महाराष्ट्र की फडणवीस सरकार में सम्भावित फेरबदल की अटकलों के बीच धनंजय मुंडे ने केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह से मुलाकात की। जिसे राजनीतिक रूप से बेहद अहम माना जा रहा है। सियासी गलियारों में चर्चा है कि महाराष्ट्र की महायुति सरकार में खासकर अजित पवार गुट में आने वाले दिनों में बड़ा सत्ता परिवर्तन देखने को मिल सकता है। सूत्रों के मुताबिक भ्रष्टाचार के मामले में सजा बरकरार रहने के बाद विवादों में घिरे मंत्री माणिकराव कोकाटे की मंत्रिमंडल से विदाई लगभग तय मानी जा रही है, वहीं उनकी जगह अजित पवार अपने सबसे भरोसेमंद और प्रभावशाली ओबीसी चेहरा धनंजय मुंडे को दोबारा मंत्रिमंडल में शामिल करने की तैयारी में हैं। सूत्रों की मानें तो विवादों में घिरे मंत्री माणिकराव कोकाटे को कैबिनेट से हटाया जा सकता है और उनकी जगह धनंजय मुंडे को शामिल किया जा सकता है। भ्रष्टाचार मामले में सजा बरकरार रहने के बाद अजित पवार पर कोकाटे से इस्तीफा लेने का भारी दबाव है। इसके अलावा पार्टी के वरिष्ठ नेता छगन भुजबल के खराब स्वास्थ्य और धनंजय मुंडे के प्रभावशाली ओबीसी नेतृत्व को देखते हुए अजित पवार गुट में बड़े फेरबदल की तैयारी की जा रही है। गौरतलब है कि सरपंच संतोष देशमुख हत्या मामले में धनंजय मुंडे के करीबी सहयोगी वाल्मिक कराड को आरोपी बनाए जाने के बाद विपक्ष के तीखे हमलों और राजनीतिक दबाव के चलते मुंडे को मंत्री पद से इस्तीफा देना पड़ा था। बताया जाता है कि धनंजय मुंडे ने मार्च 2025 में स्वास्थ्य कारणों का हवाला देते हुए महाराष्ट्र के कृषि मंत्री पद से इस्तीफा दिया था। अब पार्टी में ओबीसी नेतृत्व की मजबूती और संगठनात्मक संतुलन को देखते हुए उनकी वापसी को लेकर मंथन तेज हो गया है।
उत्तर प्रदेश की राजनीति में बड़े बदलाव के संकेत मिल रहे हैं। भाजपा के नए प्रदेश अध्यक्ष के ऐलान के बाद राज्य सरकार में व्यापक मंत्रिमंडल फेरबदल की चर्चाएं जोरों पर हैं। सूत्रों के अनुसार पूर्व प्रदेश अध्यक्ष भूपेंद्र चौधरी को मंत्रिमंडल में शामिल किया जा सकता है, जिसके बाद संगठन और सरकार दोनों स्तरों पर बड़े बदलाव सम्भव हैं। वर्तमान में योगी सरकार में 54 मंत्री हैं जबकि अधिकतम 60 मंत्रियों की अनुमति है। ऐसे में छह नए चेहरों को मंत्रिमंडल में शामिल करने की गुंजाइश पहले से मौजूद है। इसके अलावा कुछ मौजूदा मंत्रियों को संगठन की जिम्मेदारी दी जा सकती है जिससे नए नेताओं के लिए रास्ता साफ हो सकता है। चर्चा है कि समाजवादी पार्टी से अलग हुए 7 बागी विधायकों में से 2 से 3 को मंत्री पद मिल सकता है। इनमें सबसे प्रमुख नाम पूजा पाल का बताया जा रहा है। वहीं ब्राह्मण चेहरे के तौर पर पूर्व मंत्री मनोज पांडेय का नाम भी चर्चा में है। यही नहीं डिप्टी सीएम पद को लेकर भी कयास लगाए जा रहे हैं कि मौजूदा डिप्टी सीएम केशव प्रसाद मौर्य को पार्टी में नई राष्ट्रीय भूमिका दी जा सकती है। सूत्रों के मुताबिक बिहार चुनाव के दौरान भी उन्हें संगठन की ओर से अहम जिम्मेदारियां सौंपी गई थीं जिससे इस सम्भावना को और बल मिलता है। इसी बीच केंद्रीय मंत्री साध्वी निरंजन ज्योति का नाम भी तेजी से उभर कर सामने आ रहा है। खबर है कि उन्हें यूपी सरकार में लाकर डिप्टी सीएम की जिम्मेदारी दी जा सकती है। निषाद समुदाय से आने वाली साध्वी निरंजन ज्योति को पार्टी की तेज-तर्रार और जमीनी नेता माना जाता है। सम्भावित मंत्रिमंडल विस्तार में कई अन्य बड़े नामों की भी चर्चा है। इनमें पूर्व मंत्री महेंद्र सिंह शामिल हैं जिनकी संगठन में मजबूत पकड़ बताई जाती है, वहीं विधायक पंकज सिंह को एक युवा और लोकप्रिय चेहरे के तौर पर देखा जा रहा है। इसके अलावा सहयोगी दलों को भी प्रतिनिधित्व बढ़ाए जाने की उम्मीद है। माना जा रहा है कि राष्ट्रीय लोक दल और अपना दल (एस) को एक-एक अतिरिक्त राज्य मंत्री पद दिया जा सकता है।
हाल ही में एनसीपी (शरद पवार) की लोकसभा सांसद सुप्रिया सुले ने लोकसभा में चर्चा के दौरान कहा कि वह ईवीएम या वीवीपैट पर सवाल नहीं उठाएंगी क्योंकि उन्हीं मशीनों के जरिए वह चार बार सांसद चुनी गई हैं। यह बयान विपक्षी दलों की साझा रणनीति से बिल्कुल अलग था और इसे राजनीतिक संकेत के तौर पर देखा गया। अब केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह से उनकी मुलाकात के बाद सुले चर्चा के केंद्र में आ गई हैं। इन घटनाओं ने उन अटकलों को और मजबूती दी है जिनमें कहा जा रहा है कि सुप्रिया सुले को मोदी सरकार में मंत्री बनाया जा सकता है। राजनीतिक पंडितों का कहना है कि हाल के महीनों में अमित शाह द्वारा लिए गए ताबड़तोड़ और अप्रत्याशित फैसलों को देखते हुए अब राजनीति में कुछ भी असम्भव नहीं रहा। सुप्रिया सुले को लेकर चल रही अटकलें पूरी तरह निराधार नहीं मानी जा सकती हैं क्योंकि वित्त राज्यमंत्री पंकज चैधरी के उत्तर प्रदेश भाजपा अध्यक्ष बनने के बाद मोदी मंत्रिमंडल में फेरबदल की सम्भावनाएं प्रबल हो गई हैं। माना जा रहा है कि मकर संक्रांति के बाद प्रधानमंत्री मंत्रिमंडल विस्तार या फेरबदल की दिशा में कदम बढ़ा सकते हैं। बंगाल समेत कई राज्यों में होने वाले विधानसभा चुनावों से पहले यह बदलाव राजनीतिक रूप से अहम माना जा रहा है, वहीं पवार परिवार के भीतर जमी बर्फ पिघलने के संकेत भी मिल रहे हैं। शरद पवार और अजित पवार के बीच संवाद बढ़ा है और परिवार के भीतर की तल्खी कम होती दिखाई दे रही है। सुप्रिया सुले का ईवीएम पर रुख बदलना और इसके तुरंत बाद अमित शाह से मुलाकात करना, महज संयोग नहीं हो सकता। अगर सुप्रिया सुले के मंत्री बनने की अटकलें सही साबित होती हैं और शरद पवार की अगुवाई वाली एनसीपी केंद्र में मोदी सरकार को समर्थन देती है, साथ ही महाराष्ट्र में दोनों एनसीपी गुट साथ आते हैं तो यह पवार परिवार और भाजपा दोनों के लिए फायदेमंद सौदा हो सकता है। शरद पवार को सत्ता में भागीदारी मिलने से न सिर्फ पार्टी को मजबूती मिलेगी बल्कि महाराष्ट्र में शरद पवार को अपनी पार्टी को एकजुट रखने में भी मदद मिल सकती है। सत्ता के साथ रहने पर ही शरद अपने प्रभाव वाले क्षेत्रों में मनचाहे विकास कार्य करा पाएंगे। हालांकि सुप्रिया सुले के मंत्री बनने को लेकर कोई आधिकारिक पुष्टि नहीं है, लेकिन हालिया घटनाक्रम साफ संकेत दे रहे हैं कि महाराष्ट्र और राष्ट्रीय राजनीति में कोई बड़ा राजनीतिक पुनर्संतुलन आकार ले सकता है और यह 2026 की राजनीति का सबसे बड़ा घटनाक्रम साबित हो सकता है।
उत्तर प्रदेश में आगामी विधानसभा चुनावों को लेकर राजनीतिक सरगर्मी अभी से तेज हो गई है। भारतीय जनता पार्टी ने चुनावी रणनीति पर काम शुरू कर दिया है और इसी क्रम में यूपी को नया प्रदेश अध्यक्ष भी मिल गया है। ओबीसी समीकरण को साधने के लिए भाजपा ने कुर्मी बिरादरी से आने वाले पंकज चैधरी पर भरोसा जताया है, वहीं प्रदेश की राजनीति में जो एक और नाम चर्चा में है वह है अमेठी की पूर्व सांसद स्मृति ईरानी का। लम्बे समय से सक्रिय राजनीति से दूर रहीं स्मृति ईरानी एक बार फिर प्रदेश में सक्रिय दिखाई दे रही हैं, जिससे उनके राजनीतिक भविष्य को लेकर अटकलें तेज हो गई हैं। हाल ही में हुए भाजपा प्रदेश अध्यक्ष के चुनाव के दौरान स्मृति ईरानी की मौजूदगी ने राजनीतिक गलियारों में नई चर्चाओं को जन्म दिया। वे न केवल पंकज चौधरी की प्रस्तावक के रूप में नजर आईं बल्कि मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ और पार्टी के अन्य वरिष्ठ नेताओं के साथ मंच साझा करती भी दिखीं। इसके अलावा भाजपा ने स्मृति ईरानी को राष्ट्रीय परिषद का सदस्य भी नियुक्त किया है। उन्हें सुल्तानपुर से राष्ट्रीय परिषद सदस्य बनाए जाने के बाद पार्टी कार्यकर्ताओं में उत्साह देखने को मिला। ऐसे में राजनीतिक गलियारों में सवाल उठ रहे हैं कि क्या अमेठी की पूर्व सांसद स्मृति ईरानी की राजनीतिक री-एंट्री होने जा रही है? क्या वे आगामी चुनाव में विधायक का चुनाव लड़ेंगी? लम्बे समय बाद भाजपा के बड़े कार्यक्रम में उनकी सक्रिय भागीदारी को अहम संकेत माना जा रहा है। राजनीतिक जानकार इसे 2027 विधानसभा चुनाव की तैयारी से जोड़कर देख रहे हैं। उनका कहना है कि अमेठी से लोकसभा चुनाव हारने के बाद स्मृति ईरानी टीवी और मीडिया की दुनिया में सक्रिय थीं और राजनीतिक मंचों से लगभग दूर नजर आ रही थीं। लेकिन अब पार्टी कार्यकर्मों में उनकी वापसी और संगठनात्मक जिम्मेदारी मिलना, उनकी राजनीतिक दूसरी पारी के संकेत हैं। भाजपा विधानसभा चुनाव में स्मृति ईरानी को अहम भूमिका दे सकती है। यहां तक कि उन्हें चुनावी मैदान में उतारे जाने की भी सम्भावना है। स्मृति ईरानी की मजबूत राजनीतिक पहचान और आक्रामक शैली पार्टी के लिए फायदेमंद हो सकती है।
बागियों की लगेगी लॉटरी!
उत्तर प्रदेश की राजनीति में बड़े बदलाव के संकेत मिल रहे हैं। भाजपा के नए प्रदेश अध्यक्ष के ऐलान के बाद राज्य सरकार में व्यापक मंत्रिमंडल फेरबदल की चर्चाएं जोरों पर हैं। सूत्रों के अनुसार पूर्व प्रदेश अध्यक्ष भूपेंद्र चौधरी को मंत्रिमंडल में शामिल किया जा सकता है, जिसके बाद संगठन और सरकार दोनों स्तरों पर बड़े बदलाव सम्भव हैं। वर्तमान में योगी सरकार में 54 मंत्री हैं जबकि अधिकतम 60 मंत्रियों की अनुमति है। ऐसे में छह नए चेहरों को मंत्रिमंडल में शामिल करने की गुंजाइश पहले से मौजूद है। इसके अलावा कुछ मौजूदा मंत्रियों को संगठन की जिम्मेदारी दी जा सकती है जिससे नए नेताओं के लिए रास्ता साफ हो सकता है। चर्चा है कि समाजवादी पार्टी से अलग हुए 7 बागी विधायकों में से 2 से 3 को मंत्री पद मिल सकता है। इनमें सबसे प्रमुख नाम पूजा पाल का बताया जा रहा है। वहीं ब्राह्मण चेहरे के तौर पर पूर्व मंत्री मनोज पांडेय का नाम भी चर्चा में है। यही नहीं डिप्टी सीएम पद को लेकर भी कयास लगाए जा रहे हैं कि मौजूदा डिप्टी सीएम केशव प्रसाद मौर्य को पार्टी में नई राष्ट्रीय भूमिका दी जा सकती है। सूत्रों के मुताबिक बिहार चुनाव के दौरान भी उन्हें संगठन की ओर से अहम जिम्मेदारियां सौंपी गई थीं जिससे इस सम्भावना को और बल मिलता है। इसी बीच केंद्रीय मंत्री साध्वी निरंजन ज्योति का नाम भी तेजी से उभर कर सामने आ रहा है। खबर है कि उन्हें यूपी सरकार में लाकर डिप्टी सीएम की जिम्मेदारी दी जा सकती है। निषाद समुदाय से आने वाली साध्वी निरंजन ज्योति को पार्टी की तेज-तर्रार और जमीनी नेता माना जाता है। सम्भावित मंत्रिमंडल विस्तार में कई अन्य बड़े नामों की भी चर्चा है। इनमें पूर्व मंत्री महेंद्र सिंह शामिल हैं जिनकी संगठन में मजबूत पकड़ बताई जाती है, वहीं विधायक पंकज सिंह को एक युवा और लोकप्रिय चेहरे के तौर पर देखा जा रहा है। इसके अलावा सहयोगी दलों को भी प्रतिनिधित्व बढ़ाए जाने की उम्मीद है। माना जा रहा है कि राष्ट्रीय लोक दल और अपना दल (एस) को एक-एक अतिरिक्त राज्य मंत्री पद दिया जा सकता है।
मोदी सरकार में मंत्री बनेंगी सुले?
हाल ही में एनसीपी (शरद पवार) की लोकसभा सांसद सुप्रिया सुले ने लोकसभा में चर्चा के दौरान कहा कि वह ईवीएम या वीवीपैट पर सवाल नहीं उठाएंगी क्योंकि उन्हीं मशीनों के जरिए वह चार बार सांसद चुनी गई हैं। यह बयान विपक्षी दलों की साझा रणनीति से बिल्कुल अलग था और इसे राजनीतिक संकेत के तौर पर देखा गया। अब केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह से उनकी मुलाकात के बाद सुले चर्चा के केंद्र में आ गई हैं। इन घटनाओं ने उन अटकलों को और मजबूती दी है जिनमें कहा जा रहा है कि सुप्रिया सुले को मोदी सरकार में मंत्री बनाया जा सकता है। राजनीतिक पंडितों का कहना है कि हाल के महीनों में अमित शाह द्वारा लिए गए ताबड़तोड़ और अप्रत्याशित फैसलों को देखते हुए अब राजनीति में कुछ भी असम्भव नहीं रहा। सुप्रिया सुले को लेकर चल रही अटकलें पूरी तरह निराधार नहीं मानी जा सकती हैं क्योंकि वित्त राज्यमंत्री पंकज चैधरी के उत्तर प्रदेश भाजपा अध्यक्ष बनने के बाद मोदी मंत्रिमंडल में फेरबदल की सम्भावनाएं प्रबल हो गई हैं। माना जा रहा है कि मकर संक्रांति के बाद प्रधानमंत्री मंत्रिमंडल विस्तार या फेरबदल की दिशा में कदम बढ़ा सकते हैं। बंगाल समेत कई राज्यों में होने वाले विधानसभा चुनावों से पहले यह बदलाव राजनीतिक रूप से अहम माना जा रहा है, वहीं पवार परिवार के भीतर जमी बर्फ पिघलने के संकेत भी मिल रहे हैं। शरद पवार और अजित पवार के बीच संवाद बढ़ा है और परिवार के भीतर की तल्खी कम होती दिखाई दे रही है। सुप्रिया सुले का ईवीएम पर रुख बदलना और इसके तुरंत बाद अमित शाह से मुलाकात करना, महज संयोग नहीं हो सकता। अगर सुप्रिया सुले के मंत्री बनने की अटकलें सही साबित होती हैं और शरद पवार की अगुवाई वाली एनसीपी केंद्र में मोदी सरकार को समर्थन देती है, साथ ही महाराष्ट्र में दोनों एनसीपी गुट साथ आते हैं तो यह पवार परिवार और भाजपा दोनों के लिए फायदेमंद सौदा हो सकता है। शरद पवार को सत्ता में भागीदारी मिलने से न सिर्फ पार्टी को मजबूती मिलेगी बल्कि महाराष्ट्र में शरद पवार को अपनी पार्टी को एकजुट रखने में भी मदद मिल सकती है। सत्ता के साथ रहने पर ही शरद अपने प्रभाव वाले क्षेत्रों में मनचाहे विकास कार्य करा पाएंगे। हालांकि सुप्रिया सुले के मंत्री बनने को लेकर कोई आधिकारिक पुष्टि नहीं है, लेकिन हालिया घटनाक्रम साफ संकेत दे रहे हैं कि महाराष्ट्र और राष्ट्रीय राजनीति में कोई बड़ा राजनीतिक पुनर्संतुलन आकार ले सकता है और यह 2026 की राजनीति का सबसे बड़ा घटनाक्रम साबित हो सकता है।
राजनीतिक री-एंट्री करेंगी स्मृति?
उत्तर प्रदेश में आगामी विधानसभा चुनावों को लेकर राजनीतिक सरगर्मी अभी से तेज हो गई है। भारतीय जनता पार्टी ने चुनावी रणनीति पर काम शुरू कर दिया है और इसी क्रम में यूपी को नया प्रदेश अध्यक्ष भी मिल गया है। ओबीसी समीकरण को साधने के लिए भाजपा ने कुर्मी बिरादरी से आने वाले पंकज चैधरी पर भरोसा जताया है, वहीं प्रदेश की राजनीति में जो एक और नाम चर्चा में है वह है अमेठी की पूर्व सांसद स्मृति ईरानी का। लम्बे समय से सक्रिय राजनीति से दूर रहीं स्मृति ईरानी एक बार फिर प्रदेश में सक्रिय दिखाई दे रही हैं, जिससे उनके राजनीतिक भविष्य को लेकर अटकलें तेज हो गई हैं। हाल ही में हुए भाजपा प्रदेश अध्यक्ष के चुनाव के दौरान स्मृति ईरानी की मौजूदगी ने राजनीतिक गलियारों में नई चर्चाओं को जन्म दिया। वे न केवल पंकज चौधरी की प्रस्तावक के रूप में नजर आईं बल्कि मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ और पार्टी के अन्य वरिष्ठ नेताओं के साथ मंच साझा करती भी दिखीं। इसके अलावा भाजपा ने स्मृति ईरानी को राष्ट्रीय परिषद का सदस्य भी नियुक्त किया है। उन्हें सुल्तानपुर से राष्ट्रीय परिषद सदस्य बनाए जाने के बाद पार्टी कार्यकर्ताओं में उत्साह देखने को मिला। ऐसे में राजनीतिक गलियारों में सवाल उठ रहे हैं कि क्या अमेठी की पूर्व सांसद स्मृति ईरानी की राजनीतिक री-एंट्री होने जा रही है? क्या वे आगामी चुनाव में विधायक का चुनाव लड़ेंगी? लम्बे समय बाद भाजपा के बड़े कार्यक्रम में उनकी सक्रिय भागीदारी को अहम संकेत माना जा रहा है। राजनीतिक जानकार इसे 2027 विधानसभा चुनाव की तैयारी से जोड़कर देख रहे हैं। उनका कहना है कि अमेठी से लोकसभा चुनाव हारने के बाद स्मृति ईरानी टीवी और मीडिया की दुनिया में सक्रिय थीं और राजनीतिक मंचों से लगभग दूर नजर आ रही थीं। लेकिन अब पार्टी कार्यकर्मों में उनकी वापसी और संगठनात्मक जिम्मेदारी मिलना, उनकी राजनीतिक दूसरी पारी के संकेत हैं। भाजपा विधानसभा चुनाव में स्मृति ईरानी को अहम भूमिका दे सकती है। यहां तक कि उन्हें चुनावी मैदान में उतारे जाने की भी सम्भावना है। स्मृति ईरानी की मजबूत राजनीतिक पहचान और आक्रामक शैली पार्टी के लिए फायदेमंद हो सकती है।

