राजस्थान के शिक्षा मंत्री मदन दिलावर इन दिनों बच्चों के नामों को लेकर दिए गए अपने सुझावों के कारण चर्चा में हैं। मंत्री जी की सोच यह है कि नवजात बच्चों को ऐसे नाम दिए जाएं जो ‘सम्मानजनक’ और ‘प्रेरणादायक’ हों, ताकि स्कूलों में दाखिले के समय बच्चों को शर्मिंदगी का सामना न करना पड़े। इसी उद्देश्य से राज्य सरकार की ओर से करीब तीन हजार ‘स्वीकृत नामों’ की सूची तैयार की गई। मंत्री का तर्क है कि कई बार माता-पिता बच्चों के ऐसे नाम रख देते हैं जो बाद में उपहास का कारण बनते हैं। उदाहरण के तौर पर ‘शैतान’, ‘टिंकू’ या ‘शेरू’ जैसे नामों से बचने की सलाह दी गई लेकिन सरकार की यह पहल खुद विवादों में घिर गई क्योंकि सूची में शामिल कई नाम भी लोगों को कम अजीब नहीं लगे। सोशल मीडिया पर इसे लेकर जमकर मजाक बन रहा है और लोग सवाल उठा रहे हैं कि आखिर बच्चों के नाम तय करने का अधिकार सरकार को कैसे मिल सकता है? विवाद तब और बढ़ गया जब ‘शैतान’ नाम को लेकर बहस शुरू हो गई। कई लोगों ने याद दिलाया कि 1962 युद्ध के नायक मेजर शैतान सिंह का नाम तो वीरता और बलिदान का प्रतीक है, ऐसे में किसी नाम को केवल उसके शब्दार्थ के आधार पर गलत कैसे कहा जा सकता है। आलोचना बढ़ने के बाद राजस्थान सरकार ने फिलहाल इस ‘सार्थक नाम’ पहल को स्थगित कर दिया है। पूरा मामला इस बात की मिसाल बन गया है कि कभी-कभी अच्छी मंशा से शुरू की गई सरकारी पहल भी जनता के बीच हास्य और विवाद का कारण बन जाती है।
सुप्रीम कोर्ट ने गुजरात हाईकोर्ट एडवोकेट्स एसोसिएशन (जीएचसीएए) के अध्यक्ष और वरिष्ठ अधिवक्ता यतिन ओझा को बड़ी राहत देते हुए उनकी सजा और दोषसिद्धि पर फिलहाल रोक लगा दी है। हालांकि शीर्ष अदालत ने साथ ही कड़ी चेतावनी भी दी कि यदि भविष्य में उन्होंने न्यायपालिका के खिलाफ इसी तरह की टिप्पणी दोहराई तो उनकी सजा तुरंत प्रभाव से बहाल की जा सकती है। यतिन ओझा को गुजरात हाईकोर्ट ने 2020 में आपराधिक अवमानना का दोषी ठहराया था। उन पर आरोप था कि उन्होंने राज्य की न्यायपालिका के खिलाफ आपत्तिजनक और अनुचित टिप्पणियां की थीं। इस मामले में हाईकोर्ट ने उन्हें दोषी मानते हुए सजा सुनाई थी, जिसके खिलाफ उन्होंने सुप्रीम कोर्ट में अपील की थी। सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने कहा कि हाईकोर्ट के फैसले में हस्तक्षेप करने का कोई विशेष कारण नहीं दिखता लेकिन संविधान के अनुच्छेद 142 के तहत अपने विशेष अधिकारों का इस्तेमाल करते हुए अदालत फिलहाल ओझा की दोषसिद्धि और सजा को अनिश्चितकाल के लिए स्थगित कर रही है। अदालत ने इसे ‘अंतिम अवसर’ की तरह बताया। पीठ ने यह भी निर्देश दिया कि गुजरात हाईकोर्ट समय-समय पर ओझा के आचरण की समीक्षा करेगा। हर दो वर्ष में उनकी गतिविधियों और व्यवहार का मूल्यांकन किया जाएगा। यदि भविष्य में उनके खिलाफ इसी प्रकार की कोई शिकायत सामने आती है तो हाईकोर्ट तत्काल सुप्रीम कोर्ट से उनकी सजा को फिर से प्रभावी करने की मांग कर सकेगा। सुप्रीम कोर्ट की यह टिप्पणी भी महत्त्वपूर्ण रही कि न्यायपालिका की गरिमा और संस्थागत सम्मान बनाए रखना आवश्यक है। अदालत ने साफ किया कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का अर्थ यह नहीं है कि न्यायपालिका पर व्यक्तिगत या अपमानजनक हमले किए जाएं। इस फैसले के बाद कानूनी हलकों में चर्चा है कि यतिन ओझा को राहत तो मिल गई लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने उन्हें साफ संदेश भी दे दिया है कि भविष्य में ऐसी किसी भी हरकत की कीमत भारी पड़ सकती है।
उत्तराखण्ड में इस वर्ष चारधाम यात्रा पहले से कहीं अधिक भव्य और चुनौतीपूर्ण होती दिखाई दे रही है। दिल्ली-देहरादून एक्सप्रेसवे के कारण यात्रा का समय कम होने से श्रद्धालुओं की संख्या में रिकाॅर्ड वृद्धि का अनुमान लगाया जा रहा है। सरकार और प्रशासन के सामने सबसे बड़ी चुनौती भीड़ प्रबंधन और सुरक्षित यात्रा सुनिश्चित करने की है। अक्षय तृतीया के अवसर पर गंगोत्री और यमुनोत्री धाम के कपाट खुलने के साथ ही यात्रा की शुरुआत हो चुकी है जबकि केदारनाथ और बद्रीनाथ धाम के कपाट भी खोल दिए गए हैं। राज्य सरकार ने इस बार यात्रा के लिए कई नए नियम लागू किए हैं। बद्रीनाथ-केदारनाथ मंदिर समिति ने अपने अधीन आने वाले मंदिरों में गैर-हिंदुओं की एंट्री पर रोक लगाने का फैसला किया है। हालांकि सिख, बौद्ध और जैन समुदाय को इसमें छूट दी गई है। गैर-हिंदू श्रद्धालुओं को दर्शन के लिए हलफनामा देना होगा। चारधाम यात्रा के लिए डिजिटल पंजीकरण पहले ही शुरू हो चुका है और लाखों श्रद्धालु अब तक पंजीकरण करा चुके हैं। प्रशासन का अनुमान है कि इस बार यात्रा से राज्य की अर्थव्यवस्था को आठ हजार करोड़ रुपए से अधिक का आर्थिक लाभ हो सकता है। पिछले वर्ष यात्रा से लगभग साढ़े सात हजार करोड़ रुपए का राजस्व मिलने का अनुमान लगाया गया था। यात्रा मार्गों पर सुरक्षा और ट्रैफिक प्रबंधन के लिए व्यापक इंतजाम किए गए हैं। पुलिस, होमगार्ड और एसडीआरएफ की अतिरिक्त तैनाती की गई है। यात्रा मार्ग को कई जोन और सेक्टर में बांटा गया है। पहली बार अत्याधुनिक ‘यात्रा कंट्रोल रूम’ और सोशल मीडिया सेल के जरिए यात्रियों को मौसम, ट्रैफिक और आपदा सम्बंधी रियल टाइम अपडेट देने की व्यवस्था की गई है। परिवहन विभाग ने यात्रा के लिए हजारों बसों का संचालन शुरू किया है। साथ ही पहाड़ी मार्गों पर चलने वाले वाहन चालकों के लिए विशेष प्रशिक्षण और सुरक्षा मानकों को अनिवार्य किया गया है। रिफ्लेक्टर, फस्र्ट एड बाॅक्स और आवश्यक दवाइयों के बिना वाहनों को अनुमति नहीं दी जाएगी। मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने इस बार की यात्रा को ‘ग्रीन और प्लास्टिक मुक्त चारधाम यात्रा’ बनाने का लक्ष्य रखा है। यात्रा मार्गों और धामों में सफाई व्यवस्था मजबूत करने के लिए बड़ी संख्या में पर्यावरण मित्रों की तैनाती की गई है। सरकार ने यह भी घोषणा की है कि श्रद्धालुओं को अब ठंडे पानी की जगह 24 घंटे गर्म पानी उपलब्ध कराया जाएगा। हालांकि बढ़ती भीड़ के कारण स्थानीय स्तर पर चिंता भी बढ़ी है। विशेषज्ञों का मानना है कि यात्रा की सुगमता बढ़ने से श्रद्धालुओं की संख्या तेजी से बढ़ेगी, जिससे देहरादून और पर्वतीय मार्गों पर भारी दबाव पड़ सकता है। ऐसे में प्रशासन के सामने सबसे बड़ी परीक्षा श्रद्धालुओं की सुरक्षा और यात्रा प्रबंधन को लेकर होगी।
तमिलनाडु की राजनीति में एक बार फिर बड़ी उथल-पुथल दिखाई दे रही है। राज्य की प्रमुख विपक्षी पार्टी एआईएडीएमके इन दिनों गम्भीर अंदरूनी संकट से गुजर रही है और पार्टी में विभाजन की आशंकाएं तेज हो गई हैं। पार्टी के भीतर एक बड़ा धड़ा खुलकर महासचिव एडप्पादी के. पलानीस्वामी (ईपीएस) के नेतृत्व को चुनौती दे रहा है और मुख्यमंत्री सी. जोसेफ विजय की पार्टी टीवीके के साथ समझौते की वकालत कर रहा है। सूत्रों के मुताबिक पार्टी के लगभग 30 विधायक और कई वरिष्ठ नेता पूर्व मंत्री एस.पी. वेलुमणि, सी. विजयभास्कर और सी.वी. शण्मुगम के नेतृत्व वाले गुट के साथ खड़े दिखाई दे रहे हैं। यह गुट चाहता है कि एआईएडीएमके बदलते राजनीतिक समीकरणों को देखते हुए टीवीके सरकार को समर्थन दे और सत्ता में हिस्सेदारी की संभावनाओं पर विचार करे। दूसरी ओर ईपीएस फिलहाल इस प्रस्ताव के खिलाफ बताए जा रहे हैं। बताया जा रहा है कि विधानसभा चुनावों में लगातार हार और राजनीतिक अलगाव के कारण पार्टी के भीतर ईपीएस की नेतृत्व क्षमता पर सवाल उठने लगे हैं। कई नेताओं का मानना है कि मौजूदा परिस्थितियों में भाजपा से दूरी और टीवीके से संभावित नजदीकी एआईएडीएमके के लिए नई राजनीतिक जमीन तैयार कर सकती है। पार्टी के असंतुष्ट नेताओं का आरोप है कि ईपीएस बदलते राजनीतिक माहौल को समझने में विफल रहे हैं। हाल ही में एआईएडीएमके और डीएमके के बीच संभावित बैंक चैनल बातचीत की खबरें भी सामने आई थीं लेकिन यह प्रयास विफल हो गया। इसके बाद पार्टी के भीतर असंतोष और तेज हो गया। विधानसभा के भीतर भी विधायक अलग-अलग समूहों में दिखाई दिए, जिससे संकट खुलकर सामने आ गया। सूत्रों के अनुसार असंतुष्ट गुट ने ईपीएस के सामने दो प्रमुख मांगें रखी हैं, पहली, वे महासचिव पद छोड़ें और दूसरी, पार्टी टीवीके के साथ राजनीतिक बातचीत शुरू करे। हालांकि पार्टी के भीतर यह भी स्पष्ट नहीं है कि यदि नेतृत्व परिवर्तन होता है तो कमान किसके हाथ में जाएगी। वेलुमणि और षण्मुगम दोनों के नाम संभावित दावेदारों के रूप में चर्चा में हैं। राजनीतिक जानकारों का मानना है कि जयललिता के निधन के बाद से एआईएडीएमके लगातार नेतृत्व संकट और गुटबाजी से जूझ रही है। अब यदि पार्टी में औपचारिक टूट होती है तो तमिलनाडु की राजनीति में शक्ति संतुलन पूरी तरह बदल सकता है। टीवीके की बढ़ती ताकत और विजय के उभार ने एआईएडीएमके के भीतर बेचैनी को और बढ़ा दिया है। सूत्र यह भी बता रहे हैं कि टीवीके और असंतुष्ट एआईएडीएमके नेताओं के बीच अनौपचारिक स्तर पर बातचीत शुरू हो चुकी है। यदि यह समीकरण आगे बढ़ता है तो तमिलनाडु में एक नया राजनीतिक गठबंधन उभर सकता है, जिसका सीधा असर राज्य की भविष्य की राजनीति पर पड़ेगा।