हाल ही में डिजिटल पत्रिका ‘स्क्राॅल इन’ (scroll.in) में प्रकाशित इतिहासकार रामचंद्र गुहा के लेख “How the Gandhi Family Has Helped Modi Consolidate Power” ने भारतीय राजनीति में एक नई और तीखी बहस को जन्म दे दिया है। यह कोई सामान्य राजनीतिक टिप्पणी नहीं है। लेख लिखने वाले व्यक्ति रामचंद्र गुहा हैं, जिन्हें समकालीन भारत के सबसे गम्भीर इतिहासकारों और सार्वजनिक बुद्धिजीवियों में गिना जाता है। मैं स्वतंत्र भारत के इतिहास पर लिखी गई उनकी प्रसिद्ध पुस्तक ‘India After Gandhi’ को आधुनिक भारत के अध्ययन की एक महत्वपूर्ण पुस्तक मानता हूं। यह भी जानना-समझना जरूरी है कि पिछले एक दशक में गुहा लगातार नरेंद्र मोदी सरकार, हिंदुत्व राजनीति, संस्थाओं के क्षरण और लोकतांत्रिक मूल्यों पर पड़ रहे दबाव की आलोचना करते रहे हैं। यही कारण है कि जब उन्होंने राहुल गांधी और गांधी परिवार पर तीखे प्रश्न उठाए तो विवाद केवल राजनीतिक नहीं रहा बल्कि बौद्धिक जगत तक फैल गया है।
गुहा के लेख का मूल तर्क यह है कि नरेंद्र मोदी और अमित शाह की सत्ता को मजबूत करने में केवल भाजपा की ताकत जिम्मेदार नहीं है बल्कि कांग्रेस नेतृत्व की कमजोरियों ने भी इसमें महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। उनके अनुसार भाजपा की सफलता की कहानी को केवल भाजपा की उपलब्धियों के रूप में नहीं पढ़ा जा सकता बल्कि यह कांग्रेस की विफलताओं की कहानी भी है।
लेख की शुरुआत में गुहा एक दिलचस्प प्रसंग सुनाते हैं। 2024 के लोकसभा चुनाव के बाद उनकी मुलाकात कांग्रेस के एक युवा विधायक से हुई। विधायक ने राहुल गांधी के लिए सलाह मांगी तो गुहा ने कहा कि उनके पास केवल एक सलाह है, प्रियंका गांधी को वायनाड से चुनाव नहीं लड़ना चाहिए लेकिन जैसा कि उन्हें उम्मीद थी, उनकी सलाह नहीं मानी गई। राहुल गांधी ने रायबरेली सीट रखी और प्रियंका गांधी वायनाड से संसद पहुंच गईं। गुहा के लिए यह सिर्फ एक चुनावी निर्णय नहीं था बल्कि उस राजनीतिक संस्कृति का प्रतीक था जिसमें कांग्रेस आज भी गांधी परिवार से बाहर नेतृत्व की कल्पना नहीं कर पाती।
गुहा मानते हैं कि ‘भारत जोड़ो यात्रा’ राहुल गांधी के राजनीतिक जीवन का सबसे सफल और प्रभावशाली अध्याय है। इस यात्रा ने राहुल की छवि को बदला। पहली बार बड़ी संख्या में लोगों को लगा कि वे जनता के बीच जाकर संवाद करने वाले, मेहनत करने वाले और अपनी राजनीति को नए सिरे से गढ़ने वाले नेता हैं लेकिन गुहा के अनुसार यात्रा से मिली राजनीतिक पूंजी को कांग्रेस ने स्वयं नष्ट कर दिया। चुनाव के बाद पार्टी फिर उसी पुराने ढर्रे पर लौट आई और एक बार फिर ‘फैमिली फर्म’ जैसी दिखाई देने लगी।
गुहा की आलोचना केवल वंशवाद तक सीमित नहीं है। वे राहुल गांधी की राजनीतिक कार्यशैली पर भी सवाल उठाते हैं। उनके अनुसार राहुल गांधी में निरंतरता की कमी है। वे किसी मुद्दे को उठाते हैं, सुर्खियां बटोरते हैं लेकिन उसे लम्बे समय तक उसी ऊर्जा के साथ नहीं चलाते। गुहा लिखते हैं कि चुनाव आयोग के मुद्दे से लेकर लोकतांत्रिक संस्थाओं तक कई प्रश्नों पर राहुल ने आवाज उठाई लेकिन उन्हें व्यापक और स्थायी राजनीतिक अभियान में बदलने में असफल रहे। उनके अनुसार ‘भारत जोड़ो यात्रा’ उन कुछ महीनों में अपवाद थी जब राहुल गांधी ने असाधारण अनुशासन और परिश्रम दिखाया।
गुहा राहुल गांधी में ‘ग्रेविटास’ अर्थात राजनीतिक गम्भीरता की कमी भी देखते हैं। उनका मानना है कि मछुआरों के साथ समुद्र में उतरना, किसानों के साथ खेत में काम करना, किसी शेफ के साथ रसोई में जाना या आम लोगों के साथ समय बिताना जनसम्पर्क का हिस्सा हो सकता है लेकिन केवल प्रतीकात्मक राजनीति किसी नेता को राष्ट्रीय विकल्प नहीं बनाती। उनके अनुसार राष्ट्रीय नेतृत्व के लिए संगठन निर्माण, रणनीतिक सोच और निरंतर राजनीतिक हस्तक्षेप की आवश्यकता होती है।
सबसे विवादास्पद टिप्पणी राहुल गांधी के अनुभव को लेकर है। गुहा कहते हैं कि राजनीति में आने से पहले राहुल गांधी ने कौन-सा पेशा किया था? और उनके पास प्रशासनिक अनुभव क्या है? वे याद दिलाते हैं कि यूपीए सरकार के दस वर्षों में राहुल गांधी ने कभी मंत्री बनने की इच्छा नहीं दिखाई। गुहा के अनुसार मतदाताओं का यह जानना स्वाभाविक अधिकार है कि जो व्यक्ति प्रधानमंत्री बनने का दावेदार माना जा रहा है, उसने पहले कौन-सी प्रशासनिक जिम्मेदारियां निभाई हैं?
गुहा राहुल गांधी की एक और कमजोरी बताते हैं कि अतीत की गलतियों से न सीखना। वे 2019 के ‘चैकीदार चोर है’ अभियान का उदाहरण देते हैं और कहते हैं कि राहुल गांधी आज भी मोदी पर व्यक्तिगत हमले ज्यादा करते हैं जबकि उन्हें शासन, अर्थव्यवस्था, रोजगार, शिक्षा और संस्थागत विफलताओं जैसे मुद्दों पर केंद्रित रहना चाहिए।
लेख का एक बड़ा हिस्सा प्रियंका गांधी और वंशवाद पर केंद्रित है। गुहा का कहना है कि कांग्रेस के भीतर कई लोग राहुल गांधी की सीमाओं को महसूस करते हैं इसलिए अब प्रियंका गांधी में सम्भावनाएं तलाश रहे हैं लेकिन उनके अनुसार प्रियंका भी उसी वंशवादी ढांचे का हिस्सा हैं। वे याद दिलाते हैं कि 2022 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में प्रियंका गांधी के नेतृत्व में कांग्रेस का प्रदर्शन बेहद कमजोर रहा था। इसलिए केवल भाषण क्षमता के आधार पर उन्हें कांग्रेस का भविष्य मान लेना जल्दबाजी होगी।
गुहा यहां रुकते नहीं हैं। वे एक व्यापक राजनीतिक निष्कर्ष निकालते हैं कि भारतीय राजनीति में वंशवाद के खिलाफ प्रतिक्रिया बढ़ रही है। असम से लेकर पश्चिम बंगाल, तमिलनाडु और केरल तक वे उदाहरण देते हैं कि अब मतदाता परिवार आधारित राजनीति को पहले की तरह सहजता से स्वीकार नहीं कर रहे हैं। कांग्रेस यदि भविष्य में पुनर्जीवित होना चाहती है तो उसे गांधी परिवार से बाहर नेतृत्व विकसित करना होगा लेकिन लेख का सबसे विवादास्पद हिस्सा अंत में आता है। गुहा साफ लिखते हैं कि मोदी सरकार की नीतियों की उन्होंने लगातार आलोचना की है। उन्होंने संस्थाओं के क्षरण, प्रेस पर दबाव, न्यायपालिका की स्थिति, अल्पसंख्यकों के प्रति व्यवहार और पर्यावरणीय क्षति पर अनेक लेख लिखे हैं। इसके बावजूद उनका निष्कर्ष है कि भारतीय लोकतंत्र की वर्तमान स्थिति के लिए केवल मोदी और शाह को जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता। कांग्रेस नेतृत्व और गांधी परिवार की राजनीतिक विफलताओं ने भी भाजपा की शक्ति को बढ़ाने में योगदान दिया है और यही से विरोध की शुरुआत होती है।
वरिष्ठ पत्रकार मुकेश कुमार ने गुहा के लेख की आलोचना करते हुए सोशल मीडिया में लिखा कि यह विश्लेषण वर्तमान राजनीतिक परिस्थितियों को पर्याप्त महत्व नहीं देता। उनके अनुसार 2014 के बाद भारतीय राजनीति का चरित्र बदल चुका है। मीडिया, एजेंसियों, चुनावी संसाधनों, कॉरपोरेट समर्थन और संस्थागत शक्ति के असंतुलन को नजरअंदाज करके राहुल गांधी का मूल्यांकन नहीं किया जा सकता। उनके अनुसार आज विपक्ष किसी सामान्य लोकतांत्रिक प्रतिस्पर्धा का हिस्सा नहीं है बल्कि एक ऐसी राजनीतिक संरचना का सामना कर रहा है जिसमें सत्ता के लगभग सभी औजार एक ही पक्ष के हाथों में केंद्रित दिखाई देते हैं।
सोशल मीडिया पर भी इसी प्रकार की कई प्रतिक्रियाएं सामने आई हैं। गुहा से पूछा जा रहा है कि क्यों भारत में कुछ प्रश्न केवल राहुल गांधी के लिए सुरक्षित रख दिए गए हैं? कितने नेताओं से यह पूछा जाता है कि राजनीति में आने से पहले वे क्या करते थे? कितने नेताओं के जीवन-वृत्तांत की इतनी सूक्ष्म जांच होती है? यहां तक कि गुहा द्वारा राहुल गांधी से योग्यता का प्रश्न वास्तव में उन्हें अयोग्य साबित करने का प्रयास है।
पांच बार सांसद रह चुके, दो दशक का संसदीय अनुभव रखने वाले और सार्वजनिक नीतियों पर लगातार बोलने वाले राहुल गांधी की क्षमता पर सवाल उठाना वस्तुतः गांधी उपनाम के प्रति पूर्वाग्रह का परिणाम है। राहुल गांधी आज राष्ट्रीय स्तर पर मोदी-शाह की राजनीति को सबसे मजबूती से चुनौती देने वाले नेता हैं। इसलिए उनके समर्थकों को लगता है कि गुहा ने राहुल गांधी का मूल्यांकन ऐसे समय में किया है जब वे विपक्ष के सबसे प्रमुख चेहरे के रूप में उभरे हैं।
दरअसल यही इस पूरी बहस का सबसे दिलचस्प पहलू है। राहुल गांधी के समर्थकों का बड़ा वर्ग मानता है कि आज राष्ट्रीय स्तर पर यदि कोई नेता लगातार भाजपा को चुनौती दे रहा है, संसद से लेकर सड़क तक संघर्ष कर रहा है, सामाजिक ध्रुवीकरण के खिलाफ बोल रहा है और विपक्षी राजनीति को वैचारिक आधार देने की कोशिश कर रहा है तो वह राहुल गांधी हैं। ऐसे समय में उनकी कमियों पर अत्यधिक जोर देना उन्हें अनुचित लगता है।
दूसरी ओर गुहा का प्रश्न भी पूरी तरह खारिज नहीं किया जा सकता। क्या केवल लोकतांत्रिक मूल्यों में विश्वास, व्यक्तिगत ईमानदारी और नैतिक वैधता किसी नेता को प्रभावी राजनीतिक विकल्प बना देती है? या फिर उसके लिए संगठन निर्माण, रणनीतिक सोच, अनुशासन और चौबीसों घंटे की राजनीतिक सक्रियता भी आवश्यक है? यहीं शायद इस बहस का वास्तविक केंद्र है।
व्यक्तिगत रूप से कहूं तो राहुल गांधी की सबसे बड़ी ताकत उनकी लोकतांत्रिक प्रवृत्ति है। वे भारतीय राजनीति के उन कुछ नेताओं में दिखाई देते हैं जो असहमति, बहुलतावाद और संवैधानिक मूल्यों में वास्तविक विश्वास रखते हैं। वे अपने राजनीतिक विरोधियों को शत्रु की तरह नहीं देखते। उनमें वैसी अधिनायकवादी प्रवृत्ति नहीं दिखती जो आज दुनिया के अनेक लोकप्रिय नेताओं में दिखाई देती है लेकिन उनकी सबसे बड़ी कमजोरी भी उतनी ही स्पष्ट है। वे राजनीति को उसी तरह नहीं जीते जैसे नरेंद्र मोदी और अमित शाह जीते हैं। मोदी और शाह की सबसे बड़ी शक्ति केवल उनकी विचारधारा नहीं बल्कि उनका अनुशासन, संगठन निर्माण की क्षमता, राजनीतिक निरंतरता और चैबीसों घंटे की सक्रियता है। राहुल गांधी कई बार ऐसे दिखाई देते हैं जैसे राजनीति उनके जीवन का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है जबकि मोदी ऐसे दिखाई देते हैं जैसे राजनीति ही उनका सम्पूर्ण जीवन है।
सम्भवतः यही कारण है कि राहुल गांधी लाखों लोगों की आशा भी हैं और उतने ही लोगों की निराशा भी। शायद यही कारण है कि रामचंद्र गुहा का लेख इतना विवादास्पद बन गया है क्योंकि उसने भाजपा की नहीं, विपक्ष की कमजोरियों पर उंगली रखी है और लोकतंत्र में अपनी कमजोरियों का सामना करना हमेशा सबसे कठिन काम होता है।
इसलिए रामचंद्र गुहा को टारगेट करना मेरी समझ से सही नहीं है। कांग्रेस और राहुल गांधी को उनके लिखे का मर्म समझकर अपनी रणनीति तय करनी होगी अन्यथा मोदी-शाह की काट कर पाना मात्र नारों और चुनावों के समय की सक्रियता चलते सम्भव नहीं हो पाएगाा।