सोवियत संघ के विघटन बाद 24 अगस्त 1991 को यूक्रेन एक स्वतंत्र राष्ट्र के रूप में अस्तित्व में आया था। किसी भी भारतीय प्रधानमंत्री ने बीते 33 वर्षों के दौरान यूक्रेन की यात्रा नहीं की। मोदी पहले भारतीय प्रधानमंत्री हैं जो यूक्रेन की यात्रा पर गए और वह भी ऐसे समय में जब वहां युद्ध चल रहा है। यूक्रेन भारत के सबसे पुराने और सबसे विश्वसनीय मित्र देश रूस के साथ युद्धरत है। इस दृष्टि से यह यात्रा खासी महत्वपूर्ण हो जाती है। विशेषकर ऐसे समय में जब रूस को पश्चिमी देशों ने आर्थिक प्रतिबंधों से जकड़ रखा है और अमेरिका हर कीमत पर रूस को अंतरराष्ट्रीय मंचों पर हाशिए में डालने की पुरजोर कोशिश कर रहा है, भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का पहले रूस की यात्रा करना और इस यात्रा के कुछ समय बाद ही यूक्रेन जा पहुंचना दो बातों को स्पष्ट तौर पर रेखांकित करता है। पहली बात भारत-रूस के सम्बंधों की प्रगाढ़ता को सामने लाती है तो दूसरी बात भारतीय विदेश नीति की स्वतंत्रता से जुड़ी है। ऐसे दौर में जब वैश्वीकरण का दबाव और एक-दूसरे पर आर्थिक निर्भरता किसी भी विकासशील राष्ट्र को अमेरिकी दबाव के आगे नतमस्तक होने को मजबूर कर देती है, भारत नेहरूकाल से ही निर्गुटता की अपनी नीति का अनुसरण करता आया है और वर्तमान समय में भी ऐसा ही करता नजर आ रहा है। बहुत सारे विदेशी मामलों के जानकार, विशेषज्ञ और मोदी की नीतियों के आलोचक उनकी इस यात्रा और इससे पहले रूस की यात्रा से सहमत नहीं हैं। बहुतों का मानना है कि वर्तमान समय में भारतीय विदेश नीति अमेरिका परस्त हो चली है। इजरायल के संदर्भ में भारतीय विदेश नीति में आए बदलाव को सामने रख अमेरिका परस्ती के आरोपों को सही साबित करने का काम किया जा रहा है। मैं लेकिन समझता हूं कि भारत रूस-यूक्रेन संग संतुलन साधने की सही कवायद कर रहा है क्योंकि भारतीय हितों की रक्षा करनी हमारी सबसे बड़ी जरूरत है।
कीव पहुंचे मोदी ने राष्ट्रपति जेलेंस्की को जिस प्रकार गले लगाया उससे स्पष्ट है कि भारत यूक्रेन में रूसी आक्रमण चलते मची तबाही से चिंतित और दुखी है, उसकी संवेदनाएं और सहानुभूति यूक्रेन के साथ है। जेलेंस्की संग अपनी बातचीत में प्रधानमंत्री ने हालांकि सीधे मध्यस्थता की बात नहीं कही लेकिन जरूरत पड़ने पर हर प्रकार की मदद का वायदा दोहराया है। मोदी ने जेलेंस्की से कहा कि ‘हमने इस युद्ध से दूरी जरूर बनाई है लेकिन हम तटस्थ नहीं हैं। हम शांति से पक्षधर हैं। हम बुद्ध और गांधी की धरती से आते हैं जो हमेशा ही शांति का संदेश देती है। मैंने राष्ट्रपति पुतिन को उनके मुंह पर कहा है कि यह युग युद्ध का युग नहीं है और समस्याओं का समाधान युद्धभूमि में नहीं मिल सकता है।’ मोदी ने यह भी कहा कि ‘भारत शांति प्रयासों में सक्रिय भूमिका निभाने के लिए तैयार है। यदि मैं व्यक्तिगत तौर पर कुछ कर सकता हूं तो एक मित्र बतौर मैं आपको भरोसा देता हूं कि मैं ऐसा जरूर करूंगा।’ प्रधानमंत्री का उपरोक्त कथन भारत की इस युद्ध में एक विश्वसनीय मध्यस्थता बनने की राह खोलता है। अंतरराष्ट्रीय कूटनीति के जानकारों का भी मानना है कि वर्तमान समय में केवल भारत ही ऐसा देश है जो राष्ट्रपति पुतिन और राष्ट्रपति जेलेंस्की को एक साथ बैठा शांति वार्ता करा सकता है। स्मरण रहे रूस-यूक्रेन युद्ध को रूकवाने के लिए अभी तक जितने भी प्रयास हुए हैं, रूस ने उनमें सहभागिता नहीं की है। जून 2024 में स्वीटजरलैंड में आयोजित विश्व शांति सम्मेलन का रूस ने बहिष्कार किया। इससे पहले चीन ने कई बार शांति दूत बन इस युद्ध को रोकने के लिए विभिन्न देशों संग बातचीत की और प्रस्ताव तैयार किए लेकिन बात बनी नहीं। ऐेसे में अब केवल भारत ही ऐसा देश है जो दोनांेे युद्धरत राष्ट्रों के मध्य शांति दूत की भूमिका निभा सकता है।
प्रधानमंत्री मोदी जुलाई में जब मास्को गए और वहां राष्ट्रपति पुतिन संग गले मिलते उनकी तस्वीर सामने आई तब पश्चिमी देश बेहद असहज हो गए। मोदी की पश्चिमी मीडिया ने तब पुतिन संग गले लगने वाली तस्वीर और ठीक उसी दिन रूसी सेना द्वारा कीव के एक अस्पताल में हमले में मारे गए बच्चों की तस्वीरों को एक साथ दिखा खासी आलोचना भी की थी। मेरा मानना है कि यूक्रेन पर रूस का हमला और वहां के रिहायशी इलाकों में लगातार बमबारी इत्यादि राष्ट्रपति पुतिन को निश्चित तौर पर युद्ध अपराधी प्रमाणित करती है। उनके ऐसे कृत्यों को किसी भी दृष्टि से जायज नहीं ठहराया जा सकता है लेकिन इसके साथ ही हमें यह भी याद रखना होगा कि जब कभी भी हमारे पर संकट आया तो रूस एकमात्र ऐसा राष्ट्र था जिसने हमारी मदद की। हमें यह भी याद रखना होगा कि वर्तमान समय में रूस संग हमारे गहरे आर्थिक हित भी जुड़े हुए हैं और दोनों देशों के मध्य 2023 में 37 बिलियन अमेरिकी डॉलर का कारोबार हुआ है। पुराने रिश्तों और वर्तमान स्थिति, दोनों ही यही इशारा करते हैं कि भारत को रूस संग सम्बंधों में गर्माहट बनाए रखनी होगी ताकि भारतीय हितों की रक्षा की जा सके। यही मोदी कर भी रहे हैं।
अंतरराष्ट्रीय आर्थिक प्रतिबम्धों से घिरे रूस से भारत ने तमाम दबाव बाद भी सस्ते कच्चे तेल की खरीद जारी रखी है। इतना ही नहीं रूस द्वारा यूक्रेन पर हमला करने के बाद संयुक्त राष्ट्र संघ में जितने भी रूस विरोधी प्रस्ताव लाए गए हैं, ऐसे सभी प्रस्तावों में वोटिंग के दौरान भारत ने अनुपस्थित रहकर एक तरह से रूस का समर्थन ही किया है। यूक्रेन भारत के इस रुख से खासी नाइत्तेफाकी रखता आया है। गत् माह जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी मास्को यात्रा पर थे और जब ठीक उसी दिन रूसी हवाई सेना ने कीव के एक अस्पताल में बमबारी कर कई मरीजों की जान ले ली थी तब यूक्रेनी राष्ट्रपति जेलंेस्की ने प्रधानमंत्री मोदी पर निशाना साधते हुए सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर लिखा था कि ‘मैं बहुत निराश हूं। विश्व के सबसे बड़े लोकतंत्र के नेता को एक ऐसे दिन पर मास्को में दुनिया के सबसे खूनी अपराधी को गले लगाते देखना शांति प्रयासों के लिए बड़ा झटका है।’
जाहिर है मोदी भी समझते हैं कि रूसी राष्ट्रपति संग गले मिलते उनकी तस्वीर ने पश्चिमी ताकतों को नाराज करने का काम किया है। ऐसी वैश्विक ताकतों को साधने की कवायद बतौर ही प्रधानमंत्री ने यूक्रेन का दौरा किया है। इस दौरे के एक नहीं कई निहितार्थ हैं। इसमें कोई शक नहीं कि रूस भारत का विश्वसनीय सहयोगी दशकों से बना हुआ है लेकिन यह भी सत्य है कि रूस ने पाकिस्तान को भी अत्याधुनिक हथियार देने में कोई हिचकिचाहट नहीं दिखाई है। रूस ने पाक को एमआई-26 ट्रांसपोर्ट हेलिकॉप्टर, मिसाइल, एयर डिफेंस सिस्टम, एंटी एयरक्राफ्ट प्रणाली आदी बेचे हैं। हमारे सबसे घातक पड़ोसी चीन संग रूस की निकटता दिनोंदिन बढ़ रही है जो हमारे लिए चिंता का गम्भीर विषय है। दूसरी तरफ यूक्रेन भी समय-समय पर भारत विरोधी बयान देता आया है। भारत की कश्मीर नीति का वह कटु आलोचक रहा है। नब्बे के दशक में उसने पाकिस्तान को अत्याधुनिक 320 टी 80 टैंक बेचे थे। लेकिन यह भी सच है कि भारत भी समय-समय पर यूक्रेन से हथियार खरीदता रहा है। यूक्रेन प्राकृतिक गैस भी भारत को निर्यात करता है। लगभग डेढ़ वर्ष पूर्व भारत ने यूक्रेन संग सौ मिलियन अमेरिकी डॉलर का एक करार भी किया है जिसके अंतर्गत गैस आधारित ऊर्जा संयंत्रों का निर्माण यूक्रेनी कम्पनी भारत में कर रही है। यह सब जानकारी सिर्फ यह समझने और समझाने के लिए है कि वर्तमान समय में किन्हीं भी दो राष्ट्रों के मध्य मित्रता अथवा शत्रुता केवल वैचारिक तल में नहीं होती, बल्कि व्यापारिक कारण इसके मूल मंे होते हैं। भारत के लिए सबसे जरूरी है अपने हितों की रक्षा करना और प्रधानमंत्री मोदी रूस एवं यूक्रेन के साथ संतुलन साधने की कवायद इस उद्देश्य चलते सफलतापूर्वक करते नजर आ रहे हैं।
यहां यह भी समझना जरूरी है कि तेजी से बदलते परिदृश्य में भारत अब अपनी सैन्य शक्ति के लिए रूस के भरोसे नहीं रह सकता है। चीन के लगातार बढ़ रहे आक्रामक रुख ने भारत में नई चिंताओं को जन्म दे दिया है। रूस और चीन के मध्य बढ़ रही मित्रता भारतीय हितों के लिए सुखद नहीं है। चीन वर्तमान अंतरराष्ट्रीय हालातों में रूस के लिए सबसे बड़ा रणनीतिक सहारा है। भारत कभी भी खुलकर पश्चिमी देशों के खिलाफ रूस का समर्थन नहीं करेगा। रूस इस तथ्य को भलीभांति समझता है। यही कारण है कि राष्ट्रपति पुतिन भारत की चिंताओं को दरकिनार कर चीन के साथ सम्बंधों को प्रगाढ़ करने में जुटे हैं। प्रधानमंत्री की यूक्रेन यात्रा रूस को एक प्रकार से यह संदेश देने का भी काम करती है कि भारत के हितों को दरकिनार कर चीन संग प्रगाढ़ होते रूस के सम्बंधों का जवाब देने में भारत सक्षम है। इतना ही नहीं पश्चिमी देशों को भी मोदी की यह यात्रा कुछ ऐसा ही संकेत देने का काम करती है। मोदी की मास्को यात्रा ने पश्चिम बंगाल को बेहद असहज कर दिया था। वर्तमान समय में भारत न तो पश्चिम को नाराज कर सकता है और न ही उनके अनुसार अपनी विदेश नीति को बदल सकता है। मोदी पूरी दबंगई से मास्को गए, पुतिन के गले मिले और रूस को यकीं दिलाया कि भारत संग उसके संबंध यथावत हैं और रहेंगे। इसके ठीक बाद वह कीव जा पहुंचे हैं जहां उन्होंने शांति दूत बन जेलेंस्की की नाराजगी को भी कुछ हद तक कम करने का काम किया है। स्वयं जेलेंस्की ने मोदी की मध्यस्थता में रूस संग बातचीत की बात कह डाली है। कुल मिलाकर मोदी सरकार रूस और यूक्रेन को लेकर जिस प्रकार संतुलन साधते हुए कदम बढ़ा रही है, मैं समझता हूं भारतीय हितों के दृष्टिगत् इस समय इसी प्रकार की नीति की दरकार है।

