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यूएनआई पर ताला सही कार्रवाई या प्रेस पर हमला?

राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली में 21 मार्च 2026 की शाम को ‘यूनाइटेड न्यूज ऑफ इंडिया’ के दफ्तर को दिल्ली हाई कोर्ट के फैसले के तुरंत बाद पुलिस ने सील कर दिया। मौके पर मौजूद कर्मचारी जबरदस्ती और धक्का-मुक्की के आरोप लगा रहे हैं जबकि प्रशासन इस कार्रवाई को अदालत के आदेश के अनुरूप और पूरी तरह कानूनी बता रहा है। घटनाक्रम ने प्रेस की स्वतंत्रता बनाम कानूनी अनुपालन की बहस को फिर से तेज कर दिया है

इक्कीस मार्च 2026 की शाम नई दिल्ली में एक तेजी से घटित हुए घटनाक्रम ने मीडिया और प्रशासनिक हलकों में हलचल पैदा कर दी है। देश की प्रमुख समाचार एजेंसी यूनाइटेड न्यूज ऑफ इंडिया (यूएनआई) के 9 रफी मार्ग स्थित कार्यालय को उसी दिन पुलिस ने सील कर दिया, जिस दिन दिल्ली हाईकोर्ट ने सम्बंधित सरकारी जमीन के आवंटन को रद्द करने के फैसले को बरकरार रखा।

मौके पर मौजूद सूत्रों के अनुसार अदालत का आदेश आने के कुछ ही घंटों के भीतर पुलिस और प्रशासनिक अधिकारी परिसर में पहुंच गए। शाम के समय जब दफ्तर में नियमित कामकाज चल रहा था, तभी अधिकारियों ने कर्मचारियों को तुरंत दफ्तर खाली करने के निर्देश दिए। प्रत्यक्षदर्शियों का कहना है कि कार्रवाई तेज और अचानक थी जिससे कर्मचारियों को सम्भलने का मौका नहीं मिला।

समाचार एजेंसी पीटीआई से बातचीत में यू.एन.आई. के एक वरिष्ठ कर्मचारी ने बताया कि ‘‘शाम को केंद्र सरकार के सम्पत्ति विभाग के अधिकारी आए और उन्होंने कहा कि आपकी लीज खत्म हो चुकी है, आपको तुरंत जगह खाली करनी होगी। वे सीधे न्यूज रूम में घुस गए और लोगों को बाहर निकालना शुरू कर दिया।’’

इसी दौरान वरिष्ठ पत्रकार मनोहर सिंह ने एएनआई से कहा ‘‘करीब 6 से 6ः30 बजे के बीच भारी पुलिस बल के साथ अधिकारी पहुंचे। उन्होंने आते ही कहा कि अपने कम्प्यूटर बंद कर दीजिए और तुरंत बाहर निकल जाइए। हमें पांच-दस मिनट का समय देकर काउंटडाउन शुरू कर दिया गया। हमें धक्का दिया गया, महिलाओं को भी खींचा गया। यह पत्रकारिता के लिए बेहद दुखद दिन है।’’

मौके पर मौजूद एक महिला कर्मचारी आरती बाली ने भी आरोप लगाया, ‘‘भारी पुलिस बल तैनात था। हमें जबरदस्ती बाहर निकाला गया, धक्का-मुक्की हुई। हमें कोर्ट का आदेश तक नहीं दिखाया गया और अपना सामान लेने का भी पूरा समय नहीं दिया गया।’’

इन आरोपों के बीच प्रशासन और पुलिस लगातार यह कह रहे हैं कि कार्रवाई पूरी तरह अदालत के आदेश अनुसार और कानूनी प्रक्रिया के तहत की गई है। नई दिल्ली के पुलिस उपायुक्त सचिन शर्मा ने पीटीआई से कहा, ‘‘कार्रवाई में सभी कानूनी प्रक्रियाओं का पालन किया गया है। कुछ भी गलत नहीं हुआ है और पूरी प्रक्रिया की वीडियोग्राफी कराई गई है।’’

दरअसल, यह पूरा मामला उस जमीन से जुड़ा है जिसे वर्षों पहले मीडिया संस्थानों के लिए एक संयुक्त कार्यालय परिसर विकसित करने के उद्देश्य से आवंटित किया गया था लेकिन अदालत ने अपने हालिया फैसले में माना कि चार दशकों से अधिक समय बीत जाने के बावजूद निर्माण कार्य शुरू नहीं किया गया और आवंटन की शर्तों का पालन नहीं हुआ।

अदालत ने यह भी कहा कि यू.एन.आई. को कई बार समय दिया गया लेकिन परियोजना को आगे बढ़ाने के लिए ठोस कदम नहीं उठाए गए। वित्तीय कठिनाइयों जैसे तर्कों को भी अदालत ने खारिज कर दिया और इसे शर्तों का गम्भीर उल्लंघन माना। इसी के साथ अदालत ने सम्बंधित अधिकारियों को तत्काल प्रभाव से सम्पत्ति का कब्जा लेने का निर्देश दिया जिसके बाद प्रशासन ने उसी दिन कार्रवाई शुरू कर दी।

सूत्रों के मुताबिक 9 रफी मार्ग स्थित इस जमीन की वर्तमान अनुमानित कीमत सैकड़ों करोड़ रुपए बताई जा रही है जिससे यह मामला केवल संस्थागत नहीं बल्कि आर्थिक रूप से भी महत्वपूर्ण बन जाता है। हालांकि इस कार्रवाई का तरीका अब सवालों के घेरे में है। यू.एन.आई. और उससे जुड़े संगठनों का कहना है कि जिस तरह से अचानक और सख्ती के साथ कार्रवाई की गई, उसने मीडिया संस्थानों के लिए चिंता की स्थिति पैदा कर दी है। संस्था ने सोशल मीडिया पर बयान जारी कर कहा कि इस घटना से प्रेस की स्वतंत्रता को लेकर गम्भीर सवाल खड़े हुए हैं।

यू.एन.आई. के मालिक समूह द स्टेट्समैन ने भी इस कार्रवाई की आलोचना करते हुए इसे ‘‘मीडिया की आजादी पर अभूतपूर्व हमला’’ बताया है। उनका कहना है कि कर्मचारियों को न तो पर्याप्त समय दिया गया और न ही सम्मानजनक तरीके से प्रक्रिया पूरी की गई।

राजनीतिक स्तर पर भी प्रतिक्रियाएं सामने आ रही हैं। भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के सांसद पी. संदेश कुमार ने इसे प्रेस की स्वतंत्रता पर गम्भीर हमला बताते हुए कहा है कि पत्रकारों के साथ कथित दुर्व्यवहार लोकतांत्रिक मानकों के खिलाफ है।

इस बीच, प्रशासनिक हलकों में यह स्पष्ट संदेश दिया जा रहा है कि यह कार्रवाई किसी संस्था विशेष के खिलाफ नहीं बल्कि अदालत के आदेश के पालन में की गई है। अधिकारियों का कहना है कि सरकारी जमीन के उपयोग से जुड़ी शर्तों का पालन न होने पर कार्रवाई करना आवश्यक था और इसमें कोई अपवाद नहीं किया जा सकता।
यही वह बिंदु है जहां यह मामला एक व्यापक बहस का रूप ले लेता है। एक ओर अदालत का स्पष्ट आदेश और लम्बे समय से लम्बित उल्लंघन का मुद्दा है तो दूसरी तरफ कार्रवाई के तरीके और उसके प्रभाव को लेकर उठ रहे सवाल हैं।

कानूनी दृष्टि से यह कार्रवाई वैध प्रतीत होती है लेकिन लोकतांत्रिक दृष्टिकोण से यह जरूरी हो जाता है कि ऐसी कार्रवाई करते समय संस्थागत गरिमा और मानवीय पहलुओं का भी ध्यान रखा जाए।
फिलहाल 21 मार्च 2026 की यह घटना देश में मीडिया और प्रशासन के सम्बंधों पर नई बहस को जन्म दे चुकी है। आने वाले दिनों में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि क्या यह मामला आगे न्यायिक स्तर पर जाता है और क्या इस पर व्यापक राजनीतिक और सामाजिक प्रतिक्रिया विकसित होती है। एक बात स्पष्ट है कि यह केवल एक दफ्तर सील होने की घटना नहीं बल्कि लोकतंत्र में कानून और स्वतंत्रता के बीच संतुलन की एक ताजा परीक्षा है।

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