धारचूला विधानसभा ऐसा क्षेत्र है जो सीमांत इलाके से जुड़ा हुआ है। सामरिक दृष्टि से अति महत्वपूर्ण इस इलाके के लोग अपनी दुर्लभतम जिंदगी जीने के लिए जाने जाते हैं। यहां एक तरफ आपदाओं की भरमार रहती है तो दूसरी ओर स्थानीय विधायक हरीश धामी विपक्ष में होने के बावजूद इस विधानसभा क्षेत्र में विकास की धार लगातार लगाते रहे हैं। वे अपने तीसरे कार्यकाल में भी दुर्गम गांवों में सड़क, स्वास्थ्य सेवाओं और आपदा राहत पहुंचाने में सक्रिय रहे हैं। पर्वतीय क्षेत्रों में डाॅक्टरों की भारी कमी और बुनियादी सुविधाओं के मुद्दों को उन्होंने कई बार सदन में पुरजोर तरीके से उठाया है।स्थानीय प्रशासनिक लापरवाही या फंड की कमी के खिलाफ धरने पर बैठकर अपनी बात मनवाने में सफल भी रहे हैं। उनका आरोप है कि विपक्ष में होने के कारण बड़े बुनियादी ढांचे के विकास कार्यों में सत्ता पक्ष से सहयोग नहीं मिलता है
उत्तराखण्ड बनने के बाद अस्तित्व में आई धारचूला विधानसभा सीट 2002 से 2007 तक अनुसूचित जनजाति के लिए आरक्षित रही है। 2002 में हुए पहले विधानसभा चुनाव में धारचूला सीट से निर्दलीय उम्मीदवार गगन रजवार ने कांग्रेस के प्रद्युम्न सिंह को लगभग 7667 वोटों से हराकर सबको चैंका दिया था क्योंकि गगन रजवार एक लकड़हारा का काम करते थे और राजनीति से उनका कोई भी वास्ता नहीं था। रजवार लोग आदिवासी जीवन जीते हैं और इंसानों की बस्ती तक में आने से भी डरते थे। उनका रहन-सहन भी आम लोगों से नहीं मिलता था। इसका एक उदाहरण उनका चप्पल पहनकर नामांकन करने पहुंचना था। यही नहीं बल्कि गगन रजवार पहली बार देहरादून के लिए रोडवेज की बस पर सवार होकर रवाना हुए थे।
विधानसभा चुनाव में गगन सिंह राजवार (निर्दलीय) लगातार दो बार 2002 और 2007 के दोनों विधानसभा चुनाव जीत जाने के बाद भी विकास की दृष्टि से धारचूला में कुछ खास नहीं कर पाए। इसके बाद हुए 2012 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस के हरीश धामी ने जीत दर्ज की। सीमांत क्षेत्र के विकास, सड़क सम्पर्क और स्थानीय नेतृत्व पर जनता ने भरोसा जताया। इस दौरान 2014 में विधानसभा उप चुनाव हुए तो हरीश धामी ने तत्कालीन मुख्यमंत्री हरीश रावत के लिए सीट खाली की जिसमें हरीश रावत विजयी हुए, जिससे वे मुख्यमंत्री बने रहने की संवैधानिक शर्त पूरी कर सके। 2017 में हुए विधानसभा चुनाव में भाजपा की राज्यव्यापी लहर के बावजूद हरीश धामी ने कांग्रेस के टिकट पर जीत हासिल की। यह परिणाम स्थानीय नेतृत्व की मजबूत पकड़ का संकेत माना गया। 2022 के विधानसभा चुनाव में हरीश धामी ने हैट्रिक लगाते हुए भाजपा उम्मीदवार को हराकर अपने जनाधार को और मजबूत किया तथा लगातार तीसरी बार जीत दर्ज कर जता दिया कि वे जनता के सबसे पसंदीदा नेता हैं। ‘दि संडे पोस्ट’ टीम ने धारचूला विधानसभा क्षेत्र का दौरा कर वहां के लोगों की समस्याओं को इस रिपोर्ट में पेश किया है।
ग्राम तीजम निवासी जानकी देवी ने बताया कि सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र, धारचूला में अल्ट्रासाउंड की सुविधा उपलब्ध न होने के कारण उन्हें निजी केंद्र में जांच करानी पड़ती है। एक अल्ट्रासाउंड पर लगभग 1000 रुपए का खर्च आता है। यदि सरकारी अस्पताल से कुछ जांच या प्रक्रिया नहीं हो पाती तो 1300-1400 रुपए तक का अतिरिक्त खर्च भी करना पड़ता है। दवाइयां भी बाहर से खरीदनी पड़ती हैं। घर से धारचूला आने-जाने, अल्ट्रासाउंड और अन्य आवश्यक खर्चों को मिलाकर एक बार में लगभग 3000-4000 तक खर्च हो जाता है। अस्पताल में भर्ती रहने के दौरान बेडशीट और रात में ओढ़ने के लिए कम्बल उपलब्ध नहीं कराउ जाते हैं, इसलिए ये सभी सामान घर से लेकर आने पड़ते हैं।
धारचूला निवासी इंदिरा बिष्ट के अनुसार सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र, धारचूला में पर्याप्त स्वास्थ्य सुविधाएं उपलब्ध नहीं हैं। गम्भीर या विशेष उपचार के लिए अधिकांश मरीजों को पिथौरागढ़ या हल्द्वानी जाना पड़ता है। उनका कहना है कि धारचूला बाॅर्डर क्षेत्र होने के कारण यहां बेहतर स्वास्थ्य सुविधाओं की आवश्यकता है। दूर-दराज के गांवों से भी बड़ी संख्या में लोग यहां इलाज के लिए आते हैं, इसलिए यहां बेहतर स्वास्थ्य सुविधाएं उपलब्ध होनी चाहिए। वहीं अस्पताल में मौजूद कुछ अन्य महिलाओं ने बताया कि अस्पताल परिसर और बाथरूम की नियमित साफ- सफाई नहीं होती, जिससे कई स्थानों पर गंदगी दिखाई देती है। उनका यह भी कहना था कि कुछ डाॅक्टरों का व्यवहार मरीजों के प्रति संतोषजनक नहीं रहता। इसी कारण कई लोग इलाज के लिए सीधे पिथौरागढ़ या हल्द्वानी जाना अधिक उचित समझते हैं।
धारचूला के साथ ही मुनस्यारी सरकारी अस्पताल की व्यवस्था भी संतोषजनक नहीं पाई गई। अस्पताल में मौजूद कई महिलाओं का कहना है कि यहां पर्याप्त संख्या में डॉक्टर और स्वास्थ्यकर्मी होने चाहिए। यहां नियुक्त होने वाले डॉक्टरों का कार्यकाल भी पर्याप्त समय तक होना चाहिए क्योंकि कई बार डॉक्टर कुछ समय तक सेवाएं देने के बाद स्थानांतरित हो जाते हैं। उनका कहना है कि जब अस्पताल में पर्याप्त बेड और भवन की व्यवस्था है तो उसी अनुरूप डाॅक्टरों और अन्य आवश्यक सुविधाओं की भी उपलब्धता होनी चाहिए। उन्होंने यह भी कहा कि यदि कोई डॉक्टर छुट्टी पर जाता है तो उसकी जगह दूसरे डॉक्टर की व्यवस्था नहीं होती, जिससे मरीजों को परेशानी होती है। धारचूला की तरह मुनस्यारी में भी अल्ट्रासाउंड की सुविधा नियमित रूप से उपलब्ध नहीं है। यह सुविधा केवल कैंप लगने पर ही मिलती है अन्यथा जांच के लिए पिथौरागढ़ या हल्द्वानी जाना पड़ता है।
मुनस्यारी में बुनियादी स्वास्थ्य सेवाएं उपलब्ध हैं: चिकित्सा अधिकारी डाॅ. अजय इस बाबत जब सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र (सीएचसी) मुनस्यारी के चिकित्सा अधिकारी डॉ. अजय से बात की गई तो उन्होंने बताया कि अस्पताल में प्रतिदिन नियमित ओपीडी संचालित होती है, जिसमें औसतन 60 से 100 मरीज उपचार के लिए पहुंचते हैं। आवश्यकता अनुसार मरीजों को भर्ती किया जाता है तथा सभी बुनियादी जांच और उपचार की सुविधाएं उपलब्ध कराई जाती हैं। उन्होंने कहा कि जिन मरीजों को विशेषज्ञ उपचार, आॅपरेशन, एनआईसीयू या अन्य उन्नत चिकित्सा सेवाओं की आवश्यकता होती है, उन्हें पिथौरागढ़ रेफर किया जाता है। इसके लिए अस्पताल में 108 एम्बुलेंस की स्थायी तैनाती है जो 24 घंटे उपलब्ध रहती है। यदि किसी कारणवश यह एम्बुलेंस व्यस्त होती है तो मदकोट, तेजम और क्वीटी क्षेत्रों से भी एम्बुलेंस की व्यवस्था की जाती है।
डाॅ. अजय ने बताया कि अस्पताल में एक्स-रे की सुविधा नियमित रूप से उपलब्ध रहती है। हाल ही में एक्स-रे मशीन में तकनीकी खराबी आ गई थी, जिसके कारण सेवा कुछ समय के लिए प्रभावित हुई। मशीन की मरम्मत का कार्य शुरू हो चुका है जल्द ही यह सुविधा पुनः सुचारू रूप से शुरू हो जाएगी। अल्ट्रासाउंड सुविधा के सम्बंध में उन्होंने बताया कि गर्भवती महिलाओं की आवश्यक जांच के लिए प्रत्येक माह पिथौरागढ़ से सोनोलाॅजिस्ट मुनस्यारी आते हैं और निर्धारित शिविर में अल्ट्रासाउंड किए जाते हैं। उनके अनुसार, अस्पताल में नर्सिंग और पैरामेडिकल स्टाफ की कोई गम्भीर कमी नहीं है। साथ ही महिला चिकित्सा अधिकारी भी तैनात हैं और अस्पताल में सामान्य प्रसव की सुविधा नियमित रूप से उपलब्ध है।
उत्तराखण्ड का खूबसूरत पर्यटन स्थल मुनस्यारी आज देश-विदेश के पर्यटकों को आकर्षित कर रहा है लेकिन धरातल पर स्थानीय युवा और निवासी आज भी मूलभूत सुविधाओं के अभाव में जीने को मजबूर हैं। क्षेत्र के विकास और जमीनी हकीकत को लेकर स्थानीय युवा रविंद्र सिंह नेगी ने गम्भीर चिंता व्यक्त की है। उन्होंने बताया कि क्षेत्र में कुछ विकास कार्य तो अवश्य हुए हैं लेकिन जिस रफ्तार और पैमाने पर विकास होना चाहिए था, वह अब तक नहीं हो पाया है। नेगी की नजर में सबसे बड़ा मुद्दा स्वास्थ्य सेवाओं का है। मुनस्यारी के अस्पताल में मूलभूत चिकित्सा सुविधाओं का भारी अभाव है। यहां कोई भी डॉक्टर टिकना नहीं चाहता।
मुनस्यारी निवासी शांति देवी के अनुसार, मुनस्यारी की सबसे अच्छी बात यहां का शुद्ध और स्वच्छ वातावरण है। सरकारी स्कूलों में पढ़ाई अच्छी होती है और आवश्यक सुविधाएं भी उपलब्ध हैं। वहीं, पर्यटन बढ़ने से स्थानीय लोगों को होमस्टे सहित अन्य माध्यमों से रोजगार के अवसर मिल रहे हैं। विधायक के कार्यों को लेकर उनका कहना है कि वे लोगों की समस्याओं पर तुरंत ध्यान देते हैं। गांव में कोई परेशानी होने पर फोन करने पर वे तुरंत सम्पर्क करते हैं और हर संभव मदद का प्रयास करते हैं। उनके अनुसार, मुनस्यारी में कई विकास कार्य हुए हैं और विधायक का काम अच्छा रहा है।
इलाज के लिए जाना पड़ता है मीलों दूर
ग्राम धापा निवासी भावना देवी के अनुसार, उनके गांव में सड़क और पैदल रास्तों की स्थिति बेहतर नहीं है, जिससे बच्चों को स्कूल आने-जाने में दिक्कत होती है। क्षेत्र में पेयजल की कमी भी बनी रहती है। स्वास्थ्य सेवाओं को लेकर उनका कहना है कि सबसे अधिक परेशानी अस्पताल की है। इलाज के लिए करीब 13-14 किलोमीटर दूर अस्पताल जाना पड़ता है लेकिन वहां भी कई बार आवश्यक सुविधाएं उपलब्ध नहीं मिलतीं। साथ ही रोजगार के अवसरों की कमी का भी उन्होंने जिक्र किया। 2013 की आपदा के दौरान प्रभावित परिवारों को मुआवजा दिलाने और लोगों की सहायता के लिए भी प्रयास किए गए।
प्राकृतिक आपदाओं के साए में
ग्राम धापा की दीपा देवी के अनुसार, उनका क्षेत्र आपदा प्रभावित है और बरसात के मौसम में अक्सर प्राकृतिक आपदाओं के कारण रास्ते बंद हो जाते हैं। इससे राशन और अन्य आवश्यक सामान लाने-ले जाने में लोगों को काफी दिक्कतों का सामना करना पड़ता है। स्वास्थ्य सेवाओं को लेकर उनका कहना है कि स्थानीय स्तर पर सुविधाएं सीमित होने के कारण गम्भीर स्थिति में मरीजों को हल्द्वानी या पिथौरागढ़ जाना पड़ता है।
रोजगार के सम्बंध में उन्होंने कहा कि विकास कार्यों में स्थानीय युवाओं को पर्याप्त अवसर नहीं मिलते। उनके अनुसार, कई बार ठेकेदार नेपाल के मजदूरों को काम पर रखते हैं, जिससे गांव के युवाओं को रोजगार मिलने में कठिनाई होती है। विधायक हरीश धामी के बारे में उनका कहना है कि उनके मिलनसार व्यवहार और लोगों की समस्याओं पर तुरंत ध्यान देने की वजह से क्षेत्र के लोग उन पर भरोसा जताते हैं। इसी कारण वे लगातार तीन बार विधायक चुने गए हैं।
ग्राम साईं पोलू निवासी हरि सिंह लशपाल बताते हैं कि उनके क्षेत्र की सबसे बड़ी समस्या सड़क सुविधा की कमी है। उनका कहना है कि यदि किसी व्यक्ति को गम्भीर चोट लग जाए या किसी गर्भवती महिला को अस्पताल ले जाना हो तो कई बार डोली के सहारे ले जाना पड़ता है। स्वास्थ्य सेवाओं की कमी भी क्षेत्र की प्रमुख समस्याओं में शामिल है।
ग्राम साईं पोलू की रहने वाली लीला देवी के अनुसार, उनके गांव की सबसे बड़ी समस्या सड़क सुविधा की कमी है। उनका कहना है कि रास्तों पर सौर ऊर्जा आधारित स्ट्रीट लाइटें भी नहीं हैं, जिससे लोगों को विशेषकर रात के समय काफी दिक्कतों का सामना करना पड़ता है। उन्होंने बताया कि गांव में पेयजल की सुविधा उपलब्ध है लेकिन स्वास्थ्य सेवाएं पर्याप्त नहीं हैं। अस्पताल पहुंचने के लिए पहले पैदल मुख्य सड़क तक आना पड़ता है।
ग्राम लीलम निवासी हरूली देवी के अनुसार, उनके गांव में बिजली और पेयजल की सुविधा उपलब्ध है लेकिन स्वास्थ्य सेवाओं की कमी बनी हुई है। उनका कहना है कि उपचार के लिए अक्सर पिथौरागढ़ अस्पताल जाना पड़ता है। उन्होंने बताया कि पहले गांव में सड़क न होने के कारण लोगों को रोजमर्रा का सामान स्वयं ढोकर लाना पड़ता था, जिससे काफी कठिनाइयों का सामना करना पड़ता था। अब सड़क बनने के बाद आवागमन और आवश्यक सामान लाने-ले जाने में पहले की तुलना में काफी सुविधा हो गई है।
मुनस्यारी में पढ़ाई का माहौल अच्छा
राजकीय कन्या इंटर काॅलेज (जीजीआईसी), मुनस्यारी के छात्र- छात्राओं ने बताया कि उनके विद्यालय में पढ़ाई का माहौल अच्छा है। सभी विषयों के अध्यापक उपलब्ध हैं और नियमित रूप से पढ़ाई कराते हैं। विद्यालय में आवश्यक शैक्षणिक सुविधाएं भी उपलब्ध हैं। छात्र-छात्राओं का कहना है कि विद्यालय में खेल मैदान की कमी है। मैदान न होने के कारण वे मुनस्यारी हेलीपैड के पास फुटबॉल खेलते हैं। हालांकि जब हेलीकाॅप्टर का संचालन होता है, तब उन्हें खेल रोकना पड़ता है। कभी- कभी विद्यालय में पेयजल की आपूर्ति नियमित नहीं रहने से पानी की समस्या का भी सामना करना पड़ता है।
सेवानिवृत्त शिक्षक आर.ए. यशपाल कहते हैं कि मुनस्यारी में सड़क, पेयजल जैसी बुनियादी सुविधाएं उपलब्ध हैं लेकिन स्वास्थ्य सेवाओं में अभी भी कई कमियां हैं। विधायक के कार्यों पर उन्होंने कहा कि उनका काम अच्छा रहा है और क्षेत्र में पहले की तुलना में विकास हुआ है। उन्होंने मुनस्यारी के पारम्परिक ऊन उद्योग में आए बदलाव का भी उल्लेख किया। उनके अनुसार पहले इस क्षेत्र में भेड़-बकरी पालन और ऊन का कारोबार काफी बड़े स्तर पर होता था। स्थानीय ऊन से स्वेटर और अन्य गर्म कपड़े बनाए जाते थे, जो मोटे और टिकाऊ होते थे। पहले लोग इन्हें खूब पहनते थे लेकिन अब नई पीढ़ी को मुलायम ऊनी कपड़े अधिक पसंद हैं। इसी कारण पारम्परिक ऊनी वस्त्रों की मांग लगातार घटती जा रही है।
उन्होंने बताया कि अब खरगोश (रैबिट) के ऊन का चलन बढ़ गया है क्योंकि उससे बने दस्ताने, टोपी, शाॅल और अन्य वस्त्र अधिक मुलायम होते हैं। पहले क्षेत्र में खादी उद्योग सुचारू था। लोग ऊन की कार्डिंग (धुनाई) के लिए वहां जाया करते थे लेकिन अब वह उद्योग बंद हो चुका है। उनके अनुसार, वर्तमान में दरकोट क्षेत्र में ही रैबिट ऊन की कार्डिंग का कार्य किया जाता है।
मुनस्यारी में पार्किंग नहीं होना बड़ी समस्या
मुनस्यारी में रहने वाले देवेंद्र भंडारी की मानें तो यहां सबसे बड़ी समस्या पार्किंग की है। उन्होंने कहा कि इस सम्बंध में कई बार प्रशासन को ज्ञापन भी दिया जा चुका है लेकिन अब तक कोई स्थायी व्यवस्था नहीं हो पाई है। गर्मियों के पर्यटन सीजन में पर्यटकों की संख्या बढ़ने से अक्सर कई घंटे तक लम्बा जाम लग जाता है।
विधायक के कार्यों पर उन्होंने कहा कि मुनस्यारी में कई विकास कार्य हुए हैं लेकिन पार्किंग की समस्या का समाधान प्राथमिकता के आधार पर किया जाना चाहिए। हेली सेवा शुरू होने से पर्यटन को बढ़ावा मिला है, जिससे स्थानीय लोगों और वाहन चालकों को रोजगार के अवसर मिले हैं। साथ ही किसी आपातकालीन स्थिति में मरीजों को पिथौरागढ़ या हल्द्वानी तक शीघ्र पहुंचाने में भी हेली सेवा महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।
शिक्षा और स्वास्थ्य की कमी
सेरा गांव निवासी जीवन सिंह जेठा ने बताया कि मुनस्यारी सहित पूरे उत्तराखण्ड के पर्वतीय क्षेत्रों में शिक्षा और स्वास्थ्य सबसे बड़ी समस्याएं हैं। उनके अनुसार, बेहतर शिक्षा की सुविधा न होने के कारण कई परिवार पलायन कर चुके हैं। वहीं स्वास्थ्य सेवाओं की स्थिति भी चिंताजनक है। किसी गम्भीर मेडिकल इमरजेंसी की स्थिति में स्थानीय स्तर पर केवल प्राथमिक उपचार ही उपलब्ध हो पाता है। बेहतर इलाज के लिए मरीजों को पिथौरागढ़ या हल्द्वानी जाना पड़ता है जहां पहुंचने में 8-10 घंटे तक का समय लग जाता है।
खेला गांव की करिश्मा के अनुसार अधिकांश लोग खेती-बाड़ी के साथ-साथ ग्रीफ में कार्य करते हैं। ग्रीफ भारत सरकार के रक्षा मंत्रालय के अंतर्गत बाॅर्डर रोड्स ऑर्गनाइजेशन (बीआरओ) का एक प्रमुख कार्यकारी विंग है जो सीमावर्ती और दुर्गम क्षेत्रों में सड़क, पुल तथा अन्य बुनियादी ढांचे के निर्माण और रखरखाव का कार्य करता है। गांव के कई स्थानीय लोग इसी विभाग में रोजगार प्राप्त करते हैं।
उन्होंने बताया कि गांव में पेयजल की समस्या बनी रहती है लेकिन सबसे बड़ी परेशानी स्वास्थ्य सुविधाओं की है। इलाज के लिए अधिकांश लोगों को धारचूला जाना पड़ता है। किसी आपातकालीन स्थिति में एम्बुलेंस गांव तक नहीं पहुंच पाती, इसलिए मरीजों को निजी वाहन की व्यवस्था करनी पड़ती है। कई बार लोगों को तवाघाट तक पैदल जाना पड़ता है, जिसके बाद आगे का सफर वाहन से तय किया जाता है।
ग्राम सभा गरगूवा की मुन्नी देवी ने बताया कि उनका गांव एक दुर्गम क्षेत्र में स्थित है जहां आज भी बुनियादी सुविधाओं का अभाव है। उन्होंने कहा कि गांव में स्वास्थ्य सेवाएं लगभग न के बराबर हैं। यदि किसी की तबीयत अचानक खराब हो जाए तो एम्बुलेंस की सुविधा भी उपलब्ध नहीं है। गांव के पास एक छोटा स्वास्थ्य केंद्र तो है लेकिन वहां सीमित सुविधाएं ही मिलती हैं। शिक्षा व्यवस्था पर उन्होंने कहा कि गांव में विद्यालय तो है लेकिन पर्याप्त अध्यापक नहीं होने के कारण बच्चों की पढ़ाई प्रभावित होती है। इसी वजह से कई परिवार अपने बच्चों की शिक्षा के लिए उन्हें बाहर भेजने को मजबूर हैं। क्षेत्र के कुछ तोकों, विशेषकर छिल्कला तोक, में आज भी बिजली जैसी मूलभूत सुविधा पूरी तरह उपलब्ध नहीं है।
गांव में राजकीय पशु चिकित्सालय संचालित है जहां आवश्यक स्टाफ उपलब्ध है। इसके ठीक पीछे स्थित मानव स्वास्थ्य अस्पताल की स्थिति इसके विपरीत है। स्थानीय लोगों के अनुसार, अस्पताल में नियमित डॉक्टर तैनात नहीं हैं और न ही आवश्यक स्वास्थ्य सुविधाएं उपलब्ध हैं। अस्पताल सप्ताह में केवल एक दिन खुलता है जहां एक फार्मासिस्ट के भरोसे ही व्यवस्था संचालित होती है। बताया गया कि सम्बंधित कर्मचारी धारचूला से आते हैं। निरीक्षण के दौरान अस्पताल भवन तो अच्छी स्थिति में दिखाई दिया लेकिन परिसर का रखरखाव बेहद खराब मिला। अस्पताल के आस-पास घास उगी हुई थी, कई स्थानों पर सामान बिखरा पड़ा था और खिड़कियां भी खुली हुई थीं। इससे स्पष्ट होता है कि भवन होने के बावजूद स्वास्थ्य सेवाओं का समुचित संचालन नहीं हो पा रहा है।
हार्ड गांव की हंसी देवी के अनुसार उनके गांव की सबसे बड़ी समस्या सड़क और पैदल रास्ते की है। उन्होंने कहा कि बच्चों के स्कूल जाने वाले मार्ग पर अक्सर भूस्खलन (स्लाइडिंग) होता रहता है, जिससे रास्ता कभी भी क्षतिग्रस्त हो जाता है। इससे बच्चों और ग्रामीणों को आवागमन में काफी कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है। उन्होंने सरकार से मांग की कि सबसे पहले उनके गांव तक सुरक्षित और स्थायी रास्ते की व्यवस्था की जाए ताकि बच्चों की पढ़ाई और ग्रामीणों का आवागमन सुचारू रूप से हो सके।
रूपखेत गांव के राजेंद्र कुमार ने बताया कि गांव में सड़क की समस्या आज भी बनी हुई है। क्षेत्र में परिवहन का किराया भी काफी अधिक है, जिससे लोगों पर अतिरिक्त आर्थिक बोझ पड़ता है। गांव में मोबाइल नेटवर्क की समस्या भी लम्बे समय से बनी हुई है। हाल ही में नेटवर्क की व्यवस्था की गई है लेकिन उसकी सेवा नियमित नहीं रहती। कई बार नेटवर्क चलता है और कई बार पूरी तरह बंद हो जाता है, जिससे लोगों को संचार सम्बंधी परेशानियों का सामना करना पड़ता है।
स्वास्थ्य समस्याओं से जूझ रहा रूपखेत
रूपखेत गांव निवासी निशा देवी कातर कहती हैं कि उनके गांव की सबसे बड़ी समस्या आवागमन की है। यदि रात के समय किसी की तबीयत खराब हो जाए तो वाहन आसानी से उपलब्ध नहीं होते। एम्बुलेंस के गांव तक पहुंचने में भी काफी समय लग जाता है, जिससे मरीजों और उनके परिजनों को भारी परेशानियों का सामना करना पड़ता है। उनके अनुसार परिवार कल्याण उपकेंद्र, कोटमा गलाती, धारचूला, पिथौरागढ़ में पर्याप्त स्वास्थ्य सुविधाएं उपलब्ध नहीं हैं। उनका कहना है कि यहां नियमित स्वास्थ्य कर्मियों और आवश्यक चिकित्सा सुविधाओं की व्यवस्था होनी चाहिए ताकि लोगों को छोटी-छोटी बीमारियों के इलाज के लिए दूर न जाना पड़े। उन्होंने कहा कि गांव तक सड़क तो बनी है लेकिन कई स्थानों पर बड़े-बड़े गड्ढे होने के कारण आवागमन कठिन हो गया है। इसके अलावा वाहन किराया भी काफी अधिक है, जिससे लोगों पर आर्थिक बोझ बढ़ जाता है।
उन्होंने यह भी कहा कि परिवार कल्याण उपकेंद्र, कोटमा गलाती गांव से काफी दूर और ऊंचाई पर बनाया गया है। यदि इसे मुख्य सड़क के किनारे बनाया जाता तो लोगों को वहां तक पहुंचने में अधिक सुविधा होती। वर्तमान में इसकी स्थिति भी संतोषजनक नहीं है। रोजगार के विषय में उन्होंने बताया कि गांव में स्थानीय स्तर पर रोजगार के अवसर नहीं हैं। आजीविका के लिए लोग खेती पर निर्भर हैं। वहीं जंगलों में कुछ ग्रामीण कीड़ा जड़ी तथा अन्य पहाड़ी जड़ी-बूटियों का संग्रह कर अपनी आय का साधन जुटाते हैं।
चौंदास घाटी में रहने वाले मोहित जेठा आक्रोशित हैं क्योंकि पर्यटकों द्वारा फैलाई जा रही गंदगी से नाराज हैं। वे कहते हैं कि आदि कैलाश आने वाले श्रद्धालुओं और पर्यटकों को अपने साथ स्थानीय गाइड अवश्य रखना चाहिए। उनके अनुसार, स्थानीय गाइड क्षेत्र के धार्मिक, सांस्कृतिक और ऐतिहासिक महत्व की सही जानकारी देते हैं जबकि बाहर से आने वाले कई लोग पूरी जानकारी न होने के कारण गलत या अधूरी बातें बता देते हैं। खाने-पीने की वस्तुओं के रैपर, प्लास्टिक और अन्य कचरे को खुले में न फेकें बल्कि अपने साथ वापस ले जाएं या डस्टबिन में ही डालें। उनका कहना था कि यदि समय रहते इस पर ध्यान नहीं दिया गया तो आने वाले वर्षों में यहां भी प्रदूषण की समस्या बढ़ सकती है।
उन्होंने बताया कि आपदा के समय सड़कें कई दिनों तक बंद रहती हैं। ऐसे समय में लोगों को राशन और अन्य जरूरी सामान की भारी दिक्कत होती है। कई बार भारतीय सेना की मदद से आवश्यक सामग्री उपलब्ध कराई जाती है। पिछली आपदा के दौरान हेलीकॉप्टर के माध्यम से भी क्षेत्र में राशन पहुंचाया गया था।
यहां के लोग जंगलों से कीड़ा जड़ी और अन्य औषधीय जड़ी-बूटियों का संग्रह करते हैं। उन्होंने बताया कि कीड़ा जड़ी मुख्य रूप से गुंजी और नाभी क्षेत्र में मिलती है तथा इसका मूल्य काफी अधिक होता है। उनके अनुसार, इसका एक टुकड़ा लगभग 800 रुपए तक बिक जाता है और इसे नेपाल के काठमांडू तक भेजा जाता है।
शिक्षा के सम्बंध में मोहित कहते हैं कि भारी बर्फबारी के कारण स्थानीय परिवार वर्ष के लगभग छह महीने गुंजी और छह महीने धारचूला में रहते हैं। इसी कारण बच्चों की पढ़ाई भी मौसम के अनुसार दोनों स्थानों पर कराई जाती है। विधायक के कार्यों पर उन्होंने कहा कि क्षेत्र में कई विकास कार्य हुए हैं। उन्होंने अपनी व्यक्तिगत राय व्यक्त करते हुए कहा कि वर्ष 2027 के विधानसभा चुनाव में वे फिर से हरीश धामी को विधायक के रूप में देखना चाहते हैं।
सरकारी स्कूलों में नहीं है अध्यापक
दारमा घाटी के बाशिंदे इंद्र सिंह ग्वाल के अनुसार, यहां की सबसे बड़ी समस्याएं शिक्षा और स्वास्थ्य से जुड़ी हैं। उनका कहना है कि बच्चों के लिए ऑनलाइन और ऑफलाइन दोनों प्रकार की शिक्षा की समुचित व्यवस्था होनी चाहिए। काॅलेजों में विषयवार शिक्षकों की कमी के कारण विद्यार्थियों को उच्च शिक्षा के लिए पिथौरागढ़ और अन्य शहरों का रुख करना पड़ता है। वहीं सरकारी विद्यालयों में भी पर्याप्त अध्यापक नहीं हैं, जिससे बच्चों की पढ़ाई प्रभावित हो रही है।
उन्होंने बताया कि दारमा घाटी में लगभग 15-17 ग्राम सभाएं हैं। पहले डुकटूर में जूनियर हाई स्कूल संचालित होता था लेकिन अब घाटी के कई विद्यालय बंद हो चुके हैं। कई गांवों में न प्राथमिक विद्यालय हैं और न ही आंगनबाड़ी केंद्र। उनका कहना है कि दारमा घाटी की शिक्षा व्यवस्था बेहद कमजोर है। यहां के लोग वर्ष में लगभग छह महीने दारमा घाटी और छह महीने धारचूला में रहते हैं। यदि परिवार बच्चों को अपने साथ घाटी ले जाए तो वहां पढ़ाई की कोई समुचित व्यवस्था नहीं मिलती। जौलजीबी से लेकर धारचूला तक के मौसमी प्रवास करने वाले परिवार भी इसी समस्या का सामना करते हैं।
स्वास्थ्य सुविधाओं के सम्बंध में उन्होंने कहा कि दारमा घाटी में किसी को चोट लग जाए या अचानक तबीयत खराब हो जाए तो स्थानीय स्तर पर केवल आईटीबीपी की ओर से प्राथमिक उपचार मिल पाता है। इसके बाद मरीजों को धारचूला भेज दिया जाता है। नेटवर्क की समस्या और एंबुलेंस की सुविधा न होने के कारण मरीजों को समय पर अस्पताल पहुंचाना मुश्किल हो जाता है। विधायक के कार्यों के सम्बंध में उन्होंने कहा कि क्षेत्र में सोलर लाइटें लगाने, सुरक्षा दीवारों के निर्माण सहित कुछ विकास कार्य हुए हैं। हालांकि उनका मानना है कि शिक्षा, स्वास्थ्य, सड़क और संचार जैसी मूलभूत सुविधाओं के क्षेत्र में अभी भी काफी काम किया जाना बाकी है।
धारचूला विधानसभा 2026 – विधायक रिपोर्ट कार्ड
विधायक : हरीश धामी (अवधि : 4 वर्ष)
क्र. क्षेत्र मुद्दा / जमीनी स्थिति अंक (10 में)
जनसम्पर्क व क्षेत्रीय सक्रियता जनता के बीच मजबूत पकड़, उपलब्ध और मिलनसार छवि, लगातार तीसरी जीत इसका प्रमाण 9/10
स्वास्थ्य सेवाएं धारचूला व मुनस्यारी अस्पतालों में विशेषज्ञ डॉक्टर, अल्ट्रासाउंड व आधुनिक सुविधाओं का अभाव, रेफरल पर निर्भरता 4/10
सड़क व कनेक्टिविटी कई गांवों तक सड़क पहुंची लेकिन अनेक दुर्गम क्षेत्रों में आज भी डोली और पैदल ही सहारा 5/10
शिक्षा सरकारी स्कूलों की पढ़ाई बेहतर लेकिन शिक्षकों की कमी, उच्च शिक्षा के सीमित अवसर और पलायन 6/10
रोजगार व पर्यटन पर्यटन, होमस्टे, हेली सेवा और जड़ी-बूटी से कुछ अवसर बढ़े, पर स्थायी रोजगार सीमित 6/10
आपदा प्रबंधन व सीमांत विकास सुरक्षा दीवार, सोलर लाइट और कुछ कार्य हुए लेकिन भूस्खलन व आपदा से राहत अभी अपर्याप्त 6/10
पेयजल व सिंचाई कई गांवों में पानी की समस्या, पाइप लाइन और पेयजल योजनाएं अपर्याप्त 5/10
पर्यटन व आधारभूत सुविधाएं आदि कैलाश और मुनस्यारी पर्यटन को बढ़ावा मिला लेकिन पार्किंग, स्वच्छता और सुविधाएं कम 7/10
संचार व दूरस्थ सेवाएं कई गांवों में मोबाइल नेटवर्क और एम्बुलेंस जैसी मूलभूत सेवाएं कमजोर 4/10
समग्र विकास सीमित संसाधनों के बावजूद कुछ विकास कार्य हुए लेकिन स्वास्थ्य, शिक्षा और सड़क जैसी मूलभूत चुनौतियां बरकरार 6.5/10
कुल अंक : 6.7/10 फाइनल ग्रेड : पास
‘द्वेषपूर्ण भावना से काम कर रही है सरकार’
उत्तराखण्ड की सीमांत धारचूला विधानसभा सीट का प्रतिनिधित्व करने वाले हरीश धामी राज्य की कांग्रेस राजनीति के प्रमुख नेताओं में गिने जाते हैं। उनकी राजनीति का केंद्र हमेशा सीमांत क्षेत्रों का विकास रहा है। वे सीमा से लगे गांवों में सड़क, मोबाइल नेटवर्क, स्वास्थ्य सुविधाएं, शिक्षा, पर्यटन और स्थानीय युवाओं के रोजगार के मुद्दों को लगातार उठाते रहे हैं। साथ ही वे आपदा प्रभावित परिवारों के पुनर्वास, काली नदी से होने वाले कटाव और सीमांत क्षेत्रों में जनसंख्या पलायन को रोकने के लिए विशेष नीति की मांग करते रहे हैं। धारचूला मुनस्यारी की समस्याओं को लेकर ‘दि संडे पोस्ट’ की संवाददाता कंचन आर्या ने उनसे बातचीत की
आपने विधायक के रूप में 14 वर्ष का कार्यकाल पूरा कर लिया है। इस दौरान किए गए विकास कार्यों, विभिन्न योजनाओं और अपनी उपलब्धियों का आप किस तरह आत्म मूल्यांकन करते हैं?
सबसे महत्वपूर्ण है धारचूला के 111 गांव जिसमें डीडीहाट का भी आधा क्षेत्र है, को सेंचुरी से बाहर करना है। उसके बाद धारचूला के लोगों की दशकों पुरानी मांग थी कि एससी-एसटी के अलावा जो अन्य लोग वहां पर हैं उनको पिछड़ी जाति का दर्जा दिलवाना। एससी-एसटी को छोड़कर बाकी जितनी भी जातियां वहां निवास कर रही हैं, उन सबको हमने पिछड़ी जाति में आरक्षण देकर उनको लाभान्वित करने का काम किया। सौ ऐसी सड़कंे हैं जिन पर हमने काम करने का काम किया। 16 इंटर काॅलेज, 4 जूनियर स्कूल बनवाए, 2 पाॅलिटेक्निक काॅलेज बनाए जिनमें 1 बरम में, 1 बांसबगड़ में तथा 2 तहसील, 1 बंगा पानी और 1 तेज तहसील बनवाई, मुनस्यारी में महान सर्वेयर पंडित नैन सिंह के नाम पर 1 माउंटेनिंग कोर्स संचालित काॅलेज शुरू कराया। क्षेत्र की समस्याओं के लिए विधानसभा में लड़ता हूं और वहां के लोगों की जो आवश्यकता है, उन बातों को मैं सदन में रखता हूं और हम सरकार को मजबूर करते हैं कि वहां के विकास कार्य हो।
2014 में आपने अपनी जीती हुई विधानसभा सीट छोड़कर एक बड़ा त्याग किया। उस समय आपकी सोच थी कि अगर मुख्यमंत्री आपके क्षेत्र से होंगे तो धारचूला-मुनस्यारी के विकास को नई गति मिलेगी। आज इतने वर्षों बाद जब आप पीछे मुड़कर देखते हैं तो क्या आपको लगता है कि आपकी उस उम्मीद के मुताबिक क्षेत्र का विकास हो पाया?
2014 से लेकर 17 तक मैं कह सकता हूं जिन भावनाओं को लेकर वहां की जनता की जो जरूरत थी, उसके मद्देनजर जो मैंने त्याग किया उसमें हम खरे उतरे हैं लेकिन आज दुख होता है 17 से लेकर 26 जाने को है ये भाजपा जो अपने आप को डबल इंजन की सरकार कह रही है, कुछ नहीं कर पा रही है। दुख इस बात का होता है कि भाजपा अगर इस धारचूला विधानसभा को विकास के कार्य देती तो मैं भी मानता कि वास्तव में भाजपा जन सरोकार की सरकार है।
आज भी कई गांवों में सड़क, मोबाइल नेटवर्क और स्वास्थ्य सुविधाएं नहीं हैं। सबसे बड़ी बाधा क्या है, सरकार, प्रशासन या बजट?
मेरी कोशिश चलते आज मेरे क्षेत्र में पीएमजीएसवाई की 97 सड़कें हैं। पूरे प्रदेश में सबसे बड़ा रिकाॅर्ड सड़कों का है। जो गांव छूटे हैं उन गांवों को भी हम सड़क से जोड़ेंगे। मैं पहला ऐसा विधायक हूं जो 2016 में 5 दिन तक दिल्ली के जंतर-मंतर में मोबाइल नेटवर्क को लेकर आमरण- अनशन पर बैठा था। जहां पर भी मुझे मौका मिलता है सड़क से लेकर सदन तक में इन मामलों को आज भी उठाता हूं। पूरे देश में एक मात्र विधायक मैं ही हूं जिसने 26 लाख रुपए की विधायक निधि की धनराशि देकर बीएसएनएल के टावर में सिविल वर्क के लिए इतनी धनराशि पहली बार किसी विधायक ने जारी की होगी। मेरी उस नीति को अपनाते हुए त्रिवेंद्र सिंह की सरकार ने कैबिनेट का डिसीजन पास किया कि पहाड़ों में दुर्गम क्षेत्र में अगर कोई भी प्राइवेट कम्पनी टाॅवर लगाना चाहती है तो सरकार 40 लाख तक की सब्सिडी देगी लेकिन आज भी केवल मेरी विधानसभा ही नहीं है बल्कि उत्तराखण्ड के पर्वतीय क्षेत्रों में 50 प्रतिशत क्षेत्र ऐसे हैं जो आज भी मोबाइल नेटवर्किंग से वंचित हैं। इसके लिए मैं सारा दोष केंद्र सरकार और प्रदेश की सरकार को देता हूं।
लोगों से बात करने पर एक शिकायत बार-बार सामने आती है कि अस्पतालों में इलाज के साथ-साथ डॉक्टरों का व्यवहार भी कई बार मरीजों के प्रति अच्छा नहीं होता। क्या यह बात आपके संज्ञान में है?
देखिए, सोशल मीडिया में आपने देखा होगा कि रात्रि में एक तीमारदार ने मुझे फोन किया और वो जो महिला अधिकारी थी उसने बिना ये पूछे की किस से बात कर रहे हैं, जिस तरह से बर्ताव किया उसके खिलाफ मैंने स्वास्थ्य मंत्री और मुख्यमंत्री को पत्र लिखा था ये कारवाई हो और वास्तव में पर्वतीय क्षेत्र में यह एक चिंता का विषय है। 2022 से पहले जितने भी मंत्री थे, उनको मैंने अपनी तरफ से सुझाव दिया था कि पर्वतीय क्षेत्र में आप ऑपरेशन थिएटर आदि सब बनाइए जो हमारे टेक्नीशियन हैं उनकी नियुक्ति करिए एक फिजिशियन डॉक्टर जरूर रखें। बाकी कभी देहरादून, कभी हरिद्वार, कभी ऊधमसिंह नगर, कभी हल्द्वानी के सर्जनों की महीने में साप्ताहिक ड्यूटी यहां पर लगाई जानी चाहिए। जिला मुख्यालय में जो हमारे बेस्ट हॉस्पिटल हैं या डिस्ट्रिक्ट हॉस्पिटल है वो भी आज हमारे रेफर सेंटर बन गए हैं। यहां तक की सुशीला तिवारी अस्पताल जो कुमाऊं के लिए एक लाइफ लाइन माना जाता है वो भी रेफर सेंटर बन गया है क्योंकि वहां पर संसाधन नहीं है। मरीजों को या तो बरेली राममूर्ति भेजा जाता है या फिर दिल्ली भेजा जाता है।
2014 की धारचूला-बलुवाकोट आपदा के बाद क्षेत्र में आपदा से बचाव के लिए क्या-क्या स्थायी काम हुए हैं? क्या आपको लगता है कि भविष्य में ऐसे हादसों से बेहतर तरीके से निपटने के लिए अभी भी कुछ बड़े काम किए जाने बाकी हैं?
देखिए अभी तटबंध का निर्माण हो रहा है लेकिन अभी भी कई जगह ऐसे हैं जहां पर तटबंध बनना है। ऐसी जगह बलवाकोट है। गोरीछाल में बरम, चामी, लुमती, मोरी का एरिया है, उसी तरह बांसबगड़ है, छोरीबगड़ है। खुद मेरे घर से 200 मीटर दूरी में नदी बह रही है उसका स्टीमेट भी बनाकर भेज दिया गया लेकिन वह काम केवल इसलिए रोका गया है कि वहां का विधायक हरीश धामी है और उनका घर आपदा की चपेट में है। अगर किसी भाजपा के नेता का घर चपेट आ रहा होता तो आज तक तटबंध बन गया होता। उत्तराखण्ड की सरकार, द्वेष भाव की भावना से काम कर रही है, जन सरोकार के हिसाब से काम नहीं कर रही है। 2013 में हमने तमाम जगह तटबंध बनाने का काम किया, लोगों का विकास करने का काम किया। 2027 में फिर परिवर्तन करेंगे, हमारी सरकार बनेगी।
आपदा के बाद सिंचाई विभाग ने जो सुरक्षा कार्य किए थे, क्या वे आज भी असरदार हैं?
वर्तमान में जो काम चल रहे हैं, अब इस बरसात में पता चलेगा कि उसकी गुणवत्ता कितनी अच्छी है। भाजपा सरकार द्वारा 2017 के बाद दो -ढाई सौ करोड़ रुपए के तटबंद के काम कराए जा रहे हैं। उसमें 50 प्रतिशत भ्रष्टाचार की भेट चढ़ा दिया गया है। अभी इसमंे नया बजट भी स्वीकृत नहीं हुआ था। दोबारा काम स्टार्ट हो रहा है। इसमें 110 करोड़ रुपए का बजट है लेकिन वो एक ही जगह का नहीं है बल्कि जौलजीबी से लेकर धारचूला तक का समस्त इलाका उसमें शामिल है। उत्तराखण्ड के लोगों को उस सरकारी योजना से वंचित करने के लिए भाजपा सरकार ने जौलजीबी से लेकर धारचूला तक एक ही काम शुरू कर दिया। ये भ्रष्टाचार की भाजपा की नीति है।
2013 में जब आपदा आई तो आपने देखा होगा घट्टा बगड़ एक जगह है जहां पहले कभी पुराने मकान होते थे, हमने उस गांव के लोगों का पुनर्वास कराया। हमने उन्हें सुरक्षित जगह बसाया। उन्हें हमने 7-7 लाख रुपए का मुआवजा देने का काम किया लेकिन 2018 की आपदा में मोरी, बरम के साथ ही कई गांव प्रभवित हुए। वहां के लोगों का आज भी पुनर्वास नहीं हो पाया है। वो एक आशा की किरण देख रहे हैं कि कब सत्ता परिवर्तन हो, कब हमारा पुनर्वास हो। 2027 में जैसे हमारी सरकार बनेगी सबसे पहले कैबिनेट से मैं वही डिसिजन कराऊंगा कि जितने भी लोग घर से बेघर हो गए हैं सबसे पहले हम उनको घर देने का काम करेंगे यह मेरी प्राथमिकता है। उत्तराखण्ड की विधानसभा का कोई सत्र ऐसा नहीं है जिसमें मैंने कार्य स्थगन के माध्यम से आपदा प्रभावितों की तथा आपदा प्रभावित से होने वाले निर्माण कार्यों के लिए आवाज नहीं उठाई हो लेकिन ये सरकार अंधी-बहरी सरकार है, ये हाउस में कह देती है हम करेंगे लेकिन होता ढाक के तीन पात है। आज तक कभी उन लोगों को राहत नहीं मिली।
अंत में, आप धारचूला-मुनस्यारी की जनता को क्या संदेश देना चाहेंगे?
तीसरी बार का विधायक हूं, चौथी बार पार्टी मुझ पर विश्वास करेगी तो मैं कह सकता हूं कि मैं सबकी जमानत जब्त करके फिर विधानसभा जाऊंगा। जनता उसी को स्नेह, प्यार देती है, उसी को चुनती है जो उसके दुख के समय में काम आए। सुख में तो हर कोई जाता है। मुझ तक आवाज पहुंचनी चाहिए, मैं सरकार से पहले वहां पर पहुंचने का काम करता हूं। 2018 की आपदा में 11 लोगों की मौत हो गई थी। प्रशासन का एनडीआरएफ और प्रशासन मेरे आने के 6 घंटे बाद वहां पहुंचा था। मैं रस्सियों के बल पर तार पर चढ़कर 144 किलो का वेट लेकर उस गांव में पहुंचा। मैंने 4 दिन-रात वहां बिताई लेकिन दुख होता है कि आज भी तांगा गांव के लोगांे को पुनर्वास नहीं मिल पाया।