उत्तराखण्ड प्रदेश कांग्रेस कमेटी के वर्तमान अध्यक्ष गणेश गोदियाल राज्य की राजनीति का एक ऐसा नाम हैं, जिन्होंने संगठन और जनसंघर्ष, दोनों स्तरों पर अपनी अलग पहचान बनाई है। पौड़ी गढ़वाल जनपद से ताल्लुक रखने वाले गोदियाल का राजनीतिक सफर जमीनी स्तर से शुरू होकर प्रदेश नेतृत्व तक पहुंचा है जो उन्हें एक स्वाभाविक जननेता के रूप में स्थापित करता है। उन्होंने छात्र राजनीति और सामाजिक सरोकारों के माध्यम से सार्वजनिक जीवन में प्रवेश किया। उनकी छवि एक संघर्षशील, सुलभ और कार्यकर्ताओं के बीच लोकप्रिय नेता की रही है। गोदियाल उत्तराखण्ड विधानसभा में श्रीनगर (गढ़वाल) सीट से विधायक रह चुके हैं। संगठनात्मक स्तर पर भी वे लम्बे समय तक कांग्रेस के विभिन्न पदों पर सक्रिय रहे हैं, जिससे उन्हें पार्टी की आंतरिक संरचना और कार्यशैली की गहरी समझ है। प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष के रूप में उनकी नियुक्ति ऐसे समय में हुई, जब पार्टी को पुनर्गठन और कार्यकर्ताओं में नई ऊर्जा भरने की आवश्यकता है। सरल स्वभाव, स्पष्टवादिता और जनहित के मुद्दों पर मुखर रहने वाले गणेश गोदियाल से ‘दि संडे पोस्ट’ के रोमिंग एसोसिएट एडिटर आकाश नागर की विस्तृत बातचीत

वर्ष 2027 के विधानसभा चुनाव के दृष्टिगत भाजपा एक्टिव मोड में है लेकिन वहीं दूसरी तरफ देखें तो कांग्रेस की सक्रियता न के बराबर दिख रही है। ऐसा क्यों?
हमारे सभी कांग्रेसजन, वरिष्ठ नेता, पदाधिकारी और कार्यक्रकर्ता पिछले अनुभवों को ध्यान में रखते हुए बहुत ही आक्रामक तेवरों के साथ पूरी तैयारी से काम कर रहे हैं। इसका परिणाम यह होगा कि 2027 में कांग्रेस विधानसभा चुनाव जीतेगी।

जनता 2027 में कांग्रेस को क्यों वोट देगी? पिछले 9 साल से कांग्रेस ने प्रदेश के लिए ऐसा क्या किया है कि वह ‘हाथ’ को मजबूत करेगी?
जनता कांग्रेस को इसलिए वोट देगी क्योंकि जनहित में कांग्रेस ने जो भी कार्य किए हैं लोग उससे अब वर्तमान सरकार की तुलना कर रहे हैं। जगह-जगह पर भ्रष्टाचार, महिला सुरक्षा और बेरोजगारी के मुद्दे आए दिन उठते रहते हैं। प्रशासन सिर्फ और सिर्फ सत्ता पक्ष के नेताओं के हिसाब से चल रहा है। ऐसी सभी तुलना जनता कर रही है। वह देख रही है कांग्रेस और भाजपा की सरकारों ने उनके हित में क्या किया है। इन सभी बातों को ध्यान में रखते हुए जनता कांग्रेस को ही वोट देगी। जनता अब बदलाव करने के मूड में है।
अगर 2027 में कांग्रेस सत्ता में आती है तो पार्टी का गैरसैंण को लेकर क्या स्टैंड रहेगा?
गैरसैंण को लेकर मैंने पहले ही बोल दिया है कि हम सत्ता में आए तो गैरसैंण को स्थाई राजधानी बनाएंगे। पूर्व में जब हमारी सरकार थी तो गैरसैंण में सचिवालय की स्थापना की गई। करोड़ों रुपए खर्च करके वहां भवन इत्यादि बनाए गए। हमारी पार्टी चुनाव से पहले एक मेनीफैस्टो कमेटी बनाती है। मेनीफैस्टो कमेटी में भी गैरसैंण को स्थाई राजधानी बनाने का  प्रस्ताव अनिवार्य रूप से शामिल होगा। गैरसैंण राजधानी का सपना तभी साकार होगा और उसके बनने से पलायन जैसी समस्याओं पर ब्रेक लगेगा। आज जिस प्रकार से हरिद्वार, ऊधमसिंह नगर और देहरादून में पहाड़ों से पलायन करके लोग बस रहे हैं उसको रोकना बहुत आवश्यक है। इसके लिए एकमात्र रास्ता यही है कि गैरसैंण स्थाई राजधानी बने।
भाजपा सरकार के पिछले 9 साल के कार्यकाल को आप किस नजर से देखते हैं?
भाजपा सरकार का बहुत ही निराशाजनक कार्यकाल रहा है। जो सरकार किसी न किसी वाद से बनती है उससे जनता अपने आपको ठगा सा महसूस कर रही है। यह सरकार भी एक वाद के चलते बनी है। जनता को जाति, धर्म के इमोशनल भ्रम में फंसाकर सरकार बनी है। इसलिए आज प्रदेश के लोग यह महसूस करते हैं कि हमसे गलती हुई है। 2027 में जनता इस गलती को सुधारना चाहती है। जनता के पास 2027 में एक मौका है उस मौके पर जनता अपना विश्वास कांग्रेस पर व्यक्त करेगी।
अंकिता भंडारी हत्याकांड को लेकर प्रदेश में कई बार धरना-प्रदर्शन हो चुके हैं। आए दिन कोई न कोई नेता इस पर बयान देकर आग को सुलगा देता है। पिछले दिनों पूरे प्रदेश में इस हत्याकांड को लेकर जनता सड़कों पर आई। उसके बाद धामी सरकार ने सीबीआई जांच के आदेश दिए। आपका इस मामले को लेकर क्या कहना है?
सरकार ने सीबीआई जांच की बात कही है। हम अब एक-दो महीने इंतजार कर रहे हैं कि उसके रिजल्ट क्या आएंगे? मुझे लगता है सरकार ने यह काम भी ठंडे बस्ते में डाल दिया है। सरकार ने इस मामले में समग्र सीबीआई जांच नहीं कराई है। हमारा ये मानना है कि सरकार सीबीआई के नाम पर चाहे किसी नाम पर इस जांच को लटकाने-भटकाने की कोशिश में है, लेकिन जैसे ही हमारी सरकार बनेगी, हम इसकी निष्पक्ष जांच कराएंगे। जांच के दायरे में जो भी आएंगे उनके खिलाफ कानून सम्मत  कार्यवाही होगी। उसके बाद जो दोषी है वे बेनकाब होंगे और उनको सजा मिलेगी।
पच्चीस साल बीत जाने के बाद भी पहाड़ों में विकास की गंगा नहीं बही है, आज भी वहां न अच्छे स्कूल हैं, न मरीजों का बेहतर इलाज हो रहा है और न ही कोई भी सरकार रोजगार के साधन मुहैया करा पाई है। कई गांव खंडहर और भूतहा बन चुके हैं। आपके पास इसको लेकर क्या योजना है?
मैंने कहा न कि स्थाई राजधानी गैरसैंण हो तो काफी हद तक पलायन रूकेगा। पलायन का मुख्य कारण रोजगार है। सरकार चाहे वह कांग्रेस की हो या भाजपा की उसका प्रथम कर्तव्य यह होना चाहिए कि जिन जिलों में पलायन अधिक है वहां पलायन को रोकने के लिए कारगर कदम उठाए जाएं। स्थानीय लोगों को प्राथमिकता के आधार पर रोजगार उपलब्ध कराए जाएं। यह सरकार स्थानीय स्तर पर रोजगार मुहैया नहीं करा पा रही है। हमारी सरकार बनेगी तो हम इसी पर काम करेंगे। उन जिलों में जो ज्यादा प्रभावित हैं, वहां रोजगार के अवसर पैदा किए जाएंगे। वहां पर रोजगार स्थापित कराने का काम किया जाएगा जिससे कि भविष्य में पलायन न हो।
उत्तराखण्ड को पर्यटन प्रदेश कहा जाता है। यहां तीर्थाटन भी अधिक होता है। लाखों लोग चारधाम तीर्थ यात्रा पर पहुंचते हैं लेकिन यात्रियों के लिए उचित बंदोबस्त नहीं हैं। अगर 2027 में आपकी सरकार आती है तो आप कैसे पर्यटकों की समस्याओं को खत्म करेंगे और पर्यटन को बढ़ावा देंगे?
सरकार पर्यटन को जान-बूझकर तहस-नहस कर रही है। पिछले तीन-चार सालों में ये देखने को मिला है कि यात्रियों को जगह-जगह पर रोका जाता है। उन्हें अनावश्यक रूप से परेशान किया जाता है। कभी उनके इधर-उधर रूट डायवर्ट किए जाते हैं उससे पर्यटक परेशान होता है। केदारनाथ, बद्रीनाथ, यमुनोत्री और गंगोत्री यानी चारधाम यात्रा में जो श्रद्धालु आते हैं। उनकी संख्या में सरकार इजाफा तो बताती है लेकिन जो होटल, ढाबे वाले हैं उन्हें मैं पिछले चार साल से देख रहा हूं कि वे मायूस हैं। वो कहते हैं कि कोई धंधा नहीं हुआ, कोई व्यापार नहीं हुआ, किराया नहीं निकला। तो आखिर यात्री कहां हैं? ऐसा इसलिए क्योंकि सरकार यात्रा को डायवर्ट करती है उन्हें डिस्टर्ब करती है। इसका मतलब ये है कि सरकार के पास कोई योजना नहीं है। सरकार के पास इसका कोई योजनाबद्ध तरीका नहीं है। इसी का यह मिला-जुला परिणाम है।
उत्तराखण्ड में सरकार दावा करती है कि उन्होंने बेरोजगारों को बहुत संख्या में रोजगार दिया है। बावजूद इसके बेरोजगारी बढ़ती जा रही है। आपके पास बेरोजगारों के लिए क्या योजना है?
मैं कई बार कह चुका हूं कि उत्पादकता रोजगार की जननी है और जब तक हम उत्पादकता नहीं बढ़ाएंगे, उत्पादकता का माहौल नहीं बनाएंगे तब तक रोजगार कहां से आएगा? हमें उत्पादन और वैल्यू एडीशन के दो कामों में अपनी ऊर्जा को लगाना है ताकि बेरोजगारों को रोजगार मिल सके। मेरा विश्वास है कि उत्तराखण्ड के जो पहाड़ी इलाके हैं वहां हम भरपूर रोजगार दे पाएंगे। उसका सकारात्मक असर ये होगा कि जब पहाड़ी इलाकों के युवा पहाड़ी इलाकों में रोजगार करने लगेंगे तो तब मैदानों में भार कम होगा। तब मैदान के युवा भी मैदान में रोजगार आराम से पा सकते हैं।
अस्थाई राजधानी देहरादून की शांत वादियां हो या तराई का हल्द्वानी या ऊधमसिंह नगर अपराध की घटनाएं दिन पर दिन बढ़ रही हैं। जिस राज्य के लोग शांति और सुकून के साथ आनंद की जिंदगी जीने के लिए जाने जाते थे वे अब बढ़ते क्राइम से भयभीत हैं। प्रदेश में अपराध और अपराधियों के बढ़ावे के लिए आप किसे जिम्मेदार मानते हैं?
कानून व्यवस्था की नजर से अगर देखा जाए तो उत्तराखण्ड सरकार बुरी तरह से फेल है। ये सरकार इस रूप में जानी जाएगी कि वो पुलिस का अपने हित के लिए दुरुपयोग करती है। लोगों की रक्षा के लिए पुलिस नाम की कोई चीज नहीं है। ये जो वारदातें आप दिन प्रतिदिन सुन रहे हैं कि गोली चली, आज ये हो गया, कल वो हो गया वो उसी का परिणाम है। जिस दिन ये सत्ता में बैठे राजनेता पुलिस का उपयोग जनता के हित में करने लगेंगे उसी दिन से वारदातों में कमी आएगी। मैं ये मानता हूं कि पुलिस के उन अधिकारियों को भी और प्रशासन के तमाम अधिकारियों को जो संविधान की शपथ लेकर उन पदों पर बैठे हैं, उन्हें अपने दायित्वों का अहसास हो और वे जनता के हितों का काम करें। कोई राजनेता अगर जबरदस्ती उन पर अपने हितों के लिए दबाव डाले तो हाथ जोड़कर कहें कि आप मुझे चाहे तो यहां से हटा सकते हैं लेकिन मैं आपके हितों की रक्षा के लिए नहीं बल्कि कानून और जनता की रक्षा के लिए यहां पर हूं और नियम के अनुसार जो होगा वही करूंगा और मैं किसी के दबाव में आकर अनैतिक कार्यवाही नहीं करूंगाा। जिस दिन यह हो जाएगा उस दिन सब ठीक हो जाएगा।
पहाड़ों पर स्वास्थ्य सेवाएं बहुत चरमराई हुई हैं। अस्पताल रेफर सेंटर बनकर रह गए हैं। मरीजों का समुचित इलाज नहीं हो पा रहा है, डाॅक्टरों की कमी है। गर्भवती महिलाओं को प्रसव के दौरान भी इलाज नहीं मिल पा रहा है। ऐसे में आप क्या सोचते हैं?
पहाड़ों की हो या मैदानों की, स्वास्थ्य सेवाएं पूरी तरह चरमराई हुई हैं। खासकर मरीजों की जान के साथ खिलवाड़ पहाड़ों में ज्यादा हो रहा है। मैं आपको श्रीनगर का ही एक उदाहरण देता हूं। श्रीनगर मेडिकल काॅलेज एक बहुत ही महत्वाकांक्षी मेडिकल काॅलेज योजना थी। श्रीनगर में एक मेडिकल काॅलेज का बनाया जाना इस रूप में लोगों की आकांक्षाओं की पूर्ति करता था कि गम्भीर बीमारियों का इलाज भी हम यहां पर करा पाएंगे लेकिन आज यह सिर्फ एक रेफर सेंटर बनकर रह गया है। मुझे लगता है कि जब तक धन सिंह रावत स्वास्थ्य मंत्री पद पर रहेंगे तब तक कोई स्थिति नहीं सुधरेगी। पहाड़ में, चाहे वह कुमाऊं मंडल का अल्मोड़ा हो जहां मरीज किसी सरकारी सेंटर में जाता है तो उसको रेफर करके डिस्ट्रिक हाॅस्पिटल में भेजा जाता है और अगर डिस्ट्रिक हाॅस्पिटल में वो पहुंच गया तो उसको रेफर कर हल्द्वानी भेजा जाता है। यही हाल गढ़वाल मंडल का है। चमोली में अगर कोई बीमार होता है तो उसको भी रेफर करके डिस्ट्रिक हाॅस्पिटल भेजा जाता है और डिस्ट्रिक वाला उसको श्रीनगर मेडिकल काॅलेज भेजता है। फिर मेडिकल काॅलेज वाला उसको देहरादून के लिए रेफर कर देता है। इस तरह ये सब सरकारी अस्पताल सिर्फ रेफर सेंटर बनकर रह गए हैं।
पहाड़ों में जंगली जानवरों का आतंक बहुत बढ़ गया है। आए दिन उनके द्वारा लोगों पर हमला किए जा रहे हैं जिसमें मरने वाले लोगों की संख्या बढ़ रही है। इस पर रोक कैसे लग सकती है?
यह सच है कि पहाड़ी इलाकों में जंगली जानवरों के हमले बहुत बढ़ गए हैं। हमारे इलाके में कुछ दिन पहले ही एक घटना घटी कि एक महिला पर भालू ने हमला कर दिया। इस साल जंगली जानवरों के व्यवहार में बड़ा बदलाव आया है। इसको सही किए जाने की आवश्यकता है। मैंने सरकार को चेताने के लिए चार महीने पहले ही इस मुद्दे पर आंदोलन किया है। उस आंदोलन का मकसद यह था कि सरकार चेतेगी लेकिन सरकार चेतने को तैयार नहीं है। सरकार जागने को तैयार नहीं है। जंगली जानवरों से लोगों की सुरक्षा के लिए मैंने पहले भी कहा था कि दो तरह की योजनाएं बननी चाहिए, एक तात्कालिक और एक दीर्घकालिक। तात्कालिक योजना के तहत ये होना चाहिए कि जंगली जानवरों के लिए कोई सिग्नल सिस्टम होना चाहिए। गावों में कुछ ऐसे जागरूक लोगों को काम दिया जाए कि वो लोग रात को कुछ आवाज करें। कुछ ऐसे पटाखे की जैसी आवाज करें या इस तरह के कोई यंत्रों से निगरानी रखें जिससे ऐसे मामलों पर रोक लगे और दीर्घकालिक योजना के तहत यह होना चाहिए कि जानवरों की संख्या में भी कंट्रोल करने के लिए एक नियम बनना चाहिए। जैसे बंदर है, इनकी संख्या कितनी हो ये भी कंट्रोल किए जाने की बात की जानी चाहिए। अगर इंसानों से ज्यादा संख्या जंगली जानवरों की हो जाएगी तो निश्चित रूप से प्राकृतिक संतुलन गड़बड़ाएगा। ये अंतर और बढ़ता जाएगा। इसलिए यह जरूरी है कि इनकी संख्या पर भी कंट्रोल किया जाना चाहिए। जंगली जानवरों के इलाकों के और रिहायशी इलाकों में डिमार्केशन होना चाहिए। अलग-अलग बाउंड्री होनी चाहिए ताकि एक दूसरे के क्षेत्र में न घुस सके। ये दीर्घकालिक योजनाओं में शामिल किया जाना चाहिए। ये अकेले उत्तराखण्ड की बस की बात नहीं है। केंद्र सरकार तक का इसमें सहयोग मिलना चाहिए।
वर्तमान धामी सरकार को आप किस रूप में देखते हैं?
मैं धामी सरकार को इस रूप में देखता हूं कि इस प्रदेश को गलत रास्ते पर ले जाने के लिए सरकार जानी जा रही है। धामी जी नफरती भाषणों को लेकर देश के पहले नम्बर के मुख्यमंत्री बन चुके हैं। आगे भी इसी रूप में जाने जाएंगे। उनको एक युवा के रूप में उत्तराखण्ड का मुख्यमंत्री बनकर एक सौभाग्य मिला था कि वो इस प्रदेश को सही रास्ते पर ले जाने का काम करें लेकिन दुर्भाग्य से उन्होंने जनता के बीच ‘बांटो और राज करो’ को ज्यादा आसान समझा है। वो धार्मिक विद्वेष फैलाकर राज करने वाले राजपुरुष हैं। अंततोगत्वा उनकी ये इच्छा सिर्फ इसलिए है कि वो सत्ता पर बने रहें। युवा अवस्था में उन्हें यह सौभाग्य मिला था, काश इस सौभाग्य का उपयोग इस प्रदेश की जनता के हितों के लिए करते और रोजगार के अवसर पैदा करने में रूचि रखते, सृजनात्मक बातों को रखने में रूचि रखते तो बहुत अच्छे राजनेता साबित हो सकते थे लेकिन वो बस रटा-रटाया डेमोग्राफी चेंज, लव जेहाद, थूक जेहाद और भ्रष्टाचार पांच बिंदु हैं जिनको वो लिखकर ले जाते हैं उन्हीं को वो जगह-जगह बोलते हैं। जिससे कि उन्होंने सबसे ज्यादा हेट स्पीच देने वाले मुख्यमंत्री का खिताब हासिल किया है। ये खिताब उन्हें मुबारक हो लेकिन निश्चित रूप से उत्तराखण्ड के लिए ये अच्छे संकेत नहीं हैं।
आप कहते हैं कि आपकी पार्टी आगामी 2027 का विधानसभा चुनाव जीतेगी लेकिन आपकी पार्टी तो पहले से ही गुटबाजी में बंटी हुई है। नेता एक-दूसरे की टांग खिंचाई में लगे हैं। इससे  कैसे निजात पाई जाएगी?
कोई गुट नहीं है, कोई किसी की टांग खिंचाई नहीं कर रहा है। एक परिवार में अगर पांच व्यक्ति होते हैं तो हो सकता है उनके किसी विषय पर अलग-अलग मत हो लेकिन वो फिर भी एक परिवार है। इसी तरह हमारा भी कांग्रेस परिवार है जिसमें कोई राजनीति नहीं है। कोई वाद-विवाद नहीं है। यह जरूर है कि हमारी पार्टी लोकतांत्रिक प्रवृत्ति की है। हम भी सब लोकतांत्रिक लोग हैं। जो अलोकतांत्रिक प्रवृत्ति के लोग हैं वह कांग्रेस में रह ही नहीं सकते। कांग्रेस के बहुत से लोग भाजपा में गए लेकिन चूंकि वो लोकतांत्रिक प्रवृत्ति के लोग थे तो वहां उन्हें रास नहीं आता है। उन्हें बोलने की आजादी तक नहीं है। हमारे यहां अपने विचारों को रखने की आजादी है। ये भाजपा का एक प्रोपेगेंडा है कि कांग्रेस गुटबाजी का शिकार है।
देखने में आता है कि जब-जब प्रदेश में विधानसभा चुनाव होते हैं तब-तब कांग्रेस में मुख्यमंत्री बनने की होड़ लग जाती है। कई नेता अपने आपको स्वयंभू मुख्यमंत्री घोषित कर देते हैं। उससे पार्टी कार्यकर्ताओं के साथ ही जनता में ऊहापोह की स्थिति हो जाती है जबकि भाजपा में ऐसा नहीं है वहां चुनाव से पूर्व मुख्यमंत्री घोषित नहीं किया जाता है। चुनाव बाद ही तय होता है?
कौन मुख्यमंत्री होगा ये तो कांग्रेस का हाईकमान तय करता है लेकिन मैं जनता को ये संदेश आपके साक्षात्कार के माध्यम से देना चाहूंगा कि जो भी मुख्यमंत्री होगा जनता के विचारों पर ही आधारित होगा। जो जनता के
विचारों के अनुरूप कार्यशैली अपनाकर डिलीवरी करेगा। लोगों की उम्मीद पर और सरकार की उम्मीदों पर वह खरा उतरेगा।
2027 के विधानसभा चुनाव से पूर्व परिसीमन की सम्भावनाएं जताई जा रही हैं उसमें चर्चा है कि पहाड़ की सीटें कम होंगी और मैदान की बढ़ेंगी, ऐसे में पहाड़ी राज्य की परिकल्पना पर कितना असर पड़ेगा?
अभी गैरसैंण में विधानसभा का सत्र हुआ था वहा पक्ष और विपक्ष को आपसी सहमति बनाकर एक प्रस्ताव देना चाहिए था कि परिसीमन जनसंख्या के आधार पर नहीं बल्कि क्षेत्रफल के आधार पर किया जाना चाहिए। मैं मानता हूं कि विधानसभा में एक प्रस्ताव लाया जाए और सर्वानुमति से केंद्र सरकार को प्रस्ताव पास होकर जाए कि उत्तराखण्ड के परिसीमन में नियम बनाकर मानकों को शिथिल किया जाए। वर्तमान में पहाड़ों के जिलों में जो सीटें हैं उन्हें किसी भी सूरत में कम न होने दिया जाए बल्कि उनमें बढ़ोतरी हो। जैसे ये नियम है कि एक लाख की जनसंख्या पर एक विधानसभा होगी तो ये भी नियम बन सकता है कि पहाड़ों में 50 हजार की आबादी पर एक सीट होगी और मैदान में डेढ़ लाख पर एक सीट होगी।
एक तरफ भाजपा में 2027 के मद्देनजर उम्मीदवारों की बहुलता देखने को मिल रही है जबकि दूसरी तरफ कहा जा रहा है कि कांग्रेस में कई सीटें ऐसी हैं जहां कंडीडेट ढूंढ़े नहीं मिल रहे हैं, ऐसा क्यों?
मुझे तो नहीं लगता कि लोगों में ऐसी चर्चा है अगर चर्चा है तो इसमें कोई दम नहीं है। हमारे लिए तो कंडीडेट्स की अधिकता हमारे लिए एक चुनौती है कि हम उनमें से कितने कम करें।
क्या बाॅबी पवार कांग्रेस से चुनाव लड़ेंगे?
ये उन पर निर्भर करता है। हम उनके बारे में कुछ नहीं बोल सकते हैं। अभी इस बारे में कोई प्राइमरी बात तो नहीं हुई है लेकिन एक दिन उनका बयान मैंने जरूर सुना था कि विपक्ष के सब लोगों को एकजुट होकर चुनाव लड़ना चाहिए।
जो पूर्व में कांग्रेस के नेता भाजपा में गए हैं क्या उनके लिए कांग्रेस दरवाजा खोलेगी?
मैं अकेला इस बात के लिए अधिकृत नहीं हूं लेकिन समय-समय पर हमारी पार्टी के वरिष्ठ नेताओं के बीच बात होती रहती है। हालांकि भविष्य में जीतने की सम्भावना सबसे बड़ा आधार होगा। जीतने की सम्भावना के आधार पर और पार्टी का भविष्य में अपेक्षित सहयोग देने के आधार पर इस निर्णय को लिया जाना उचित होगा। जब समय-समय पर इन पर बातें सामने आएंगी तब इन पर निर्णय लिया जाएगा।
चर्चा है कि कांग्रेस के कुछ नेता भाजपा के सम्पर्क में हैं?
मुझे लगता नहीं है कि ऐसा है। मैं एक-एक विधायक के सम्पर्क में हूं लेकिन मुझे ऐसा लगता नहीं। ये बीजेपी का एक शिगुुफा है।
कुछ ऐसे नेता हैं जो दूसरी पार्टियों से आकर धनबल पर चुनाव के ऐन वक्त पर पार्टी में आते हैं और टिकट पा लेते हैं। ऐसे में पार्टी का जमीनी नेता जिसने अपना पूरा जीवन पार्टी का सिपाही बनकर सेवा में लगाया वह उपेक्षित और निराश हो जाता है?
मैं कांग्रेस पार्टी के सभी कार्यकर्ताओं को यह आश्वासन देना चाहता हूं कि धनबल के आधार पर किसी को टिकट नहीं मिलेगा। मेरे रहते यह सम्भव नहीं होगा। हम जमीनी कार्यकर्ताओं की पुरजोर लड़ाई लड़ेंगे जो लोग वर्षों से काम कर रहे हैं। मैं भी ऐसे किसी नेता की पैरवी नहीं करूंगा जिसमें जीतने की सम्भावना नहीं होगी चाहे वह कितना ही बलशाली और धनवान हो क्योंकि मैं जिस पद पर बैठा हूं उस पद  पर न्याय करना मेरा फर्ज बनता है।
पिछली बार विधानसभा चुनाव से ऐन वक्त पहले आप कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष बने थे, एक बार फिर यही सिचुएशन है। ऐसे में तब और अब में आप अपने सामने कैसी स्थितियां पा रहे हैं और इस बार कैसी चुनौती महसूस कर रहे हैं?
मैं जब पहली बार अध्यक्ष बना था तब कम्फर्ट और आत्मविश्वास से लबरेज था। मुझे लगता है कि राजनीति में प्रेशर तो होते हैं लेकिन समय अनुसार वह ठीक हो जाते हैं। आज मैं यह महसूस करता हूं कि मैं चीजों को हैंडल करने में पहले से ज्यादा सक्ष्म हूं। ये इसलिए सम्भव हो पाया कि मुझे सभी वरिष्ठ नेताओं का सहयोग और कार्यकर्ताओं का विश्वास प्राप्त है। कार्यकर्ताओं में एक नया जोश, नई उम्मीद और नई उमंग आई है। उत्तराखण्ड का आम जनमानस इस बात को कहने लगा है कि अब कांग्रेस की सरकार आएगी इससे मैं कॉन्फीडेंट हूं। मेेरा आत्मविश्वास बढ़ा है। सकारात्मक प्रयास करने से जब आत्मविश्वास बढ़ता है तो वो मंजिल तक पहुंचा देता है। मेरा विश्वास है कि हम इस बार मंजिल पर जरूर पहुंचेंगे।

   कांग्रेस में कोई गुट नहीं है, कोई किसी की टांग खिंचाई नहीं कर रहा है। एक परिवार में अगर पांच व्यक्ति होते हैं तो हो सकता है उनके किसी विषय पर अलग-अलग मत हो लेकिन वो फिर भी एक परिवार है। इसी तरह हमारा भी कांग्रेस परिवार है जिसमें कोई राजनीति नहीं है। कोई वाद-विवाद नहीं है। यह जरूर है कि हमारी पार्टी लोकतांत्रिक प्रवृत्ति की है। हम सब लोकतांत्रिक लोग हैं। जो अलोकतांत्रिक प्रवृत्ति के लोग हैं वे कांग्रेस में रह ही नहीं सकते। कांग्रेस के बहुत से लोग भाजपा में गए लेकिन चूंकि वो लोकतांत्रिक प्रवृत्ति के लोग थे तो वहां उन्हें रास नहीं आता है। उन्हें बोलने की आजादी तक नहीं है। हमारे यहां अपने विचारों को रखने की आजादी है। ये भाजपा का एक प्रोपेगेंडा है कि कांग्रेस गुटबाजी का शिकार है
    धामी सरकार प्रदेश को गलत रास्ते पर ले जाने के लिए जानी जा रही है। धामी जी नफरती भाषणों को लेकर देश के पहले नम्बर के मुख्यमंत्री बन चुके हैं। आगे भी इसी रूप में जाने जाएंगे। उनको एक युवा के रूप में उत्तराखण्ड का मुख्यमंत्री बनकर एक सौभाग्य मिला था कि वो इस प्रदेश को सही रास्ते पर ले जाने का काम करें लेकिन दुर्भाग्य से उन्होंने जनता के बीच ‘बांटो और राज करो’ को ज्यादा आसान समझा है। वो धार्मिक विद्वेष फैलाकर राज करने वाले राजपुरुष हैं। अंततोगत्वा उनकी ये इच्छा सिर्फ इसलिए है कि वो सत्ता पर बने रहें। युवा अवस्था में उन्हें यह सौभाग्य मिला था, काश इस सौभाग्य का उपयोग इस प्रदेश की जनता के हितों के लिए काम करते और रोजगार के अवसर पैदा करने में रूचि रखते, सृजनात्मक बातों को रखने में रूचि रखते तो बहुत अच्छे राजनेता साबित हो सकते थे

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