बर्दाश्त नहीं करेगी।
पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में करारी शिकस्त के बाद से ही तृणमूल कांग्रेस के भीतर सियासी हलचल तेज हो गई है। पार्टी सुप्रीमो ममता बनर्जी की करीबी और बारासात से चार बार की सांसद काकोली घोष दस्तीदार के इस्तीफे की अटकलों ने नया राजनीतिक संकट खड़ा कर दिया है। काकोली घोष पहले ही पार्टी के जिला पदाधिकारी और महिला मोर्चा के पद से इस्तीफा दे चुकी हैं। उनके बेटे वैद्यनाथ घोष ने संकेत दिए हैं कि वह सांसद पद भी छोड़ सकती हैं। उन्होंने आरोप लगाया कि तत्कालीन राज्य सरकार से जुड़े लगातार भ्रष्टाचार और घोटालों ने परिवार की छवि को नुकसान पहुंचाया है। उन्होंने कहा कि बारासात लोकसभा क्षेत्र की सात में से छह विधानसभा सीटों पर टीएमसी की हार की जिम्मेदारी लेते हुए उनकी मां ने यह कदम उठाया है। उन्होंने पार्थ चटर्जी भर्ती घोटाला, ज्योतिप्रिय मल्लिक राशन घोटाला और आरजी कर अस्पताल मामले का जिक्र करते हुए कहा कि इन घटनाओं का राजनीतिक नुकसान पार्टी नेताओं को भी झेलना पड़ा। इसी बीच केंद्र सरकार ने काकोली घोष को ‘वाई श्रेणी’ की सुरक्षा दी है, वहीं मुख्यमंत्री सुवेंदु अधिकारी की बैठक में छह विधायकों के साथ काकोली के शामिल होने के बाद राजनीतिक गलियारों में चर्चाएं और तेज हो गई हैं। सवाल उठ रहा है कि क्या काकोली भाजपा में शामिल होंगी? गौरतलब है कि हाल ही में टीएमसी ने लोकसभा में मुख्य सचेतक पद से काकोली घोष को हटाकर फिर से कल्याण बनर्जी को जिम्मेदारी सौंपी थी। इसके बाद से ही पार्टी के अंदर नाराजगी और असंतोष की खबरें सामने आने लगी थीं। बारासात से चार बार की सांसद काकोली को तृणमूल के पुराने नेताओं में से एक माना जाता है। उनका इस्तीफा तृणमूल की चुनावी हार के बाद लोकसभा में पार्टी के मुख्य सचेतक पद से उन्हें हटाए जाने और उनकी जगह वरिष्ठ सांसद कल्याण बनर्जी को नियुक्त किए जाने के कुछ दिनों बाद आया है।
आगामी उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव से पहले बहुजन समाज पार्टी सुप्रीमो मायावती ने अपनी सियासी सक्रियता तेज कर दी है। लखनऊ में आयोजित हाईलेवल समीक्षा बैठक में उन्होंने संगठन को बूथ स्तर तक मजबूत करने, साफ छवि वाले उम्मीदवार उतारने और पार्टी को आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बनाने का संदेश दिया है। इसके बाद राजनीतिक गलियारों में चर्चा तेज है कि क्या बसपा एक बार फिर किंगमेकर की भूमिका में लौटने की तैयारी कर रही है। असल में 2017 में भाजपा की लहर के बीच बसपा 19 सीटों पर सिमट गई थी जबकि 2022 में पार्टी का प्रदर्शन गिरकर केवल 1 सीट तक पहुंच गया। इस लिहाज से अब मायावती फिर से अपने पुराने सोशल इंजीनियरिंग फाॅर्मूले दलित, ओबीसी, ब्राह्माण और मुस्लिम समीकरण को सक्रिय करने में जुटी हैं जिसने 2007 में उन्हें पूर्ण बहुमत दिलाया था। बसपा की बढ़ती सक्रियता ने सबसे ज्यादा चिंता सपा-कांग्रेस गठबंधन की बढ़ा दी है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यदि मायावती दलित खासकर जाटव वोट बैंक को दोबारा मजबूत करने और गैर यादव ओबीसी में सेंध लगाने में सफल रहती हैं तो इसका सीधा असर विपक्षी गठबंधन के पीडीए समीकरण पर पड़ेगा। मुस्लिम और दलित वोटों के बंटवारे से सपा-कांग्रेस को नुकसान हो सकता है। दूसरी ओर त्रिकोणीय मुकाबले की स्थिति में भाजपा को फायदा मिलने की सम्भावना भी बढ़ जाती है। उत्तर प्रदेश की राजनीति में अक्सर बहुकोणीय मुकाबले का लाभ सत्ताधारी दल को मिलता रहा है। यदि विपक्षी वोट बंटते हैं और भाजपा का कोर वोट बैंक एकजुट रहता है तो कई सीटों पर मुकाबला उसके पक्ष में जा सकता है। मायावती पहले ही साफ कर चुकी हैं कि बसपा 2027 का चुनाव अकेले लड़ेगी। लगातार समीक्षा बैठकों और संगठनात्मक फेरबदल से यह संकेत मिल रहे हैं कि बसपा इस बार सिर्फ चुनाव लड़ने नहीं बल्कि अपनी खोई राजनीतिक जमीन वापस पाने की रणनीति पर काम कर रही है। बहरहाल, बसपा की यह लगातार बैठकें केवल औपचारिक चुनावी तैयारी नहीं हैं बल्कि मायावती का अपनी राष्ट्रीय पार्टी की साख और यूपी में अपना वजूद बचाने का आखिरी और सबसे बड़ा दांव है। यदि मायावती जमीनी स्तर पर अपने पारम्परिक वोट बैंक के भीतर यह भरोसा जगाने में कामयाब रहीं कि बसपा ही दलितों और वंचितों की असली आवाज है तो 2027 का उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव द्विपक्षीय न होकर एक बेहद दिलचस्प त्रिकोणीय मुकाबला बन जाएगा जहां सरकार बनाने की चाबी एक बार फिर सोशल इंजीनियरिंग के हाथ में हो सकती है।