कहा जाता है कि जब अधिकारी प्रतिनियुक्ति पर दूसरे प्रदेश में जाते हैं तो उनमें से अधिकतर का उद्देश्य प्रदेश हित ना होकर स्वहित होता है। इसे साबित कर दिखाया डाॅ. हरमिंदर सिंह बवेजा ने। बावेजा हिमाचल प्रदेश से उत्तराखण्ड उद्यान विभाग में प्रतिनियुक्ति पर आए और निदेशक पद पर नियुक्ति पाने के कुछ दिनों बाद ही उन्होंने ‘खेल’ शुरू कर दिया। इससे सरकारी योजनाओं की विश्वसनीयता पर तो सवाल उठे ही साथ ही मामला विधानसभा में भी उठाया गया। एक सामाजिक कार्यकर्ता दीपक करगेती के प्रयासों से पहले एसआईटी जांच हुई और फिर मामला सीबीआई के हवाले कर दिया गया। सीबीआई ने अपनी चार्जशीट में मुख्य आरोपी डॉ हरमिंदर सिंह बावेजा को बनाते हुए एक दर्जन अधिकारियों पर तीन अलग-अलग मुकदमे दर्ज किए। कई महीनों तक सीबीआई ने सरकार से आरोपी अधिकारियों पर केस चलाने के लिए स्वीकृति मांगी लेकिन स्वीकृति नहीं मिली। जिसका फायदा उठाते हुए बावेजा अपने मूल प्रदेश हिमाचल में जाकर नियुक्ति पा गए। आश्चर्यजनक यह है कि हिमाचल हाईकोर्ट ने बावेजा को नियुक्ति देने से पहले उत्तराखण्ड सरकार से इस बाबत जवाब तलब किया लेकिन सरकार ने न्यायालय को भी स्पष्ट जानकारी देने की बजाय गोलमोल जवाब दे दिया। फिलहाल उत्तराखण्ड में भ्रष्टाचार के आरोपी और सस्पेंड अधिकारी डॉ. हरमिंदर सिंह बावेजा हिमाचल प्रदेश के नौनी यूनिवर्सिटी में वाइस चांसलर बन चुके हैं
उ त्तराखण्ड में उद्यान विभाग के निदेशक रहे हरमिंदर सिंह बवेजा को कौन नहीं जानता। उनके एक के बाद एक उद्यान विभाग में किए गए भ्रष्टाचार और कारनामे किसी से छुपे नहीं हैं। अल्मोड़ा जिले के भतरौंजखान में रहने वाले सामाजिक कार्यकर्ता दीपक करगेती ने बवेजा के भ्रष्टाचार और किसानों के साथ हो रहे अन्याय के खिलाफ मोर्चा खोला था। महीनों तक धरना-प्रदर्शन किए गए। तब जाकर धामी सरकार नींद से जागी। इसके बाद न केवल एसआईटी जांच की गई बल्कि बाद में यह मामला सीबीआई के हवाले भी कर दिया गया।
प्रदेश के सबसे चर्चित उद्यान घोटाले की 22 महीनों बाद सीबीआई ने चार्जशीट भी तैयार कर ली थी। गत फरवरी माह से सीबीआई लगातार उत्तराखण्ड सरकार से उन सभी कार्मिकों पर मुकदमा चलाने की अनुमति मांग रही है जिनके नाम चार्जशीट में आए हैं। सीबीआई की चार्जशीट और तीनों मुकदमों में मुख्य आरोपी तत्कालीन उद्यान निदेशक डॉ. हरमिंदर सिंह बावेजा को बनाया गया था लेकिन चार महीने की जद्दोजहद के बाद भी सीबीआई को सभी पर केस चलाने की अनुमति नहीं मिली। जिसका पूरा फायदा भ्रष्टाचार में लिप्त बावेजा को मिल रहा है। बहरहाल बावेजा को अब हिमाचल प्रदेश की नौणी यूनिवर्सिटी में वाइस चांसलर के महत्त्वपूर्ण पद पर नियुक्त किया जा चुका है।
जी हां, यह वही बवेजा है जिसे भ्रष्टाचार के आरोप में उत्तराखण्ड सरकार द्वारा उद्यान विभाग के निदेशक से सस्पेंड कर दिया गया था। सस्पेंड रहते हुए वह उत्तराखण्ड छोड़कर हिमाचल प्रदेश चले गए। जहां उन्होंने फिर से नियुक्ति पाने को एप्लाई किया। याद रहे कि बवेजा हिमाचल प्रदेश से उत्तराखण्ड में उद्यान विभाग में प्रतिनियुक्ति पर आए थे।
बताया जा रहा है कि हिमाचल नौली यूनिवर्सिटी ने बवेजा को लेने से मना कर दिया। इसके बाद बवेजा ने हिमाचल हाईकोर्ट में याचिका दाखिल की। जिस पर हिमाचल हाईकोर्ट ने उत्तराखण्ड सरकार से अपना जवाब दाखिल करने को कहा। सरकार ने अपने जवाब में न तो यह बताया कि वह भ्रष्टाचार का आरोपी हैं और उन पर सीबीआई जांच चल रही है और न ही यह खुलासा किया कि वे यहां निलम्बित चल रहे हैं। सरकार ने अपने जवाब में हाईकोर्ट में केवल इतना ही कहा कि ‘‘पहले वह हमारा कर्मचारी था, अब नहीं हैं।’’ जिसका फायदा लेते हुए बवेजा को हिमाचल मूल यूनिवर्सिटी (वाई एस परमार यूनिवर्सिटी) में कोर्ट ने वापस लेने के आदेश कर दिए।
चौंकाने वाली बात यह है कि एक साल तक बवेजा के खिलाफ किसी ने भी सच उजागर तक नहीं किया। बवेजा को अब साल भर के अंतराल में हिमाचल प्रदेश में नौनी यूनिवर्सिटी के वाइस चांसलर का चार्ज दे दिया गया है।
गौरतलब है कि ‘दि संडे पोस्ट’ ने डाॅ हरविंदर सिंह बवेजा के भ्रष्टाचार के खिलाफ एक के बाद एक कई खुलासे किए थे। ‘दि संडे पोस्ट’ ने बताया था कि कैसे उत्तराखण्ड के उद्यान विभाग में पूर्व निदेशक रहे हरविंदर सिंह बवेजा का नाम पिछले कुछ वर्षों में राज्य के सबसे चर्चित भ्रष्टाचार मामलों में शामिल रहा है। उनके कार्यकाल के दौरान फलदार पौधों, कीवी मिशन, अदरक-हल्दी बीज खरीद और नर्सरी भुगतान से जुड़े कई ऐसे मामले सामने आए, जिनमें करोड़ों रुपए की वित्तीय अनियमितताओं के आरोप लगे। इन आरोपों ने उद्यान विभाग की कार्यप्रणाली पर सवाल खड़े किए।
उत्तराखण्ड जैसे पर्वतीय राज्य में उद्यान विभाग का महत्त्व बहुत अधिक है। राज्य सरकार लम्बे समय से किसानों की आय बढ़ाने के लिए सेब, कीवी, अखरोट, माल्टा, अदरक और हल्दी जैसी फसलों को बढ़ावा देने की नीति अपनाती रही है। इसी उद्देश्य से करोड़ों रुपए की योजनाएं संचालित की जाती हैं। लेकिन जब इन्हीं योजनाओं में भ्रष्टाचार के आरोप लगने लगे, तब यह मामला राज्य की साख से भी जुड़ जाता है।
डाॅ. हरमिंदर सिंह बवेजा के हिमालय प्रदेश से उत्तराखण्ड आने के साथ ही भ्रष्टाचार का खेल शुरू हो गया था। बवेजा से संबंधित पहला मामला फलदार पौधों की खरीद को लेकर सामने आया। आरोप लगाया गया कि उद्यान विभाग ने बाहरी राज्यों की निजी नर्सरियों से अत्यधिक कीमतों पर पौधे खरीदे। जो सामान्य बाजार दर से कई गुना अधिक मूल्य पर खरीदे गए थे। आरोप था कि चयनित कम्पनियों और नर्सरियों को लाभ पहुंचाने के लिए निविदा प्रक्रिया में पारदर्शिता नहीं बरती गई। कई मामलों में यह भी कहा गया कि पौधों की गुणवत्ता मानकों के अनुरूप नहीं थी, फिर भी उनका भुगतान कर दिया गया।
फलदार पौधों के इस कथित घोटाले में लगभग 2 करोड़ से अधिक की वित्तीय अनियमितता की बात सामने आई। शिकायतकर्ताओं ने दावा किया कि करीब 45 हजार पौधों की खरीद में भारी हेराफेरी हुई। आरोप यह भी लगाया गया कि कुछ पौधे ऐसे क्षेत्रों के लिए खरीदे गए जहां उनकी खेती की उपयुक्तता ही नहीं थी। इससे किसानों को भी नुकसान उठाना पड़ा। इस पूरे मामले में सवाल उठा कि आखिर विभागीय अधिकारियों ने तकनीकी परीक्षण और गुणवत्ता जांच के बिना भुगतान कैसे कर दिया गया?
इसके बाद कीवी पौधों की खरीद का मामला चर्चा में आया। उत्तराखण्ड सरकार ने राज्य में कीवी उत्पादन बढ़ाने के लिए विशेष अभियान शुरू किया था। इसके तहत किसानों को सब्सिडी पर पौधे उपलब्ध कराने की योजना बनाई गई। आरोप लगा कि इस योजना में भी नियमों की अनदेखी कर कुछ चुनिंदा आपूर्तिकर्ताओं को फायदा पहुंचाया गया। जिन पौधों को ऊंची गुणवत्ता का बताकर खरीदा गया, वे वास्तविकता में निम्न स्तर के पाए गए थे। इससे सरकारी धन की बर्बादी हुई और किसानों का भरोसा भी कमजोर हुआ।
अदरक और हल्दी बीज खरीद में भी गम्भीर आरोप सामने आए। आरोप था कि बीजों की खरीद बाजार दर से काफी अधिक कीमत पर की गई। कुछ शिकायतों में यह भी कहा गया कि जिन किसानों के नाम पर बीज वितरण दिखाया गया, उन्हें वास्तविक लाभ नहीं मिला। इससे यह आशंका और गहरी हुई कि विभागीय स्तर पर कागजी लाभार्थी दिखाकर सरकारी धन के दुरुपयोग का प्रयास किया गया।
इन मामलों के सामने आने के बाद विभाग के भीतर भी असंतोष बढ़ने लगा। कई वरिष्ठ अधिकारियों और कर्मचारियों ने शासन को पत्र लिखकर कथित तौर पर यह शिकायत की कि विभाग में निर्णय प्रक्रिया पारदर्शी नहीं रही और कई महत्त्वपूर्ण फैसले नियमों की अनदेखी कर लिए गए। यह घटना इसलिए भी महत्त्वपूर्ण मानी गई क्योंकि सामान्यतः अधिकारी खुलकर अपने विभागाध्यक्ष के खिलाफ शिकायत दर्ज कराने से बचते हैं लेकिन जब एक साथ कई अधिकारियों ने असहमति जताई तो मामला और गम्भीर हो गया।
राज्य सरकार पर दबाव बढ़ने लगा। विपक्षी दलों और सामाजिक संगठनों ने भी इस मामले की निष्पक्ष जांच की मांग उठाई। इसके बाद सरकार ने हरविंदर सिंह बावेजा को पद से हटाने का निर्णय लिया। बाद में उन्हें निलंबित भी किया गया। सरकार ने मामले की जांच के लिए विशेष जांच दल (एसआईटी) गठित किया। एसआईटी को उद्यान विभाग की विभिन्न योजनाओं और खरीद प्रक्रियाओं की जांच का जिम्मा सौंपा गया।
एसआईटी जांच के दौरान कई महत्त्वपूर्ण दस्तावेजों और भुगतान रिकॉर्ड की जांच की गई। रिपोर्टों के अनुसार जांच एजेंसियों को ऐसे संकेत मिले कि खरीद प्रक्रिया में निविदा प्रणाली का सही तरीके से पालन नहीं हुआ। कुछ मामलों में भुगतान और आपूर्ति के रिकॉर्ड में भी अंतर पाया गया। जांच के दौरान बाहरी राज्यों की नर्सरियों और निजी कम्पनियों की भूमिका भी जांच के दायरे में आई।
मामला तब और बड़ा हो गया जब यह मामला सामाजिक कार्यकर्ता दीपक करगेती द्वारा नैनीताल हाईकोर्ट में पहुंचाया गया। अदालत में दायर याचिकाओं में आरोप लगाया गया कि राज्य स्तर की जांच पर्याप्त नहीं है और मामले की निष्पक्ष जांच केंद्रीय एजेंसी से कराई जानी चाहिए। सुनवाई के दौरान अदालत ने मामले की गंभीरता पर टिप्पणी की। बाद में हाईकोर्ट ने सीबीआई जांच के आदेश कर दिए।
सीबीआई जांच शुरू होने के बाद यह मामला राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा में आया। सीबीआई ने उत्तराखण्ड, हिमाचल प्रदेश और जम्मू-कश्मीर सहित कई स्थानों पर छापेमारी की। विभिन्न निजी नर्सरियों, आपूर्तिकर्ताओं और अधिकारियों के दस्तावेज खंगाले गए। सीबीआई ने करीब एक दर्जन अधिकारियों और निजी व्यक्तियों के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज की। जांच में सरकारी धन के दुरुपयोग, आपराधिक साजिश और भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम के उल्लंघन से जुड़े पहलुओं की पड़ताल की गई।
बात अपनी-अपनी
आज किसानों के पेट का निवाला छीनकर खाने वाला अपराधी सरकार की लापरवाही से खुले में घूम रहा है और सरकार उसकी खुशी मना रही है। आज सरकार को सुप्रीम कोर्ट, सीबीआई,किसी के फैसलों से कोई मतलब नहीं है। इनका एक ही उद्देश्य है बस भ्रष्टाचारियों को बचाना और जीरो टॉलरेंस का ढोंग करना।
दीपक करगेती, सामाजिक कार्यकर्ता एवं क्षेत्र पंचायत सदस्य, भतरौंजखान