अपने स्थापना काल से ही लगातार लाभ अर्जित करने वाली केंद्रीय आयुष मंत्रालय की मिनीरत्न कम्पनी इंडियन मेडिसिन्स फार्मास्यूटिकल काॅरपोरेशन लिमिटेड (आईएमपीसीएल) को 121 करोड़ रुपए में निजी हाथों में सौंपे जाने के फैसले ने उत्तराखण्ड में व्यापक बहस छेड़ दी है। आक्रोशित आमजन का कहना है कि यह केवल एक कम्पनी की बिक्री नहीं बल्कि पहाड़ की अर्थव्यवस्था, जड़ी-बूटी आधरित आजीविका, स्थानीय रोजगार और आयुर्वेदिक विरासत से जुड़े एक पूरे तंत्र का निजीकरण है। वहीं सरकार इसे रणनीतिक विनिवेश और आर्थिक सुधारों की दिशा में उठाया गया कदम बता रही है
भारत में सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों को उनके प्रदर्शन, लाभप्रदता और रणनीतिक महत्व के आधार पर विभिन्न श्रेणियों में वर्गीकृत किया जाता है। इनमें सबसे ऊपर महारत्न, उसके बाद नवरत्न और फिर मिनीरत्न श्रेणी आती है। महारत्न और नवरत्न कम्पनियां देश की सबसे बड़ी और रणनीतिक दृष्टि से महत्वपूर्ण सार्वजनिक इकाइयां मानी जाती हैं जबकि मिनीरत्न का दर्जा उन कम्पनियों को दिया जाता है जिन्होंने लगातार लाभ कमाया हो, जिनकी वित्तीय स्थिति मजबूत हो और जो सरकार पर बोझ बनने के बजाय स्वयं अपनी आर्थिक क्षमता के बल पर आगे बढ़ रही हों। सरल शब्दों में कहें तो किसी सरकारी कम्पनी को मिनीरत्न का दर्जा मिलना इस बात का प्रमाण होता है कि वह सफल, लाभकारी और सक्षम सार्वजनिक उपक्रम है। इसी श्रेणी की एक महत्वपूर्ण कम्पनी है इंडियन मेडिसिन्स फार्मास्यूटिकल काॅरपोरेशन लिमिटेड (आईएमपीसीएल), जिसकी स्थापना वर्ष 1978 में की गई थी। उत्तराखण्ड के अल्मोड़ा जनपद के मोहान स्थित यह कम्पनी आयुष मंत्रालय के अधीन कार्यरत है और देश में आयुर्वेदिक तथा यूनानी औषधियों के सबसे बड़े सरकारी निर्माताओं में से एक मानी जाती है। लगभग पांच दशक के अपने इतिहास में आईएमपीसीएल ने केवल दवाओं का निर्माण ही नहीं किया बल्कि भारत की पारम्परिक चिकित्सा पद्धतियों को संस्थागत आधार प्रदान करने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।
कम्पनी देशभर के आयुष अस्पतालों, सीजीएचएस, ईएसआईसी, केंद्रीय और राज्य सरकारों के स्वास्थ्य संस्थानों तथा विभिन्न अनुसंधान संस्थाओं को दवाओं की आपूर्ति करती रही है। आयुर्वेदिक और यूनानी चिकित्सा पद्धति के क्षेत्र में आईएमपीसीएल एक भरोसेमंद सरकारी नाम के रूप में स्थापित हो चुकी है। यही कारण है कि इसे लगातार अच्छे प्रदर्शन के आधार पर मिनीरत्न का दर्जा प्राप्त हुआ लेकिन आईएमपीसीएल की कहानी केवल एक दवा निर्माण कम्पनी की कहानी नहीं है। उत्तराखंड के लोगों के लिए यह एक औद्योगिक इकाई से कहीं अधिक है।
कुमाऊं के सल्ट क्षेत्र और मोहान की अर्थव्यवस्था में इस कम्पनी की भूमिका इतनी व्यापक है कि स्थानीय लोग इसे क्षेत्र की आर्थिक जीवन रेखा मानते रहे हैं। कम्पनी द्वारा निर्मित दवाओं के लिए 100 से अधिक प्रकार की जड़ी-बूटियों की आवश्यकता होती है। इनमें कुटकी, चिरायता, अश्वगंध, गिलोय, तिमूर, तेजपत्ता और अनेक अन्य वनौषधियां शामिल हैं। इन जड़ी-बूटियों की खरीद स्थानीय किसानों, वन पंचायतों और संग्रहकर्ताओं से की जाती है। लगभग 300 से अधिक पंजीकृत जड़ी-बूटी संग्रहकर्ता इस व्यवस्था से जुड़े हुए हैं।
स्थानीय लोगों का दावा है कि आईएमपीसीएल किसानों और संग्रहकर्ताओं को खुले बाजार की तुलना में बेहतर मूल्य प्रदान करती है। इसके कारण पहाड़ के दूरस्थ क्षेत्रों में रहने वाले अनेक परिवारों को नकद आय का एक स्थायी स्रोत उपलब्ध हुआ। जड़ी-बूटी आधारित यह अर्थव्यवस्था केवल कृषि या वानिकी तक सीमित नहीं थी बल्कि इससे जुड़े अनेक छोटे व्यवसाय भी विकसित हुए।
मोहान और उसके आस-पास के क्षेत्रों में आईएमपीसीएल का प्रभाव हर स्तर पर दिखाई देता है। स्थानीय बाजार के दुकानदारों, परिवहन व्यवसायियों, ढुलाई कार्य से जुड़े श्रमिकों, छोटे ठेकेदारों, होटल और ढाबा संचालकों, किराना व्यापारियों तथा अन्य सेवा क्षेत्रों के लोगों की आय प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से कम्पनी से जुड़ी हुई है। स्थानीय लोगों का दावा है कि मोहान बाजार की लगभग 70 प्रतिशत आर्थिक गतिविधियां किसी न किसी रूप में आईएमपीसीएल पर निर्भर हंै। कच्चा माल लाने और तैयार दवाओं को देशभर में भेजने के लिए प्रतिदिन 25 से 30 छोटे वाहन संचालित होते हैं, जिससे स्थानीय परिवहन क्षेत्र को भी निरंतर रोजगार मिलता है।
महिला स्वयं सहायता समूहों की भूमिका भी इस पूरी व्यवस्था में महत्वपूर्ण है। स्थानीय स्तर पर ईंधन, उपले और अन्य सहायक कार्यों के माध्यम से अनेक महिला समूह कम्पनी से जुड़े हुए हैं। इससे ग्रामीण महिलाओं को अतिरिक्त आय प्राप्त होती है। यही कारण है कि स्थानीय समाज आईएमपीसीएल को केवल एक फैक्ट्री नहीं बल्कि एक ऐसे सामाजिक-आर्थिक तंत्र के रूप में देखता है जिसने पहाड़ में रोजगार, आय और आर्थिक गतिविधियों के नए अवसर पैदा किए।
कम्पनी की वित्तीय स्थिति भी लम्बे समय तक मजबूत रही। आईएमपीसीएल स्थापना काल से ही लाभ अर्जित करने वाली कम्पनी रही है। हाल के वर्षों में आयुर्वेदिक उत्पादों की बढ़ती मांग के कारण उसका कारोबार लगातार बढ़ा। उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार कम्पनी का वार्षिक कारोबार 200 करोड़ रुपए से अधिक है और वह लगातार लाभ अर्जित कर रही है। यही कारण है कि आज निजीकरण के विरोध का सबसे बड़ा आधार बन उभर रहा है।
केंद्र सरकार ने रणनीतिक विनिवेश की नीति के तहत आईएमपीसीएल की 100 प्रतिशत हिस्सेदारी निजी क्षेत्र को हस्तांतरित करने का निर्णय ले कम्पनी को 121 करोड़ रुपए की सर्वाेच्च बोली के आधार पर निजी हाथों में सौंप दिया है। सरकार का कहना है कि यह पूरी प्रक्रिया पारदर्शी और प्रतिस्पर्धी बोली प्रणाली के तहत पूरी की गई तथा प्राप्त बोली आरक्षित मूल्य से अधिक थे लेकिन विरोध करने वालों का तर्क है कि किसी कम्पनी का मूल्यांकन केवल उसकी वर्तमान आय या शेयर पूंजी से नहीं किया जाता। उसके पास उपलब्ध भूमि, भवन, संयंत्र, मशीनरी, ब्रांड वैल्यू, बाजार नेटवर्क, संस्थागत प्रतिष्ठा और भविष्य की सम्भावनाएं भी उसके मूल्यांकन का हिस्सा होती हैं। आलोचकों का कहना है कि आईएमपीसीएल की परिसम्पत्तियों और दशकों में निर्मित प्रतिष्ठा का वास्तविक मूल्य 121 करोड़ रुपए से कहीं अधिक है। इसी कारण बिक्री मूल्य को लेकर भी गम्भीर सवाल उठ रहे हैं।
निजीकरण का विरोध कर रहे लोगों का कहना है कि यदि कोई कम्पनी लगातार लाभ में है, सरकार पर वित्तीय बोझ नहीं है और स्थानीय अर्थव्यवस्था को मजबूत कर रही है तो उसे बेचने की आवश्यकता क्यों पड़ी? उनके अनुसार सामान्यतः निजीकरण का तर्क घाटे में चल रही कम्पनियों के लिए दिया जाता है लेकिन आईएमपीसीएल का मामला इससे अलग है क्योंकि यह एक लाभकारी सार्वजनिक उपक्रम है।
इस मुद्दे का एक राजनीतिक पहलू भी है। सामाजिक संगठनों और जनप्रतिनिधियों का आरोप है कि दो वर्ष पहले जब कम्पनी के निजीकरण की आशंका सामने आई थी तब भी आंदोलन और पदयात्राएं हुई थीं और तब लोगों को आश्वासन दिया गया था कि आईएमपीसीएल का निजीकरण नहीं किया जाएगा। स्थानीय लोगों की चिंता केवल कम्पनी के स्वामित्व परिवर्तन तक सीमित नहीं है। उन्हें आशंका है कि निजी प्रबंधन आने के बाद रोजगार के अवसर कम हो सकते हैं, स्थानीय खरीद व्यवस्था में बदलाव आ सकता है और जड़ी-बूटी आधारित अर्थव्यवस्था पर भी असर पड़ सकता है। उत्तराखण्ड पहले से ही पलायन की गम्भीर समस्या से जूझ रहा है। ऐसे में यदि आईएमपीसीएल से जुड़े रोजगार और आर्थिक गतिविधियां प्रभावित होती हैं तो इसका असर पूरे क्षेत्र पर पड़ सकता है।
आईएमपीसीएल का मामला राष्ट्रीय स्तर पर भी एक बड़ी बहस को जन्म देता है। पिछले कुछ वर्षों में ‘एयर इंडिया’, ‘पवन हंस’ और अन्य अनेक सार्वजनिक उपक्रमों के विनिवेश या निजीकरण के निर्णय लिए गए हैं। सरकार का तर्क है कि उसका कार्य व्यापार चलाना नहीं बल्कि शासन करना है और गैर-रणनीतिक क्षेत्रों में निजी क्षेत्र अधिक दक्षता से काम कर सकता है। दूसरी ओर आलोचक पूछते हैं कि यदि कोई सार्वजनिक उपक्रम लाभ कमा रहा है और राष्ट्रीय हितों की पूर्ति कर रहा है तो उसके निजीकरण की आवश्यकता क्यों है।
यह बहस भारतीय जनता पार्टी और उससे जुड़े वैचारिक संगठनों की पुरानी स्वदेशी राजनीति तक भी पहुंचती है। एक समय स्वदेशी जागरण मंच और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से जुड़े अनेक विचारक उदारीकरण और निजीकरण की नीतियों की आलोचना करते थे। सार्वजनिक क्षेत्र को राष्ट्रीय सम्पत्ति माना जाता था लेकिन आज वही राजनीतिक धारा सत्ता में रहते हुए रणनीतिक विनिवेश को आर्थिक सुधारों का महत्वपूर्ण साधन बता रही है। समर्थकों के अनुसार यह बदलती वैश्विक अर्थव्यवस्था के अनुरूप व्यावहारिक नीति है जबकि आलोचकों के अनुसार यह स्वदेशी की उस अवधारणा से विचलन है जिसका वर्षों तक प्रचार किया गया।
आईएमपीसीएल का भविष्य क्या होगा, यह आने वाला समय बताएगा लेकिन फिलहाल इतना स्पष्ट है कि यह मामला केवल 121 करोड़ रुपए में एक कम्पनी की बिक्री का नहीं है। यह सार्वजनिक सम्पत्तियों के मूल्यांकन, लाभकारी सरकारी उपक्रमों की भूमिका, पहाड़ की अर्थव्यवस्था, जड़ी-बूटी आधरित आजीविका, रोजगार, पलायन और भारत की आर्थिक नीतियों की दिशा से जुड़ा प्रश्न बन चुका है। उत्तराखण्ड के अनेक लोगों की नजर में आईएमपीसीएल केवल एक कम्पनी नहीं बल्कि पहाड़ के श्रम, संसाधनों, ज्ञान और आत्मनिर्भरता की एक ऐसी विरासत है जिसके भविष्य को लेकर अब गम्भीर सवाल खड़े हो गए हैं।
बात अपनी-अपनी
आईएमपीसीएल कम्पनी के साथ अल्मोड़ा, रामनगर, सल्ट और गढ़वाल के लोगों का भावनात्मक लगाव रहा है। यह एशिया की पहली ऐसी यूनिट है जिसे इंदिरा जी ने 1980 में यहां स्थापित कराया था। वैसे तो इसमें 500 कर्मचारी कार्य कर रहे हैं लेकिन अप्रत्यक्ष तौर पर 40000 लोग इससे पलते हैं। यहां जड़ी-बूटियां और गाय का गोबर भी बहुत संख्या में खपता है। जिस कम्पनी ने इसे खरीदा है वह कोई ‘डाबर’ जैसी विख्यात कम्पनी नहीं है बल्कि मुझे लगता है कि यह किसी कम्पनी की फ्रंट कम्पनी है। इस कम्पनी का 50 करोड़ की एफडी और 40 करोड़ जीएसटी आता है। करीब 500 करोड़ की यह जमीन है जिस पर यह बनी है। ऐसे में सिर्फ 121 करोड़ में यह कम्पनी क्यों बेच दी गई?
हरीश रावत, पूर्व मुख्यमंत्री उत्तराखण्ड
आईएमपीसीएल केवल एक कम्पनी नहीं है बल्कि आयुर्वेद, स्थानीय रोजगार, किसानों की आजीविका और उत्तराखण्ड की पहचान से जुड़ी एक महत्वपूर्ण संस्था है। दशकों से यह संस्थान देश को आयुर्वेदिक एवं यूनानी औषधियां उपलब्ध कराता आया है तथा हजारों परिवारों की आजीविका का आधार बना हुआ है। आज जब इसके भविष्य को लेकर प्रश्न उठ रहे हैं, तब उत्तराखण्ड की जनता अपने देश और प्रदेश के मुख्य सेवकों से सवाल पूछ रही है कि आपने कसम खाई थी कि मैं इस देश को नहीं बिकने दूंगा लेकिन ऐसी क्या मजबूरी हुई कि आज देश की सरकारी और अर्धसरकारी संस्थाओं को एक-एक करके बेच रहे हो। जब सब कुछ बेचना ही है और हर क्षेत्र निजी हाथो में ही सौंपना है तो फिर जनता को सरकार चुनने का कोई औचित्य नहीं रह जाता, जनता का स्पष्ट संदेश है, सरकारें जनता के हितों की रक्षा करने के लिए चुनी जाती हैं, न कि केवल सत्ता संचालन के लिए। जनता चाहती है कि विकास हो, रोजगार बढ़े, उद्योग आगे बढ़ें और प्रदेश की ऐतिहासिक संस्थाएं मजबूत हों। यदि किसी सार्वजनिक संस्था के सम्बंध में कोई बड़ा निर्णय लिया जाता है तो उसके प्रत्येक पहलू को जनता के सामने स्पष्ट किया जाना चाहिए, न कि किसी निजी व्यक्ति के लिए सरकार को काम करना चाहिए। इसलिए हम चाहते हैं कि देश हित और जनहित में निर्णय लेना चाहिए और इस निजीकरण को तत्काल प्रभाव से निरस्त करना चाहिए। प्रधानमंत्री ने वादा किया था दो करोड़ नौजवानों को हर साल रोजगार देने का लेकिन प्रधानमंत्री ने ठीक इसके विपरीत काम किया आज हर साल 2 करोड़ लोग बेरोजगार हो रहे हैं।
नारायण सिंह रावत, पूर्व जिला पंचायत सदस्य, सल्ट
आईएमपीसीएल को केंद्र सरकार ने अपने करीबियों को फायदा पहुंचाने के लिए कौड़ियों के भाव बेच दिया है। सरकार की गिद्ध दृष्टि 40 एकड़ बेशकीमती जमीन पर है। रोजगार देने के बजाय सरकार ने इस संस्थान की नीलामी कर हजारों लोगों को बेरोजगार कर दिया है। हम कर्मचारी, वेतन भोगी श्रमिकों के साथ हैं। जब तक फैक्ट्री का निजीकरण वापस नहीं होता आंदोलन जारी रहेगा ।
संजय नेगी, ज्येष्ठ ब्लाॅक प्रमुख, रामनगर