Uttarakhand

जांच में गबन की पुष्टि, फिर भी कार्रवाई नहीं ‘कुछ समय उपरांत प्रस्तुत करें’

देवभूमि भैरव वाहिनी के केंद्रीय अध्यक्ष एवं सामाजिक कार्यकर्ता संदीप खत्री की शिकायत पर शुरू हुई जांच में मंदिर निधि के दुरुपयोग, वित्तीय अनियमितताओं और प्रथम दृष्टया आपराधिक कृत्य की पुष्टि होने के बावजूद दो वर्ष बाद भी कोई आपराधिक कार्रवाई नहीं हुई। विशेष सचिव रिधिम अग्रवाल ने एसआईटी गठन और अभियोग दर्ज करने की संस्तुति की जबकि बाद में अपर सचिव निवेदिता कुकरेती ने भी जांच में मंदिर निधि की हानि और दुरुपयोग की पुष्टि दर्ज की। इसके बावजूद गृह सचिव शैलेश बगोली की एक टिप्पणी ‘कृपया, कुछ समय उपरांत प्रस्तुत करने के निर्देश हैं’ पूरे मामले का सबसे बड़ा रहस्य बन गई है

देवभूमि भैरव वाहिनी के केंद्रीय अध्यक्ष संदीप खत्री द्वारा बदरीनाथ-केदारनाथ मंदिर समिति में राज्य सरकार द्वारा नामित सदस्य आशुतोष डिमरी के विरुद्ध की गई शिकायत अब केवल कथित वित्तीय अनियमितताओं का मामला नहीं रह गया है बल्कि उत्तराखण्ड शासन की प्रशासनिक कार्यप्रणाली, जवाबदेही और निर्णय प्रक्रिया पर भी गम्भीर प्रश्नचिह्न खड़े कर रहा है। उपलब्ध सरकारी पत्रावलियों, नोटशीट्स और विभागीय अभिलेखों का अध्ययन बताता है कि शिकायत की जांच में आरोपों की पुष्टि होने के बावजूद कार्रवाई को लगातार टालने और फाइल को इधर-उधर घुमाने का सिलसिला चलता रहा।

क्या थे आरोप?
संदीप खत्री ने मुख्यमंत्री को भेजे अपने विस्तृत शिकायती पत्र में आरोप लगाया था कि बदरीनाथ-केदारनाथ मंदिर समिति के सदस्य रहते हुए आशुतोष डिमरी ने अपने समाचार पत्रों ‘दैनिक जनआगाज’ और ‘क्षेत्रीय वाणी’ को अनुचित लाभ पहुंचाया। शिकायत के अनुसार पिछले लगभग दस वर्षों के दौरान करीब 30 लाख रुपए के विज्ञापन और निविदाएं इन समाचार पत्रों को उपलब्ध कराई गईं। आरोप यह भी था कि कई अवसरों पर विभागीय आदेश जारी किए बिना ही विज्ञापन दिए गए तथा एक ही सप्ताह में कई-कई विज्ञापन जारी किए गए। शिकायतकर्ता ने इसे मंदिर निधि के दुरुपयोग, हितों के टकराव और सरकारी पद के प्रभाव का दुरुपयोग बताते हुए उच्च स्तरीय जांच और कार्रवाई की मांग की थी।

मुख्यमंत्री के निर्देश पर शुरू हुई जांच
30 मई 2023 को शिकायत मुख्यमंत्री कार्यालय पहुंची। मुख्यमंत्री कार्यालय से इसे तत्कालीन अपर मुख्य सचिव (गृह) राधा रतूड़ी को आवश्यक कार्रवाई के लिए भेजा गया। इसके बाद गृह विभाग ने 12 अक्टूबर 2023 को पुलिस महानिदेशक को पत्र लिखकर मामले की जांच कराने के निर्देश दिए। जांच चमोली पुलिस को सौंपी गई और 15 फरवरी 2024 को जांच रिपोर्ट शासन को भेज दी गई। पुलिस जांच के बाद मामला जब शासन स्तर पर पहुंचा तो 7 मार्च 2024 को विशेष सचिव रिधिम अग्रवाल ने अपनी महत्वपूर्ण टिप्पणी दर्ज की। उन्होंने स्पष्ट लिखा कि प्रकरण में ‘प्रथम दृष्टया आपराधिक कृत्य’ पाया गया है। उन्होंने जांच रिपोर्ट के आधार पर अभियोग पंजीकृत करने, विशेष जांच दल (एसआईटी) गठित करने अथवा मंदिर अधिनियम की धारा-19 के अंतर्गत ऑडिट समिति गठित करने जैसे विकल्प सुझाए। यह टिप्पणी इस बात का संकेत थी कि शासन स्तर पर मामले को सामान्य प्रशासनिक त्रुटि नहीं बल्कि सम्भावित आपराधिक प्रकरण माना जा रहा था।
गृह सचिव स्तर पर बदली फाइल की दिशा

9 मार्च 2024 को फाइल गृह सचिव शैलेश बगोली के पास पहुंची तो उन्होंने यह प्रश्न उठाया कि प्रस्तावित कार्रवाई गृह विभाग की अनुमति से की जानी चाहिए या सम्बंधित प्रशासनिक विभाग की अनुमति से। यहीं से फाइल की दिशा बदलती दिखाई देती है। इसके बाद मामला लम्बे समय तक विभागीय अधिकार क्षेत्र की बहस में उलझा रहा। इस बीच संस्कृति एवं धर्मस्य विभाग के सचिव हीराचंद्र सेमवाल ने 22 जुलाई 2024 को गृह विभाग को पत्र लिखकर स्पष्ट कहा कि चूंकि जांच गृह विभाग द्वारा कराई गई है, इसलिए दोषियों के विरुद्ध विधि सम्मत कार्रवाई भी गृह विभाग को ही करनी चाहिए। इसके बावजूद मामला आगे नहीं बढ़ा और फाइल फिर विभागों के बीच घूमती रही।

दूसरी बार भी दर्ज हुई गम्भीर आपत्तियां
10 अक्टूबर 2024 को विशेष सचिव रिधिम अग्रवाल ने एक बार फिर प्रकरण का परीक्षण किया और अपनी टिप्पणी में लिखा कि यह ‘शासकीय कोष के आपराधिक गबन’ तथा ‘जान-बूझकर क्षति’ का मामला प्रतीत होता है। उन्होंने पुनः अभियोग दर्ज करने, एसआईटी गठित करने और सक्षम वित्त नियंत्रक से परीक्षण कराने जैसे विकल्प सुझाए। यह टिप्पणी पहले से भी अधिक कठोर और स्पष्ट थी। इसका सीधा अर्थ था कि जांच रिपोर्ट और उपलब्ध तथ्यों के आधार पर शासन की वरिष्ठ अधिकारी मामले में गम्भीर वित्तीय अपराध की आशंका देख रही थीं।

वह टिप्पणी जिसने खड़े कर दिए सबसे बड़े सवाल
17 अक्टूबर 2024 को जब फाइल पुनः गृह सचिव शैलेश बगोली के समक्ष पहुंची तो उन्होंने फाइल पर केवल एक पंक्ति लिखी ‘कृपया, कुछ समय उपरांत प्रस्तुत करने के निर्देश हैं।’ यहीं से पूरे मामले का सबसे विवादास्पद और रहस्यमय अध्याय शुरू होता है। यह प्रश्न स्वाभाविक रूप से उठता है कि आखिर गृह सचिव को यह निर्देश किसने दिए थे? यदि पुलिस जांच में आरोपों की पुष्टि हो चुकी थी, यदि विशेष सचिव रिधिम अग्रवाल ‘प्रथम दृष्टया आपराधिक कृत्य’ और ‘शासकीय कोष के आपराधिक गबन’ जैसी टिप्पणियां दर्ज कर चुकी थीं। यदि एसआईटी गठन और अभियोग दर्ज करने का विकल्प शासन की फाइल पर मौजूद था तो फिर कार्रवाई रोकने अथवा टालने की आवश्यकता क्यों महसूस हुई?
यदि गृह सचिव विशेष सचिव की संस्तुतियों से सहमत नहीं थे तो उन्होंने असहमति का कोई ठोस कारण फाइल पर दर्ज क्यों नहीं किया? उन्होंने यह क्यों नहीं लिखा कि जांच रिपोर्ट त्रुटिपूर्ण है, आरोप सिद्ध नहीं होते या फिर एसआईटी अथवा एफआईआर की आवश्यकता नहीं है? इसके बजाय केवल यह लिखा गया कि ‘कुछ समय उपरांत प्रस्तुत करने के निर्देश हैं।’ यह टिप्पणी इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि इसमें यह नहीं बताया गया कि निर्देश किस स्तर से प्राप्त हुए, न ही यह स्पष्ट किया गया कि कार्रवाई स्थगित करने का औचित्य क्या था। ऐसे में यह आशंका स्वाभाविक रूप से जन्म लेती है कि कहीं न कहीं मामले को आगे बढ़ाने के बजाय रोकने का प्रयास किया गया।

नौ महीने तक फाइल पर जमी रही धूल
17 अक्टूबर 2024 की टिप्पणी के बाद फाइल लगभग नौ महीने तक प्रभावी रूप से ठंडी पड़ी रही। इस दौरान शिकायतकर्ता संदीप खत्री सूचना के अधिकार के तहत लगातार जानकारी मांगते रहे। मामला राज्य सूचना आयोग तक पहुंच गया।

9 जुलाई 2025 को गृह अनुभाग की टिप्पणी में यह तक दर्ज किया गया कि आवेदक विभिन्न माध्यमों से सूचना प्राप्त करने का प्रयास कर रहा है तथा यह सम्भावना है कि वह न्यायालय की शरण ले सकता है। इसलिए प्रकरण को उच्च स्तर पर प्रस्तुत किया जाना चाहिए।

निवेदिता कुकरेती ने फिर आगे बढ़ाया मामला
11 जुलाई 2025 को फाइल अपर सचिव एवं वरिष्ठ आईपीएस अधिकारी निवेदिता कुकरेती के पास पहुंची। उन्होंने पूर्व विशेष सचिव रिधिम अग्रवाल द्वारा सुझाए गए विकल्पों पर निर्णय लेने के लिए प्रकरण को मुख्यमंत्री अनुमोदन हेतु भेजने की संस्तुति की। इसके बाद 27 अगस्त 2025 को निवेदिता कुकरेती ने धर्मस्य विभाग को औपचारिक पत्र जारी किया। इस पत्र में स्पष्ट रूप से लिखा गया कि गृह विभाग स्तर पर की गई जांच में ‘मंदिर निधि की हानि एवं दुरुपयोग की पुष्टि हुई है।’ यह अत्यंत महत्वपूर्ण तथ्य है क्योंकि यह केवल विभागीय राय नहीं बल्कि शासन के आधिकारिक पत्र में दर्ज निष्कर्ष था। अर्थात एक ओर जांच रिपोर्ट थी, दूसरी तरफ विशेष सचिव रिधिम अग्रवाल की आपराधिक कृत्य सम्बंधी टिप्पणियां थीं और तीसरी ओर अपर सचिव निवेदिता कुकरेती द्वारा मंदिर निधि के दुरुपयोग की पुष्टि दर्ज की जा चुकी थी।

फिर भी कार्रवाई नहीं
27 अक्टूबर 2025 को धर्मस्य विभाग ने बद्रीनाथ- केदारनाथ मंदिर समिति के मुख्य कार्य अधिकारी को पत्र
भेजकर आवश्यक कार्रवाई करने और शासन को अवगत कराने के निर्देश दिए। लेकिन सबसे महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि आज तक न तो एफआईआर दर्ज हुई, न एसआईटी गठित हुई और न ही किसी प्रकार की आपराधिक कार्रवाई सामने आई। यही कारण है कि अब इस पूरे प्रकरण का केंद्र आशुतोष डिमरी पर लगे आरोपों से आगे बढ़कर उस प्रशासनिक प्रक्रिया पर आ गया है, जिसमें जांच में आरोपों की पुष्टि होने के बावजूद कार्रवाई लगातार टलती रही।

प्रश्न अब केवल यह नहीं है कि मंदिर निधि का दुरुपयोग हुआ या नहीं। प्रश्न यह भी है कि जब पुलिस जांच, विशेष सचिव की टिप्पणियां और अपर सचिव के आधिकारिक पत्र सभी एक ही दिशा में संकेत कर रहे थे, तब गृह सचिव शैलेश बगोली ने एसआईटी या अभियोग दर्ज करने की संस्तुति को आगे क्यों नहीं बढ़ाया? और सबसे महत्वपूर्ण ‘कुछ समय उपरांत प्रस्तुत करने के निर्देश हैं’ यह निर्देश आखिर किसके थे और किस उद्देश्य से दिए गए थे? यही वह सवाल है जिसका उत्तर इस पूरे प्रकरण की असली तस्वीर सामने ला सकता है।

बात अपनी-अपनी

यह एक काफी पुराना मामला है। इस मामले को हमने धर्मस्य विभाग को भेज दिया है। जहां हमने उनसे जांच करने के लिए कहा है।
शैलेश बगौली, प्रमुख सचिव (गृह)

इस मामले की जानकारी मुझे नहीं है। मैं इस पर कुछ नहीं बोल सकता।
हेमंत द्विवेदी, अध्यक्ष, बीकेटीसी

यह घपला हमारे कार्यकाल से पहले का है। हालांकि इसकी जांच हमारे कार्यकाल में ही हुई है। पुलिस ने हमसे जो भी डॉक्यूमेंट इस घपले से सम्बंधित मांगे थे वह हमने दे दिए। साथ ही हमने पुलिस विभाग को इसमें पूरी सहायता की है। जांच का निष्कर्ष क्या निकलेगा यह तो शासन ही बता पाएगा।
अजेंद्र अजय, पूर्व अध्यक्ष, बीकेटीसी

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