Editorial

एक निजी अनुभव, एक सामूहिक संकट

मैं उत्तराखण्ड का रहने वाला हूं। रानीखेत में पैदा हुआ, वहीं पला-बढ़ा और फिर जीवन की जरूरतों ने मुझे प्रवासी बना दिया। लेकिन अपनी मातृभूमि का मोह ऐसा है कि वह बार-बार मुझे अपनी ओर खींचता है। गत सप्ताह मैं अल्मोड़ा में था, मेरा गृह जनपद, यह वही अल्मोड़ा है जिसे हम अपनी संस्कृति, अपनी परम्परा और अपनी आत्मा का हिस्सा मानते हैं लेकिन उस दिन जो देखा, उसने भीतर तक झकझोर दिया। चारों तरफ गंदगी का अम्बार, ढलानों पर फेंका हुआ कूड़ा, रास्तों के किनारे बिखरे प्लास्टिक और एक ऐसी लापरवाही, जिसे देखकर मन खिन्न हो गया।
उस क्षण सबसे बड़ा सवाल किसी और से नहीं, खुद से था कि हम आखिर कर क्या रहे हैं? सरकारी तंत्र को कोसना आसान है लेकिन क्या हमने कभी ईमानदारी से यह सोचा कि इस गंदगी में हमारा अपना कितना योगदान है? क्या हम केवल शिकायत करने वाले नागरिक बनकर रह गए हैं? उस दिन पहली बार यह एहसास भीतर तक चुभा कि हिमालय की हालत के लिए हम उतने ही जिम्मेदार हैं, जितनी कोई व्यवस्था।
आज जब मैं हिमालय की ओर देखता हूं तो उसकी भव्यता के साथ-साथ उसकी बेबसी भी दिखती है। यह वही हिमालय है जिसने हमें नदियां दीं, जलवायु दी, जीवन दिया लेकिन आज हम उसी हिमालय को धीरे-धीरे कचरे में बदल रहे हैं। यह बात कहने में भले ही कठोर लगे मगर सच यही है कि हिमालय अब केवल प्राकृतिक सौंदर्य का प्रतीक नहीं बल्कि हमारी लापरवाही का दर्पण बनता जा रहा है।
मैंने अपने बचपन में जिन पहाड़ों को साफ, शांत और पवित्र देखा था, आज उन्हीं पहाड़ों की ढलानों पर कूड़े के ढेर दिखाई देते हैं। प्लास्टिक की बोतलें, चिप्स के पैकेट, पाॅलिथीन और तरह-तरह का कचरा, यह सब अब हिमालय के नए ‘रंग’ बन गए हैं। यह दृश्य केवल आंखों को नहीं चुभता बल्कि भीतर तक एक अपराधबोध पैदा करता है कि हम अपनी ही धरती के साथ क्या कर रहे हैं।
यह समस्या केवल दिखने भर की नहीं है। यह कचरा धीरे-धीरे मिट्टी में घुलता है, नदियों में बहता है और अंततः हमारे ही जीवन का हिस्सा बन जाता है। हिमालय, जो जल का सबसे बड़ा स्रोत है, आज उसी जल को प्रदूषित करने का माध्यम बनता जा रहा है और इसके लिए जिम्मेदार कोई और नहीं बल्कि हम स्वयं हैं।
अगर इस संकट का सबसे भयावह रूप देखना हो तो दुनिया की सबसे ऊंची चोटी माउंट एवरेस्ट की ओर देखना होगा। एवरेस्ट, जिसे हम गौरव और उपलब्धि का प्रतीक मानते हैं, आज एक कड़वी सच्चाई का प्रतीक बन चुका है। वहां दशकों से जमा कचरे में ऑक्सीजन सिलेंडर, प्लास्टिक, टेंट, रस्सियां, खाने के पैकेट और यहां तक कि मानव मल और शव भी शामिल हैं।
नेपाल सरकार और विभिन्न अभियानों के अनुसार, एवरेस्ट क्षेत्र से समय-समय पर 50 टन से अधिक कचरा हटाया जा चुका है और कई अभियानों में एक ही सीजन में 10-11 टन कचरा नीचे लाया गया लेकिन समस्या यह है कि जितनी तेजी से कचरा हटाया जाता है, उससे कहीं अधिक तेजी से नया कचरा वहां पहुंच जाता है। यह एक अंतहीन चक्र बन चुका है, जहां सफाई और गंदगी की दौड़ में गंदगी आगे निकलती जा रही है।
यह केवल एक पर्यावरणीय संकट नहीं बल्कि एक नैतिक संकट भी है। हम शिखर तक पहुंचने की होड़ में उस शिखर की गरिमा को भूल गए हैं। यह सवाल हमें खुद से पूछना होगा कि क्या उपलब्धि की यह दौड़ इतनी जरूरी है कि हम प्रकृति को नष्ट कर दें? हिमालय में फैल रही इस गंदगी को व्यवस्थित रूप से सामने लाने का काम ‘दि हिमालयन क्लीनअप’  ने किया है, जिसे ‘इंटेग्राटेड माउंटेन इनिशिएटिव’ और ‘ब्रेक फ्री फ्रॉम प्लास्टिक’ जैसे संगठनों के सहयोग से चलाया जाता है। यह पहल खास इसलिए है क्योंकि यह केवल कागजों पर नहीं बल्कि जमीन पर काम करती है।
इस अभियान में स्वयंसेवक पहाड़ों पर जाकर कचरा इकट्ठा करते हैं, उसे गिनते हैं और उसका विश्लेषण करते हैं। इस प्रक्रिया में जो आंकड़े सामने आए, वे बेहद चिंताजनक हैं। आंकड़ों के अनुसार 1,21,000 से अधिक कचरे के टुकड़े दर्ज किए गए जिनमें करीब 88 प्रतिशत प्लास्टिक था। इसमें भी अधिकांश हिस्सा खाने-पीने की पैकेजिंग का था यानी वही चीजें जिन्हें हम आसानी के लिए इस्तेमाल करते हैं और बिना सोचे-समझे फेंक देते हैं।
यह रिपोर्ट हमें आईना दिखाती है। यह बताती है कि समस्या कहीं बाहर नहीं है, यह हमारी आदतों में है, हमारी सोच में है और हमारी सुविधा की संस्कृति में है।
उत्तराखण्ड के चार धाम, केदारनाथ, बद्रीनाथ, गंगोत्री और यमुनोत्री जहां श्रद्धा अपने चरम पर होती है, वहीं गंदगी भी अपने चरम पर पहुंच जाती है। हर साल लाखों श्रद्धालु इन धामों में पहुंचते हैं। यह संख्या आस्था का प्रमाण है लेकिन साथ ही एक भारी पर्यावरणीय दबाव भी पैदा करती है।
इन यात्राओं के दौरान जो कचरा उत्पन्न होता है, प्लास्टिक की बोतलें, खाने के पैकेट, पूजा सामग्री,वह अक्सर सही तरीके से निपटाया नहीं जाता। परिणामस्वरूप, यह कचरा ढलानों पर फेंक दिया जाता है जहां से वह नदियों में बहता हुआ नीचे तक पहुंचता है। यह स्थिति केवल पर्यावरण के लिए ही नहीं बल्कि हमारी आस्था के लिए भी एक गम्भीर सवाल खड़ा करती है।
इस विषय पर उत्तराखण्ड हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट  ने भी समय-समय पर चिंता जताई है। अदालतों ने स्पष्ट कहा है कि हिमालय एक नाजुक पारिस्थितिकी है और इसे अंधाधुंध विकास से बचाना जरूरी है लेकिन जमीनी स्तर पर इन चेतावनियों का असर सीमित ही दिखाई देता है।
जोशीमठ का धंसना एक बड़ा संकेत था। यह केवल एक शहर की समस्या नहीं थी बल्कि पूरे हिमालय के लिए एक चेतावनी थी लेकिन इसके बावजूद हम विकास के नाम पर वही गलतियां दोहरा रहे हैं, पहाड़ों को काटना, बड़ी सड़कें बनाना और प्राकृतिक संतुलन की अनदेखी करना।
इसी अंधेरे के बीच ‘हीलिंग हिमालयास फाउंडेशन’ जैसे प्रयास उम्मीद की किरण बनकर सामने आते हैं। इस संस्था की शुरुआत प्रदीप सांगवान ने 2016 में की थी। एक साधारण से अनुभव से शुरू हुआ यह प्रयास आज एक बड़े आंदोलन का रूप ले चुका है।
यह संगठन केवल कचरा उठाने का काम नहीं करता बल्कि ‘दि हिमालयन क्लीनअप’ जैसे अभियानों से मिले डेटा को आधार बनाकर अपने कार्यों को दिशा देता है। यह ट्रेकिंग मार्गों पर सफाई अभियान चलाता है, कचरे के पृथककरण के लिए केंद्र स्थापित करता है और स्थानीय समुदायों को इस प्रक्रिया में शामिल करता है। यह दिखाता है कि अगर इच्छाशक्ति हो तो बदलाव सम्भव है लेकिन अंततः यह सवाल हम पर आकर रुकता है। मैंने खुद देखा  पहाड़ों की ढलानों पर कूड़े के ढेर। यह दृश्य केवल एक समस्या नहीं बल्कि एक चेतावनी है। अब हमें यह तय करना होगा कि हम केवल दर्शक बने रहेंगे या जिम्मेदारी उठाएंगे। सरकारें अपनी भूमिका निभाएंगी लेकिन अगर समाज नहीं बदलेगा, तो कुछ नहीं बदलेगा। जो लोग पहाड़ों पर जाते हैं, वे अपना कचरा वापस लेकर आएं। जो लोग वहां दुकानें चलाते हैं, वे कचरा ढलानों पर न फेंकें। और हम सब मिलकर यह समझें कि हिमालय कोई ‘डस्टबिन’ नहीं है।
हिमालय ने हमें जीवन दिया है, सिर्फ पानी और संसाधन नहीं बल्कि एक सभ्यता, एक संस्कृति और एक संतुलित जीवन जीने की समझ भी दी है। हमारे गीतों में, हमारी आस्थाओं में, हमारे त्योहारों में हिमालय कहीं न कहीं जीवित रहता है। गंगा और यमुना केवल नदियां नहीं हैं, वे हमारी चेतना का हिस्सा हैं और उनका उद्गम यही हिमालय है, जिसे हम अपनी लापरवाही से चोट पहुंचा रहे हैं।
अब समय केवल भावुक होने का नहीं बल्कि ठोस निर्णय लेने का है। हमें अपने व्यवहार में बदलाव लाना होगा, यात्रा के दौरान अपने कचरे को वापस लाना, प्लास्टिक का उपयोग कम करना, और दूसरों को भी इसके लिए प्रेरित करना। स्थानीय स्तर पर छोटे-छोटे प्रयास ही बड़े बदलाव की नींव रखते हैं। गांवों में, कस्बों में, यात्रा मार्गों पर, जहां भी हम हैं, वहीं से शुरुआत करनी होगी।
हमें यह भी समझना होगा कि हिमालय को बचाना केवल पर्यावरण का मुद्दा नहीं है, यह हमारे अस्तित्व का प्रश्न है। अगर हिमालय असंतुलित होगा, तो नदियां प्रभावित होंगी, जलवायु बदलेगी और उसका असर पूरे देश पर पड़ेगा। इसलिए यह किसी एक राज्य या क्षेत्र की जिम्मेदारी नहीं बल्कि पूरे समाज की साझी जिम्मेदारी है।
हमें अपने भीतर यह भाव भी जगाना होगा कि हिमालय कोई ‘घूमने की जगह’ भर नहीं है बल्कि यह हमारी धरोहर है, हमारी पहचान है। जब तक यह भाव हमारे भीतर नहीं आएगा, तब तक नियम और कानून भी अधूरे रहेंगे। बदलाव तब आएगा जब हर व्यक्ति अपने हिस्से की जिम्मेदारी समझेगा, चाहे वह पर्यटक हो, स्थानीय निवासी हो या व्यवसायी। आने वाली पीढ़ियां हमसे यह नहीं पूछेंगी कि हमने कितनी सड़कें बनाईं या कितनी ऊंचाइयां छुईं, वे यह पूछेंगी कि जब हिमालय संकट में था, तब हमने क्या किया और उस सवाल का जवाब हमें आज अपने कर्मों से तैयार करना है। गिर्दा ने दशकों पहले जो हमें अपने गीत के जरिए कहा था, हम न तब समझे थे और न आज समझ रहे हैं। हालांकि उन्होंने हिमालयी संसाधनों की लूट को केंद्र बनाते हुए अपनी व्यथा गीत के माध्यम से सामने रखी थी, आज वे होते तो अवश्य ही कचरेदान में बदल दिए गए पहाड़ों की व्यथा जरूर अपने गीतों के जरिए सामने रखते। 80 के दशक में उन्होंने गाया था-

आज हिमाल तुमनकै धत्यूंछो,
जागो, जागो हो मेरा लाल,
नि करि दी हालो हमरी निलामी,
नि करि दी हालो हमरो हलाल।

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