हाल में सम्पन्न हुए केरल चुनाव में बड़ा बदलाव देखने को मिला है। करीब दस साल बाद कांग्रेस नीत यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट ने सत्ता में वापसी कर लेफ्ट डेमोक्रेटिक फ्रंट के शासन को समाप्त कर अब दो हफ्ते बाद यूडीएफ सरकार का गठन हो गया है। वीडी सतीशन केरल के नए मुख्यमंत्री बन गए हैं। राज्यपाल विश्वनाथ आर्लेकर ने उन्हें मुख्यमंत्री पद की शपथ दिलाई। इसके अलावा 20 विधायकों ने मंत्री पद की शपथ ली। इस राजनीतिक बदलाव के केंद्र में सबसे बड़ा चेहरा बनकर उभरे हैं वीडी सतीशन। विपक्ष के मजबूत नेता से मुख्यमंत्री की कुर्सी तक का उनका सफर कांग्रेस के लिए नई उम्मीद लेकर आया है लेकिन सत्ता का रास्ता जितना आकर्षक दिखता है, जिम्मेदारियां उससे कहीं ज्यादा कठिन होती हैं। केरल जैसे राजनीतिक रूप से जागरूक और सामाजिक रूप से संवेदनशील राज्य में सरकार चलाना किसी बड़ी परीक्षा से कम नहीं माना जाता। ऐसे में वीडी सतीशन के सामने प्रशासनिक, राजनीतिक और आर्थिक स्तर पर कई बड़ी चुनौतियां खड़ी हैं। राजनीतिक गलियारों से लेकर मीडिया और सोशल मीडिया तक सवाल उठ रहे हैं कि क्या सतीशन राज्य की आर्थिक स्थिति सुधार पाएंगे? क्या वे बेरोजगारी और युवाओं की उम्मीदों पर खरे उतर पाएंगे? क्या कांग्रेस की अंदरूनी राजनीति को संतुलित रखते हुए स्थिर सरकार चला पाएंगे?
राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि केरल सामाजिक और धार्मिक रूप से बेहद संवेदनशील राज्य है। यहां मुस्लिम, ईसाई और हिंदू समुदायों के बीच राजनीतिक संतुलन बनाए रखना हमेशा से सरकारों के लिए चुनौती रहा है। नई सरकार से लोगों को प्रशासनिक बदलाव की भी उम्मीद है। भ्रष्टाचार, सरकारी प्रक्रिया में देरी और नौकरशाही पर नियंत्रण जैसे मुद्दों पर जनता तेज फैसले चाहती है। नई सरकार के सामने सबसे बड़ी समस्या राज्य की आर्थिक स्थिति को सुधारने की होगी। पिछले कुछ वर्षों में केरल पर कर्ज का बोझ लगातार बढ़ा है। राज्य की आय सीमित है जबकि सामाजिक योजनाओं और कल्याणकारी कार्यक्रमों पर खर्च काफी अधिक है।
सरकार को एक तरफ जनता से किए गए वादे पूरे करने होंगे तो दूसरी ओर वित्तीय अनुशासन भी बनाए रखना होगा। अगर सरकार टैक्स बढ़ाती है तो विपक्ष इसे जनता पर बोझ बताएगा और यदि खर्च कम करती है तो कल्याणकारी छवि प्रभावित हो सकती है। ऐसे में वीडी सतीशन के लिए सबसे बड़ी परीक्षा होगी कि वे विकास और सामाजिक सुरक्षा के बीच संतुलन कैसे बनाते हैं। निवेश आकर्षित करना, पर्यटन और आईटी सेक्टर को बढ़ावा देना तथा रोजगार के नए अवसर पैदा करना उनकी प्राथमिकता बन सकता है।
केरल लम्बे समय से शिक्षित बेरोजगारी की समस्या से जूझ रहा है। बड़ी संख्या में युवा खाड़ी देशों या दूसरे राज्यों में रोजगार की तलाश में जाते हैं। चुनाव के दौरान यूडीएफ ने युवाओं को रोजगार और स्टार्टअप के क्षेत्र में नए अवसर देने का वादा किया है। अब जनता सरकार से त्वरित परिणाम चाहती है। यदि रोजगार के मोर्चे पर सरकार शुरुआती वर्षों में कोई बड़ा बदलाव नहीं दिखा पाई तो विपक्ष इसे बड़ा मुद्दा बना सकता है। आईटी पार्क, डिजिटल इकोनाॅमी, पर्यटन और एमएसएमई सेक्टर में निवेश बढ़ाना सरकार की मजबूरी भी होगी और राजनीतिक जरूरत भी।
कांग्रेस की सबसे बड़ी कमजोरी अक्सर उसकी अंदरूनी राजनीति मानी जाती रही है। सत्ता में आने के बाद मंत्री पद, संगठन और प्रशासनिक नियुक्तियों को लेकर खींचतान बढ़ने की आशंका रहती है। सतीशन को पार्टी के वरिष्ठ नेताओं, युवा चेहरों और सहयोगी दलों के बीच संतुलन बनाकर चलना होगा। यदि सरकार के भीतर मतभेद खुलकर सामने आते हैं तो विपक्ष को हमला करने का मौका मिल जाएगा।
कांग्रेस नेतृत्व के सामने यह चुनौती भी होगी कि सरकार और संगठन के बीच बेहतर तालमेल बना रहे क्योंकि केरल की राजनीति में छोटी-छोटी नाराजगियां भी बड़े राजनीतिक संकट का रूप ले लेती हैं। हालांकि एलडीएफ सत्ता से बाहर हो गया है लेकिन उसकी राजनीतिक ताकत अभी भी कमजोर नहीं मानी जा सकती। पिनराई विजयन के नेतृत्व में वामपंथी दल आक्रामक विपक्ष की भूमिका निभाने की कोशिश करेंगे। वाम दल हर उस मुद्दे को उठाने की कोशिश करेंगे जहां सरकार कमजोर नजर आएगी। चाहे वह पेट्रोल-डीजल की कीमतें हों, बेरोजगारी, निजीकरण या केंद्र-राज्य सम्बंधों का मुद्दा। ऐसे में सतीशन को सिर्फ सरकार नहीं चलानी होगी बल्कि लगातार राजनीतिक जवाबदेही भी निभानी होगी।
दूसरी तरफ केरल में भाजपा अभी तक सत्ता से दूर रही है लेकिन पार्टी लगातार अपनी जमीन मजबूत करने की कोशिश कर रही है। खासकर शहरी क्षेत्रों और युवा वोटरों के बीच भाजपा अपनी पकड़ बढ़ाने में जुटी है। यदि यूडीएफ सरकार किसी भी मुद्दे पर कमजोर पड़ती है तो भाजपा इसे अवसर के रूप में इस्तेमाल करने की कोशिश करेगी। ऐसे में कांग्रेस को अपनी पारम्परिक वोट बैंक राजनीति से आगे बढ़कर नए सामाजिक समीकरण भी बनाने होंगे।
केरल सामाजिक और धार्मिक रूप से बेहद संवेदनशील राज्य माना जाता है। यहां मुस्लिम, ईसाई और हिंदू समुदायों के बीच राजनीतिक संतुलन बनाए रखना हमेशा से सरकारों के लिए चुनौती रहा है। यूडीएफ की जीत में अल्पसंख्यक समुदायों की बड़ी भूमिका मानी जा रही है लेकिन सरकार को यह भी ध्यान रखना होगा कि उसकी नीतियां किसी एक वर्ग विशेष तक सीमित न दिखें। धार्मिक मुद्दों, शिक्षा संस्थानों और सामाजिक संगठनों से जुड़े मामलों में सरकार का हर फैसला राजनीतिक असर डाल सकता है।
नई सरकार से लोगों को प्रशासनिक बदलाव की भी उम्मीद है। भ्रष्टाचार, सरकारी प्रक्रियाओं में देरी और नौकरशाही पर नियंत्रण जैसे मुद्दों पर जनता तेज फैसले चाहती है। यदि सरकार पारदर्शी प्रशासन देने में सफल होती है तो यह उसकी सबसे बड़ी उपलब्धि साबित हो सकती है लेकिन यदि पुरानी व्यवस्था ही जारी रही तो ‘परिवर्तन’ का नारा कमजोर पड़ सकता है। सतीशन के लिए मुख्यमंत्री पद सिर्फ राजनीतिक उपलब्धि नहीं बल्कि बड़ी जिम्मेदारी भी है। जनता ने बदलाव की उम्मीद में यूडीएफ को सत्ता सौंपी है। अब सरकार की सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि वह कितनी तेजी से जनता की समस्याओं का समाधान करती है और राजनीतिक स्थिरता बनाए रखती है। यदि सतीशन आर्थिक सुधार, रोजगार, प्रशासनिक पारदर्शिता और गठबंधन
संतुलन में सफल रहते हैं तो वे केरल की राजनीति में लम्बे समय तक मजबूत नेतृत्व के रूप में उभर सकते हैं लेकिन यदि सरकार अपेक्षाओं पर खरी नहीं उतरी तो सत्ता में वापसी जितनी ऐतिहासिक रही है, जनता की नाराजगी भी उतनी ही तेजी से सामने आ सकती है।
संतुलन में सफल रहते हैं तो वे केरल की राजनीति में लम्बे समय तक मजबूत नेतृत्व के रूप में उभर सकते हैं लेकिन यदि सरकार अपेक्षाओं पर खरी नहीं उतरी तो सत्ता में वापसी जितनी ऐतिहासिक रही है, जनता की नाराजगी भी उतनी ही तेजी से सामने आ सकती है।