ऊधमसिंह नगर जनपद की प्रमुख विधानसभा रुद्रपुर वह विधानसभा सीट है जहां हर धर्म- सम्प्रदाय का मतदाता निवास करता है। इसके कारण ही इसको भारत का गुलदस्ता कहा जाता है। सिडकुल जैसे औद्योगिक संस्थान के होने के चलते इसे उत्तराखण्ड की आर्थिक राजधानी भी कहा जाता है। लेकिन विकास के आईने में देखें तो नाम बड़ा, दर्शन छोटे वाली कहावत यहां सटीक बैठती है। जनप्रतिनिधि जनता की वोट पाने की खातिर बड़े-बड़े वायदे जरूर करते हैं मगर चुनाव बाद वायदे भुला दिए जाते हैं। यही वजह है कि यहां समस्याओं का जाल फैला हुआ है। इस जाल के जंजाल में उलझी जनता मूकदर्शक बनी हुई है। हालांकि जनता समय- समय पर सड़क, बिजली, पानी, स्वास्थ्य, स्वच्छता और रोजगार के लिए आंदोलन तो करती है लेकिन परिणाम ढाक के तीन पात की मानिंद होता है। कहीं जल भराव तो कहीं सड़क जाम तो कहीं अस्पताल इलाज के नाम पर सिर्फ रेफरल सेंटर बनकर रह गए हैं तो कहीं पेयजल योजनाएं अधूरी हैं। नजूल भूमि पर वर्षों से बसे लोग मालिकाना हक के लिए हर सरकार से दरकार करते हैं लेकिन मामला घोषणाओं तक सिमटा दिया जाता है। कभी शहर की पहचान हुआ करती कल्याण नदी को आज भी किसी भगीरथ का इंतजार है जो उसको गंदगी से निजात दिलाकर उसके मूल स्वरूप में ला सके। यहां बढ़ते अपराध, बेरोजगारी और नशाखोरी से युवाओं का भविष्य अंधकारमय हो चला है। समय-समय पर उन्हें जिहाद के जरिए विषवमन की घुट्टी पिला दी जाती है। जमीनी रिपोर्ट बताती है कि यहां विकास जमीन पर होने की बजाय कागजों में ज्यादा चमका है

ऊधमसिंह नगर जनपद के रुद्रपुर विधानसभा क्षेत्र को सामाजिक एवं सांस्कृतिक विविधता का एक महत्वपूर्ण केंद्र माना जाता है। यहां कई समुदाय मिलकर क्षेत्र की राजनीतिक एवं सामाजिक दिशा को प्रभावित करते हैं। यहां बंगाली, पंजाबी तथा मुस्लिम समाज बहुतायत में है जो चुनावी समीकरणों में भी निर्णायक भूमिका निभाते हैं।

वर्ष 2019 के आंकड़ों के अनुसार, इस क्षेत्र में लगभग एक लाख 72 हजार से अधिक मतदाता हैं। वर्ष 2017 के विधानसभा चुनाव में यहां से राजकुमार ठुकराल ने भाजपा के टिकट पर विजय प्राप्त की थी। 2022 के  विधानसभा चुनाव में शिव अरोरा ने भाजपा के टिकट पर चुनाव लड़ा और 60,602 मत प्राप्त कर इस सीट पर विजय हासिल की जबकि रूद्रपुर की पूर्व नगर पालिका अध्यक्ष मीना शर्मा ने कांग्रेस उम्मीदवार के तौर पर चुनाव लड़कर 40,852 मत प्राप्त किए और दूसरे स्थान पर रही।
रूद्रपुर की सबसे बड़ी पहचान सिडकुल से है जहां उत्तराखण्ड का सबसे बड़ा औद्योगिक हब स्थित है। यहां टाटा मोटर्स, अशोक लेलैंड, नेस्ले, ब्रिटानिया और बजाज जैसी बड़ी कम्पनियों के प्लांट स्थापित हैं। यहां हजारों लोग रोजगार की तलाश में देश के विभिन्न हिस्सों से आकर बसे हैं। रूद्रपुर में ऊधमसिंह नगर जिला का सबसे बड़ा सरकारी अस्पताल स्थित है तथा एक मेडिकल काॅलेज भी निर्माणाधीन है। पूरे जिले का प्रशासनिक मुख्यालय भी रूद्रपुर में ही है। बावजूद इसके रूद्रपुर विधानसभा क्षेत्र बदहाली की स्थिति का सामना कर रहा है।
‘दि संडे पोस्ट’ द्वारा रूद्रपुर विधानसभा के विभिन्न क्षेत्रों, ट्रांजिट कैम्प, प्रेमनगर, भदईपुरा, रपटपुर, गांधी नगर, सिविल लाइंस, बिंदुखेड़ा, मटखोटा, कीरतपुर, बसंतीपुर, खानपुर, अलगदेवी, अलगदेवा तथा रूद्रपुर शहर और आस-पास के ग्रामीण इलाकों का स्थलीय निरीक्षण किया गया। स्थानीय निवासियों से बातचीत के दौरान यह तथ्य सामने आया कि क्षेत्र के कई हिस्से आज भी मूलभूत समस्याओं से जूझ रहे हैं। बिंदुखेड़ा और मटकोटा जैसे गांवों में पिछले लगभग 20 वर्षों से सड़कों का डामरीकरण नहीं हुआ है। रूद्रपुर विधानसभा के आधे से अधिक क्षेत्रों में पेयजल की समस्या यथावत बनी हुई है। मलिन बस्तियों के निवासी लम्बे समय से बुनियादी सुविधाओं की मांग को लेकर संघर्ष कर रहे हैं जो प्रत्येक चुनाव में प्रमुख मुद्दा तो बनती हैं किंतु अब तक उनका समाधान नहीं हो पाया है। यहां नजूल भूमि के नियमितीकरण (मालिकाना हक) का मुद्दा भी वर्षों से लम्बित है और यह स्थानीय लोगों के लिए एक प्रमुख चिंता का विषय बना हुआ है। इसके अलावा नशाखोरी और अराजकता की समस्या इस पूरे विधानसभा क्षेत्र को प्रभावित कर रही है। कचरे के ढेर पूरे रुद्रपुर में स्पष्ट दिखाई देते हैं, जिनका प्रभाव वातावरण में भी महसूस किया जा सकता है। शिक्षा, स्वास्थ्य और रोजगार से जुड़ी समस्याएं इस क्षेत्र के लिए  कोढ़ में खाज साबित होती जा रही है। स्थानीय लोगों का कहना है कि समस्याएं नई नहीं हैं बल्कि वर्षों से बनी हुई हैं, जिन पर हर चुनाव में आश्वासन तो दिए जाते हैं लेकिन उनका स्थायी समाधान अब तक नहीं हो पाया है।
जल निकासी और कचरा प्रबंधन बदहाल
रूद्रपुर में स्वच्छता का अभाव सबसे ज्यादा देखने को मिला है। यहां के विभिन्न इलाकों में सिविल लाइन, आवासीय काॅलोनियों, गलियों एवं मुख्य सड़कों के किनारे, नालियों के निर्माण एवं जल निकासी व्यवस्था का कार्य लम्बे समय से नहीं हो पाया है। अधिकांश स्थानों पर नालियां या तो अधूरी हैं या उनका नियमित सफाई एवं रखरखाव नहीं हो रहा है, जिसके कारण पानी का ठहराव गम्भीर समस्या बन गया। इससे गंदगी फैल रही है तथा मच्छरों का प्रकोप बढ़ गया है, जिससे डेंगू और मलेरिया जैसी बीमारियों का खतरा गम्भीर स्तर तक पहुंच चुका है। पूरे रूद्रपुर विधानसभा क्षेत्र में ठोस अपशिष्ट प्रबंधन की स्थिति अत्यंत चिंताजनक है। कई स्थानों पर कचरे के ढेर और उससे उठने वाली दुर्गंध देखी जा सकती है। यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगा कि कई इलाके अस्थायी डम्पिंग जोन में परिवर्तित होते दिखाई दे रहे हैं।
क्षेत्रों का निरीक्षण करते समय पाया गया कि रूद्रपुर स्थित रिजर्व पुलिस लाइन ऊधमसिंह नगर के प्रवेश द्वार के समीप नाले में लम्बे समय से कचरा और गंदा पानी जमा है, जो न केवल दुर्गंध फैलाता है बल्कि बीमारियों के प्रसार का भी सम्भावित कारण बना हुआ है जबकि यह क्षेत्र अत्यधिक आवागमन वाला है तथा इसके आस-पास अनेक व्यावसायिक प्रतिष्ठान भी संचालित होते हैं। जब कानून-व्यवस्था से जुड़े इस महत्वपूर्ण परिसर के मुख्य प्रवेश द्वार पर ही स्वच्छता की ऐसी बदहाल स्थिति बनी हुई है तो अन्य स्थानों की स्थिति कैसी होगी यह सोचा जा सकता है। इसी तरह की स्थिति अटरिया ट्रांजिट कैम्प में भी ग्राउंड रिपोर्टिंग के दौरान देखने को मिली, यह रूद्रपुर का एक अत्यधिक घनी आबादी वाला क्षेत्र है। यहां मुख्य रूप से श्रमिक वर्ग तथा बंगाली समुदाय निवास करता है। निरीक्षण में पाया गया कि आवासीय क्षेत्रों के आसपास नालियों की समुचित निकासी की कोई प्रभावी व्यवस्था नहीं है। बस्ती से सटे तथा मुख्य आवागमन मार्ग के बीचों-बीच एक बड़ा नाला स्थित है, जिसमें जलभराव एवं कचरे के ढेर दिखाई देते हैं। इससे क्षेत्र में तीव्र दुर्गंध फैली रहती है तथा मक्खी-मच्छरों का प्रकोप सुबह से शाम तक बना रहता है जो स्थानीय निवासियों के स्वास्थ्य के लिए गम्भीर खतरा है।
स्थानीय निवासी विक्रम आर्या कहते हैं कि ‘नाले की यह स्थिति कई वर्षों से यथावत बनी हुई है। नाले के  समीप आवास स्थित है जहां बच्चों का खेलना तथा लोगों का आवागमन भी इसी मार्ग से होता है। उनके अनुसार, नाले से उठने वाली दुर्गंध और मच्छर-मक्खियां सीधे घरों के भीतर तक पहुंच जाती हैं। वर्षा ऋतु के दौरान नाले का जलस्तर अत्यधिक बढ़ जाता है, जिससे स्थिति और अधिक गम्भीर हो जाती है। नाले में वर्षों से कचरा जमा है। बावजूद इसके न तो नगरपालिका द्वारा इसकी समुचित सफाई कराई गई है और न ही सम्बंधित जनप्रतिनिधियों द्वारा इस दिशा में कोई ठोस पहल की गई है।’
ट्रैफिक जाम और सड़क हादसे
यातायात व्यवस्था की दृष्टि से देखें तो रूद्रपुर में जाम की समस्या एक प्रमुख मुद्दा है। आम नागरिकों को प्रतिदिन घंटों जाम में फंसे रहना पड़ता है। काशीपुर बायपास रोड के चैड़ीकरण का प्रस्ताव पूर्व में भाजपा के घोषणा पत्र में शामिल था किंतु अब तक इस दिशा में कोई ठोस प्रगति नहीं हुई है। इस सम्बंध में न्यायालय में मामला विचाराधीन है। शहर में पर्याप्त पार्किंग सुविधाओं का अभाव बना हुआ है तथा प्रस्तावित हाईटेक रोडवेज बस स्टेशन का निर्माण भी अभी तक प्रारम्भ नहीं हो सका है। सड़क सुरक्षा के दृष्टिकोण से स्थिति और अधिक चिंताजनक है जिसे इससे समझा जा सकता है कि पिछले 112 दिनों में लगभग 60 लोगों की मृत्यु सड़क दुर्घटनाओं में दर्ज की गई है जो एक गम्भीर समस्या है। इसके बावजूद, दुर्घटनाओं की रोकथाम एवं यातायात प्रबंधन को सुदृढ़ करने के लिए प्रशासन या पुलिस विभाग द्वारा कोई प्रभावी कदम उठाए जाने के प्रमाण नहीं मिले हैं।
कागजों में पेयजल योजनाएं
स्थानीय निवासियों के अनुसार, क्षेत्र में नल तो स्थापित कर दिए गए हैं किंतु अधिकांश स्थानों पर उनमें नियमित जल आपूर्ति नहीं हो रही है। कई इलाकों जैसे प्रेमनगर, अलगदेवी, अलगदेवा, कीरतपुर, खानपुर एवं बसंतीपुर, बिंदुखेड़ा, मटकोटा में पेयजल योजना के अंतर्गत खुदाई कार्य तो किया गया परंतु उन गड्ढों को अब तक भरा नहीं गया है, जिससे स्थानीय स्तर पर असुविधा एवं सुरक्षा संबंधी जोखिम उत्पन्न हो रहे हैं। इस तरह देखें तो यहां ‘हर घर नल, हर घर जल’ योजना का क्रियान्वयन मुख्यतः कागजी प्रतीत होता है क्योंकि इसके वास्तविक लाभ आमजन तक प्रभावी रूप से नहीं पहुंच पा रहा है। कई क्षेत्रों में लोगों को निजी टैंकरों या हैंडपम्प पर निर्भर रहना पड़ रहा है, जिससे अतिरिक्त आर्थिक बोझ भी बढ़ रहा है। गर्मियों में यह समस्या और अधिक विकराल रूप ले लेती है।
ग्रामीण क्षेत्रों में आधारभूत सुविधाएं ठप
बिंदुखेड़ा एवं मटकोटा जैसे गांवों में पिछले लगभग 20 वर्षों से सड़कों का डामरीकरण नहीं किया गया है जबकि उसी मार्ग पर विकास के नाम पर अंग्रेजी और देशी शराब की दुकानें तो स्थापित हो चुकी हैं लेकिन मूलभूत सुविधाएं अब भी उपेक्षित बनी हुई हैं। कच्ची एवं जर्जर सड़कों के कारण आवागमन में निरंतर कठिनाई बनी रहती है, तथा कई बार सड़क दुर्घटनाओं के मामले भी सामने आए हैं। बरसात के दिनों में स्थिति और अधिक गम्भीर हो जाती है। केंद्र सरकार की स्वच्छता से जुड़ी योजनाओं के क्रियान्वयन में भी कमी देखने को मिली है।
स्थानीय लोगों के अनुसार, प्रदेश को शत-प्रतिशत शौचमुक्त किया जा चुका है लेकिन यहां कई परिवार अब भी शौचालय सुविधा से वंचित हैं जबकि बिंदुखेड़ा और मटखोटा रूद्रपुर विधानसभा के बेहद महत्वपूर्ण ग्रामीण क्षेत्र हैं। सुखविंदर कौर, निवासी बिंदुखेड़ा बताती हैं  कि ‘‘हमारे गांव में पिछले करीब 20 सालों से पक्की सड़क नहीं बनी है। कुछ साल पहले गड्ढे भर दिए गए थे लेकिन उसके बाद से कोई काम नहीं हुआ। न कोई प्रशासनिक अधिकारी यहां जांच के लिए आया और न ही किसी ने सड़क बनाने की पहल की। पानी की भी बहुत बड़ी समस्या है।’’
स्वास्थ्य सेवाएं चरमराई : अस्पताल बना रेफर सेंटर
रुद्रपुर विधानसभा क्षेत्र में स्वास्थ्य सेवाओं की स्थिति गम्भीर चिंता का विषय बनी हुई है। स्थानीय निवासियों के अनुसार, रूद्रपुर का सरकारी अस्पताल व्यवहारिक रूप से एक रेफर सेंटर बनकर रह गया है जहां समुचित उपचार सुविधाओं का अभाव देखा जा रहा है। अस्पताल में विशेषज्ञ चिकित्सकों की कमी बताई गई है तथा आवश्यक उपकरणों, विशेष रूप से एमआरआई मशीन की उपलब्धता भी नहीं है। अल्ट्रासाउंड जांच के लिए मरीजों को लगभग डेढ़ महीने तक का समय दिया जा रहा है जो विशेष रूप से गर्भवती महिलाओं के लिए चिंताजनक स्थिति उत्पन्न करने वाला है।
अस्पताल में भर्ती एक मरीज के परिजन ने बताया कि कागजी
औपचारिकताएं तो पूरी करा दी जाती हैं किंतु उपचार के स्तर पर पर्याप्त सुविधाएं उपलब्ध नहीं हो पातीं। कई मामलों में मरीजों को या तो उच्च संस्थानों के लिए रेफर कर दिया जाता है अथवा आवश्यक मशीनों के अभाव में जांच के लिए निजी केंद्रों का सहारा लेने को कहा जाता है जो आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग के लिए कठिनाई पैदा करता है।
रुद्रपुर निवासी संजय कुमार आर्या के अनुसार ‘‘क्षेत्र में स्वास्थ्य सुविधाएं अत्यंत सीमित हैं और सरकारी अस्पताल केवल रेफर सेंटर के रूप में कार्य कर रहा है। अस्पताल में न तो पर्याप्त चिकित्सक उपलब्ध हैं और न ही आवश्यक मशीनें। स्थिति गर्भवती महिलाओं के लिए ज्यादा गम्भीर बनी हुई है।’’
महंगी पढ़ाई और कमजोर सरकारी ढांचा
रुद्रपुर में शिक्षा के क्षेत्र की स्थिति भी संतोषजनक नहीं है। निजी विद्यालयों में शिक्षा अधिक महंगी होती जा रही है जहां महंगी पुस्तकों एवं अन्य शुल्कों का बोझ अभिभावकों पर डाला जा रहा है वहीं सरकारी विद्यालयों में शिक्षकों की कमी एवं जर्जर भवन जैसी समस्याएं बनी हुई हैं। उच्च शिक्षा के हिसाब से देखें तो रूद्रपुर काॅलेज में पर्याप्त पाठ्यक्रमों एवं विषयों का अभाव है। वर्ष 2006 में स्थापित मेडिकल काॅलेज भी अब तक पूर्ण रूप से शुरू नहीं हो पाया है। इसके चलते मध्यम और निम्न वर्ग के परिवारों के लिए गुणवत्तापूर्ण शिक्षा प्राप्त करना एक बड़ी चुनौती बनता जा रहा है।
स्थानीय निवासी दिनेश आर्या का कहना है कि ‘‘रूद्रपुर में बच्चों की पढ़ाई आज एक बड़ी चिंता बन गई है। प्राइवेट स्कूलों की फीस इतनी ज्यादा हो गई है कि आम आदमी के लिए बच्चों को वहां पढ़ाना मुश्किल हो गया है। सरकारी स्कूलों की हालत ठीक नहीं है, कई जगह शिक्षकों की कमी है और पढ़ाई का स्तर भी संतोषजनक नहीं पाया गया।’’
नशा, अपराध और बिगड़ती कानून-व्यवस्था
रूद्रपुर में नशे की समस्या व्यापक रूप से फैली हुई है, जिसका प्रभाव बच्चों से लेकर युवाओं और वृद्धों तक देखा जा रहा है। इसके साथ ही क्षेत्र में अराजकता की घटनाओं में बढ़ोतरी देखी गई है जहां समय-समय पर गम्भीर आपराधिक घटनाएं सामने आती रहती हैं। अलका अरोड़ा, निवासी शांति विहार बताती है कि ‘‘मैं रूद्रपुर विधानसभा क्षेत्र में एक एनजीओ संचालित करती हूं। मेरे अनुभव के अनुसार, क्षेत्र में नशे की बढ़ती समस्या अत्यंत गम्भीर रूप ले चुकी है और इस पर तत्काल प्रभाव से रोकथाम की आवश्यकता है।
एक स्थानीय रेस्टोरेंट संचालक ने नाम न प्रकाशित करने की शर्त पर बताया कि कुछ समूह उनके प्रतिष्ठान पर आकर दबाव बनाते हैं। इन लोगों द्वारा मांसाहारी भोजन न बनाने के लिए कहा जाता है तथा विरोध करने पर गाली-गलौज, तोड़-फोड़ और हिंसा की धमकियां दी जाती हैं। इसके अतिरिक्त यहां हनी ट्रैप से सम्बंधित मामलों की भी चर्चा सामने आई है। स्थानीय लोगों का मानना है कि यदि समय रहते इस दिशा में ठोस कदम नहीं उठाए गए तो आने वाले समय में यह समस्या और अधिक गम्भीर सामाजिक संकट का रूप ले सकती है।
रोजगार का संकट : उद्योगों में स्थानीय युवाओं की अनदेखी
रुद्रपुर में रोजगार के अवसरों को लेकर स्थिति संतोषजनक नहीं पाई गई। यहां रोजगार सृजन के लिए कोई ठोस योजना या मास्टर प्लान प्रभावी रूप से लागू होता नहीं दिख रहा है। औद्योगिक विस्तार के मामले में कोई उल्लेखनीय प्रगति नहीं हुई है।
औद्योगिक इकाइयों में 70 प्रतिशत स्थानीय युवकों को रोजगार देने का आश्वासन भी धरातल पर लागू होता नहीं दिखता। वर्तमान में क्षेत्र की रोजगार व्यवस्था मुख्यतः कुछ बड़ी कम्पनियों जैसे टाटा, बजाज एवं लेलैंड पर निर्भर है। यदि जनसंख्या वृद्धि के अनुपात में रोजगार पर और विकास का विस्तार नहीं किया गया तो भविष्य में यह अधिक गम्भीर समस्याओं को जन्म दे सकता है।
कल्याणी नदी में बढ़ता प्रदूषण बना स्वास्थ्य संकट
रूद्रपुर में कल्याणी नदी की स्थिति दिन-प्रतिदिन खराब होती जा रही है। नदी में प्रदूषण, गंदगी का जमाव एवं रखरखाव की कमी स्पष्ट रूप से देखी जा रही है, जिसका असर पर्यावरण एवं स्थानीय निवासियों के स्वास्थ्य पर पड़ रहा है।
नजूल भूमि, पट्टा और बुनियादी सुविधाओं का संघर्ष
रूद्रपुर में भूमि एवं शहरी विकास से जुड़े मामलों को देखें तो बाजार क्षेत्र का लगभग 65 प्रतिशत हिस्सा नजूल भूमि के अंतर्गत आता है, जहां फ्रीहोल्ड की प्रक्रिया को लेकर लम्बे समय से मांग जारी है। रूद्रपुर में लगभग 30 से अधिक मलिन बस्तियां स्थित हैं, जिनमें लाखों लोग निवास करते हैं। इन बस्तियों के निवासी वर्षों से अपनी कुछ मूलभूत मांगों को लेकर संघर्षरत हैं, जो प्रत्येक चुनाव में प्रमुख मुद्दों के रूप में उभरती हैं। इनमें सबसे प्रमुख मुद्दा नजूल भूमि पर मालिकाना हक (पट्टा) का है। स्थानीय लोग दशकों से इस भूमि पर निवास कर रहे हैं किंतु अब तक उन्हें स्वामित्व के अधिकार प्राप्त नहीं हो सके हैं। इसके अतिरिक्त बुनियादी सुविधाओं का अभाव भी एक गम्भीर समस्या के रूप में सामने आया है। मलिन बस्तियों में नालियों की गंदगी, जलभराव तथा स्वच्छ पेयजल की कमी जैसी समस्याएं आम हैं। विशेष रूप से वर्षा ऋतु के दौरान इन बस्तियों की स्थिति अत्यंत दयनीय हो जाती है, जिससे निवासियों को दैनिक जीवन में गम्भीर कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है।
कुल मिलाकर रूद्रपुर विधानसभा की ग्राउंड रिपोर्टिंग यह साफ बताती है कि क्षेत्र में विकास केवल कागजों और बड़े औद्योगिक प्रोजेक्ट्स तक सीमित है जबकि जमीनी हकीकत इससे बिल्कुल अलग है। सिडकुल में बड़ी कम्पनियों की मौजूदगी के बावजूद आम जनता आज भी सड़क, पानी, स्वच्छता, स्वास्थ्य और रोजगार जैसी बुनियादी जरूरतों के लिए संघर्ष कर रही है। शहर से लेकर गांव तक अव्यवस्था एक जैसी दिखाई देती है, कहीं जलभराव और कचरे का अम्बार, कहीं टूटी सड़कें तो कहीं अस्पतालों में इलाज के नाम पर रेफर करने की व्यवस्था। पेयजल योजनाएं अधूरी हैं, शिक्षा व्यवस्था कमजोर है और रोजगार के नाम पर युवाओं को अपेक्षित अवसर नहीं मिल पा रहे हैं। उक्त समस्याएं नई नहीं हैं बल्कि वर्षों से जस की तस बनी हुई हैं, जिन पर हर चुनाव में वादे तो होते हैं लेकिन समाधान नहीं। नशा, अपराध और अव्यवस्थित शहरीकरण ने हालात को और जटिल बना दिया है।

‘क्षेत्र में विकास कार्यों की दयनीय स्थिति’
जमीनी स्तर पर विकास कार्य नगण्य हैं। जनता आज भी मूलभूत सुविधाओं के लिए संघर्ष कर रही है।  जनप्रतिनिधियों में कार्य करने की इच्छाशक्ति का अभाव है। क्षेत्र में जितने भी घोटाले हुए हैं, सबके सब भाजपा वालों ने किए हैं और मैंने उन घोटालों को खोला है।
आज विकास के नाम पर यहां कुछ भी नहीं है। केवल हिंदू-मुस्लिम के नाम पर लोगों की भावनाएं भड़काई जा रही हैं, क्षेत्र में अराजकता का माहौल है, लोगों को डराने-धमकाने का वातावरण है। ग्रामीण और शहरी दोनों क्षेत्रों में सड़कें बदहाल हैं, योजनाएं ठप हैं। यहां नजूल भूमि का मुद्दा भी गम्भीर है। 10 दिसम्बर 2021 को मेरे प्रयासों से शासनादेश जारी हुआ, जिसमें गरीबों को मालिकाना हक देने और मलिन बस्तियों को 50 एकड़ तक निःशुल्क पट्टा देने का प्रावधान था। बीजेपी द्वारा किसी भी व्यक्ति को कोई पट्टा, मालिकाना हक अब तक नहीं दिया गया है।
बंगाली समाज के साथ भी छल हुआ है। उन्हें अनुसूचित जाति का दर्जा देने का प्रस्ताव पारित होने के बावजूद आज तक लागू नहीं किया गया। सिडकुल परियोजना में 70 प्रतिशत स्थानीय रोजगार का वादा किया गया था जो पूरा नहीं हुआ। शौचालय निर्माण से लेकर विधायक निधि और सिडकुल में रोजगार तक हर स्तर पर कमीशन की मांग की जा रही है। 33 प्रतिशत तक कमीशन की मांग के प्रमाण मेरे पास उपलब्ध हैं। खटीमा पानीपत राष्ट्रीय राजमार्ग से बिंदुखेड़ा तक का बहुत बुरा हाल है। साढ़े चार सालों में सड़क बनाने को कोई तैयारी नहीं दिखी। नेशनल हाईवे से बिंदुखेड़ा तक सड़क बनती है, उखड़ जाती है। बिंदुखेड़ा से छत्तरपुर डैम तक सड़क बनी नहीं और उसका पेमेंट कंस्ट्रक्शन कम्पनी को हो जाता है। आप जितना मर्जी बोलिए ये गूंगी बहरी है, भ्रष्टाचारियों की सरकार है। इस सरकार से किसी भी प्रकार की न्याय की उम्मीद करना बिल्कुल व्यर्थ है। डम्पर के ओवरलोड से सैकड़ों लोग मर चुके हैं, अधिकतर डम्पर भाजपा के लोगों के हैं। एक डम्पर से 70 हजार रुपए प्रति माह वसूली होती है और कुल मिलाकर रूद्रपुर में 2 करोड़ रुपए प्रति माह की वसूली हो रही है। वर्दी के नाम पर एक ही अधिकारी प्रतिमाह 2 करोड़ रुपए वसूलता है। रूद्रपुर विधानसभा में सड़कों का बुरा हाल है। पूरी रूद्रपुर विधानसभा का हाल बदहाल है। शासन के तुगलकी फरमान है जो नहीं मानता उसे कुचल दो, लोग डरेंगे, सब कुछ होगा लेकिन वोट इस बार इनके खिलाफ पड़ने हैं। समूचे विधानसभा में कहीं भी, कुछ भी विकास कार्य नहीं हुए हैं। रूद्रपुर विधानसभा पूरी तरह उपेक्षा, भ्रष्टाचार और अव्यवस्था का शिकार है।
राजकुमार ठुकराल, पूर्व विधायक, रूद्रपुर

कैप्शन  : 20 सालों से डामरीकरण का इंतजार करती बिंदुखेड़ा-मटकोटा की सड़कें लेकिन विकास के नाम पर उसी रास्ते पर खुल गई अंग्रेजी और देशी शराब की दुकानें

क्षेत्र में एक तरफ सड़क किनारे लगा कूड़ा है तो दूसरी ओर पुलिस लाइन के पास बदबूदार नाला

रूद्रपुर विधानसभा 2026 – विधायक रिपोर्ट कार्ड

विधायक : शिव अरोड़ा (अवधि : 4 वर्ष)

क्र. क्षेत्र                                 मुद्दा / जमीनी स्थिति                   अंक  (10 में)
  1. सड़क और ट्रैफिक व्यवस्था शहर में जाम स्थायी समस्या बन चुका है। काशीपुर बायपास चैड़ीकरण अधूरा, पार्किंग व्यवस्था नहीं, ग्रामीण क्षेत्रों में वर्षों से सड़कें बदहाल 3/10
  2. पेयजल और जल निकासी ‘हर घर जल’ योजना का असर जमीन पर नहीं दिखता। कई इलाकों में पाइपलाइन अधूरी, जलभराव और गंदे नाले बड़ी समस्या 2.5/10
  3. स्वच्छता और कचरा प्रबंधन पूरे शहर में कचरे के ढेर, दुर्गंध और नालों की बदहाली। डेंगू-मलेरिया का खतरा लगातार बढ़ रहा 2/10
  4. स्वास्थ्य सेवाएं जिला अस्पताल रेफर सेंटर बन चुका है। एमआरआई, विशेषज्ञ डाॅक्टरों और अल्ट्रासाउंड जैसी सुविधाओं का अभाव 3/10
  5. शिक्षा व्यवस्था सरकारी स्कूलों की स्थिति कमजोर, निजी शिक्षा महंगी। मेडिकल काॅलेज वर्षों बाद भी अधूरा 4/10
  6. रोजगार और उद्योग सिडकुल और उद्योग मौजूद हैं लेकिन स्थानीय युवाओं को अपेक्षित रोजगार नहीं मिला। औद्योगिक विस्तार भी ठहरा हुआ 5/10
  7. कानून व्यवस्था और नशा नियंत्रण नशाखोरी और अपराध तेजी से बढ़े। लोगों में असुरक्षा की भावना साफ दिखाई देती है 2.5/10
  8. ग्रामीण विकास बिंदुखेड़ा, मटकोटा जैसे गांव मूलभूत सुविधाओं से वंचित। सड़क, पानी और शौचालय तक अधूरे 3/10
  9. पर्यावरण और नदी संरक्षण कल्याणी नदी प्रदूषण और गंदगी की शिकार। सफाई और संरक्षण की कोई ठोस योजना नजर नहीं आई 2.5/10
  10. जनसम्पर्क और राजनीतिक प्रभाव भाजपा संगठन और सत्ता का लाभ मिला लेकिन जमीनी समस्याओं के समाधान में अपेक्षित सक्रियता नहीं दिखी 5.5/10

You may also like