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फीफा विश्व कप-2026 गोलीबारी ने रोका ‘टीम मेले’ का गोल

 

  • जीवन सिंह टनवाल

 

फीफा विश्वकप में ईरान की सम्भावित अनुपस्थिति दिखाती है कि अंतरराष्ट्रीय तनाव का असर केवल सीमाओं और कूटनीतिक बैठकों तक सीमित नहीं रहता बल्कि वह खेल, संस्कृति और समाज के हर क्षेत्र को प्रभावित करता है। ईरान की टीम ने वर्षों तक मेहनत और प्रतिभा के बल पर फुटबाॅल जगत में अपनी पहचान बनाई है। इसलिए दुनिया भर के फुटबाॅल प्रेमी यही उम्मीद कर रहे हैं कि भविष्य में परिस्थितियां सुधरें और ईरानी खिलाड़ी फिर से बड़े मंच पर अपनी प्रतिभा दिखा सकें। खेल का असली उद्देश्य प्रतिस्पर्धा के साथ-साथ वैश्विक भाईचारे और शांति का संदेश देना है। यदि दुनिया के देश इस भावना को समझें तो सम्भव है कि आने वाले समय में राजनीति और खेल के बीच की दूरी कम हो और मैदान पर केवल खेल की ही जीत हो

आगामी फेडरेशन इंटरनेशनल फुटबाॅल एसोसिएशन यानी फीफा विश्व कप 11 जून से 19 जुलाई के बीच अमेरिका, कनाडा और मैक्सिको में आयोजित होना है जिसे लेकर खेल प्रेमियों और खिलाड़ियों में उत्साह देखने को मिल रहा है। यह विश्वकप कई मायनों में खास होने वाला है। टूर्नामेंट में कुल 104 मैच खेले जाएंगे। पहली बार तीन देश मिलकर इसकी मेजबानी कर रहे हैं। अमेरिका के कई बड़े शहरों में मैच आयोजित किए जाएंगे, जिसकी तैयारी को लेकर ट्रम्प प्रशासन ने सुरक्षा के कड़े इंतजाम करने का दावा किया है। लेकिन ईरान फुटबॉल फेडरेशन के अध्यक्ष मेहदी ताज और ईरान के खेल मंत्री अहमद दुन्यामाली ने विश्वकप को लेकर निराशा जताई है। मेहदी ने कहा कि हालिया हमलों के बाद ईरान से विश्वकप को लेकर उम्मीद रखने की गुंजाइश नहीं है। ताज ने ईरानी सरकारी टेलीविजन पर सवाल उठाते हुए कहा, ‘विश्वकप का माहौल ऐसा ही रहने वाला है तो कौन-सा देश अपनी टीम को ऐसी जगह भेजने की हिम्मत करेगा’। वहीं ईरान के खेल मंत्री अहमद दुन्यामाली ने कहा कि देश की फुटबॉल टीम फीफा विश्वकप में हिस्सा नहीं ले सकती। उनका कहना है कि अमेरिकी-इजराइली हमलों में ईरान के सर्वोच्च नेता की हत्या के बाद बने हालात में टीम का टूर्नामेंट में भाग लेना सम्भव नहीं है।

दूसरी तरफ अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने कहा कि ईरानी फुटबॉल टीम को अपनी जान और सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए विश्वकप के लिए अमेरिका नहीं आना ही बेहतर होगा। हालांकि उन्होंने यह भी कहा कि ईरानी टीम का स्वागत है। यानी अमेरिका और इजरायल द्वारा ईरान पर संयुक्त हमलों के चलते जहां पूरी दुनिया पर इसका असर दिख रहा है वहीं इसका प्रभाव अब खेलों पर भी साफ दिखाई देने लगा है। ऐसी स्थिति में सवाल है कि ईरान का विश्वकप में सम्भावित अनुपस्थिति से इस खेल महाकुम्भ पर क्या असर पड़ेगा? क्या इसका एशियाई फुटबॉल पर भी प्रभाव देखने को मिलेगा? क्या यह आयोजन सफल हो पायेगा जैसे कई सवाल उठ रहे हैं।

खेल विश्लेषकों का कहना है कि फुटबाॅल को अक्सर खेलों का महाकुम्भ कहा जाता है और ‘फीफा’ का दावा रहा है कि खेल को राजनीति से दूर रखा जाना चाहिए लेकिन वास्तविकता यह है कि अंतरराष्ट्रीय
राजनीति और खेलों के बीच गहरा सम्बंध रहा है। जब देशों के बीच तनाव बढ़ता है तो उसका असर खेल प्रतियोगिताओं पर भी दिखाई देता है। ईरान का विश्वकप से बाहर होना इसी कड़ी की एक नई घटना है। पिछले कुछ वर्षों में ईरान और पश्चिमी देशों के बीच तनाव लगातार बढ़ा है। खासकर अमेरिका के साथ उसके सम्बंध काफी तनावपूर्ण रहे हैं। परमाणु कार्यक्रम, आर्थिक प्रतिबंध और क्षेत्रीय संघर्षों ने दोनों देशों के रिश्तों को और जटिल बना दिया है।

फीफा विश्वकप में किसी देश की भागीदारी केवल खेल प्रदर्शन पर निर्भर नहीं करती। इसके लिए कई प्रशासनिक और राजनीतिक शर्तें भी होती हैं। यदि किसी देश पर अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंध लागू हों या उसकी टीम की यात्रा और सुरक्षा को लेकर आशंका हो तो आयोजन समिति और ‘फीफा’ को कठिन निर्णय लेने पड़ते हैं। ईरान के मामले में भी यही स्थिति सामने आई। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर लगाए गए प्रतिबंधों और बढ़ते सैन्य तनाव ने टीम की यात्रा, सुरक्षा और आयोजन में भागीदारी को लेकर कई सवाल खड़े कर दिए। कुछ देशों ने यह भी चिंता जताई कि यदि ईरान टूर्नामेंट में भाग लेता है तो इससे राजनीतिक विवाद पैदा हो सकते हैं।

ईरानी फुटबॉल की बात करें तो ईरान का फुटबॉल इतिहास बेहद समृद्ध रहा है। एशिया में यह टीम लम्बे समय तक शीर्ष स्थान पर रही है। ईरानी टीम जिसे ‘टीम मेले’ के नाम से भी जाना जाता है ने कई बार एशियाई फुटबॉल में अपनी श्रेष्ठता साबित की है। एएफसी एशियन कप में उसकी सफलता और विश्व कप क्वालीफायर में लगातार मजबूत प्रदर्शन ने उसे वैश्विक मंच पर पहचान दिलाई है।

पिछले दशकों में ईरान ने कई प्रतिभाशाली खिलाड़ी दुनिया को दिए हैं। इनमें सबसे चर्चित नामों में अली डेई का नाम शामिल है जो लम्बे समय तक अंतरराष्ट्रीय फुटबाॅल में सबसे ज्यादा गोल करने वाले खिलाड़ियों में रहे। वर्तमान दौर में मेहदी तारेमी और सरदार आजमौन जैसे खिलाड़ी भी वैश्विक क्लब फुटबाॅल में अपनी पहचान बना चुके हैं। खिलाड़ियों और प्रशंसकों की नजर से देखें तो ईरान का विश्वकप से बाहर रहने का सबसे बड़ा असर खिलाड़ियों और प्रशंसकों पर पड़ा है। किसी भी फुटबाॅल खिलाड़ी के लिए विश्व कप में खेलना उसके करियर का सबसे बड़ा सपना होता है। कई ईरानी खिलाड़ियों ने वर्षों तक कड़ी मेहनत की लेकिन राजनीतिक परिस्थितियों के कारण उनका सपना अधूरा रह सकता है।

ईरान में फुटबाॅल बेहद लोकप्रिय खेल है। हर विश्वकप के दौरान सड़कों पर जश्न, स्टेडियम में हजारों दर्शक और टीवी के सामने बैठे लाखों प्रशंसक इस खेल के प्रति देश के जुनून को दर्शाते हैं। ऐसे में विश्वकप में भाग न लेना केवल खेल का नुकसान नहीं बल्कि राष्ट्रीय भावनाओं पर भी असर डालने वाला फैसला है। हालांकि इतिहास में कई बार ऐसा हुआ है जब राजनीतिक कारणों से देशों ने खेल आयोजनों का बहिष्कार किया या उन्हें बाहर कर दिया गया।

वर्ष 1980 ग्रीष्मकालीन ओलम्पिक का अमेरिका और कई पश्चिमी देशों ने बहिष्कार किया था जबकि 1984 के ग्रीष्मकालीन ओलम्पिक में सोवियत संघ और उसके सहयोगी देशों ने भाग नहीं लिया। इन घटनाओं से यह स्पष्ट होता है कि खेल और राजनीति को पूरी तरह अलग रखना व्यावहारिक रूप से सम्भव नहीं है। ऐसे में फेडरेशन इंटरनेशनल फुटबाॅल एसोसिएशन के सामने सबसे बड़ी चुनौती यह है कि वह खेल की निष्पक्षता बनाए रखते हुए राजनीतिक विवादों से कैसे निपटे। संगठन का मुख्य उद्देश्य दुनिया भर में फुटबाॅल को बढ़ावा देना है लेकिन जब अंतरराष्ट्रीय तनाव बढ़ता है तो उसके फैसले भी विवादों में घिर जाते हैं। यदि किसी देश को टूर्नामेंट से बाहर रखा जाता है तो उस पर राजनीतिक दबाव का आरोप लग सकता है और यदि उसे खेलने दिया जाता है तो सुरक्षा और कूटनीतिक समस्याएं पैदा हो सकती हैं। ईरान के मामले में भी फीफा को इसी दुविधा का सामना करना पड़ रहा है।

एशियाई फुटबॉल पर असर?
ईरान एशिया की सबसे मजबूत फुटबाॅल टीमों में से एक है। यदि वह विश्वकप में भाग नहीं लेता है तो इसका असर एशियाई फुटबाॅल की प्रतिस्पर्धा पर भी पड़ेगा। एशिया से कई टीमें विश्वकप में हिस्सा लेती हैं लेकिन ईरान की अनुपस्थिति से टूर्नामेंट का संतुलन बदल सकता है। इससे अन्य टीमों के लिए अवसर बढ़ सकते हैं लेकिन साथ ही प्रतियोगिता का स्तर भी प्रभावित हो सकता है।

खेल कूटनीति की भूमिका
विशेषज्ञों का मानना है कि खेल कूटनीति देशों के बीच तनाव कम करने का प्रभावी माध्यम बन सकते हैं। जब खिलाड़ी एक ही मैदान पर प्रतिस्पर्धा करते हैं तो यह संदेश जाता है कि दुनिया के देशों के बीच संवाद और सहयोग सम्भव है। इतिहास में कई ऐसे उदाहरण हैं जब खेलों ने राजनीतिक रिश्तों को सुधारने में भूमिका निभाई। ‘पिंग-पोंग डिप्लोमेसी’ के जरिए अमेरिका और चीन के रिश्तों में सुधार हुआ था। इसी तरह फुटबॉल मैचों ने भी कई देशों के बीच संवाद का रास्ता खोला है। हालांकि अभी स्थिति अनिश्चित है लेकिन अंतिम निर्णय परिस्थितियों पर निर्भर करेगा। यदि अंतरराष्ट्रीय तनाव कम होता है और सुरक्षा सम्बंधी चिंताएं दूर होती हैं तो सम्भव है कि ईरान की टीम को फिर से भागीदारी का अवसर मिल सके।
फुटबाॅल दुनिया का सबसे लोकप्रिय खेल है और इसका उद्देश्य लोगों को जोड़ना है न कि विभाजित करना। इसलिए उम्मीद की जा सकती है कि कूटनीतिक प्रयासों के जरिए ऐसा समाधान निकले जिससे खेल की भावना और वैश्विक एकता दोनों सुरक्षित रह सकें।

गौरतलब है कि अमेरिका, कनाडा और मैक्सिको मिलकर 2026 फीफा विश्व कप की मेजबानी कर रहे हैं। टूर्नामेंट की शुरुआत 11 जून को मैक्सिको सिटी से होगी जबकि फाइनल मुकाबला 19 जुलाई को न्यूयॉर्क के न्यू जर्सी स्टेडियम में खेला जाएगा। लेकिन अंतरराष्ट्रीय खेल जगत में उस समय हलचल मच गई जब यह खबर सामने आई कि ईरान आगामी फीफा विश्वकप में हिस्सा नहीं लेगा। फुटबाॅल प्रेमियों के लिए यह खबर किसी झटके से कम नहीं है क्योंकि ईरान एशिया की सबसे मजबूत टीमों में से एक रहा है और पिछले कई विश्वकप टूर्नामेंटों में उसने शानदार प्रदर्शन किया है मगर इस बार परिस्थितियां अलग हैं। वैश्विक राजनीति, सुरक्षा चिंताओं और अंतरराष्ट्रीय कूटनीतिक तनाव ने खेल के सबसे बड़े मंच को भी प्रभावित कर दिया है।

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