Uttarakhand

भाजपा की होगी कड़ी परीक्षा

 

केदारनाथ विधानसभा उपचुनाव

बदरीनाथ और मंगलौर उपचुनाव हारने के बाद भाजपा के लिए केदारनाथ विधानसभा उपचुनाव कठिन परीक्षा बनकर सामने आ रहा है। दो उपचुनाव जीतने के बाद अति उत्साहित कांग्रेस को दिल्ली में केदारनाथ मंदिर निर्माण का मुद्दा ‘तीतर के मुंह बटेर’ माफिक हाथ लग चुका है। कांग्रेस ने ‘केदारनाथ प्रतिष्ठा रक्षा यात्रा’ शुरू कर भाजपा के लिए परेशानी पैदा कर दी है। हालांकि भाजपा भी केदारनाथ पर फतह हासिल करने के लिए अभी से रणनीति बनाने में जुट गई है। पार्टी इसके प्रति गंभीर है। पिछले दिनों हुई राज्य भाजपा कार्यसमिति की बैठक के दौरान इस पर चिंतन हुआ और यह मुख्य मुद्दा बना। फिलहाल भाजपा और कांग्रेस में केदारनाथ की सियासी यात्रा शुरू हो चुकी है। देखना यह होगा कि मंजिल पर पहले कौन पहंुचेगा?

‘पुष्कर सिंह धामी 15 साल तक मुख्यमंत्री रहें, ऐसी मेरी कामना है। प्रदेश में कार्यकर्ताओं को पूरा सम्मान नहीं मिल रहा है। मैंने पहले भी कहा था कि प्रत्याशी का चयन ठीक नहीं। अब केदारनाथ में प्रत्याशी चयन में हमें और समझदारी दिखानी होगी। सबसे राय मशविरा लेकर बातचीत करते हुए, थोपने का काम मत करना। सभी मिलकर काम करें। पार्टी की जीत के लिए एकजुटता दिखाएं। अब तो जनता आगे बढ़ गई, हम पीछे हो गए भईया। जो यहां बैठे हैं, कोई बड़ा आदमी नहीं है। आज तू है तो कल मैं हूं। सबसे पीछे वाला आगे आ जाए और आगे वाला पीछे चला जाए। कहीं भी बैठो, जमीन मत छोड़ो।’

तीरथ रावत, पूर्व मुख्यमंत्री

‘ये पहाड़ का इलाका है। छोटे-मोटे भूकंप के झटके तो आते रहते हैं। लेकिन हिमालय नहीं हिलता। अगला कार्यक्रम केदारनाथ चुनाव जीतने के बाद होगा। कठिन चुनाव है। आसान न समझना है। इससे देश की आस्था जुड़ी है।’

विजय बहुगुणा, पूर्व मुख्यमंत्री

‘यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि हम बदरीनाथ में हार गए, जबकि हार का अंतर बहुत कम था। शहरी स्थानीय निकाय और पंचायत चुनावों के अलावा, अब हमारे सामने केदारनाथ उपचुनाव है। हमें कड़ी मेहनत करनी होगी और हर कीमत पर जीत सुनिश्चित करनी होगी। हमें जनता के बीच अपना प्रभाव प्रदर्शित करने की आवश्यकता है, जिससे जनता का विश्वास जीतने के लिए भाजपा की अद्वितीय प्रतिबद्धता को उजागर किया जा सके। हम अराजक, भ्रष्ट और सनातन विरोधी दलों को उनके मंसूबों में सफल नहीं होने देंगे।’

महेंद्र भट्ट, प्रदेश भाजपा अध्यक्ष

‘पार्टी उपचुनाव में हार पर गौर करेगी, लेकिन यह ध्यान रखना चाहिए कि मंगलौर विधानसभा उपचुनाव में हमारी हार मात्र 422 वोटों से हुई थी। इसके विपरीत, मृतक बसपा विधायक सरवत करीम अंसारी ने 2022 के राज्य चुनावों में काफी अधिक अंतर से जीत हासिल की। राज्य पार्टी अध्यक्ष पहले ही घोषणा कर चुके हैं कि हम केदारनाथ सीट बरकरार रखेंगे। राज्य नेतृत्व और केदारनाथ में भाजपा कार्यकर्ता यह सुनिश्चित करने के लिए प्रतिबद्ध हैं कि कांग्रेस इस सीट को न छीन पाए।’

मनवीर सिंह चौहान, भाजपा के वरिष्ठ प्रदेश प्रवक्ता

‘भगवान राम की भूमि अयोध्या को खोने के लिए पार्टी की बड़े स्तर पर आलोचना की गई, जो चुनाव अभियान का मुख्य केंद्र था। पार्टी बदरीनाथ मंदिर को भी गंवा चुकी है, जो हिंदुत्व का प्रतिनिधित्व करता है। इस विवाद के बीच ही अब केदारनाथ को खोने का खतरा नहीं उठाया जा सकता क्योंकि यह मंदिर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के पसंदीदा मंदिरों में से एक है जो साल 2013 की बाढ़ त्रासदी के बाद इसके कायाकल्प के लिए सारी कोशिशें करते रहे हैं। पहले अयोध्या और फिर बदरीनाथ, दोनों हार पार्टी के लिए अपमानजनक थीं क्योंकि हम एक हिंदू समर्थक संगठन हैं। केदारनाथ में जीत से हमारा गौरव बहाल हो सकता है।’

बीजेपी के एक सीनियर लीडर

उत्तराखण्ड के पूर्व मुख्यमंत्रियों से लेकर भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष और पार्टी प्रवक्ता के साथ ही वरिष्ठ नेताओं के उक्त बयानों से समझा जा सकता है कि बदरीनाथ और मंगलौर विधानसभा उपचुनाव हारने के बाद पार्टी में कितनी उथल- पुथल है। बीते दिनों केदारनाथ की विधायक शैला रानी के निधन से खाली हुई सीट पर उपचुनाव होगा। संभावित अक्टूबर- नवंबर में होने वाले केदारनाथ विधानसभा उपचुनाव को लेकर पार्टी के नेता फूंक-फंूक कर कदम रख रहे हैं तो वहीं दूसरी तरफ हिंदुओं की आस्था के सबसे बड़े केंद्र अयोध्या और बदरीनाथ जैसे तीर्थ को सबसे बड़ी पार्टी भाजपा से हथियाने वाली इंडिया गठबंधन की अहम कड़ी कांग्रेस पूरे जोश में है। कांग्रेस की नजर अब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के सबसे बड़े श्रद्धा के केंद्र केदारनाथ धाम की विधानसभा पर टिक गई है। इसको जीतकर रही- सही कसर भी कांग्रेस निकाल लेना चाहती है। फिलहाल कांग्रेस को दिल्ली के बुराड़ी में केदारनाथ मंदिर विवाद और तथाकथित सोना घोटाला जैसे मुद्दों में मोटा वोट बैंक भी साफ नजर आ रहा है। ऐसे में केदारनाथ मंदिर के प्रतीकात्मक मंदिर बनने के मुद्दे को लेकर कांग्रेस केदारनाथ उपचुनाव तक सियासत गरमाए रखने की रणनीति पर काम कर रही है। कांग्रेस की हरिद्वार के हर की पैड़ी से स्नान के साथ ही केदारनाथ में पूजा अर्चना के बाद पदयात्रा इसी रणनीति का एक हिस्सा है।

गौरतलब है कि केदारपुरी के पांडा पुरोहित और स्थानीय जनता में दिल्ली में केदारनाथ मंदिर निर्माण को लेकर गुस्सा है ऐसे में पदयात्रा के दौरान कांग्रेस अनेक स्थानों पर जनता को अपने साथ जोड़ने में कितनी सफल होगी यह तो भविष्य के गर्भ में छुपा है। लेकिन फिलहाल प्रदेश में दोनों उपचुनाव जीतने वाली कांग्रेस को ये मौका किसी ‘तीतर के मुंह लगी बटेर’ सरीखा हाथ लग चुका है। लिहाजा अब दिग्गज नेताओं ने भी मोर्चा संभाल लिया है। खुद पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत इस मुद्दे को लेकर मैदान में उतर चुके हैं। रावत ने अपनी फेसबुक पोस्ट में लिखा कि ‘केदारनाथ प्रतिष्ठा रक्षा यात्रा में ऋषिकेश और अगस्त्यमुनि में भाग लूंगा। धाम और शंकराचार्यों के सम्मान को बचाने की लड़ाई अभी समाप्त नहीं हुई है।
भाजपा में धाम बनाने की होड़ लगी है।’

हालांकि केदारनाथ के ही एक

दुकानदार का यह भी कहना है कि कांग्रेस को सफल चार धाम यात्रा और स्थानीय कारोबारियों की बढ़ती आर्थिकी हजम नहीं हो रही है, इसलिए वह यात्रा प्रभावित करने की कोशिशों में जुटे हैं। इस मुद्दे पर हरिद्वार से पैदल यात्रा की घोषणा से कांग्रेस की राजनीतिक मंशा भी स्पष्ट हो गई है। उनका एकमात्र मकसद केदारनाथ में होने वाले उपचुनाव को अपने पक्ष में प्रभावित करना है। अभी हाल ही में धामी कैबिनेट ने राज्य हित में इस बाबत सख्त कानूनी प्रावधान लागू करने का निर्णय लिया है। जिसके तहत अब राज्य के भीतर या बाहर कोई भी व्यक्ति या संस्था राज्य के चारों धामों और प्रमुख मंदिरों के नाम पर कोई समिति या ट्रस्ट नहीं बना सकेगी। जबकि इससे पहले दिल्ली के जिस प्रतीकात्मक केदारनाथ पर ‘धाम’ शब्द पर उत्तराखण्ड के पुरोहितो को आपत्ति थी उसे हटाकर अब ‘मंदिर’ जोड़ दिया गया है।

इस धर्म संकट से बाहर निकलते ही भाजपा के लिए जो सियासी संकट मुंह बाएं खड़ा है वह यह है कि केदारनाथ में उसके लिए जिताऊ उम्मीदवार की तलाश कैसे पूरी हो। प्रदेश में भाजपा की सरकार होने पर सबसे अधिक दबाब भाजपा संगठन पर ही है। इसलिए भाजपा केदारनाथ सीट को हासिल करने के लिए बेताब है। परंतु उसके सामने यक्ष प्रश्न है कि चुनाव में उसकी नैय्या पार कौन लगा सकता है। कहने को तो पार्टी में कई प्रबल दावेदार हैं। जिनमें पहले नंबर पर दिवंगत विधायक शैलारानी रावत की पुत्री ऐश्वर्या रावत है। कयास लगाए जा रहे हैं कि भाजपा सहानुभूति की लहर को भुनाने के लिए दिवंगत शैलारानी रावत की पुत्री ऐश्वर्या रावत को अपना प्रत्याशी बना सकती है। हालांकि चर्चा यह भी है कि भाजपा फिर किसी नए प्रत्याशी या फिर किसी पुराने जमीनी नेता पर भी दांव लगा सकती है। उत्तराखण्ड में अब तक भाजपा तथा कांग्रेस दोनों का ही यह इतिहास रहा है कि उनके द्वारा किसी विधायक की मौत होने पर उनके परिजनों को ही प्रत्याशी बनाया जाता रहा है और वे चुनाव जीत कर विधान सभा में भी पहुंचते रहे हैं।

अगर केदारनाथ सीट पर भी भाजपा की यही रणनीति रही तो ऐश्वर्या रावत की उम्मीदवारी तय है। इसके अलावा भाजपा के पास और भी कई दावेदार हैं। जिनमें पूर्व विधायक आशा नौटियाल जो दो बार केदारनाथ की विधायक रह चुकी हैं। 2017 में उन्होंने कांग्रेस से आई शैलारानी का विरोध करते हुए निर्दलीय चुनाव लड़ा था। वर्तमान में आशा नौटियाल महिला मोर्चा की प्रदेश अध्यक्ष के पद पर रहते हुए क्षेत्र में काफी सक्रिय हैं। इसके अलावा संघ की पृष्ठभूमि को अगर तवज्जो मिलती है तो पूर्व जिला पंचायत अध्यक्ष चण्डीप्रसाद भट्ट, जो वर्तमान में सीमांत अनुश्रवण परिषद में उपाध्यक्ष (दर्जा राज्यमंत्री) हैं। दशज्यूला क्षेत्र निवासी और नैनीताल हाईकोर्ट बार एसोसिएशन के सचिव जयवर्धन काण्डपाल का नाम भी उम्मीदवारों की सूची में है। वहीं पूर्व उपाध्यक्ष अशोक खत्री भी पार्टी में अपनी पकड़ के चलते दावेदारों की सूची में अपना नाम चलाए हुए हैं।

कुलदीप रावत भी भाजपा से टिकट पाने के प्रबल दावेदार के रूप में उभरे हैं। लोकसभा चुनाव के दौरान भाजपा में शामिल हुए कुलदीप रावत दो बार केदारनाथ से निर्दलीय चुनाव लड़े हैं तथा दोनों बार 13 हजार वोट लाकर दूसरे स्थान पर रहे हैं। बीकेटीसी के वर्तमान अध्यक्ष अजेन्द्र अजय भी दावेदारों में शामिल हैं। जिस तरह से वे दिल्ली के केदारनाथ मंदिर निर्माण प्रकरण में वे सरकार के पैरोकार के रूप में सामने आए हैं उससे उन्हें भी मजबूत प्रत्याशी माना जा रहा है। बीकेटीसी (श्री बदरी-केदार मंदिर समिति) से उनका कार्यकाल जल्दी ही समाप्त होने को है। पूर्व जिलाध्यक्ष दिनेश उनियाल, पूर्व दर्जाधारी पंकज भट्ट, एडवोकेट संजय दरमोड़ा, कुलदीप नेगी आजाद भी दावेदारों में शामिल हैं। भाजपा ने इससे इतर अगर बाहरी प्रत्याशियों पर दांव खेला तो उसमें सबसे आगे कर्नल अजय कोठियाल का नाम होगा। जिन्होंने केदारनाथ पुनर्निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी।

केदारनाथ सीट पर भाजपा और कांग्रेस दोनों ही जीतती रही हैं। 2002 के विधानसभा चुनाव में इस सीट से भाजपा की उम्मीदवार आशा नौटियाल विधायक चुनी गई थीं। उन्होंने कांग्रेस की उम्मीदवार शैलारानी रावत को हराया था। 2007 के विधानसभा चुनाव में आशा दूसरी बार भाजपा की विधायक चुनी गईं इस बार उन्होंने कांग्रेस पार्टी के उम्मीदवार कुंवर सिंह नेगी को हराया था। 2012 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस पार्टी की उम्मीदवार शैलारानी रावत विधायक चुनी गई उन्होंने दो बार की विधायक रहीं आशा नौटियाल को हराया था। 2017 के विधानसभा चुनाव में इस सीट से कांग्रेस पार्टी के उम्मीदवार मनोज रावत विधायक चुने गए उन्होंने निर्दलीय उम्मीदवार कुलदीप सिंह रावत को हराया था। पूर्व में पत्रकार रहे कांग्रेस के मनोज रावत इस चुनाव में 13,906 वोट ले गए थे। तीसरे नंबर पर निर्दलीय उम्मीदवार आशा नौटियाल रही थीं, जो भाजपा की बागी उम्मीदवार के तौर पर चुनाव लड़कर 11,736 वोट ले गई जबकि भाजपा की शैलारानी रानी रावत को इस चुनाव में 11,472 वोट पड़े थे।

2022 के विधानसभा चुनाव में भाजपा के टिकट पर शैलारानी रावत चुनाव जीती उन्होंने निर्दलीय कुलदीप रावत को 8 हजार से अधिक वोटांे से हराया। जबकि कांग्रेस के मनोज रावत इस चुनाव में तीसरे नंबर पर रहे थे। शैलारानी का राजनीतिक करियर मिला जुला रहा। उन्होंने कांग्रेस और भाजपा दोनों पार्टियों की ओर से राजनीति की। उनका राजनीतिक सफर कांग्रेस से शुरू हुआ था। हरीश रावत की सरकार के दौरान मची भगदड़ में शैलारानी भी 9 विधायकों के साथ भाजपा में शामिल हो गई थीं। साल 2017 में चुनाव प्रचार के दौरान शैलारानी रावत गिर गई थी, जिससे उन्हें आंतरिक चोट आई थी। इससे मांस फटने के कारण उन्हें कैंसर भी हो गया था। करीब तीन साल तक इलाज के बाद वह स्वस्थ होकर अपने घर लौटी और फिर से राजनीति में सक्रिय हो गई। लेकिन कुछ महीने पहले ओंकारेश्वर मंदिर ऊखीमठ की सीढ़ियों से गिरने के कारण उनकी रीढ़ की हड्डी में फ्रैक्चर आ गया था। उन्हें हायर सेंटर ले जाया गया, जहां उनकी सर्जरी की गई, वह सफल नहीं हो पाईं। दो दिन तक वह जिंदगी और मौत की जंग से लड़ती रहीं। आखिरकार उन्होंने 9 जुलाई को अंतिम सांस ली।

You may also like

MERA DDDD DDD DD